Tuesday, September 27, 2011

महेश वर्मा की नई कविताएं




पुराना दिन

तुम वहाँ कैसे हो गुज़रे हुए दिन और साल?
यह पूछते हुए पुरानी एलबम के भुरभुरे पन्ने नहीं पलट रहा हूँ

तुम्हारी आवाज़ आज के नए घर में गूंजती है
और हमारी आज की भाषा को बदल देती है

एक समकालीन वाक्य उतना भी तो समकालीन नहीं है
वह पुरानी लय का विस्तार है

और इतिहास की शिराओं का हमारी ओर खुलता घाव
वह तुम्हारे विचारों का निष्कर्ष है हमारी आज की मौलिकता
पुराने आंसुओं का नमक आज की हंसी का सौंदर्य

मरा नहीं है वह कोई भी पुराना दिन
राख, धूल और कुहासे के नीचे वह प्रतीक्षा की धडकन है
गवाही के दिन वह उठ खड़ा होगा
और खिलाफ गवाही के दस्तावेज के नीचे दस्तखत करेगा.
****

बाहर

...फिर क्या होता है कि तुम प्रतीक्षा के भ्रामक विचार से धीरे धीरे दूर होते जाते हो . यह दूर जाना इतने धीमे तुम्हारे अवचेतन में घटित होता है कि दांतों के क्षरण और त्वचा के ह्रास की तरह इसका पता ही नहीं चलता. किसी एक रोज थोड़ा दूर हटकर तुम संदेह करते हो कि वाकई तुम्हें प्रतीक्षा थी भी या नहीं . फिर होता यह है कि तुम प्रेम की घटना और अंततः प्रेम के विचार से ही एक उपहासात्मक दूरी बनाना चाहते हो अपने वीतराग में इस तरह कि कोई प्रेम नहीं था, प्रतीक्षा भी नहीं .

यहाँ ज़रा रूककर इस सुन्दर संतुलन को देखें कि ये तुम्हारे विचार नहीं थे , एक पुकार थी तुम्हारी ओर से अपने आप को यातना देती हुई कि प्रेम तुम्हें पुकारता हूँ इस तरह कि आज कह रहा हूँ कि तुम नहीं थे. धूल भरे मैदानों की दूरियों में अस्त होती तुम्हारी इस पुकार की कोई उदास प्रतिध्वनि गूंजती भी हो तो तुम्हारी आत्मा के एकांत में ही सुनाई देगी वह प्रतिध्वनि.

तुम्हारी इच्छा से बाहर थी तुम्हारी प्रतीक्षा .

तुम्हारी प्रतीक्षा से बाहर तुम्हारा प्रेम.
****

इतिवृत्त

घोड़े की पीठ पर सो लेते थे बाबा
एक बार ऐसे ही पार कर गए थे
पारिवारिक किम्वदंती की नदी
घोड़े की पीठ पर सोते-सोते

पुजारी पिता भोर में नहीं उठ पाते थे जिस रोज
देवी के स्वप्न से उठते थे हडबडाए
देवी ने लात मारकर जगाया कहते फिर
उस पदाघात को प्रणाम करते अमूर्त दिशा में

चाचा को बस में बैठते ही नींद आ जाती थी
चौंक-चौंक उठते थे सपने की दुर्घटना में
थोड़ी देर में पहचानते थे अपना आसपास

माँ गुडीमुडी होकर सो रही है रसोई के ही फर्श पर
कभी सोती है पूजाघर में

भाई सपने में अक्सर डांटता है किसी को
पहले कहाँ सोता था मेरे पेट पर घुटना दिए बगैर

कहानी या अपने रुदन के विस्तार में ही सोता है मेरा बेटा

अधूरे कामों के टुकड़ा वाक्यों में डूब रही है पत्नी
अपनी थकन में सोने से पहले

ऐसे में क्या कहा जा सकता है अपने सोने जागने के बारे में
****

चेहरा

पता नहीं तुम कितने अंतिम संस्कारों में शामिल हुए
कितनी लाशें देखीं लेकिन फिर जोर देता हूँ इसपर
कि मृत्यु इंसान का चेहरा अप्रतिम रूप से बदल देती है

