Wednesday, September 14, 2011

बही-खाता : १४ : निर्मल वर्मा




कथ्य की खोज


क्या 'खोज' अपने में ही तो ग़लत शुरुआत नहीं है ? जो है, सामने दिखाई देता है, चारों ओर से घेरे है, जन्म की पहली विस्मयकारी नज़र से लेकर मृत्यु की अंतिम बुझती लौ तक, भला उसकी खोज कैसी ? वही तो सारी कहानी है...सारी पर क्या असली भी ?

असली
क्या है, यह भी तो एक खोज हो सकती है, जो है, उसके भीतर से 'जो नहीं है', ( पर जो हर बन्द खिड़की से बाहर झाँकता है ) उसकी खोज ? कथ्य के कितने आवरण हैं, कितने परदे, कितनी खिड़कियाँ. लिखते हुए हम एक-एक के पास से गुजरते हुए छिपे को थोड़ा उघाड़ पाते हैं...पढ़ते हैं तो हँसी सुनाई देती है ; कहाँ, किस जगह, किसके साथ पहली बार सुनी थी ?

वह
बार-बार समुद्र की लहरों की तरह हमसे टकराती है, मुड़ जाती है, फिर आती है, खाली, तट पर अपनी फेनिल झाग छोड़ जाती है, कुछ अपने साथ बहा ले जाती है, कुछ छोड़ पाती है.

बचे
हुए अवशेष, जो हैं, उस पर जो बीत गया, उसके खुदे हुए 'हियरोक्लिफ'.. क्या हम उन्हें पढ़ सकते हैं ? कथ्य अनुवाद है, जो अबूझा है, उसे बूझे हुए में अनूदित करता हुआ. वह लिखे हुए को पढ़कर पढ़े हुए को लिखने का खेल है.

पाँचों इन्द्रियां आखेट करती हैं -- कान लगाकर सुनती हैं, बचपन के बाग़ में दिल की अँधेरी गुहारें चखती हैं जो धूल भरे बालों से आती गंध है, बेहोशी की हालत में भागती हैं, जो नंगे पैरों की आहट है, देखती हैं, बन्दूक की नाल से अपनी बहती हुई ज़िन्दगी का सुराख.

सृष्टि
के बीहड़ में शिकारी कुत्ते इसी तरह इशारा पाकर भागते होंगे, सूंघते होंगे, इकठ्ठा कर रख पाते होंगे, खोई हुई गंध को भूले हुए रास्तों पर पाते होंगे, खून में लथपथ शिकार को लाते होंगे.

आखिर तक पता नहीं चलता, दांतों और नाखूनों से छलनी देह का कथ्य कहां से आता है ?

पता नहीं चलता, पर कुछ-कुछ आभास तो होता है ? वह क्या था, जब तुम बुदापेस्त के रेस्तराँ में बैठे थे और बाहर सड़क पर लोगों की भीड़ थी, और कुछ हो रहा था, जब तुमने सोचा था, यह मुझे याद रहेगा, यह रेस्तराँ के शीशे के आर-पार बहता हुआ शहर.

या
शायद चोट कहीं बहुत गहरी थी और दर्द का कहीं पता नहीं था...वह सामने की बर्थ पर बैठी थी और उसका चेहरा मैं सीधा न देखकर रेल की खिड़की के शीशे में देख रहा था, जहां वह रोशनी की छाया में टिमटिमा रहा था और तब मुझे पता चला, यह वहां है, दर्द, अँधेरे में भागती हुई ट्रेन की खिड़की पर टिमटिमाता हुआ --जो अपने में कभी कथ्य नहीं बनता, पर कथ्य के साथ संगत देता है, तब सबसे ऊंचा, जब कहानी सबसे चुप, कराहता हुआ...जिसे कथ्य स्वयं कान पर हाथ रखकर हैरत में सुनने लगता है, जैसे उसे पता ही नहीं था, मेरे भीतर जो भरा था, उसे वह इस तरह उघाड़ सकता है.

