Tuesday, October 11, 2011

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते




[ अपने एकांत में लिखना भले नैसर्गिक हो, लेकिन एक लेखक का लिखा पढ़ते हुए शायद हममें पहली बार वह स्फुरण भी पैदा होता है जिससे 'लेखन' एक निजी कर्म न रहकर भाषा और साहित्य की बड़ी बिरादरी में भागीदारी हो जाता है. हालाँकि बीतते वक़्त के साथ लिखना-न-लिखना खुद हमारे लिए अचरज और रहस्य का भी सबब बनता जाता है. हम कई दफा लिख लेने और न लिख पाने की दुविधा और पीड़ा के बीच घड़ी की पेंडुलम की तरह झूलते रहते हैं. इसलिए मन में यह सहज जिज्ञासा उठती है कि जिन लेखकों को हम पढ़ते हैं, वे कैसे इन स्थितियों से दो-चार होते होंगे ? कैसा होता होगा उनका लिखना-पढ़ना-जीना? कैसे वे इनके बीच एक जटिल, तनाव भरा किन्तु अनिवार्य सम्बन्ध बना पाते हैं ? सबद की इस दूसरी गोष्ठी में इन्हीं सवालों को जगह दी गई है. हमारी भाषा में लेखकों से ऐसे सवाल पूछने का न तो रिवाज़ है न ही उनके उत्तर पाने/देने में दूर तक दिलचस्पी. गोष्ठी में चार महत्वपूर्ण कवि-लेखकों का शामिल होना इस ओर की गई एक पहल है. ऊपर दी गई तस्वीर माइक स्टिलकी की. शेष तस्वीरें लेखकों के सौजन्य से. ]



१. आप कब लिखते हैं?

कुंवर नारायण :
सुबह लिखना पसन् करता हूँ -- खासकर कविता. ऐसा लगता है किमस्ति‍‍ष् के जागने और दि शुरू होने के बीच निकट लयात्मक संबंध है. शाम को पढ़ना तो पसन् करता हूँ लिखना नहीं. इसीलि ज़ल्दी सोने और ज़ल्दी जागने की पुरानी आदत है. किसी कारण से यदि सुबह लिखना नही कर पाता तो दि बेकार लगने तगता है. अन्यथा, अच्छी शुरूआत हो तो शाम तक भी उसका सिलसिला चलता रह सकता है.

गीत चतुर्वेदी :
इसका कोई निश्िचत समय नहीं है. कई बार ऐसा होता है कि कोई विचार या छवि मन या दृष्टि में आई, और उसे उसी क्षण लिख लिया गया. और कई बार ऐसा होता है कि कोई विचार या छवि पंद्रह साल से मन के भीतर थी, और अब जाकर लिखी गई. जैसे परागण की प्रक्रिया है. तितलियां एक फूल पर बैठती हैं, उसके परागकणों को अपने पैरों में चिपकाकर दूर देश ले जाती हैं और वहां उन परागों का बीजन होता है. तितलियों के पैर में चिपकते समय यह पता नहीं चलता कि उस परागकण का कोई अस्तित् भी है या नहीं, और उसका भविष् क्या होगा. लेखन में आने वाली छवियां भी ऐसी ही होती हैं. विशेषकर वे, जिनके बारे में हम कहते हैं कि ये बरसों पहले की कोई छवि अथवा विचार हैं. वे छवियां या विचार बरसों तक मन के भीतर की हवा में भटकते हैं, बाहर आते हैं, तो कई बार पता भी नहीं चलता था कि ये भी भीतर थे. अमूमन, तुरंत कुछ नहीं होता, सिवाय एक टेंपरेरी जॉटिंग के, वह विलंबित रहता है. किसी विचार को कब लिखा जाना है, इसलिए यह तय नहीं होता.

व्योमेश शुक्ल :
हमेशा लगता है कि पहले लिखने का वक़्त ज़्यादा था. तब हम लिख सकते थे. याने, अगर सवाल यह है कि 'आप कब लिखते हैं' तो इसका तुकांत जवाब अपने पास यही है कि 'हम तब लिखते हैं'. इस 'हैं' को 'थे' भी पढ़ा जा सकता है. लिखने का अभीष्ट शांत कोमल सादा पवित्र क्षण आता ही नहीं है. हमलोग लिखकर उस क्षण को हासिल करना चाहते हैं जबकि उस क्षण को लेखन के बाहर होना चाहिए. उस क्षण को लिखने के पहले जाना चाहिए. माहौल या मौसम की तरह. शायद शुरूआत की सारी तारीख़ें ख़त्म हो गयी हैं और सबकुछ बीच में है. याने, एक जवाब यह भी है कि हम बीच में लिखते हैं. यह 'बीच' हमें दे दिया गया है. हम इसका जो कर सकते हैं, करते हैं. हम व्यतीत और आगामी, जीवन और मरण, समयों, शहरों, विचारों, कविताओं और कहानियों और निबंधों, इंतज़ारों, अपेक्षाओं, विकलताओं, नींदों, फ़ोन काल्स, ट्रैफ़िक, साहित्यिक डाह, अन्याय, अपमान और टुकड़ा-टुकड़ा प्रेम के बीच में लिखते हैं. एक अहर्निश गोधूलि ही हमारा लिखने का वक़्त है. ज़ाहिर है कि वह कभी भी जाती है और नहीं भी आती.

चन्दन पाण्डेय :
लेखन के लिए समय एक मुश्किल है पर अकेली मुश्किल नहीं. समय कहीं किसी कोने से निकल भी आए अगर, तो विचार श्रृंखला के टूटने से सबकुछ गड्ड मड्ड हो जाता है. मसलन, एक वाक्य लिखा कि ' देश के निस्बतन् स्त्रियों का अतीत मुझे रूचिकर लगता है. ' ( अगली किसी कहानी का शुरुआती वाक्य ) और इससे आगे का वाक्य लिखने से पहले ये मुश्किलें पीछे पड़ जाती हैं :-
) कोई छूटा हुआ काम याद जायेगा. कोई भूली हुई बात, जिसके याद आने से कोई काम निकल सकता है, याद जायेगी.
) कभी कभी तो डर भी बना रहता है कि इधर मैं कहानी में मशगूल हूँ, उधर कहीं कोई काम छूटा तो नही जा रहा.

ये सारी परेशानियाँ अपनी जगह हैं, पर लिखता तो हूँ. अपने जाने लगातार लिखता हूँ. किसी खास कहानी की बात करें तो उसका लिखा जाना, मेरे लिए उस दिन शुरु हो जाता है,जिस दिन मुझे कोई बात चमकती है. बात मसलन आईडिया, चित्र, चलचित्र या कुछ और. कथा बीज मैं डायरी में, नोट्स में कहीं कही टॉक जरूर देता हूँ. फिर विचारने की शुरुआत होती है. मसलन, इस कथा बीज के सहारे कौन कौन सी बात कही जा सकती है, पात्र कौन होंगे, भाषा या सम्वाद कैसे रहेंगे, सम्वाद रहेंगे भी कि नहीं. जब सारे विकल्प सामने जाते हैं तो चुनता हूँ कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण कौन सा विकल्प है. यह चुनाव नितांत व्यक्तिगत सोच विचार से करता हूँ. हाँ लेकिन, अनुसन्धान तो नही करता, पर एकाधिक बार रेफरेंसेज जाँचता जरूर हूँ. कुल कारोबार में इतना समय गुजर जाता है कि कहानी ठंढे बस्ते में चली जाती है और देर बाद, महीना या साल बाद, उन्हें लिखता हूँ.
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२. क्या लिखने का कोई तय वक़्त है?

