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अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविता

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[ कवि ने सूचना दी है कि यह कविता उसने अपनी ही कविताओं पर एकाग्र गद्य लिखने की प्रक्रिया में संपन्न की है। अम्बर की कविताओं के बारे में यह बात यत्र-तत्र समझाई गई है कि वह रीतिकालीन काव्य-बिम्बों से प्रेरित आज के जन-मन से कटी हुई कविता है। यह सारल्य इस बात का प्रमाण भी है कि ऐसे लोगों की तादाद इधर बढ़ी है जो 'कविता-कविता' तो बहुत करते हैं, और अपने लेखे उन्होंने कविता को अनेक कामों में लगा भी रखा है, लेकिन कविता जिस भाषा में संभव होती है उससे उनका सम्बन्ध बहुत उथला है। वे कविता को बहुत सीमित और तात्कालिक मांग-पूर्ती के नियमों पर खरा उतरनेवाली कोई पण्य वस्तु ही समझते हैं। कविता का सामजिक सरोकार उन्हें जुमलेबाजी करने के लिए याद रहता है, उसका भाषिक सरोकार वे अक्सर भूलते हैं ! उनमें यह चिंता सिरे से ग़ायब है कि हमारे यहां संस्कृत, ( सिर्फ़ उर्दू नहीं) फारसी और अनेक बोलियों से संपन्न एक विपुल काव्य भी है, जिससे भाषा के स्तर पर एक स्मृतिजन्य सम्बन्ध बनता है। अकारण नहीं आज की हिंदी कविता में कुछेक अपवादों को छोड़कर अनेक कवि सर्वोप्लब्ध काव्य-भाषा में कविता लिख रहे हैं। ऐसी चलताऊ कविताओं के मुरीदों और कवियों का सामना जब अपने से नितान्त भिन्न कविता से होता है तो कुछ आसान नुस्खों से इसका इलाज कर डालने की पवित्र-हिंसा में वे मंडल बांधकर सामने आ जाते हैं। उनमें से कई अम्बर की ही तरह मुख्यतः प्रेम पर थोक भाव से कविताएं लिख कर अपने संग्रहों को छपा पेड़ काटने के गंभीर अपराध में भी लगातार शरीक हो रहे हैं। बहुतों कवि तो इस दुर्भाग्य से भी बेखबर हैं कि आज जन-मन तक प्रसार के लिए जहां-जहां भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे हिंदी को 'समझ की कठिनाई' का हवाला देकर कम-से-कमतर प्रयोग में लेन की हिदायत है। ऐसे समय में अम्बर सरीखा कवि बज़िद जिस काव्य-भाषा में लिख रहा है वह एक शोक की भी सूचना है। एक ऐसी सूचना जिसे इस सूचना-तकनीक के युग में अशोकी उचित ही पढ़ पाने में अक्षम हैं ! लेकिन खुद अपनी कविता के प्रति अम्बर का कविजनोचित संशय बरकरार है। 'अपना सामना' उसी की एक बानगी है। ]


अपना सामना

तुम बिम्ब से मुझे चमत्कृत कर सकते हो,
तुम बीस पच्चीस बिम्बों के एक कविता में अपव्यय से
मुझे अधिक चमत्कृत कर सकते हो
किन्तु पंसुलियों के बीच पड़ी
यह गाँठ नहीं खोल पाती तुम्हारी कविता

किसी असूर्यम्पश्या स्त्री सी मैं
छू नहीं पाता जिसे तुम्हारी कविता का तत्व
किन्तु इस परकीया को चाहिए
तुम्हारे छंद का स्पर्श
हल्दी की पानी में पड़ी गाँठ
जैसा गल जाए मन कि छेद कर
पोह लो देवी के लिए हार
किन्तु तुम तो नास्तिक हो तुम तो मार्क्सवादी हो
देवी तो तुम्हारे लिए महज़
एक सांस्कृतिक बिम्ब हैं.

कभी किसी दिन, जब धूप निकली हो क्वांर की
वर्षा के बाद फिर चढ़ी हो
धूल हवा के रथ पर
तब आना और करना
प्रतिबिम्ब की बात

बहुत हो चुकी तुम्हारी सच्ची कविता
बात करना झूठे प्रेम की
बात करना ऐसे जैसे अठ्ठारह सौ सत्तावन के बाद
लखनऊ के शायर इश्क इश्क की
कनबतियां फूंकते थे गालों पर
फूंकते थे सिगरेट की तरह

कभी बात भी करना या बात ही करना
लीला लीला में मुस्कुराना
श्वेत-श्याम सिनेमा के नायकों की तरह
रूठ जाना बेवज़ह, उस दिन
तुम्हें कसम हैं कोई और बात मत करना

कविता मत सुनाना.केवल बाँह
पकड़ लेना कसके, जोर दिखाना
मत करना बात लातिन-अमरीकी फिक्शन की
रूसी फलसफे इस्पहानी फोटोग्राफी की
जानकारियों की जो तुमने उस कमबख्त इन्टरनेट से
बीन बीन कर जमा कर ली है.