जिस तरह पौधे को जमीन से उखाड़ते हैं और उसकी जड़ों पर मिट्टी का गीला, लिथड़ा, अँधेरा बाहर निकल आता है, वैसा ही होता है कला का कथ्य...कोई भी चीज़ अचानक चटककर, उखडकर, हड़बड़ाकर बाहर आती है...वह अभिन्न को भिन्न करती है, संलग्न को विगलित करती है, सुरक्षित को जोखिम में डालती है. वह एक फड़फडाती प्राणवत्ता है, खंडित, उखड़ी हुई मिट्टी में अपनी छाया टटोलती हुई. भाषा के भीतर एक करंट, कुंडली-सी जगाती हुई, जिसका झटका खाते ही सब बिखरे हुए अनुभव-खंड एवं तस्वीर, एक इमेज, एक पैटर्न में सिमटने लगते हैं. पाँचों इन्द्रियां जिस 'शिकार' को खून में लिसा क्षत-विक्षत लाई थीं, वह अपनी आँखें खोलता है और पाता है, जिन तीरों से वह धराशायी हुआ था, वे उसके नहीं, शिकारी की देह में बिंधे हैं --कला का 'कथ्य' वह आईना है, जिसमें दुनिया का यथार्थ नहीं, आत्म (सेल्फ़) की दुनिया प्रतिबिंबित होती है --उसके भीतर झांकते हुए पता नहीं चलता, कौन मैं हूँ, कौन तुम, कौन वह ? प्रूस्त क्या 'लेखक' है जो मार्सेल के वेश में 'खोये हुए समय' की भूलभुलैया में अपने को ढूंढ रहा है ?

कला का 'कथ्य' अनूठा आखेट स्थल है, जहां शिकारी अपने लहू के चिह्नों का पीछा करता हुआ ख़ुद अपना ही शिकार करने निकलता है.

कहां से 'कथ्य' की पहली लहर उठती है ? पहला शब्द वह गाँठ है, कथ्य के भीतर उठी हुई 'ग्रोथ' जिसका पता तब चलता है, जब यह पता चलाना असंभव हो जाता है, वह कितना फैलेगा, कहां होगा इसका विस्फोटन, किन मिथुन-पक्षियों की चीख, किस विगत के पश्चाताप, किस आर्तनाद की गाथा में ?

समुद्र का ज्वार उठता है और लहरें पछाड़ खाकर गिरती हैं...गिरती हैं, उठती हैं, वापस लौट आती हैं. समुद्र वहीं रहता है, किंतु हर लहर पर उन्मत्त ऊँचाई को छूकर नीचे गिरता है, निन्यानबे डिग्री से ऊपर. वह होरी के शव पर धनिया की पछाड़ है. सारे उपन्यास के कथ्यस्थल को भूचाल की तरह हिलाती हुई. मरते सब हैं, विधवाएं विलाप करती हैं, जो बच जाते हैं, उनकी अपनी बेचारगी है, पर धनिया की पछाड़, उसका कोई जोड़ है ? हमें आश्चर्य होता है, हम 'बचे' रह गए हैं. कला का 'कथ्य' हमारे बचे रहने का --सर्वाइवल का--साक्ष्य है, संदिग्ध साक्ष्य, क्योंकि हम सचमुच बच गए हैं, क्या इसका प्रमाणित सबूत कभी मिल सकता है ?