कुंवर
नारायण :
उत्प्रेरक लेखन खुद अपना समय बनाता है. उसके लि घड़ी कोई ख़ास माने नही रखती. वैसे, सुबह 4-5 घण्टे लिखना-पढ़ना अच्छा लगता है. पढ़ना शाम को भी हो जाता है, पर शामेंघर से बाहर बितानाचाहता हूँ. सिनेमा, कॉफी-हाउस, मित्रो से मिलना-जुलना, बातचीत, घूमने-फिरने की पुरानी आदत आज भी बनी हुई है. शाम होते ही मन बाहर भटकने की और भागता हैचाहे किताबों, फिल्मों वगैरह के रास्ते ही; अन्यथा, एक अजीब-सी घुटन महसूस होती है! मैंने अनुभव किया है किएक अच्छी शाम बीते तो सुबह लिखना भी बेहतर होता है.

गीत चतुर्वेदी :
हां. लिखने की अलग्-अलग छवियां हैं. लिखना मेरे लिए निहायत निजी काम है. कोई मुझे देख रहा हो, तो मैं लिख नहीं सकता. जैसे कोई मुझे देख रहा हो, तो आम नहीं खा सकता. आम खाना भी निहायत निजी रस है. मुझे हैरत होती है कि ग़ालिब सबके सामने आम कैसे खा लेते थे. और लोग भी. :-) इसीलिए मैं अमूमन रात को लिखता हूं, यह तय होने के बाद कि अब मुझे लिखता देखने के लिए कोई शरीर नहीं आएगा. इसका एक व्यावहारिक कारण नौकरी भी है. हालांकि मेरे लिए कोई नियम अंतिम नहीं होता, मैं ख़ुद को चौंका देता हूं और सबसे ज़्यादा वादाखि़लाफ़ी भी ख़ुद से ही करता हूं. इसीलिए कुछ चीज़ें मैंने दिन में भी लिखी हैं. 'पिंक स्लिप डैडी' का एक हिस्सा मैंने मुंबई एअरपोर्ट के बाहर एक ओपन रेस्त्रां में लिखा था. ट्रेन में यात्रा करते हुए भी मैंने कुछ चीज़ें लिखी हैं. लेकिन यह सब हमेशा नहीं. नियमित लेखन के लिए रात का समय तय है. लिखते समय कई बार मुझे रेफरेंस की ज़रूरत पड़ती है, डायरी में लिए गए नोट्स पढ़ने होते हैं, मुझे अच्छा लगता है कि लिखते समय मेरे चारों ओर किताबें, फिल्में और संगीत हो. यह हर कमरे में उपलब् नहीं. इसलिए मैं अपनी स्टडी में, अपने टेबल पर ही बैठकर लिखता हूं.

व्योमेश शुक्ल :
रोज़ सुबह यह याद आता है कि लेखक हूँ. लेखक हुए ज़्यादा दिन नहीं हुए, इसलिए इस अनुभव में एक ताज़गी बाक़ी है. फिर इस अनुभव को भुला देने वाली घटनाएँ बेसंभाल ढंग से घटती हैं. बीच-बीच में लेखक होना आता है और कवि के शब्दों में, 'विचार की तरह' चला जाता है. मेरा ख़याल है कि मैं और मेरे कई लेखक दोस्त कविता की अंतर्वस्तु हासिल करके गँवा देते हैं. इसकी वजह यह भी है कि लिखने का कोई तय वक़्त नहीं है. दरअसल जब आप कविता को ज़िन्दगी के तर्कों से लिखने कि कोशिश करेंगे तो ज़िन्दगी भी आपको कविता के तर्कों से जीनी पड़ सकती है. यह विचित्र पारस्परिकता है. मैं इसका अनुभव करता हूँ. लिखने का तय वक़्त एक चमत्कार है और चमत्कारों के लिये इंतज़ार करना पड़ता है. चमत्कार होता है और सबकुछ विन्यस्त हो जाता है. रचना भी जीवन भी. मेरा यक़ीन है कि चमत्कार होगा, जैसे पिछली बार हुआ था.

चन्दन पाण्डेय :
कथा हर वक़्त मन मस्तिष्क में चलते रहती है इसलिए आलम यह है कि जब भी समय मिलता है, घर पर, ऑफिस में, यात्राओं में (खास कर रेल यात्राओं में), लिखता हूँ. दूर दफ्तर सुबह साढे सात बजे पहुँच जाना होता है इसलिए रात को जल्दी सोना होता है. वरना बड़ी इच्छा रहती है कि देर रात तक लिखूँ. है दरअसल यह कि मुक्कमल लिखना शुरु करने से पहले सोचने / विचारने के लिए काफी समय चाहिए। मसलन शाम को : बजे घर गया तो लिखने का मूड बनाते बनाते नौ या दस बज जायेगे. तब तक डायरी पलटना, नोट्स देखना, संगीत सुनना ( कुल मिलाकर लिखने को ' अवॉयड' करना ), इस चाय दुकान से अगले तक घूमना. जब सब तैयार होता है तो आपको याद आयेगा सुबह होते होते दफ्तर भी जाना है चन्दन और फिर सारा ध्यान घड़ी पर रहता है.
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३. लिखने के लिए कम्प्यूटर या कागज़ में से किसका इस्तेमाल करते हैं और क्यों?

कुंवर
नारायण :
कागज़ कलम के साथ अधि सहज आत्मीयता अनुभव करता हूँ. टाइपराइटर पर भी लिखने का अभ्यास है. पर कम्प्यूटर पर असहज हो जाता हूँवह मुझे अकारण कुछ ज्यादा तुनुकमिजाज़ लगता है. काग़ज़ कलम की सादगी, विनम्रता और स्पर्श तो कम्प्यूटर मे है, टाइपराइटर में. उनमें मशीन-युग की सुविधाएँ हैं तो थोड़ी अकड़ भी.

गीत चतुर्वेदी :
अब काग़ज़ की आदत नहीं रही. मानसिकता भी वैसी नहीं रही. काग़ज़ कुछ भी लिखा जाए, तो वह प्रथमदृष्टया जॉटिंग् होते हैं. मुख् लेखन सीधे लैपटॉप पर ही होता है. मैं कई बरसों से कम्प्यूटर के साथ हूं. और अधिकतम लिखाई उसी पर है. काग़ज़ ज़्यादा श्रम लेता है. मुझे रफ़्तार पसंद है. और की-पैड पर उंगलियां कई बार मन में आने वाले विचारों की रफ़्तार के साथ तालमेल बिठा लेती हैं. बशर्ते की-पैड रफ़्तार से घबराकर मशीन को हैंग कर दे. लिखने के बाद उलटफेर करता हूं और वह कम्प्यूटर पर आसान है. गैजेट्स और तकनीक मुझे आकर्षित करते हैं. इसलिए जब कुछ नहीं होता, तो मैं अपने मोबाइल पर भी लिख लेता हूं, कई बार अपने टैब पर भी. मुझे याद है कि कविता की कुछ पंक्तियाँ ऑन--गो सूझी हैं और उन्हें मैंने मोबाइल पर टाइप कर ख़ुद को ही एसएमएस कर दिया है.