यह मुखमुद्रा तुमने इसके जीते जी कभी नहीं देखी थी

यह अपने मन का रहस्य लेकर जा रहा है और निश्चय ही नहीं लौटेगा

पता नहीं क्या करता इसका अगर कुछ और दिन रुकता कि
कौन-सा स्पर्श उसकी त्वचा में सिहरन भर देता था और उसकी सांसों में आग
कौन सी याद उसकी आत्मा को भर देती थी खालीपन से
किन कंदराओं से आता था उसका वीतराग मौन और उसकी धूल भरी आवाज़

यह उसका विनोद है, उसका असमंजस
उसकी पीड़ा है और उसका पापबोध
जो उस रहस्य से जुडा है निश्चय ही जिसे लेकर जा रहा है
या उसका क्षमाभाव है

और बदला न ले पाने को ऐंठती उसकी आत्मा की प्रतिछवि है उसके चेहरे पर
जो उसे बनाती है अभेद्य और अनिर्वचनीय

एक प्रेमनिवेदन जो किया नहीं गया
एक हत्यारी इच्छा , हिंसात्मक वासना
मौक़ा, चूकी दयालुताएं और प्रतिउत्तर के वाक्य

ये उसकी आत्मा की बेचैन तहों में सोते थे फिलवक्त
अब इन्हें एक अँधेरे बक्से में रख दिया जाएगा

प्रार्थना का कोई भी सफ़ेद फूल,
करुणा का कोई भी वाक्य इन तक नहीं पहुँच पायेगा

और तुम्हें यह तो मानना ही होगा कि
तुम्हारी काव्यात्मक उदासी से बड़ी चीज़ थी
उसके मन का रहस्य

बाकी संसार आज उससे छोटा ही रहेगा.
****

[ महेश वर्मा हिंदी के चर्चित युवा कवि हैं। सबद पर इनकी कविताएं इससे पहले यहां देखें।
कविताओं के साथ दी गई तस्वीर गूगल से। ]