वह एक मायानगरी है, धूप में चमकते इन्द्रप्रस्थ के बीच एक चलना महल. दीवारों को देखकर लगता है, पानी का झरना है, खाली सूखी जगह में तालाब झिलमिलाता है, पर जब नहाने जाओ, तो सूखा का सूखा. कुछ भी वह नहीं जो दिखाई देता है, जो दिखाई देता है, वह कितना दूर है, हम उसे पास बुलाना चाहते हैं पर वह एक इंच अपना सफेद पाँव बढ़ाती है, और दो इंच पीछे हट जाती है --हमारे पास आते-आते ओझल हो जाती है --भला जिसका नाम ही दूरी है, वह पास कैसे आएगी ? कथ्य एक जमी झील है, जहां द्रौपदी की हंसी सुनाई देती है और वह हड़बड़ाकर बहने लगती है.

वह अपरिमेय है, अपरिमेय में अपने को रूपायित करता हुआ कथ्य, पास बुलाता हुआ नहीं, दूरी को पाटता हुआ भी. बल्कि उसी के परिदृश्य में अपने को रचाता हुआ...हम बीच के गड्ढों को पार करते हुए, गिरते-पड़ते उस 'सच' के पास पहुँचते हैं. तभी दिल के भीतर सिरसिराता साँप छाती पर लोटता दिखाई देता है, हाथ से छूते हैं, तो आश्वस्त होते हैं, यह साँप नहीं, पीड़ा है, जिसे हर दूरी अपने कथ्य के भीतर केंचुल की तरह छोड़ जाती है. यह धुकधुकी है, सफ़ेद पन्ने पर घड़ी की टिक-टिक करती हुई. कहानी समाप्त होने पर भी 'कथ्य' की साँस बराबर चलती रहती है.

क्या हम उसे पहचानते हैं, जो कथ्य को शुरू करता है, किंतु वह 'पहला शब्द' नहीं ; एक ही शब्द बार-बार दूसरे शब्दों में अपने को दुहराता है, एक अभाव को पूरा करते ही एक दूसरे अभाव को खोलता हुआ, धड़धड़ाती ट्रेन व पटरियों के नीचे अपना सिर धुनता हुआ, जो कभी बचपन में हम सुनते थे और खो देते थे, उन सैंडिलों की आवाज़ की तरह, जो एक लड़की फिल्म की खाली सड़कों पर खटखटाते हुए चली जाती है। अगर हम उसे ध्यान से सुनें तो वह कथ्य की नंगी पाशविक लय है, हमारे अपने दिल की धड़कन, एक शब्द को दूसरे से पिरोती हुई, पैरों और पटरियों के नीचे धुक-धुक करती हुई.

वे ठीक कहते हैं कि लेखक की मृत्यु हो चकी है --पर इसे स्वीकार करते हुए झिझकते हैं, कि उसकी रुकी हुई साँस उसके 'कथ्य' में एक उच्छ्वास एवं आह की तरह सुनाई देती रहती है --हर शब्द पर उड़ता हुआ एक बादल.

'कथ्य' का शाब्दिक अर्थ है, जो कहना चाहिए --जोर 'चाहिए' पर है, एक ज़बर्दस्त नैतिक बाध्यता से बंधा हुआ। क्या 'कहना' चाहिए, इसका पूर्व ज्ञान किसी के पास नहीं, इसीलिए हर कथ्य की तलाश खाली पन्ने पर शुरू होती है --वह खाली पन्ना नहीं, जिस पर अब तक का कुछ लिखा हुआ नहीं है, बल्कि वह जिस पर अब तक लिखा हुआ मित गया हो, स्मृति से ओझल हो गया हो...हमें वही लिखना है, जो लिखा जा 'चुका' है, वह नहीं, जो अब तक लिखा नहीं गया हो. स्कूली बच्चे की तरह हम तख्ती पर, उसी पर कलम फेरते हैं, जो कभी खाली हो गया है.

खाली हो गया है, पर असल में खाली है नहीं। हम बादल को याद करते हैं, तो पन्ने पर एक छाँव दिखाई देती है, हवा कहते हैं, तो कहीं हूक-सी उठती है, पत्ता कहते हैं, तो मरती हुई उम्र दिखाई देती है, लहर कहते ही साँस ऊपर उठने लगती है, लौटती है, सिर धुनती है.

