
चकती
हम एक देश के बारे में बात करेंगे. एक लड़का था, नाम नहीं था या मालूम नहीं. ये जानना कितना विराट अनुभव है कि हर देश एक आदत है, और हर आदत पैसा है और पैसा समय नहीं है....लड़का एक लड़की का पर्याय भी है – लड़की धर्म भी है.
लड़का जब पैदा हुआ, तो उसके पैदा होने के एक घंटे बाद ही उसके घरवालों नें उसकी दोनों आँखों की पुतलियों के निचले आधे हिस्से में अर्ध-चंद्राकार काली अपारदर्शी चकती लगा दी. चकती किसी फाइबरनुमा चीज़ से बनी हुई थी, तो वह अपनी संरचना में काफ़ी कठोर थी.
चकती लगाते समय लड़का एकदम नहीं रोया, उसे पेट में ही इस बात का अंदाज़ लग गया था कि या तो चकती लगेगी, और अगर सफलता नहीं मिली, तब आँखों में गरम तेल उड़ेला जाएगा.
गर्भ में उसका शारीरिक विकास इस तरीके से हुआ कि चकती को वह अच्छे से जज़्ब कर सके. आँखों की पुतलियाँ और फैलीं, अपनी क्षमता से चार गुना ज़्यादा, आँखों के चमड़ीदार कोने अपनी हद से कुछ ज़्यादा फटे, कि फ़ैली हुई पुतली को कोई दिक्कत न हो और वे उसका पर्याय बन सकें.
कहते हैं कि लड़का हिंदू नहीं था, अब किसी के ‘हिंदू न होने’ का मानी मुसलमान ही हो सकता है. शायद यही दो कौमें ऐसी हैं, जो एक-दूसरे से ही डरती हैं और लड़ती हैं, और फिर डरती हैं. चकती इसलिए लगाई गई ताकि वह लड़का ‘किसी’ को उसके कन्धों से नीचे न देख सके. उसका चेहरा ही देख पाए, थोड़ा गला, और गले के आधे का आधा सीना. तमाम शारीरिक विकास इसलिए हुए थे क्योंकि उस लड़के को उस चकती को नकार देना था, उसके उपस्थित रहते हुए भी अपने सभी काम करने थे....जैसे कालीन बुनना, अच्छी शेरवानियों की सिलाई करना, अच्छी बिरयानी बनाना, अच्छी शहनाई बनाना और अच्छी शहनाई बजाना.... बहुत से काम थे उसके जिम्मे.
जिन परिजनों नें चकती लगाई थी, कहा जाता है कि वे मुसलमान नहीं थे. अब किसी के ‘मुसलमान न होने’ का मानी हिन्दू ही हो सकता है. तो, वे यानी जिन्होनें चकती लगाई थी...उसके ‘पुकारे गए’ परिजन...उन्होंने सारी संभावनाओं को खत्म करते हुए उसकी आँख के निचले आधे हिस्से में चकती सिल दी थी.
वह अब नीचे नहीं देख सकता है, सारी स्त्रियाँ उससे बची हुई हैं – जैसा कि लोग कभी नहीं कहते हैं, फिर भी जताते हैं – वह शहनाई भी नहीं बजा रहा है कि शहनाई सो चुकी है, कालीन नहीं बना रहा है, शेरवानी भी बेताला हो जाती है, बिरयानी में भी मसाला कम है, नमक तो और भी कम है – लेकिन, नमक तो गुजरात से आता है न – बिरयानी में हमेशा मिलने वाला गोश्त भी नहीं है, कुछ छोटे हिसाब नहीं हो पातें हैं, बड़े तो एकदम नहीं.
सुना है, जिन लोगों नें चकती लगाई थी, वे उसके घरवाले नहीं थे. लेकिन ये भी सुना है कि वे ही उसके घरवाले होने के हक़दार भी थे, क्योंकि शायद उसके पूर्वजों की घरवालियाँ उनकी शायद कुछ लगती हों?
सुना है, जिन लोगों नें चकती लगाई थी, उन्हें भी चकती लगी हुई है – उनकी आँख के ऊपरी आधे हिस्से में – फिर भी वह सिली हुई नहीं होती है, वे उसे एडजस्टेबल चकती कहते हैं.