Saturday, September 17, 2011

सबद विशेष : १२ : उम्बेर्तो ईको






उम्बेर्तो ईको यानी कल्पना का विज्ञान

इतालवी लेखक उम्बेर्तो ईको ने जब पहला उपन्यास लिखा, तो उस समय उनकी उम्र लगभग पचास साल थी। वह चिंतक और दार्शनिक के तौर पर उससे पहले ही दुनिया-भर में कीर्ति पा चुके थे। उनका पहला उपन्यास 'द नेम ऑफ द रोज़’, जिसे शुरुआत में आलोचकों ने निशाने पर लिया था, बहुत जल्द ही पूरी दुनिया में मक़बूल हुआ और अब वह मॉडर्न क्लासिक्स में गिना जाता है।
ईको जटिल और भीषण बुद्धिवादी हैं। तर्क उनके पैरों का महावर है, जो चलते समय फ़र्श पर अपनी छाप ज़रूर छोड़ता है। जब अधिकांश लेखक भाव को रचना की शेष-शय्या बताते हैं, ईको तर्क को भाव का सहोदर बना देते हैं और उसे आगे खड़ा करते हैं। वह बोर्हेस की मेटाफिक्शन और मेटानैरेटिव परंपरा को कृष्णकाय ऊंचाई तक पहुंचा देते हैं।
बोर्हेस को पढ़ते हुए हमेशा यह ध्यान आता है कि हमारी कल्पना का दायरा उतना ही बड़ा होता है, जितना यथार्थ के बारे में हमारे ज्ञान का। हमारा अज्ञान कभी भी हमारी कल्पना का हिस्सा नहीं बन पाता। यानी यथार्थबोध और कल्पना का आकार एक जितना होता है। ईको का फिक्शन, जिसे वह हमेशा अपनी कल्पना ही कहते हैं, एक अविश्वसनीय ज्ञान का आख्यान ही है। उनकी कल्पनाएं तथ्यों से इतनी परिपूर्ण होती हैं कि यथार्थ होती हैं। यह उनके चमकते भाल पर मेटानैरेशन का तिलक है। मेरी नज़र में ईको 'कल्पना का विज्ञान’ हैं।
इन टुकड़ों में ईको अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बहुत अनौपचारिक तरीके से बता रहे हैं। यह जानना सुखद और आश्चर्यकारी है कि उनके पास अपने हर किरदार के चेहरे का रेखांकन बना होता है, इमारतों के नक्शे बनाकर वह अपना काम करते हैं, दो जगहों के बीच की दूरी को नापने के लिए खुद उनके बीच पैदल चलते हैं और उतनी देर खुद से बातें करके शब्द गिनते हैं,ताकि उन्हें यह पता हो कि इस विशेष दूरी में उनके किरदार इससे ज़्यादा शब्द कह ही नहीं सकते। इससे उनके संवाद अपनी लंबाई में एकदम सटीक होते हैं। ऐसा वह लेखक करता है, जिसे शुरू से खुद पर संदेह है कि वह कभी अच्छे संवाद लिख ही नहीं सकता। ऐसा ही संदेह हमेशा मारकेज़ भी खुद पर करते रहे।
हम जिस भाषा में काम करते हैं, वहां लेखकों की रचना-प्रक्रिया स्वत:स्फूर्ति पर टिकी होती है। नई कहानी के दिग्गज अक्सर यह लिखते पाए गए कि मैं अवसाद में था, रात लिखने बैठा, सुबह तक कहानी पूरी कर दी, नहा-धोकर नई कहानियां या सारिका या अमुक के दफ्तर में दे आया, अगले अंक में वह छप गई, और खूब चर्चित हुई। हमें यहां अक्सर सडेन बर्थ की उत्सवधर्मिता मिलती है। ‘प्रकाशपुंजीय प्रेरणाओं’ का माहात्‍म्‍य मिलता है।
ऐसे में, ख़ुद पहल करके रचनात्‍मक श्रम का हाथ मांगने की इस ईको-कथा से गुज़रना, हमारे लेखक-पाठकों के लिए एक अनिवार्य अध्‍यवसाय जैसा जान पड़ता है।
त्वरा और श्रम की कोई भेंट नहीं होती। दोनों विपरीत ध्रुवों के वासी हैं। श्रेष्ठता का कोई एक फॉर्मूला नहीं होता। रचना-प्रक्रिया लेखक का निजी प्रदेश है। वह कैसा भी हो सकता है, उस पर प्रश्न नहीं। लेकिन एक निर्विवाद मास्टर रचनात्मकता के अपने जुनून में महान मिस्त्रियों की तरह कैसे एक-एक ईंट अपने हाथ से चुनता है और कैसे एक-एक त$फ्सील का महत्व समझता-समझाता है, इसे जानना अपने अभूतपूर्व संकरेपनों को निरस्त करने का बायस ज़रूर हो सकता है। लेखक/कलाकार की प्रतिबद्धता सिर्फ अपनी कहानी/कला की सुंदरता से होती है।