व्योमेश शुक्ल :
मैं हमेशा काग़ज़ पर लिखता हूँ. काग़ज़, अब तक, चेतना के ज़्यादा क़रीब है. उसमें ज़्यादा अप्रत्याशित, चैलेन्ज और निमंत्रण है. वह आह्वान करता रहता है. अभी भी वह ऐसी जगहों पर साथ चला आता है जहाँ लैपटॉप नहीं सकता, मसलन संकटमोचन संगीत समारोह की दो प्रस्तुतियों के दरमियान या सुजाता महापात्र के ओडिसी के बीच में. लैपटॉप कभी भी अजनबियों की तरह पेश आने लग सकता है, जैसे नेट नहीं लग रहा है, वगैरह-वगैरह. सादा काग़ज़ पर सुंदर-सुंदर लिखना एक चिरंतन स्वप्न है. फिर काटाकूटी से भी हौसला बढ़ता है कि कुछ सार्थक हो रहा है. कम्प्यूटर पर ऐसी संभावनाएँ कम हैं. इन बातों का संबंध वस्तुपरकता से कम और तबीअत से ज़्यादा है. ये हवाई आदतें हैं और कभी भी बदल जायेंगी. इन्हें तय करने में एक पुख्ता तर्कपूर्ण आलस्य बड़ी भूमिका निभाता है. यों मैं अपने अंतराल, अभाग्य और विनाश संभव करता हूँ. ऐसा करने के और भी तरीक़े हैं लेकिन उनका संबंध इस प्रश्न से नहीं है.

चन्दन पाण्डेय :
कम्प्यूटर पर लिखता हूँ. सम्पादन में आसानी होती है. दूसरे, रोजगार के जो सिलसिले है, उनमें लगातार लैपटॉप पर ही बने रहना होता है, इसलिए कम्प्यूटर से कागज और फिर कम्प्यूटर की यात्रा कठिन हो जाती है. वैसे कम्प्यूटर, शब्दों की मितव्ययिता नहीं सिखाता. जो बेध्यानी लोग हैं उनके लिए कम्प्यूटर पर वाचाल होने की सम्भावना अधिक होती है.
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. लेखन के बीच अन्तराल या निरन्तरता किस तरह बनाते हैं?

कुंवर
नारायण :
बेमन से लि‍खना नापसन्‍द करता हूँ. जब मन लगे तभी लि‍खना चाहता हूँ; अन्‍यथा, अकसर आधे लिखे को बीच ही में छोड़ देता हूँ. कभी-कभी वाक्‍य तक को पूरा नहीं करता. इस तरह लि‍खने के बीच अन्‍तराल बनते चलते हैं. ये अन्‍तराल बड़े काम के होते हैं; सार्थक अवकाश, जो आगे के लेखन को गति‍ देते हैं. जि‍से तुम नि‍रन्‍तरता कह रहे वह इन अन्‍तरालों से फर्क़ है, मगर इनसे बहुत अलग नहीं. जैसे, संगीत की लय में आरोह-अवरोह। राग ‘पक्‍का‘ होना चाहि‍ए... निरंतरता से तुम्हारा मतलब यदि लगातार लेखन, या योजनाबद्ध लेखन से है तो निश्‍चय ही मैं बहुत जुटकर लि‍खने वालों मे से नहीं हूँ. आराम से लि‍खना मुझे आराम देता है.

गीत चतुर्वेदी :
यह चीज़ तो बिल्‍कुल अपने हाथ में नहीं है. मैं निरंतरता बनाना चाहता हूं, जीवन अंतराल बनाता है. दोनों के बीच छीनाझपटी चलती है. और दोनों एक दूसरे से दुखी हो जाते हैं. चूंकि मैं एक थीम या प्‍लॉट पर काफ़ी समय तक काम करता रहता हूं, इसलिए पहली दिक़्क़त यह होती है कि इतने समय के लिए एक विचार को, उसके कई सहयोगी विचारों को, अपने दिमाग़ में बनाए रखना. उसके सूत्र को पकड़े रखना. इसीलिए मेरे लिए कौंध का विशेष महत्‍व नहीं है. कौंध भी संचयित हो जाती हैं. तुरंत बाहर आ नहीं दमकतीं. जैसे 'सावंत आंटी की लड़कियां' लिखने में मुझे चार साल का समय लगा था, और उस दौरान मैंने पांच शहर बदले थे. कुछ दिन लिखने के बाद सब कुछ छूट जाता, और मैं लगभग यह भूल जाता कि आखि़र बात कहां छूटी थी, मुख्‍य विचार क्‍या था. हर चीज़ के नोट्स लेने, ईको की तरह चित्र और नक्‍शे बनाने की पुरानी आदत के कारण काफ़ी चीज़ें संभल जातीं. दो-तीन सिटिंग के स्‍ट्रगल के बाद मैं वापस अपनी लय पकड़ पाता. इसीलिए लिखने से पहले हर चीज़ के नोट्स बनाने को मैं अपने लिए ज़रूरी मानता हूं.

व्योमेश शुक्ल :
मुझे पता नहीं है कि ऐसा कैसे किया जाता है. मैं धुआंधार लिखता रहा हूँ लेकिन आजकल दुकान बंद है और गाहे-बगाहे खुलती है. बेशर्मी इस क़दर है कि प्रायः किसी तरह के कर्तव्य का भी एहसास नहीं होता. लेकिन अंधविश्वास है कि बहुत कुछ संचित हो रहा है. इनदिनों एक अंतराल है और पहली बार है. निरंतरता भी पहली बार ही थी. कुछ भी योजित नहीं है और जो है, पर्याप्त बचकाना है. अंतराल अपने तर्कों से है - निरंतरता की तरह. मुझे सिर्फ़ रचना को बनाना ही आता है. अंतराल तो स्वयंभू है. हालाँकि ऐसी सूरत से बाहर निकलने की विकलता ख़ूब है लेकिन इस हालात के भी अपने मज़े हैं. कुछ लोग रोज़ कवि बने रहना चाहते होंगे. मैं सिर्फ़ रचना करना चाहता हूँ.

चन्दन पाण्डेय :
कुछ अंतराल समय से बन जाता है और कुछ सोचने से. जैसे, सोचने विचारने का असर नकार पर पड़ा. नकार कहानी के लिखने की शुरुआत से कहानी में पहले माँ एक ही थी पर जब कहानी पूरी हो रही थी तब ख्याल आया कि अगर इस नाम के औरतों की सँख्या चार या पाँच रहे तो कैसी कहानी बनेगी. समय का असर सिटी पब्लिक स्कूल कहानी पर पड़ा. जब यह कहानी पहली दफा लिखी तो यह काफी रोँदू किस्म की कहानी थी और उसके हाल पर हल्की तरस खाकर उसे मैने छोड़ दिया. जब उसे तीन साल बाद लिखा तो कहानी बिल्कुल बदली हुई थी.
जैसी निरंतरता चाहता हूँ उसका इंतजार है अभी.
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५. क्या कभी 'रायटर्स ब्लाक' का अनुभव किया है ? इससे कैसे उबरते हैं?