सुना है, बिरयानी के गोश्त में कुछ सिली हुई आधी चकतियाँ मिल जाती हैं.
****
तमीज
यह एक तमीज़ के बारे में है, व्यवहार के बारे में और साथ में उस समय के बारे में, जिसमें हम जीते हुए भी अतीत को भविष्य में ढ़ालने की इच्छा रखते हैं. सब कुछ हमेशा चूल्हे-भाड़ में जाता रहा है, सृष्टि की सारी चीज़ें स्थानीयता के अर्थों में 'तेल लेने' चली गईं. अतीत का वर्तमान भी 'तेल लेने' क्यों नहीं चला गया? उसकी उपस्थिति हमेशा मानकों की रचना करती रहती है.
दो बच्चे सड़क पर थे, कन्धों पर बस्ते और गले में थर्मस लटकाए, वे अपने स्कूल की तरफ बढ़ रहे थे, जहां पानी की बोतल लाना मना था, क्योंकि बोतल लाना समय के साथ एक समझौता है, तो स्कूल के लोगों को बोतल-वोतल से कोई खास परेशानी नहीं होती थी.
जैसे दुनिया की हर सड़क अपने हर मोड़ पर असफल हो जाती रही है क्योंकि मोड़ के पहले वाली सड़क हमेशा मोड़ के बाद वाली सड़क से एकदम अलग होती है...दोनों बच्चे ऐसे ही दुनिया के किसी मोड़ के मध्यांतर पर पहुँच रहे थे. एक लड़का था और उसके साथ उसकी छोटी बहन लड़की थी. वे चल नहीं रहे थे, वे दौड़ भी नहीं रहे थे, उनकी गति चलने और दौड़ने की गति के बीच की गति थी. आठ बजे के स्कूल में वे सवा आठ बजे सही-सही पहुंचना चाह रहे थे.
मोड़ के कुछ पहले से एक कार आ रही थी, तेज़ – इतनी तेज़ कि बच्चों को आगाह हो जाना चाहिए. कार वाले ने अपनी का हॉर्न जोर से भनभनाया. किसी भी गाड़ी का हॉर्न, सृष्टि में बेसुरी न रहते हुए भी अप्रिय चीज़ होने का सबसे सफल उदाहरण है. बच्चों नें नहीं सुना. कार रुकी और कार चला रहे आदमी नें खिड़की से निकलकर चिल्लाकर कहा – अबे! किनारे हट जा.
छोटा लड़का घूमा और पूछा : कहाँ जाऊं हटके?
लड़की घूमी : अपने आप से किनारे कैसे हटें?
कारवाला कुछ देर तक सोच में पड़ा रहा और फिर उसने झुंझलाकर पूछा : किनारा नहीं पता तुम्हें?
लड़की बोली : किनारा कैसा होता है?
फिर लड़का बोला : किनारे से जो चीज़ लगी होती है, वह भी तो अपने मूल का किनारा होती है... अब हम किनारे जैसी किसी जगह पर जायेंगे तो दूसरे किनारे के मूल में रहने वाले लोग हमें इस किनारे आने को कहेंगे, आप तो जानते ही हैं कि इस तरफ़ का किनारा मानी इस तरफ़ के मूल का बीच होता है, मतलब, आपके ठीक सामने.
कारवाला कमीनी हंसी के साथ बोला : मैं कहाँ हूँ? इस किनारे पर...
लड़की : आप तो अभी अंतरिक्ष में हैं, एक मोड़ एक अंतरिक्ष होता है...क्योंकि सड़क ही भारयुक्त है, मोड़ भारहीन है.
अब तक कारवाला कार की बोनट पर आ चुका था.
लड़का : क्यों क्या हुआ..
अब कारवाले ने कहा : तुम लोगों का नाम क्या है?
दोनों कुछ मेल के-से स्वर में बोले : हम आत्मा जैसी कोई चीज़ हैं, हमारा नाम ‘ये’ और ‘वे’ है...हम अपनी आत्मा को अपनें मुंह के अंदर रखते हैं. हमारी आत्मा के पास पूंछ है, वह पेट तक लटकी रहती है.