- गीत चतुर्वेदी
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आख्यान, प्रथमत: और अंतत: एक ब्रह्मांडीय कारोबार है
1978 के शुरुआती दिनों में एक छोटे प्रकाशक के लिए काम करने वाली मेरी एक दोस्त ने मुझे बताया कि उसने कुछ गैर-उपन्यासकार लेखकों (यानी दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों, राजनीतिज्ञों आदि) से कहा है कि वे एक छोटी-सी जासूसी कथा लिखकर दें। मैंने उसे यही जवाब दिया कि मैं क्रिएटिव राइटिंग में दिलचस्पी नहीं रखता और मुझे यह पूरा विश्वास है कि मैं अच्छे संवाद लिखने में पूर्णत: अक्षम हूं। यह कहते हुए मैंने अपनी बात खत्म की कि जब भी मैं एक क्राइम नॉवल लिखूंगा, वह कम से कम पांच सौ पेज लंबा होगा और किसी मध्ययुगीय मठ की पृष्ठभूमि पर होगा। पता नहीं, यह बात मैंने क्यों कही थी, लेकिन यह थोड़ा भड़काऊ अंदाज़ में कही थी। मेरी दोस्त ने मुझसे कहा कि वह ऐसे किसी फटाफट बिक जाने वाले लुगदी साहित्य की चर्चा करने मेरे पास नहीं आई है। और हमारी मुलाक़ात वहीं समाप्त हो गई।
जैसे ही मैं घर पहुंचा, मैंने अपनी मेज़ की दराज़ों में खोजा और पिछले साल लिखे काग़ज़ के एक टुकड़े को निकाला, जिस पर मैंने कुछ भिक्षुओं के नाम लिख रखे थे। इसका अर्थ यह था कि मेरी आत्मा के सबसे गुप्त हिस्से में एक उपन्यास का विचार पहले से ही चल रहा था, लेकिन मैं उससे अनभिज्ञ था। उसी समय मुझे यह विचार आया कि बेहतर होगा कि मेरी कहानी में ऐसा हो, एक भिक्षु एक रहस्यमयी किताब पढ़ रहा है और उसी समय ज़हर के कारण उसकी मौत हो जाती है। इस तरह मैंने'द नेम ऑफ द रोज़’ लिखने की शुरुआत की।
उपन्यास छपने के बाद अक्सर लोग मुझसे यह सवाल करते कि आखिर मुझे उपन्यास लिखने की क्या पड़ी थी, और मैं उन्हें जो भी कारण बताता (मेरे कारण हमेशा मेरे मूड के हिसाब से बदल जाते थे), वे सारे के सारे सही थे- इसका अर्थ यह हुआ कि वे सारे के सारे गलत थे। धीरे-धीरे मैंने खुद जाना कि सिर्फ एक ही जवाब सही था और वह यह कि जीवन के किसी एक खास पल में मेरे भीतर उपन्यास लिखने की इच्छा जागी थी- और मुझे लगता है कि यही पर्याप्त और वाजिब जवाब है ऐसे सवाल का।
*
जब इंटरव्यू करने वाले मुझसे पूछते हैं, 'आप अपने उपन्यास किस तरह लिखते हैं’, तो मैं उनके सवाल को बीच में ही काटते हुए जवाब देता हूं, 'बाएं से दाएं की तरफ’। मुझे पता है कि यह कोई संतोषजनक जवाब नहीं है और इसके कारण कई अरब देशों और इज़राइल में एक खास किस्म की हैरत भी फैल सकती है। इस प्रश्न का विस्तृत उत्तर देने के लिए अब मेरे पास पर्याप्त समय है।
पहला उपन्यास लिखने की प्रक्रिया में मैंने कुछ चीज़ें बहुत गौर से सीखीं। पहली, 'प्रेरणा’ एक बहुत बुरा शब्द है, जिसका इस्तेमाल तिकड़मी लेखक खुद की कलात्मक स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए करते हैं। जैसा कि पुरानी कहावत कहती है, प्रतिभा का अर्थ दस फीसदी प्रेरणा और नब्बे फीसदी कठोर श्रम है। फ्रेंच कवि लामार्तीने के बारे में एक किस्सा बताया जाता है। वह अपनी एक अत्यंत चर्चित कविता के बारे में कहते थे- एक रात मैं घने जंगल में घूम रहा था, तभी एक प्रकाशपुंज के साथ यह कविता मुझ पर नाजि़ल हुई। एकदम इसी तरह लिखी हुई। उनकी मृत्यु के बाद किसी ने उनके अध्ययन-कक्ष से उस कविता के कई अलग-अलग ड्राफ्ट खोज निकाले। यानी वह उस कविता का लेखन और पुनर्लेखन कई बरसों से कर रहे थे।