कुंवर नारायण :
जो कई वि‍धाओं मे लि‍खते है उनके लि‍ए राइटर्स ब्‍लॉक की समस्‍या शायद कम ही उठती है. कवि‍ता इस माने में अपने आप में एक relaxed वि‍धा है. थकने की समस्‍या धुऑधार लि‍खने वालों के सामने ज्‍यादा उठती है. मैं वैसे भी कम लि‍खने वालों में से हूँ.

गीत चतुर्वेदी :
लेखक हमेशा एक रायटर्स ब्‍लॉक की तरफ़ अग्रसर होता है. यदि रचनात्‍मकता कोई प्रवाह है, तो यक़ीनन उसमें बाधाएं भी होंगी. सारी धाराएं अंतत: एक विशाल और व्‍यापक बाधा की ओर प्रस्‍थान ही हैं. मुझे कई बार रायटर्स ब्‍लॉक का अनुभव होता है. इस सवाल के साथ मुझे कालिदास का एक सुंदर बिंब याद आता है. कुमारसंभव का दृश्‍य है यह. तपस्‍या के बाद पार्वती को शिव के दर्शन हुए हैं. वह आगे बढ़कर शिव को छू लेना चाहती हैं, लेकिन साथ ही खुद को रोक भी देती हैं. कालिदास यहां एक बिंब देते हैं कि जिस तरह नदी एक बाधा के पास पहुंचकर अपने प्रवाह को वापस मोड़ लेती है, दीवार से टकराकर पानी थोड़ा मुड़कर या तो पीछे की तरफ़ अपना रास्‍ता बनाता है, या ज़रा-सा दूसरे किनारे की ओर बढ़ जाता है, उसी तरह पार्वती अपना एक पैर उठा लेती हैं, जिससे यह भान होता है कि वह आगे बढ़ रही हैं, लेकिन अपने दूसरे पैर को वह टिकाए रखती हैं यानी ज़मीन भी नहीं छोड़ रहीं यानी आगे बढ़ना भी नहीं चाहतीं. कालिदास ने दृश्‍य को यहीं फ्रीज कर दिया है. यह स्त्रियोचित गति और स्‍थैर्य का, मन और अन्‍यमनस्‍कता का, आगे बढ़ने और रुक जाने का बहुत सुंदर बिंब है. यह अवांतर अर्थों में प्रेम की प्रतीक्षा का बिंब हो, लेकिन कई बार मुझे यह रायटर्स ब्‍लॉक का बिंब दिखता है. यह रचनात्‍मकता का भी बिंब है. लेखक हमेशा पार्वती जैसी इसी मुद्रा में रहता है. एक पैर आगे बढ़ाए हुए, हवा में और दूसरा पैर रोके हुए, ज़मीन पर टिकाए हुए. आप कभी भी रचना की तरफ़ पूरी तरह, दोनों पैर बढ़ाकर नहीं जा सकते. आपमें जितनी गति होगी, उतना ही स्‍थैर्य भी होगा. आप जितना मन से कर रहे होंगे, उतनी ही अन्‍यमनस्‍कता भी होगी. मैं हर समय लिख रहा होता हूं और हर समय एक ब्‍लॉक में भी रहता हूं. मन और अन्‍यमनस्‍कता के बीच, गति और स्‍थैर्य के अनुपात में फ़र्क़ आता है, तो वह ब्‍लॉक बन जाता है. मेरे साथ कई बार होता है ऐसा.

कुछ बहुत ही स्‍थूल किस्‍म के कारण भी होते हैं. मनोदशा, परिस्थितियों के अलावा कई बार कोई ऐसा असाइनमेंट अपने हाथ में ले लें, जो दरअसल आपकी सीमा से काफ़ी बाहर हैं. ख़ुद को स्‍ट्रेच करने के बाद भी वहां तक नहीं पहुंच पाते, फिर भी संघर्ष कर रहे हैं, तो नतीजा यह निकलता है कि आप जो मूल काम कर रहे थे, उससे तो भटक ही गए, यह जो बीच में काम शुरू किया था, यह भी गया. जैसे क्रिकेट में खिलाड़ी फॉर्म खो देते हैं, एक संघर्ष भरी पारी के बाद, उसी तरह लेखन में भी होता होगा. कई बार मैं मित्रों-संपादकों को नाराज़ कर देता हूं, और इसी डर के कारण मना कर देता हूं. क्‍योंकि ऐसे कामों के कारण यह ब्‍लॉक मेरे अनुभव में आ चुका है.

वैसे, मैं यह मानता हूं कि ऐसा ब्‍लॉक होना बहुत ज़रूरी है. यह विश्‍लेषण का समय देता है. प्रवाह में आई कोई भी बाधा एक ख़ास कि़स्‍म का घर्षण पैदा करती है और घर्षण अमूमन ऊर्जा के कारक बनते हैं. ठीक ब्‍लॉक के वक़्त में बेचैनी होती है, अवसाद आता है, लेकिन उसके बाद ताज़गी भी दिखती है. यह सांप का केंचुल छोड़कर अपना त्‍वचा को पुनर्नवा करते रहने के उपक्रम की तरह है.

रायटर्स ब्‍लॉक का चूंकि कोई एक कारण होता नहीं, इसलिए उससे निपटने का भी कोई एक तरीक़ा नहीं हो सकता. यह बहुत निजी और इंडीविजुअल्‍स के हिसाब से बदलता जाता है. जैसे क्रिकेट में कहते हैं न, अपने बेसिक्‍स से चिपके रहो, लाइन और लेंग्‍थ पर ध्‍यान दो, फुटवर्क और टाइमिंग संभालो. वही करता हूं. ब्‍लॉक्‍स के दिनों में मैं मिनिमलिस्‍ट हो जाता हूं. बहुत बुनियादी तकनीकों का प्रयोग करता हूं. उन दिनों मेरा लक्ष्‍य किसी भी तरह ख़ुद को अभिव्‍यक्‍त कर लेना होता है. अभिव्‍यक्ति की सुंदरता द्वितीय हो जाती है. संकट तो अभिव्‍यक्ति पर है. एक बार वह संकट हटा दिया जाए, तो अभिव्‍यक्ति में कलात्‍मक सुंदरता को वापस पाया जा सकता है. उसमें आप ख़ुद एक बदलाव महसूस करते हैं. अचानक एक चमकीला विचार या एक चमकीली पंक्ति आती है, जो आपको ब्‍लॉक से बाहर खड़ा कर देती है. जैसे मुझे याद है, उभयचर में मैंने एक पंक्ति लिखी है, 'दुर्भाग्‍य के दिनों में सुंदरता की फि़क्र करना कला से ज़्यादा जिजीविषा है.' यह पंक्ति एक ब्‍लॉक के दौरान ही लिखी गई थी. उस समय मैं ख़ुद से जूझ रहा था और मैंने पाया कि जब आप न लिखने के संकट का साहस से सामना करते हैं, तब आपकी जिजीविषा ही आपकी कला बन जाती है.