लड़के ने हवा में हाथ लहराते हुए पूछा : आपके पास कैसी आत्मा है...उसका शरीर कैसा है?
कारवाले ने हँसते हुए कहा : आज मैं घर से आत्मा लेकर निकला था, मेरी जेब में पर्स के अंदर रखकर...अभी कहीं मिल नहीं रही है, कुछ देर पहले उसनें मेरी जेब कटने से बचाया था...पता नहीं कहाँ खो गयी...पैसा, कागज़ और पर्स सभी मौजूद हैं, लेकिन आत्मा का हिसाब गड़बड़ाया हुआ लग रहा है.
दोनों बच्चों नें एक दूसरे की तरफ़ देखकर बहुत हल्की-सी मुस्कान दी.
कारवाले ने पूछा : तुम्हें पता है कि आत्मा अगर पर्स में न हो तो कहाँ हो सकती है?
बच्चों नें कहा : शायद वह आपको छोड़कर चली गई है...आप अपने शरीर के साथ लड़ रहे हैं, इसलिए इतने अनमने ढंग से बात कर रहे हैं.
अब कारवाले ने पूछा : खून कैसा होता है?
बच्चों नें कहा : अगर आत्मा का साथ हो तो खून लाल होता है.
कारवाले ने कहा : मेरा खून तब पीला होना चाहिए!!
लड़के ने उत्तर दिया : आपका खून किसी रंग का नहीं है, पारदर्शी या सफ़ेद भी नहीं..वह तरल भी नहीं है. आपके बताए के अनुसार आपका खून रेत और लेई जैसी किसी चीज़ के बीच का है. वह जमता भी नहीं है, और बहता भी नहीं है. इस तरह आपके अंदर बहुत सारा अखून-खून है.
कारवाले ने कार की स्टेयरिंग पर बैठ कर पूछा : तुम लोगों के अंदर कितना खून है? वह तो लाल होगा न!
बच्चों नें कहा : हाँ, वह लाल ही है, लेकिन बहुत थोड़ा-सा है.
कारवाले ने कहा : तो ठीक है.
कारवाला अब उन बच्चों के ऊपर से गुज़रकर जा चुका था, पीछे दुनिया के उस अन्तरिक्षीय मोड़ पर दो गिलास खून दो स्कूली कपड़ों से निकल रहा था, वहाँ किसी शरीर की कोई उपस्थिति नहीं थी.
आगे किसी ठेले पर रूककर कारवाले ने कुछ खाया. पैसे देने के लिए उसने पर्स निकाला. उसके पर्स में पैसे और कागज़ सब थे, लेकिन कोई चीज़ गायब थी...वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या गायब है, पर्स में सृष्टि की सबसे बड़ी जगह खाली थी.
अगले चौराहे पर उस कारवाले को कुछ रंगदारों नें गोली मार दी. चश्मदीदों नें बताया कि उसके शरीर से जो निकल रहा था, वह खून जैसा न महक रहा था न ही दिख रहा था और न ही उसका स्वाद खून जैसा था(उसका खून चखा गया था?)...वह न बह रहा था, न जम रहा था. सुना है, कारवाला मुस्कुराते हुए भी नहीं मर रहा था.
****
हम एक देश के बारे में बात करेंगे. एक लड़का था, नाम नहीं था या मालूम नहीं. ये जानना कितना विराट अनुभव है कि हर देश एक आदत है, और हर आदत पैसा है और पैसा समय नहीं है....लड़का एक लड़की का पर्याय भी है – लड़की धर्म भी है.
लड़का जब पैदा हुआ, तो उसके पैदा होने के एक घंटे बाद ही उसके घरवालों नें उसकी दोनों आँखों की पुतलियों के निचले आधे हिस्से में अर्ध-चंद्राकार काली अपारदर्शी चकती लगा दी. चकती किसी फाइबरनुमा चीज़ से बनी हुई थी, तो वह अपनी संरचना में काफ़ी कठोर थी.
चकती लगाते समय लड़का एकदम नहीं रोया, उसे पेट में ही इस बात का अंदाज़ लग गया था कि या तो चकती लगेगी, और अगर सफलता नहीं मिली, तब आँखों में गरम तेल उड़ेला जाएगा.