जिस आलोचक ने 'द नेम ऑफ द रोज़’ की पहली समीक्षा लिखी थी, उसका कहना था कि यह उपन्यास किसी प्रकाशपुंजीय प्रेरणा के तहत ही लिखा गया है, लेकिन इसकी भाषा, संरचना और थीम इतने कठिन हैं कि इस उपन्यास को सिर्फ एक खास वर्ग ही पढ़ सकता है। जब उस उपन्यास ने अतुलनीय सफलता हासिल की, उसकी दसियों लाख प्रतियां बिकीं, उसी आलोचक ने उसकी लोकप्रियता और प्रशंसाओं को पचा न पाते हुए यह लिखा, 'मुझे पूरा विश्वास है कि इस उपन्यास में बहुत यांत्रिक तौर पर किसी गुप्त नुस्खे या रेसिपी का इस्तेमाल किया गया है।‘ बाद में उन लोगों ने यह कहा कि किताब की सफलता के पीछे एक कंप्यूटर प्रोग्राम का योगदान है। यह कहते हुए वे यह भूल गए कि एक ठीक-ठाक से लेखन-साफ्टवेयर के साथ जो पहला कंप्यूटर आया था, वह अस्सी के दशक की शुरुआत में आया था। मैं अपना उपन्यास उससे पहले लिख चुका था। 1978-79 में अमेरिका में भी आपको जो सर्वश्रेष्ठ कंप्यूटर मिल सकता था, वह था टैंडी का बनाया हुआ घटिया कंप्यूटर, जिसका अधिकतम इस्तेमाल आप एक छोटी चिट्ठी लिखने के लिए कर सकते थे, उससे ज्यादा कुछ नहीं।
मैं कंप्यूटर प्रोग्राम वाले इन आरोपों से थोड़ा दुखी था। सो इसके कुछ ही समय बाद मैंने कंप्यूटर-मेड बेस्टसेलर की एक रेसिपी तैयार की :
''सबसे पहले आपको एक कंप्यूटर चाहिए। स्वाभाविक है कि यह वह बुद्धिमान मशीन है, जो आपके लिए सोचती है। यह कई लोगों के लिए मददगार साबित होगी। आपको सिर्फ चंद पंक्तियों का एक प्रोग्राम चाहिए, और उसके बाद एक बच्चा भी यह काम कर सकता है। उसके बाद आप कंप्यूटर में सौ से ज्यादा उपन्यासों, वैज्ञानिक कृतियों, बाइबल, $कुरान और कई सारी टेलीफोन डायरेक्टरी (चरित्रों का नाम रखने के लिए टेलीफोन डायरेक्टरी बहुत मददगार होती है) को फीड कर दीजिए। अंदाज़न 1,20,000 पेज। इसके बाद आप एक दूसरे प्रोग्राम की मदद से इसे रैंडमाइज करेंगे। दूसरे शब्दों में कहूं, तो आप सारे टेक्स्ट को आपस में मिक्स करेंगे, कुछ एडजस्टमेंट करेंगे, मसलन, आप सारे टेक्स्ट में 'ई’ की मात्रा को हटा दीजिए। इससे न केवल उपन्यास तैयार होगा, बल्कि पेरेक की तरह एक लिपोग्राम भी बन जाएगा। इसके बाद आप प्रिंट का कमांड दबाइए और चूंकि आपने 'ई’ की सारी मात्राएं हटा दी हैं, तो जो बाहर आएगा, वह यकीनन 1,20,000 पेजों से कम ही होगा। इसे आप कई बार पढ़ डालिए, कुछ अच्छे पैराग्राफ को अंडरलाइन कर दीजिए, इसके बाद आप इस पूरे टेक्स्ट को एक भट्ठी में ले जाइए। इसके बाद आराम से एक पेड़ के नीचे बैठ जाइए, चारकोल और एक अच्छा-सा ड्राइंग पेपर लीजिए और अपने दिमाग को भटकने की पूरी छूट दीजिए, उसके बाद उस पेपर पर दो पंक्तियां लिखिए, मसलन, 'चांद आसमान में बहुत ऊपर है/ जंगल में पत्तियां खडख़ड़ा रही हैं’। इस तरह जो शुरुआत में उभरेगा, वह उपन्यास की तरह कम, जापानी हाइकु की तरह ज़्यादा दिखेगा। लेकिन फिर भी आप जानते ही हैं, शुरुआत ही तो सबसे जरूरी होती है।‘’
*