व्योमेश शुक्ल :
क्या तो रायटर और क्या रायटर्स ब्लॉक. मैं सिर्फ़ लेखक नहीं हूँ. मुझे तबला बजाना, गाड़ी चलाना, पोर्न फ़िल्म देखना, नाटक करना, राजनीतिक मुद्दों पर दोस्तों से तल्ख़ बातचीत करना, प्रेम करना, घूमना, वादा करके पूरा न करना और यों ही बहुत कुछ करना आता है. जैसा कि सहाय जी की एक कविता कहती है, किसी ने मुझसे नहीं कहा था कि मैं आऊं और काव्य रचूँ. मैंने कोई ठेका नहीं लिया है कविता या निबंध लिखने का. 'सबद'-संपादक अनुराग वत्स को छोड़ दें तो लिखने के कठिन दुर्निवार आग्रह भी नहीं हैं. यह पहल के बाद का दौर है, साहित्यिक इतिहास का 'उत्तर पहल युग'. प्रिंट का वैभव क्षीण होता जा रहा है और वर्चुअल स्पेस में अभिनव गहमागहमी है. माध्यमों की शक्ति और सीमायें लगातार ज़ाहिर हो रही हैं. दृश्य को समझने के औज़ार कम से कम हैं, पूरे दृश्य को एक साथ देखने वाली निगाह और उसे सामान्यीकृत करने वाली मेधा और वक्तृता भी कमज़ोर और संदिग्ध है. अच्छी आलोचना है, लेकिन उससे चिढ अकल्पनीय ढंग से ज़्यादा है. हर रचना अपने से चिढने वालों की मूर्खता, संख्या और शक्ति से एक टुच्चे संग्राम में मुब्तिला है. ऐसे में अच्छा लिखने की महत्वाकांक्षा को ढंग से पोषण नहीं मिल पा रहा है. मैंने कुछ नितांत नये लोगों को हिंदी और अंग्रेज़ी की कविता पढ़ाने और सुंदर वाक्य लिखना सिखाने की कोशिश की है. यह कोशिश भी, अन्य चीज़ों की तरह, बीच में है, लेकिन इसमें बहुत मज़ा है. जयशंकर प्रसाद की जीवनी पढ़ाते हुए छात्रों को उनके खंडहर मक़ान में ले जाना. वहाँ मुहल्ले के लफंगे लड़कों को क्रिकेट खेलते देखकर छात्रों को किसी बड़े प्रश्न का उत्तर मानो मिल गया, कि रचनाकार के माहात्म्य से अपरिचित लोग ही इस परिसर में क्रिकेट खेलने जैसी छोटी हरकत कर सकते हैं. छात्र मेरी ओर देखकर शांतिप्रिय द्विवेदी की तरह मुस्कराते हैं. मुझे लगता है कि महानता के बादल कुछ-कुछ इन पर भी घिर आए हैं, भले ही कामायनी के एक वाक्य का अर्थ भी अभी वे न बता पायें. लेकिन रास्ता यही है रचना की ओर जाने का. रचनाकार से प्यार का और गरिमा का संबंध बनाना होगा. कुछ लोगों को यह बता पाना भी कोई कम सार्थकता नहीं. अगर यह रचना से इतर है, तो है.

चन्दन पाण्डेय :
अभी तो अपने लेखन की उम्र ही जुम्मा जुम्मा चार दिन की हुई पर इस खास 'ब्लॉक' के दूसरे दूसरे चेहरों से अक्सर मुठभेड़ हो ही जाती है. ऐसा अक्सर होता है कि मैं एक साथ कई कई कहानियाँ लिख रहा होता हूँ और किसी ना किसी नुक्ते पर सभी कहानियाँ एक ही समय के आस पास ठप्प पड़ जाती हैं. कई सारी बेचारी कहानियों के साथ ऐसा भी हुआ कि आधी से अधिक लिखी जाने के बाद, लगा कि ये मैं क्या लिख रहा हूँ !! अपना ही लिखा कमजोर मालूम पड़ता है. फिर कई कई दिनों, महीनों तक मामला ठप रहता है.
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६. न लिखने के दिनों में क्या करते हैं ?

कुंवर नारायण :
न लि‍खने के दि‍नों मे पढ़ता ज्‍़यादा हूँ. ज्‍़यादा पढ़ना…लि‍खने का वि‍कल्‍प नहीं है – उसे लि‍खने की तैयारी में शामि‍ल मानता हूँ.

गीत चतुर्वेदी :
न लिखने के दिनों में मैं बहुत कुछ करता हूं. पढ़ता हूं. बार-बार पढ़ी गई चीज़ों को बार-बार पढ़ता हूं. बीस साल पुराना ग्रीटिंग कार्ड खोजता हूं और पंद्रह साल पुरानी कोई तस्‍वीर. बहुत पीछे छूट गए किसी शख्‍स या बात का चेहरा खोजता हूं. जिन लोगों से प्रेम करता हूं, उनसे जी खोलकर बातें करता हूं. जल्‍दी सोने की कोशिश में बिस्‍तर में घुस जाता हूं और छह घंटे तक करवटें बदलने के बाद पाता हूं कि सो ही नहीं पाया, जाने क्‍या-क्‍या सोचता रहा. सड़क पर देर तक पैदल चलता हूं जो कि दुर्लभ होता है आम दिनों में. कुछ स्‍केच बनाता हूं, कभी-कभार पेंट कर लेता हूं, किचन में कोई एकदम देसी या एकदम विदेशी या एकदम प्रायोगिक, व्‍यंजन बनाता हूं. कमरे की बत्‍ती बुझाकर अधलेटा संगीत सुनता हूं. नया संगीत खोजता हूं. पुराने के पास फिर-फिर जाता हूं. मोत्‍ज़ार्ट, फिलिप ग्‍लास और प्रैसनर तीनों को एक साथ चला देता हूं एक ही कमरे में, फिर स्‍वरलहरियों को खोजता हूं. फिल्‍में देखता हूं. अगर उस दौरान कुछ और काम नहीं, या छुट्टी का दिन है, तो एक ही दिन में चार-चार फिल्‍में देख लेता हूं. ये यब ऐसी हरकतें हैं, जिन्‍हें मेरे घरवाले नहीं समझ पाते और बहुत अचरज से देखते हैं. पर यह सब कुछ करते हुए दिमाग़ में लगातार वही चीज़ चलती रहती है, जो मैं लिख नहीं रहा, लेकिन जिसे मैं जल्‍द ही लिखने वाला हूं. दरअसल, जिन वक़्तों में मैं नहीं लिख रहा होता, उन्‍हीं वक़्तों में लिख रहा होता हूं. बाक़ी के दिन तो टाइपिंग के दिन हैं.