गर्भ में उसका शारीरिक विकास इस तरीके से हुआ कि चकती को वह अच्छे से जज़्ब कर सके. आँखों की पुतलियाँ और फैलीं, अपनी क्षमता से चार गुना ज़्यादा, आँखों के चमड़ीदार कोने अपनी हद से कुछ ज़्यादा फटे, कि फ़ैली हुई पुतली को कोई दिक्कत न हो और वे उसका पर्याय बन सकें.
कहते हैं कि लड़का हिंदू नहीं था, अब किसी के ‘हिंदू न होने’ का मानी मुसलमान ही हो सकता है. शायद यही दो कौमें ऐसी हैं, जो एक-दूसरे से ही डरती हैं और लड़ती हैं, और फिर डरती हैं. चकती इसलिए लगाई गई ताकि वह लड़का ‘किसी’ को उसके कन्धों से नीचे न देख सके. उसका चेहरा ही देख पाए, थोड़ा गला, और गले के आधे का आधा सीना. तमाम शारीरिक विकास इसलिए हुए थे क्योंकि उस लड़के को उस चकती को नकार देना था, उसके उपस्थित रहते हुए भी अपने सभी काम करने थे....जैसे कालीन बुनना, अच्छी शेरवानियों की सिलाई करना, अच्छी बिरयानी बनाना, अच्छी शहनाई बनाना और अच्छी शहनाई बजाना.... बहुत से काम थे उसके जिम्मे.
जिन परिजनों नें चकती लगाई थी, कहा जाता है कि वे मुसलमान नहीं थे. अब किसी के ‘मुसलमान न होने’ का मानी हिन्दू ही हो सकता है. तो, वे यानी जिन्होनें चकती लगाई थी...उसके ‘पुकारे गए’ परिजन...उन्होंने सारी संभावनाओं को खत्म करते हुए उसकी आँख के निचले आधे हिस्से में चकती सिल दी थी.
वह अब नीचे नहीं देख सकता है, सारी स्त्रियाँ उससे बची हुई हैं – जैसा कि लोग कभी नहीं कहते हैं, फिर भी जताते हैं – वह शहनाई भी नहीं बजा रहा है कि शहनाई सो चुकी है, कालीन नहीं बना रहा है, शेरवानी भी बेताला हो जाती है, बिरयानी में भी मसाला कम है, नमक तो और भी कम है – लेकिन, नमक तो गुजरात से आता है न – बिरयानी में हमेशा मिलने वाला गोश्त भी नहीं है, कुछ छोटे हिसाब नहीं हो पातें हैं, बड़े तो एकदम नहीं.
सुना है, जिन लोगों नें चकती लगाई थी, वे उसके घरवाले नहीं थे. लेकिन ये भी सुना है कि वे ही उसके घरवाले होने के हक़दार भी थे, क्योंकि शायद उसके पूर्वजों की घरवालियाँ उनकी शायद कुछ लगती हों?
सुना है, जिन लोगों नें चकती लगाई थी, उन्हें भी चकती लगी हुई है – उनकी आँख के ऊपरी आधे हिस्से में – फिर भी वह सिली हुई नहीं होती है, वे उसे एडजस्टेबल चकती कहते हैं.
सुना है, बिरयानी के गोश्त में कुछ सिली हुई आधी चकतियाँ मिल जाती हैं.
****
तमीज
यह एक तमीज़ के बारे में है, व्यवहार के बारे में और साथ में उस समय के बारे में, जिसमें हम जीते हुए भी अतीत को भविष्य में ढ़ालने की इच्छा रखते हैं. सब कुछ हमेशा चूल्हे-भाड़ में जाता रहा है, सृष्टि की सारी चीज़ें स्थानीयता के अर्थों में 'तेल लेने' चली गईं. अतीत का वर्तमान भी 'तेल लेने' क्यों नहीं चला गया? उसकी उपस्थिति हमेशा मानकों की रचना करती रहती है.
दो बच्चे सड़क पर थे, कन्धों पर बस्ते और गले में थर्मस लटकाए, वे अपने स्कूल की तरफ बढ़ रहे थे, जहां पानी की बोतल लाना मना था, क्योंकि बोतल लाना समय के साथ एक समझौता है, तो स्कूल के लोगों को बोतल-वोतल से कोई खास परेशानी नहीं होती थी.