'द नेम ऑफ द रोज़’ लिखने में मुझे दो साल से भी कम वक्त लगा। इसका एक कारण यह भी था कि मुझे मध्य युग पर किसी किस्म का शोध नहीं करना पड़ा। जैसा कि आप जानते ही हैं, मेरा पीएचडी का विषय ही मध्य युगीन सौंदर्यशास्त्र था। उन बरसों में मैंने कई रोमन मठों की यात्रा की थी, गॉथिक चर्चों में गया था। जब मैंने उपन्यास लिखना तय किया, तो यह वैसा ही था, जैसे मुझे अपनी मेज़ का वह दराज़ खोलना है, जिसमें मध्य युग से संबंधी फाइलों को मैं बरसों से रखता आ रहा हूं। सारा सामान तो मेरे हाथ में ही था, मुझे सिर्फ यह चुनना था कि मुझे इसमें से क्या चाहिए। दूसरे उपन्यासों के लिए हालात एकदम अलग थे (हालांकि मैंने हमेशा वही विषय चुने, जिनके बारे में मैं पहले से जानता था)। इसी कारण मेरे बाद के उपन्यासों ने काफी वक्त लिया। 'फूकोज पेंडुलम’ में आठ बरस लगे, 'आइलैंड ऑफ द डे बीफोर’ और 'बॉदोलीनो’ के लिए छह-छह बरस लगे।'द मिस्टीरियस फ्लेम ऑफ क्वीन लोना’ पर मैंने सिर्फ चार बरस लगाए, क्योंकि वह मेरी 1930 और 40 के दशक में यानी मेरे बचपन के दौरान की पढ़ाइयों से जुड़ा हुआ उपन्यास था। उसके लिए मैंने घर में मौजूद कई सारी चीज़ों का इस्तेमाल किया,मसलन कॉमिक्स, पुरानी रिकॉर्डिंग्स, पत्रिकाएं और अखबार। यानी स्मृतियों का मेरा पूरा ज़खीरा।
*
साहित्यिक गर्भावस्था के बरसों में मैं क्या करता हूं? मैं दस्तावेज़ इकट्ठा करता हूं, जगहों की यात्रा करता हूं और नक्शे बनाता हूं। मैं इमारतों की संरचना नोट करता हूं। या किसी जहाज़ की, जैसा कि 'आइलैंड ऑफ द डे बीफोर’ के लिए किया था या फिर अपने चरित्रों के चेहरे का स्केच बनाता रहता हूं। 'द नेम ऑफ द रोज़’ लिखते समय मैंने अपने हर भिक्षुक चरित्र के चेहरे का स्केच बनाया था। मैं तैयारी के इन सारे बरसों को एक जादुई महल की तरह जीता हूं। या इस तरह कहें कि पूरी तरह खोया हुआ और निर्लिप्त रहता हूं। किसी को पता नहीं चलता कि मैं क्या कर रहा हूं, मेरे परिवार को भी नहीं। मैं ऐसा जताता हूं जैसे मैं एक साथ बहुत सारी चीज़ें कर रहा हूं, लेकिन हकीकत यह है कि मैं हमेशा अपनी कहानी के लिए विचार, छवियां और शब्द जुटाता रहता हूं। जैसे कि जब मैं मध्य युग के बारे में लिख रहा हूं और उसी समय मैं गली में एक कार को गुज़रते हुए देखता हूं, और उसका रंग मुझे पसंद आ जाता है, तो मैं उसके अनुभव को अपनी डायरी में लिख लेता हूं, या फिर अपने दिमाग में नोट कर लेता हूं, और संभव है कि बाद में वह रंग मध्य युग की किसी पेंटिंग का वर्णन करते समय मेरी मदद कर जाए।
'फूकोज पेंडुलम’ की योजना बनाते समय मैंने कई शामें, लगातार एक के बाद एक, उस संग्रहालय में बिताई थीं, जहां मेरी कहानी का एक बड़ा हिस्सा चित्रित होता है। मैं वहां तब तक रहता था, जब तक कि वे उसे बंद नहीं कर देते थे। कासुबों की पेरिस में रातों को की जाने वाले चहलकदमियां लिखने के लिए मैंने कितनी ही रातें पेरिस में, दो से तीन बजे के बीच, पैदल चल-चलकर काटी हैं। उस समय मैं अपने पास एक पॉकेट टेपरिकॉर्डर रखता था और लगातार बोलता चलता था, ताकि मैं गलियों और चौराहों के नामों में कोई गलती न कर बैठूं। उन्हें मैं बोलकर उसमें नोट करता था।
'आइलैंड ऑफ द डे बीफोर’ की तैयारी करते समय ज़ाहिर है कि मैं दक्षिणी समुद्र की तरफ गया था। मैं ठीक उस जगह को देखना चाहता था, जहां मेरी कहानी चलती है। मैं देखना चाहता था कि दिन के अलग-अलग घंटों में आसमान और समंदर का रंग कैसे बदला करता है। मछलियों और मूंगों को देखा करता था। दो या तीन साल मैंने सिर्फ इसी अध्ययन में लगाए कि उस ज़माने के जहाज़ों का नक्शा कैसा होता था, ताकि मैं सही-सही यह जान सकूं कि उसमें केबिन का आकार कितना हो सकता था और कैसे एक व्यक्ति एक से दूसरे केबिन में जा सकता है।