व्योमेश शुक्ल :
न लिखने के दिन अच्छे और निर्भार दिन होते हैं. आप दोस्तों से ढंग से बात करते हैं, फ़ोन पर बेहतर संवाद होता है, आपके पास समय होता है और खाली समय की मस्त व्यस्तताएं होती हैं, स्थानीय झगड़े वगैरह भी दिल लगाकर किये जा सकते हैं. अस्त-व्यस्त पढाई भी इन्हीं दिनों का इंतज़ार करती है. लिखने की ऊर्जा और नेकी को जीवन के दूसरे कामों में खपा देना अद्भुत लगता रहा है. टिपिकल साहित्यकारों का न लिखने वाला चरण हमारे कुल जीवन और हमारे संभावित जीवत्व से भी बहुत बड़ा है. यह सवाल उनसे कोई पूछे तो हिंदी के समाजशास्त्र को जानने में बड़ी मदद मिलेगी. डोमा जी उस्ताद के नायकत्व वाली पूरी फ़िल्म उनके जवाब से ख़ुद-ब-ख़ुद तैयार हो जाएगी. कुछ लोगों की सर्वथा अनर्जित केन्द्रीयता के केंद्र में यही 'न लिखना', 'न लिखने के कारण' और लिखने के चापलूस और सुर्ती ठोंकू चेला आग्रह हैं, लेकिन साफ़-साफ़ यह नहीं जाना जा सका है कि उन्होंने नहीं लिखा तो क्या किया. पहले वे बतायें. हालाँकि अंततः उनका लेखन ही यह बता देगा, और बता भी रहा है, कि वे क्यों नहीं लिख सके और लिखते भी तो क्या लिखते.

चन्दन पाण्डेय :
एक लेखक सिर्फ लिखता है और जब नही लिखता तो लिखने की तैयारी कर रहा होता है. जिसमें नौकरी, पढ़ाई, मकसद बेमकसद यात्राएँ, सिनेमा, घर की चिंता, दोस्तों की अचानक याद, कोई भूली बिसरी बात शामिल है. वैसे, न लिखने के दिनों में पाबन्द होकर पढ़ता हूँ. अच्छी पसन्दीदा किताबें दुहराता हूँ. यह भी एक अजीब मुश्किल है कि बहुत सारा समय लिखने की तैयारी में ही गुजर जाता है.
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७. कितने घंटे पाबन्दी से लिखते हैं ?

कुंवर नारायण :
सुबह 4-5 घण्टे अपने साथ बैठता हूँ. बस इतनी ही पाबन्‍दी अपने पर लगाता हूँ. ठीक सुबह चाय के साथ ही नोटबुक और कलम ले कर बैठता हूँ—जो कुछ लि‍ख जाए—छोटी टि‍प्‍पणि‍यां अंग्रेजी हि‍न्‍दी में जि‍नसे नोटबुक्‍स भरी पड़ी हैं. कवि‍ता पूरी या अधूरी, लेख, जो भी मन में आया लि‍ख जाता है. बहुत भि‍ड़कर विधिवत लिखने वालों मे से नहीं हूँ. अपने को काफ़ी छूट देकर लि‍खता हूँ.

गीत चतुर्वेदी :
कितने घंटे का हिसाब नहीं बनता. ज़रूरी नहीं है कि आप छह घंटे टेबल पर बैठे हैं और सारा समय लिखते ही रहें, हो सकता है कि उन छह घंटों में आपने छह मिनट ही लिखा हो. लेकिन यह ज़रूर है कि मैं अपनी टेबल पर बैठता ज़रूर हूं, भले दो घंटे रोज़ के लिए या छह घंटे रोज़ के लिए. इस दौरान बहुत कुछ होता है. संभव है कि मैं किसी विचार के शक्‍ल लेने का इंतज़ार कर रहा होऊं. हो सकता है कि काफ़ी समय तक उसकी प्रतीक्षा करनी पड़ जाए. उस दौरान मैं पढता रहता हूं. संगीत सुनता हूं या पसंदीदा फिल्‍मों की पसंदीदा क्लिप्‍स देखता हूं. उस समय किसी मित्र से बात ही कर रहा होऊं. इस बारे में मुझे काफ़्का की वह बात बहुत पसंद है, जो उन्‍होंने फेलिस को एक ख़त में लिखी थी- 'जैसे मुर्दे को उसकी क़ब्र से अलग नहीं किया जाता, उसी तरह कोई मुझे अपनी राइटिंग टेबल से अलग करने की कोशिश न करे.' लिखने की मेज़ लेखक का ताबूत होता है. वह उसी में दफ़न रहता है. अगर आप मेज़ पर नहीं लिखते, तो भी उस जगह का यही मतलब है.

व्योमेश शुक्ल :
पाबन्दी में तो हम कुछ भी नहीं करते, लिखेंगे क्या. लिखने की आज़ादी का भी सही इस्तेमाल कमज़ोर इच्छाशक्ति के कारण स्थगित होता जाता है. तो कई दिनों तक कुछ भी नहीं लिखते और फिर लगातार लिखते ही रहते हैं. यह सब एक बाइक पर तीन सवारी सरीखा है.

चन्दन पाण्डेय :
नौकरी से पहले रोज ही लिखना होता था पर नौकरी मिलने के बाद रोजाना लिखने का अब तक कोई नियम नही बन पाया है. फिर भी कोशिश रहती है कि रोज कुछ न कुछ लिखा जाए. सुबह डेढ़ दो घण्टे के नियमित लेखन के अलावा दूसरा कोई पाबन्द समय नहीं है. हाँ डायरी का शौक है. इसलिए उस दुनिया में कुछ न कुछ रोज लिखता हूँ. मसलन वो सर के पास ही पड़ी रहती है, सो कुछ टीप देता हूँ.
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८. कितना लिख लेना एक दिन में पर्याप्त लगता है ?

कुंवर नारायण :
यदि‍4-5 पृष्‍ठ भी मन को सन्‍तोष देने लायक लि‍ख जाए तो अच्‍छा लगता है। पर हमेशा ऐसा हो नहीं पाता। फि‍र गद्य-लेखन से कवि‍ता-लेखन की बात बि‍ल्‍कुल अलग है -- दो अच्‍छी पंक्‍ति‍यों के लि‍ए भी पूरा दि‍न लग सकता है।