जैसे दुनिया की हर सड़क अपने हर मोड़ पर असफल हो जाती रही है क्योंकि मोड़ के पहले वाली सड़क हमेशा मोड़ के बाद वाली सड़क से एकदम अलग होती है...दोनों बच्चे ऐसे ही दुनिया के किसी मोड़ के मध्यांतर पर पहुँच रहे थे. एक लड़का था और उसके साथ उसकी छोटी बहन लड़की थी. वे चल नहीं रहे थे, वे दौड़ भी नहीं रहे थे, उनकी गति चलने और दौड़ने की गति के बीच की गति थी. आठ बजे के स्कूल में वे सवा आठ बजे सही-सही पहुंचना चाह रहे थे.
मोड़ के कुछ पहले से एक कार आ रही थी, तेज़ – इतनी तेज़ कि बच्चों को आगाह हो जाना चाहिए. कार वाले ने अपनी का हॉर्न जोर से भनभनाया. किसी भी गाड़ी का हॉर्न, सृष्टि में बेसुरी न रहते हुए भी अप्रिय चीज़ होने का सबसे सफल उदाहरण है. बच्चों नें नहीं सुना. कार रुकी और कार चला रहे आदमी नें खिड़की से निकलकर चिल्लाकर कहा – अबे! किनारे हट जा.
छोटा लड़का घूमा और पूछा : कहाँ जाऊं हटके?
लड़की घूमी : अपने आप से किनारे कैसे हटें?
कारवाला कुछ देर तक सोच में पड़ा रहा और फिर उसने झुंझलाकर पूछा : किनारा नहीं पता तुम्हें?
लड़की बोली : किनारा कैसा होता है?
फिर लड़का बोला : किनारे से जो चीज़ लगी होती है, वह भी तो अपने मूल का किनारा होती है... अब हम किनारे जैसी किसी जगह पर जायेंगे तो दूसरे किनारे के मूल में रहने वाले लोग हमें इस किनारे आने को कहेंगे, आप तो जानते ही हैं कि इस तरफ़ का किनारा मानी इस तरफ़ के मूल का बीच होता है, मतलब, आपके ठीक सामने.
कारवाला कमीनी हंसी के साथ बोला : मैं कहाँ हूँ? इस किनारे पर...
लड़की : आप तो अभी अंतरिक्ष में हैं, एक मोड़ एक अंतरिक्ष होता है...क्योंकि सड़क ही भारयुक्त है, मोड़ भारहीन है.
अब तक कारवाला कार की बोनट पर आ चुका था.
लड़का : क्यों क्या हुआ..
अब कारवाले ने कहा : तुम लोगों का नाम क्या है?
दोनों कुछ मेल के-से स्वर में बोले : हम आत्मा जैसी कोई चीज़ हैं, हमारा नाम ‘ये’ और ‘वे’ है...हम अपनी आत्मा को अपनें मुंह के अंदर रखते हैं. हमारी आत्मा के पास पूंछ है, वह पेट तक लटकी रहती है.
लड़के ने हवा में हाथ लहराते हुए पूछा : आपके पास कैसी आत्मा है...उसका शरीर कैसा है?
कारवाले ने हँसते हुए कहा : आज मैं घर से आत्मा लेकर निकला था, मेरी जेब में पर्स के अंदर रखकर...अभी कहीं मिल नहीं रही है, कुछ देर पहले उसनें मेरी जेब कटने से बचाया था...पता नहीं कहाँ खो गयी...पैसा, कागज़ और पर्स सभी मौजूद हैं, लेकिन आत्मा का हिसाब गड़बड़ाया हुआ लग रहा है.
दोनों बच्चों नें एक दूसरे की तरफ़ देखकर बहुत हल्की-सी मुस्कान दी.
कारवाले ने पूछा : तुम्हें पता है कि आत्मा अगर पर्स में न हो तो कहाँ हो सकती है?
बच्चों नें कहा : शायद वह आपको छोड़कर चली गई है...आप अपने शरीर के साथ लड़ रहे हैं, इसलिए इतने अनमने ढंग से बात कर रहे हैं.