शब्द की नैतिकता, उसे देखने में है, वह नहीं जो शब्दकोष में है, बल्कि वह जो दुनिया में आदि, पुनीत रहस्य को उद्घाटित करती है, जैसे वह पहली बार की दुनिया हो, जिस पर सूरज उग रजा हो, जिसे हम पहली बार देख रहे हैं, अपनी पारदर्शी पवित्रता में, जब वह अपने 'होने' को टटोल रही थी. हिचक रही थी. कितना अभागा है वह लेखक जो दुनिया की आंख से बचकर दुनिया को रचता है और उसे हमेशा के लिए खो देता है. अभागा लेकिन हमारे लिए मूल्यवान --वही तो स्वप्न देखता है. खोई हुई दुनिया का स्वप्न, जो कला का दुर्लभ सत्य है.
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[ बही-खाता स्तंभ के तहत आप इससे पहले कई लेखकों को पढ़ चुके हैं. निर्मल जी का यह लेख उनकी निबंध-पुस्तक ''आदि, अन्त और आरम्भ'' से लिया गया है. इसे छापने की अनुमति हमें निर्मल जी की पत्नी और कवयित्री गगन गिल ने दी है. हम उनके शुक्रगुज़ार हैं. सबद पर निर्मल जी से संबंधित अन्य प्रविष्टियों के लिए यहां देखें. पेंटिंग : शागाल ]

11 comments:

वंदना शुक्ला said...

‘’ओब्ज़र्वेशन’’ना सिर्फ कहानी ,बल्कि किसी भी कला या साहित्यिक विधा की रीढ़ कहा जा सकता है !हर स्थापित कहानीकार का एक खास शिल्प होता है जहां तक निर्मल वर्मा की कहानियों की बात है,उनका ओब्ज़र्वेशन गज़ब का होता है ! ''शायद चोट कहीं बहुत गहरी थी और दर्द का कहीं पता नहीं था...वह सामने की बर्थ पर बैठी थी और उसका चेहरा मैं सीधा न देखकर रेल की खिड़की के शीशे में देख रहा था, जहां वह रोशनी की छाया में टिमटिमा रहा था और तब मुझे पता चला, यह वहां है, दर्द, अँधेरे में भागती हुई ट्रेन की खिड़की पर टिमटिमाता हुआ --जो अपने में कभी कथ्य नहीं बनता, पर कथ्य के साथ संगत देता है, तब सबसे ऊंचा, जब कहानी सबसे चुप, कराहता हुआ...जिसे कथा स्वयं कान पर हाथ रखकर हैरत में सुनने लगता है, जैसे उसे पता ही नहीं था, मेरे भीतर जो भरा था, उसे वह इस तरह उघाड़ सकता है.
विवेक कुमार सिंह का यह कथन कि जिंदगी से साक्षात्कार का नज़रिया उनकें यहाँ ‘’आत्म’’की यात्रा है,यह जितना बाह्य है उतना आतंरिक भी है!इस स्तर पर साहित्य और आध्यात्म का भेद उनके यहाँ समाप्त हो जाता है!’’’’निर्मल वर्मा मास्को में एयर पोर्ट से शहर आते हुए खिडकी से देखते सोचने लगते हैं,कि यहीं कहीं ‘’वौर एंड पीस ‘’की कौटेल होगी ,जहाँ आंद्रे ने पहली बार नताशा के प्रति अपने प्रेम को पहचाना था,नीद ना आने पर वह कहीं इसी ओक के वृक्ष की छाल को छू रहे होंगे ,......’’बस की खिडकी से मै बरसों पहले पढ़ी दुर्दांत प्रेम कथा को सौ वर्ष बाद रूस की चांदनी में चरितार्थ होता हुआ पा रहा था ‘’ये लेखन की वो गहराई वो प्रतिबद्धता है जो निर्मल वर्मा के लेखन को कालजयी एवं विशिष्ट बनाती है !निर्मल वर्मा स्वयं मानते है कि हर व्यक्ति अकेला ही सत्य की मशाल लेकर अँधेरे में चलता है !''(एक पाठक की द्रष्टि से )...