किसी दिन कवि नहीं कलाकार नहीं एक्टिविस्ट नहीं
शमशेर बहादुर सिंह को जो मुहाल था
वह इंसान बनकर आना
जिसे लगता हो चाँद हसीन न कि टेढ़े मुँह वाला.

तुम्हारी कनपटियों पर आया स्वेद है मेरी कविता
तुम्हारी दुर्गन्ध, तुम जब गर्दन झुकाए देखते हो कुछ
तो तुम्हारे उघारी पीठ पर जो निकल आते हैं पंख
वह बहुत हैं मेरे संसार को लेकर उड़ जाने के लिए.

असल में अम्बर रंजना पांडे
तुम जो कवि बने इतराए फिरते हो
तुम्हारी कविता मेरी सौत हैं
तुम्हारी कविता बेहद बेहद बुरी है
इससे बेहतर तो तुम जवाकुसुम लगाकर
बांधते हो मेरी दो चोटियाँ.
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Comments

बहुत सुन्दर ... बस पढ़ते जाओ... समझते जाओ ... और महसूस करते जाओ ... कविता के किसी नियम के बारे में बात किए बगैर. कुछ कहना माने टिप्पणी करना मुश्किल है ... बहुत मुश्किल... अम्बर रंजना पाण्डेय आपकी कवितायें सुन्दर है उन सभी पुरानी कविताओं की तरह, अनुराग जी शुक्रिया

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कविता ने एक लम्बी यात्रा तय की है, एक आयाम आपका भी।
pradeep saini said…
बहुत अच्छी कविता .......... अम्बर रंजना पाण्डेय को बधाई.......इसे पढ़ते पढ़ते अपनी एक कविता याद आ गयी ...... कैसे कह दूँ / बचा ही लूँगा / नाखूनों में धरती / सांसों में आकाश / इतना बड़ा कवि नहीं हूँ मैं............
Priyankar said…
आज रवींद्रनाथ को पढ रहा था.कविता पर बात करते हुए वे कहते हैं :

"आनंद किसी को भी बलपूर्वक नहीं दिया जा सकता. कुसुम पुष्प से कोई उसका रंग निकालता है,कोई तेल निकालने के लिए उसका बीज निकालता है, कोई मुग्ध नेत्रों से उसकी शोभा निहारता है. काव्य के भीतर से कोई इतिहास खींचता है,कोई दर्शन स्थापित करता है,कोई नीति तो कोई विषय-ज्ञान का उद्घाटन करता रहता है, और कोई काव्य में से काव्य छोड़कर और कुछ भी नहीं निकाल पाता -- जिसे जो मिला वही ले संतुष्ट मन से घर लौट सकता है -- किसी के साथ विरोध की कोई आवश्यकता नहीं समझता, विरोध का कोई लाभ नहीं."

कौन बिंब को लेकर क्या सोचता है/सोच रहा है,इसे भूल कर अंबर को अपने कवि के साथ चलना चाहिए. मैं फिर से कहूंगा कि नई पीढ़ी के कवियों में वे अलहदा किस्म के कवि हैं -- संभावनाओं से भरे-पूरे कवि .
बात करना ऐसे जैसे अठ्ठारह सौ सत्तावन के बाद
लखनऊ के शायर इश्क इश्क की
कनबतियां फूंकते थे गालों पर
फूंकते थे सिगरेट की तरह ..

kya baat hai !

कविता मत सुनाना.केवल बाँह
पकड़ लेना कसके, जोर दिखाना
मत करना बात लातिन-अमरीकी फिक्शन की
रूसी फलसफे इस्पहानी फोटोग्राफी की
जानकारियों की जो तुमने उस कमबख्त इन्टरनेट से
बीन बीन कर जमा कर ली
again...अरसे बाद पी हुई सिगरेट की पहली किक सा ..
leena malhotra said…
तुम्हारी कविता मेरी सौत हैं तुम्हारी कविता बेहद बेहद बुरी हैइससे बेहतर तो तुम जवाकुसुम लगाकरबांधते हो मेरी दो चोटियाँ... sundar lagi kavita..aur ye agrah bhi..
वाह !
पहली लाइन से आखिर तक बांधे रखने में सक्षम हैं ये शब्द और ये भाव !
बढ़िया.
( महज़ को महज कर लें और बेवज़ह को बेवजह)
mahesh mishra said…
एक नया आस्वाद..आपकी कविता में बाँधने का बांधे रखने का जादू है..

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