अब कारवाले ने पूछा : खून कैसा होता है?
बच्चों नें कहा : अगर आत्मा का साथ हो तो खून लाल होता है.
कारवाले ने कहा : मेरा खून तब पीला होना चाहिए!!
लड़के ने उत्तर दिया : आपका खून किसी रंग का नहीं है, पारदर्शी या सफ़ेद भी नहीं..वह तरल भी नहीं है. आपके बताए के अनुसार आपका खून रेत और लेई जैसी किसी चीज़ के बीच का है. वह जमता भी नहीं है, और बहता भी नहीं है. इस तरह आपके अंदर बहुत सारा अखून-खून है.
कारवाले ने कार की स्टेयरिंग पर बैठ कर पूछा : तुम लोगों के अंदर कितना खून है? वह तो लाल होगा न!
बच्चों नें कहा : हाँ, वह लाल ही है, लेकिन बहुत थोड़ा-सा है.
कारवाले ने कहा : तो ठीक है.
कारवाला अब उन बच्चों के ऊपर से गुज़रकर जा चुका था, पीछे दुनिया के उस अन्तरिक्षीय मोड़ पर दो गिलास खून दो स्कूली कपड़ों से निकल रहा था, वहाँ किसी शरीर की कोई उपस्थिति नहीं थी.
आगे किसी ठेले पर रूककर कारवाले ने कुछ खाया. पैसे देने के लिए उसने पर्स निकाला. उसके पर्स में पैसे और कागज़ सब थे, लेकिन कोई चीज़ गायब थी...वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या गायब है, पर्स में सृष्टि की सबसे बड़ी जगह खाली थी.
अगले चौराहे पर उस कारवाले को कुछ रंगदारों नें गोली मार दी. चश्मदीदों नें बताया कि उसके शरीर से जो निकल रहा था, वह खून जैसा न महक रहा था न ही दिख रहा था और न ही उसका स्वाद खून जैसा था(उसका खून चखा गया था?)...वह न बह रहा था, न जम रहा था. सुना है, कारवाला मुस्कुराते हुए भी नहीं मर रहा था.
****

Monday, 05 September, 2011
कहानियों के उस परंपरागत शिल्प को जो हिंदी में एक विकल्पवंचित भाव में स्वीकृत रहा आया है.... अतिक्रमित करने के लिए ऐसी लम्बी कहानियों की ज़रुरत पड़ती रही है, जो अपने मूल में एक छोटे उपन्यास सी लगती आई हैं,लेकिन Ssiddhant Mohan Tiwary की ये दो कहानियाँ उस परंपरागत शिल्प को (बगैर किसी विराट वाग्जाल के) स्केप कर जाती हैं.... बगैर किसी संशय के यह कहा जा सकता है कि यह इनकी एक बड़ी कामयाबी हैं....
Tuesday, 06 September, 2011
mujhe phir se padhna hoga inhe jazb karne ke liye.. bahut sundar.. gagar me saagar bhar diya hai..
Tuesday, 06 September, 2011
अविनाश ने अपनी टिपण्णी में मेरे मन की बात कह दी है ...बहुत दिनों बाद कोई वाकई अच्छी चीज़ पढ़ी है ...
Tuesday, 06 September, 2011
खुशामदीद! पहली नजर में ये कहानियाँ, कविता जैसी दीखती हुई भी अपने प्रभाव में कहानियां हैं. संरचना के लिहाज से लड़ने का हौसला जुटाने के लिए, बधाई सिद्धांत. अभी और कुछ सोचने-कहने को रह गया है पर बधाई तो ले ही लो!
Thursday, 08 September, 2011
कहानियां अच्छी है. बिषय की नवीनता को भाषा की सजीवता ने और भी प्राणवान बना दिया है...
Friday, 09 September, 2011
शिल्पगत नयापन स्वागतेय है। बधाई...
Friday, 09 September, 2011
अविनाश मिश्र जी और मृत्युंजय ने वही कहा है जो शायद मै कहना चाहता हु.
Saturday, 10 September, 2011
अच्छी कहानियां.
Tuesday, 19 February, 2013
Execellent way of story telling......impressive n fluent.GOOD WISHES.
Post a Comment