'द नेम ऑफ द रोज़’ के छपने के बाद जिस पहले फिल्म निर्देशक ने मुझसे संपर्क किया था, वह थे मार्को फेरारी। उन्होंने मुझसे कहा, 'ऐसा लगता है जैसे आपने यह किताब ठीक किसी फिल्म को ध्यान में रखकर लिखी हो। इसके संवाद एकदम सटीक हैं,अपनी लंबाई और प्रभाव में।‘
शुरू में मेरी समझ में यह बात नहीं आई। फिर मुझे याद आया कि जब मैंने लिखना शुरू किया था, तो मैंने उस मठ की भुलभुलैया और संरचना का हज़ारों बार रेखांकन किया था। इसलिए मुझे यह पता था कि किन्हीं दो चरित्रों को एक से दूसरी जगह जाने में कितना समय लगेगा। और उस दौरान अगर वे बातें कर रहे होंगे, तो उस निश्चित दूरी में वे कितनी बातें कर सकेंगे। तो इस तरह मेरी काल्पनिक दुनिया ने मेरे संवादों की लंबाई भी तय कर दी थी।
इस तरह मैंने यह सीखा कि उपन्यास केवल एक भाषाई तत्व नहीं होता। कविता में शब्दों का अनुवाद अत्यंत कठिन है क्योंकि वहां शब्दों के ध्वन्यार्थों का गहरा महत्व होता है, साथ ही जान-बूझकर उन शब्दों में रची गई अर्थबहुलता भी। इस तरह कविता में शब्दों का चयन यह तय करता है कि उसका कंटेंट कैसा होगा। आख्यान में हम बिलकुल उलटी स्थिति में होते हैं: लेखक ने अपने लिए जो ब्रह्मांड रचा है और उसमें जो घटनाएं घटती हैं, वे यह तय करते हैं कि इसकी लय और शैली क्या होगी, यहां तक कि शब्दों का चयन भी वही तय करते हैं। आख्यान उस पुराने लातिन नियम से संचालित होता है, जिसमें कहा गया है,अपने विषय के साथ चिपके रहो, शब्द अपने आप आ जाएंगे। जबकि कविता के लिए हमें यह कहावत बदलनी होती है: अपने शब्दों के साथ चिपके रहो, विषय अपने आप आ जाएगा।
आख्यान, प्रथमत: और अंतत:, एक ब्रह्मांडीय कारोबार है। जब आप आख्यान की रचना करते हैं, तो अपने काम की शुरुआत विश्वकर्मा देव की तरह करते हैं, जिन्होंने दुनिया को बनाया। दुनिया जो कि इतनी सूक्ष्म हो कि आप उसमें पूरे विश्वास के साथ चल सकें।
मैं इस नियम का पालन बहुत कड़ाई से करता हूं। जैसे जब मैं 'फूकोज पेंडुलम’ में कहता हूं कि दो प्रकाशन संस्थान मानुत्सियो और गारामोंद अगल-ब$गल की इमारतों में हैं और दोनों के बीच से एक गलियारा गुज़रता है, तो मैं लंबा समय उसकी संरचना का नक्शा बनाने में लगाता हूं और ठीक-ठीक यह पता करता हूं कि वह गलियारा कैसा दिखेगा, और क्या दोनों इमारतों की ऊंचाई के फर्क को दिखाने के लिए बीच में कुछ सीढिय़ों की भी ज़रूरत होगी। उपन्यास में मैंने सीढिय़ों का बहुत हल्का-सा जि़क्र किया है, और मेरा ख्याल है कि पाठक उस पर ज़्यादा ध्यान भी नहीं देता, लेकिन मेरा मानना है कि अगर मैंने उन सीढिय़ों की डिज़ाइन पर काम नहीं किया होता, तो मेरे लिए कहानी को आगे बढ़ा पाना बहुत मुश्किल हो जाता।
लोग कहते हैं कि लूचिनो विस्कोंती अपनी फिल्मों के लिए भी यही तरीका अपनाते थे। अगर पटकथा में यह लिखा होता कि दो किरदार गहनों से भरे एक डिब्बे के सामने आपस में बातें कर रहे हों, तो वह ज़ोर देते थे कि उस दौरान डब्बे में असली गहने भरे जाएं, भले पूरे दृश्य में उस डब्बे को एक बार भी खुला हुआ न बताया जाए। वैसा न होने पर अभिनेता पूरी शिद्दत के साथ अभिनय नहीं कर पाएगा।