गीत चतुर्वेदी :
यह भी अमूर्त है. पर्याप्‍त की बात तो ऐसे है कि एक ही बैठक में महाकाव्‍य लिख डालने की आस बन जाए. कोई भला प्रतीक्षा की वेदना से क्‍यों गुज़रना चाहेगा ? कई बार ऐसा होता है कि लिखने से पहले यह समझ में आ जाए कि क्‍या लिखने जा रहे हैं. अगर किसी प्रोजेक्‍ट पर काम चल रहा है, तो पहले से पता होता है कि यह-यह लिखना है. यह देखना सुखद होता है कि जो-जो आप जिस-जिस तरह लिखना चाहते हैं, उस-उस को उसी-उसी तरह लिख ले रहे हैं. यह संतोष देता है. बाक़ी समय नोट्स लिखना चलता है और वह एक बैठक में एक पंक्ति भी हो सकता है. दिन-भर में मैं इतनी ई-मेल्‍स के जवाब देता हूं कि कई बार वह भी पूरा-पूरा लेखन ही लगता है. हालांकि पैक-अप करते समय मैं माइक्रोसॉफ़्ट वर्ड में जाकर, (मैं उसे बुनियादी टाइपिंग के लिए कभी इस्‍तेमाल नहीं करता, मेरी नज़र में वह बहुत ख़राब प्रोग्राम है टाइपिंग या लेखन के लिए) वर्ड काउंट ज़रूर करता हूं, क्‍योंकि उस प्रोग्राम का वर्ड काउंट सबसे सही है. कभी पचास शब्‍द होते हैं, तो कभी पांच सौ. एक दिन में अपने लिए डेढ़ हज़ार शब्‍द लिख लेना उत्‍सव की तरह है. मैं फ़ाइल पर पिछली सिटिंग के वर्ड काउंट डाल देता हूं. जब मुझे पता चला कि हेमिंग्‍वे भी रोज़ का लिखा गिनते थे और नोट करके महीने का औसत निकालते थे, तब मुझे अच्‍छा लगा था वह. फिर भी शब्‍द संख्‍या से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण संतोष और आनंद है, क्‍योंकि बाज़ दफ़ा ऐसा भी हो चुका है कि आज के लिखे हज़ार शब्‍द, कल दुबारा पढ़ने पर पूरी तरह डिस्‍कार्ड भी हो जाते हैं.

व्योमेश शुक्ल :
पर्याप्त तो कुछ भी हुआ नहीं है. जो कुछ भी लिखा है बहुत कम और आरंभिक है, उसका रोज़ का हिसाब भी वैसा ही है, ३२ रूपया रोज़. कभी कुछ क्षणिक संतोष भी होता है, लेकिन वह भी गिरावट का ही एक प्रकार होगा. बड़े रचनाकारों के उदाहरणों, उनके संघर्ष, उनके जीवट, उनके निरभिमान को देख सुन पढ़कर जो ग्लानि जमा होती जाती है उसका हिसाब नहीं लगाया जा सकता.

चन्दन पाण्डेय :
निर्भर करता है. वैसे अगर कहानी ही कहानी के दिनों की बात करूँ औसतन, चार या पाँच पृष्ठ पर्याप्त लगते थे पर इधर गति सुधरी है और लेखन के फॉर्म / स्वरूप में कुछ बदलाव किया है इसलिए आठ दस पृष्ठ का उद्देश्य लेकर चलता हूँ. ऐसा कठिन उद्देश्य कि पूरा हो जाए तो भी यकीन नहीं होता.
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९. पढ़ने के लिए कितना वक़्त निकालते हैं ?

कुंवर नारायण :
अब आंखो की तकलीफ की वजह से ज़्यादा पढ़ नहीं पाता. फि‍र भी धीरे-धीरे दो तीन घण्‍टे तो नि‍कल ही आते हैं कि‍सी तरह.

गीत चतुर्वेदी :
अमूमन दोनों का वक़्त एक ही है. उसी सिटिंग में पढ़ना भी है, उसी में लिखना भी. मेरे पास प्रिंट की किताबों से ज़्यादा ई-बुक्‍स हैं, इसलिए ऑन-द-गो मोबाइल में भी पढ़ना हो जाता है. जब मैं किसी थीम पर काम कर रहा होता हूं, तो सिर्फ़ वही चीज़ें पढ़ता हूं, जिनका संबंध मेरी थीम से होता है. वैसे भी, मेरी पढ़ाई बहुत फोकस्‍ड और थीमेटिक रही है. मैं सब कुछ नहीं पढ़ पाता.

व्योमेश शुक्ल :
पढ़ने का वक़्त, लिखने के वक़्त की ही तरह, पाठ और पाठक के संबंध के बीच में, उसके भीतर होता है. बाहर के वक़्त के साथ उसकी तुलना ही संभव है, उसे बाहर की गिनती में नहीं गिना जा सकता. ऐसी पढाई भी हमने की है कि उसका वक़्त पाकीज़गी के चरम समय के तौर पर हमेशा वर्तमान रहे और ऐसे भी पढ़ते हैं जैसे अखबार में राशिफल देख रहे हों. तो यहाँ भी पढाई की गुणवत्ता, पाठ का आभ्यंतरीकरण ही मुद्दा है, किताब के साथ घंटे बिताने में क्या रखा है? पढ़ने के वक़्त को M. K. S. वाली प्रणाली में गिनना भी ज़्यादती ही है.

चन्दन पाण्डेय :
दफ्तरी दिनों में दो ढाई घंटे और सप्ताहांतों में हाथ उठाई गई किताब पर पर निर्भर करता है कि समय कितना दिया जाए. किताब अच्छी हुई तो पूरा दिन वरना वही रूटीन समय. दफ्तर से आने के बाद कुछ न कुछ पढ़ने का ही मन बनता है.
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१०. पढ़ने की आदत लेखन में बाधक तो नहीं ?

कुंवर नारायण :
पढ़ने लि‍खने को सहयोगी चेष्‍टायें मानता हूँ. अच्‍छे लि‍खे को पढ़ना जीने की तरह है. पढ़ना मेरे लि‍ए जीवन के घनि‍ष्‍ठ यथार्थ से वि‍चार-वि‍नि‍मय की तरह है.

गीत चतुर्वेदी :
यह वही बात है कि जब आप सांस छोड़ते हैं, तो क्‍या आपको सांस लेने में दिक़्क़त महसूस होती है? लिखना ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें पढ़ना अपने आप शामिल है. मेरे लिए दोनों एक ही प्रक्रिया के दो खंड या पहलू हैं. जब मैं पढ़ रहा होता हूं, तब भी लिख रहा होता हूं. बिना उंगलियों की जुंबिश के. और जब लिख रहा होता हूं, तो भी पढ़ ही रहा होता हूं.

व्योमेश शुक्ल :
लेखन के सामने ख़ुद इतनी बाधाएँ हैं, और लेखन ख़ुद भी एक बवाल, कि पढाई को क्या बाधा मानना. वैसे यह बुरी आदत मुझमें है भी नहीं.

चन्दन पाण्डेय :
बनती है, खूब बनती है. पढ़ना हमेशा लिखने के आड़े आता रहा है. अगर कोई साहित्यिक अदालत का मामला न बनता हो को कहना चाहूँगा कि पढ़ना प्राथमिक है. ऐसा अनुशासन लाना चाहता हूँ कि लिखना, पढ़ने पर भारी पड़ने लगे.
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14 comments:

dinesh tripathi said...

अनुराग गजब लगी गोष्ठी -२ . अपने तरह के नए व् बेहतरीन सवाल उठाये आपने इस गोष्ठी . सामान्यता रचना कर्म के इन पहलुओ पर चर्चा कम होती . निश्चित ही लेखन की प्रक्रिया को ठीक-ठीक शब्द नहीं दिए जा सकते . किन्तु हर रचनाकार अपने लेख्नाकूल परिस्थितियां तो निर्मित करता ही है . अच्छी लगी ये प्रस्तुति .
बधाई
डा. दिनेश त्रिपाठी 'शम्स'

आवेश said...

गजब ,गोष्ठी के सरल सवालों के बहाने कठिन से नजर आने वाले कवियों ,कहानीकारों और लेखकों को जानना मस्त कर देने वाला है ,ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो शायद कभी न पूछे जाते ,कई ऐसे जवाब मिले जो शायद कभी न दिए जाते|आभार अनुराग

बाबुषा said...

waah !