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत नये तरीके से दुनिया को देखा गया है।

नवनीत पाण्डे said...

मन को बांधने और आंदोलित कर देनेवाला गद्य

रीनू तलवाड़ said...

पढ़ा...अब जाने कब तक मन के भीतर कहीं, अपनी परते खोलता रहेगा..." कितना फैलेगा, कहां होगा इसका विस्फोटन, किन मिथुन-पक्षियों की चीख, किस विगत के पश्चाताप, किस आर्तनाद की गाथा में ?"

sarita sharma said...

कथ्य के बारे में इतना गहन चिंतन और अभिव्यक्ति.निर्मलजी ने उन महान रचनाओं के कथ्यों की बात की है जिन्हें समझने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है कि किस तरह कथ्य रचना के समाप्त होने पर भी पाठक के मन में जिन्दा रहता है.वुद्रिंग हाईट्स को बहुत पहले कालेज में पढ़ा था.और अब समीक्षार्थ हिंदी अनुवाद पढ़ा तो लगा कि जो मोटी मोटी बात याद रह गयी थी वह थी विलक्षण प्रेम कथा.बाकि सभी डिटेल्स भूल गयी थी. कहानी के पात्र और घटनाएँ भी पुस्तक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.मगर कथ्य ही पुस्तक की आत्मा है जो अजर अमर है.पुस्तक के भौतिक अंत के बाद भी जो हमारी स्मृति में गूंजती रहती हैं.वही वह चाबी है जो अर्थ के रहस्य से पर्दा उठाती है.

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर मनभावन अभिव्यक्ति|

Pratibha Katiyar said...

sundar!

RANJANA POHANKAR said...

Hazaron anubhav ..kuch kamaaye huye ..kuch diye huye...har ek se zalakte darpan me puree duniya samet lee hai...Antarpat Nirmal ho gaya..rango me..bimbo me...naya canvas mil gaya...har anubhav bahree satah se prarambh hote hai..phir aantareek jagat se sahi arth milte hai.

Nirmal ji ki sahaj abhivyaktee hotee thee...Regards to Nirmal ji...

सुशीला पुरी said...

"रात का रिपोर्टर" और "चीडों पर चाँदनी" बहुत पहले पढ़ी थी...शायद 9वीं में पढ़ रही थी...फिर तो सिलसिला ही चल पड़ा...। "जो है ,उसके भीतर से 'जो नहीं है'..." की ही यात्रा तो है साहित्य ,....और जीवन भी ...!!!!!!!!!

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

"कितना अभागा है वह लेखक जो दुनिया की आंख से बचकर दुनिया को रचता है और उसे हमेशा के लिए खो देता है. "

कहीं बांधता ही गया, कही खोलता गया. खूबसूरत!

नवीन रांगियाल said...

यहाँ कोई भ्रम नहीं. कोई छलावा नहीं. मनुष्य अपने से शुरू होता है, अपने में नष्ट हो जाता है. इस आत्मकेन्द्रित सत्य के पीछे कोई तसल्ली नहीं, कोई दिलासा नहीं. यह क्षण ही शाश्वत है, सम्पूर्ण है, अन्तिम है. सबकुछ अभी है, यहाँ है - इसके परे सिर्फ राख है. निर्मल वर्मा की शब्द और स्मृति के एक पन्ने पर लिखी गई इन पंक्तियों के सिवाय कुछ याद नहीं आता इसे पढ़कर. शायद यही ओब्ज़र्वेशन है, निर्मल वर्मा की दृष्टि है या मनुष्य की खोज है. और अन्तिम सत्य या परिणाम राख है.