शशि भूषण said...

इस गोष्ठी के सवाल बड़े दिलचस्प लगे। इतने झल्ला देने वाले,भौतिक कि लिखने-पढ़ने वाले यानी लेखक भी महज कामगर ही ठहरे। शायद कुँवर नारायण जी के जवाब इसीलिए ऐसे हैं कि जैसे उनसे एक ही बात बार-बार पूछी जा रही है।

गीत भाई के जवाब पढ़कर सुख मिला। यह गीत जी की ताक़त और खासियत है कि वे गंभीर और रोचक एक से हैं। उनकी यह बात दूर तक सोचने में ले गयी " यदि रचनात्‍मकता कोई प्रवाह है, तो यक़ीनन उसमें बाधाएं भी होंगी. सारी धाराएं अंतत: एक विशाल और व्‍यापक बाधा की ओर प्रस्‍थान ही हैं." कह सकते हैं यह बात एक उत्प्रेरक की तरह है।

वैसे इस गोष्ठी के बारे में मेरा खयाल है कि हमारे समय की पत्रकारिता को यह प्रचलन में नहीं ला देना चाहिए कि लेखकों से समय समय पर पूछा जाये कि आप कब और कैसे लिखते हैं। वरना इसका हस्र उस व्यंजन निर्माण संबंधी औरतों की बातचीत सा होता है जो औरतें समय काटने के लिए परस्पर करती रहती हैं।

चंदन और व्योमेश जी के जवाबों के बारे में यही सोचा कि बेहतर होता यदि वे अपनी पिछली उल्लेखनीय रचनाओं के आधार पर लिखने का समय, तैयारी और श्रम आदि के बारे में बताते।

कुल मिलाकर नेट में बहुत दिनो बाद बैठकर कुछ पढ़ा है। तो यह प्रतिक्रिया देने से खुद को रोक नहीं पाया।

Priyankar said...

एक सिटिंग में पूरा पढ़ा. बहुत अच्छा आयोजन . बधाई !

व्योमेश का प्रशंसक होता जा रहा हूं. उसकी शैली बेहद आकर्षक और मारक है और वह देसी-विदेशी साहित्यिक पूर्वजों-अग्रजों की महानता और समकालीनों की अपेक्षाओं से भाराक्रांत नहीं लगता. उसमें एक विलक्षण किस्म का देशज रचाव है,जो सहजता और मौलिकता दोनों को प्रश्रय देता है.अगर वह अपने को नष्ट करने पर उतारू नहीं हुआ तो उसे लेकर उम्मीदों के तूमाल बांधे जा सकते हैं और समकालीन रचनाशीलता को लेकर कुछ बड़े स्वप्न देखे जा सकते हैं.

कुंवर जी और गीत चतुर्वेदी के उत्तर अपेक्षा और प्रतिष्ठा के अनुरूप हैं और चंदन के चलताऊ .

चूंकि जीवन की और साहित्य की कोई 'स्टैण्डर्ड रेसिपी' नहीं होती इसलिये जीवनानुभव और रचनाप्रक्रिया से जुड़े वही सवाल अगर शताब्दियों तक भी भिन्न-भिन्न व्यक्तियों,विशेषकर लेखकों-कवियों से पूछे जाते रहें तो ताज़गी बनी रहती है.

महिलाओं की व्यंजन-निर्माण संबंधी बात-चीत भी जीवन का जायका कायम रखने की कवायद है, समय काटने की नहीं.उसके अवमूल्यन का अर्थ रचनाशीलता का अवमूल्यन ही नहीं, जीवन के उस आस्वाद की अवमानना भी है जिसे विद्वानों ने 'हॉट टेस्ट ऑफ लाइफ' कहा है.

अंशुमाली रस्तोगी said...

मेरे देखे-जाने-पढ़े लिखने-पढ़ने पर तमाम लेखकों से तमाम बातें सुनी-पढ़ी हैं परंतु उन सब से अलग ये बातें और लेखकिए अनुभव कमाल के हैं..लेखक का लिखना और किन-किन कारणों, समयों व साधनों के साथ लिखना इसे इस तरह से स्वयं लेखकों द्वारा जानना खासा दिलचस्प रहा है..

शशि भूषण said...

"महिलाओं की व्यंजन-निर्माण संबंधी बात-चीत भी जीवन का जायका कायम रखने की कवायद है, समय काटने की नहीं.उसके अवमूल्यन का अर्थ रचनाशीलता का अवमूल्यन ही नहीं, जीवन के उस आस्वाद की अवमानना भी है जिसे विद्वानों ने 'हॉट टेस्ट ऑफ लाइफ' कहा है."

प्रियंकर जी के शब्द।

मज़ेदार बात यह है कि जब व्यंजन निर्माण संबंधी बात मैं लिख रहा था तभी मुझे लगा था कि जिस तरह का फैशन परस्त आंदोलनकारी समय है उसमें मित्रों द्वारा इसे 'लोक' लेने और स्त्री विरोधी घोषित कर देने में वक्त नहीं लगेगा। प्रियंकर जी, जिसका रचनाशीलता से वास्ता होगा वह खाना बनाने, तोरे करते रहने की ही बातचीत में छुपी उदासी और इंतज़ार का खयाल कर दहल जायेगा।

विद्वान क्या कहते हैं और क्या करते रहते है यह माया तो कोई विद्वान ही जाने मैंने तो सिर्फ़ किसी खास प्रवृत्ति के प्रचलित होते चले जाने की ओर इशारा किया था। यह सोचकर कि समझदार तो इशारा समझ ही लेते हैं।

Padmaja said...

Accha laga padhkar, lekhkon ko jab is tarah jaan ne lagte hain tab bahut fark padhta hai ki unse sawal kis tarah ke kiye gaye hain, aam sawalo se boriyat ho jaati hai, aur unse shayad hum unhe bahut ooper ooper se jaan paate hain.
subah shaam aur din ki baaten thi isliye mujhe aur bhi acchi lagi.
bahut hi saral aur swabhavik bhi..

sarita sharma said...

आपने लेखन प्रक्रिया से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाये हैं और एक सवाल के अलग अलग उत्तर बहुत दिलचस्प हैं.इनमें लेखक का दृष्टिकोण और व्यक्तित्व झलकता है.वे किन किन उपकरणों या कला माध्यमों को पसंद करते हैं और उनकी जीवन शैली क्या है इन सब प्रश्नों के जवाब इस बातचीत से मिल जाते हैं.

Suman said...

nice

anupama pathak said...

अनुभवी शब्दों के प्राकट्य में इन सहज प्रश्नों का महत्वपूर्ण योगदान है!

navratan purohit said...

Gosthi prernaadaayak he,Lekhak ki likhne ki manstathi achhi ban pari he.

navratan purohit said...

Lekhak ki likhte vaqt manstathati jaananaa achhaa anubhav ban para he

शिवनारायण गौर said...

पढ़कर मज़ा आया। सोचने का मौका मिला। अनुराग जी जारी रखें ऐसे प्रयास।