'फूकोज पेंडुलम’ के पाठकों को कोई ज़रूरत नहीं कि वे उसमें दिखाए प्रकाशन संस्थानों की इमारतों की संरचना के बारे में जानें। भले लेखक के लिए बुनियादी चीज़ यह है कि वह उपन्यास की दुनिया, जो कि चरित्रों और घटनाओं से बनती है, उस पर ज़्यादा ध्यान दे। ऐसे में यह सब बातें पाठक के सामने बहुत मोटे तौर पर आती हैं।
'द नेम ऑफ द रोज़’ की शुरुआत में ही मठ की पूरी संरचना दिखाई गई है। ऐसा करके मैंने अपने उपन्यास को पुराने ज़माने के उन जासूसी उपन्यासों की परंपरा से जोड़ा, जो शुरुआत में ही अपराध के दृश्य की संरचना और नक्शा बता दिया करते थे। यह यथार्थवाद का थोड़ा विडंबनात्मक चित्र है, जिससे यह य$कीन हो जाए कि यह मठ असल में था। लेकिन मैं यह चाहता था कि मेरे पाठक पढ़ते समय यह आसानी से देख सकें कि किरदार उस मठ में कैसे चला-फिरा करते होंगे।
'द आइलैंड ऑफ द डे बीफोर’ के छपने के बाद मेरे जर्मन प्रकाशक ने मुझसे कहा कि हमें उपन्यास की शुरुआत में ही समुद्री जहाज़ का नक्शा छाप देना चाहिए। मेरे पास ऐसा रेखांकन था भी, जिसे बनाने में मैंने बहुत समय लगाया था। जैसा कि मैंने'द नेम ऑफ द रोज़’ की शुरुआत में छापा भी था। लेकिन 'आइलैंड...’ उपन्यास में मैं चाहता था कि मेरा पाठक भ्रम में पड़ जाए और साथ में उपन्यास का नायक भी, जो जहाज़ की भुलभुलैया में रास्ता नहीं खोज पा रहा है। इस तरह मुझे अपने पाठक को थोड़ी दुविधा में डालना था, लेकिन खुद को एकदम स्पष्ट रखते हुए। हमेशा एक-एक मिलीमीटर की दूरी का ख्याल रखते हुए, जैसा कि मैंने बताया भी।
*
एक सवाल और बार-बार पूछा जाता है, वह यह कि जब आप लिखना शुरू करते हैं, तो आपके दिमाग में थीम की किस तरह की योजना या संरचना होती है? तीसरा उपन्यास लिखने के बाद मेरी समझ में आया कि मेरे हर उपन्यास की उत्पत्ति एक बीज-विचार से हुई है, जो कि एक छवि से ज़्यादा है। 'रिफ्लेक्शंस ऑन द नेम ऑफ द रोज़’ में मैंने लिखा है कि इस उपन्यास को मैं इसलिए लिखना चाहता था कि मैं एक भिक्षु को ज़हर दे देना चाहता था। दरअसल, मेरी कभी ऐसी इच्छा नहीं रही कि मैं किसी भिक्षु को ज़हर दे दूं, यानी भिक्षु ही क्या, किसी भी इंसान को ज़हर देने की इच्छा नहीं रही। मैं तो उस छवि से चिपककर रह गया था, जिसमें एक भिक्षु किताब पढ़ रहा है और ज़हर के कारण उसकी मौत हो जाती है। शायद एक तरह से मैं उस अनुभव को याद कर रहा था, जो मुझे 16 की उम्र में हुआ था। एक बेनेडिक्टन मठ की यात्रा के दौरान मैं एक मध्ययुगीन विहार से होते हुए एक अंधेरी लाइब्रेरी में पहुंचा, जहां एक त$ख्त पर 'अक्ता सैंक्टोरम’ मिली। गहरे सन्नाटे के बीच मैं उस मोटी किताब के पन्ने पलटने लगा, उस समय कांच की खिड़कियों से रोशनी की दुबली किरणें उस पर गिर रही थीं। यकीनन मैं बहुत रोमांचित हुआ। चालीस साल बाद यह रोमांच मेरे अवचेतन से बाहर निकल आया।
यह उसकी बीज-छवि थी। बा$की चीज़ें धीरे-धीरे आईं, ताकि मैं उस छवि को कुछ अर्थ प्रदान कर सकूं। और जैसे ही मैंने पच्चीस साल से जमा किए हुए अपने मध्ययुगीन रिकॉर्ड्स को देखना शुरू किया, ये सब अपने आप आती गईं।
'फूकोज पेंडुलम’ के साथ जटिलताएं ज़्यादा थीं। 'द नेम ऑफ द रोज़’ लिखने के बाद मुझे ऐसा लगा कि मेरे भीतर अपने बारे में कहने लायक जितनी चीज़ें थीं, वे सब तो मैंने अपने पहले उपन्यास में ही कह दी हैं, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से। क्या सच में मेरे भीतर कुछ और भी है, जिसे मैं लिख सकता हूं? मेरे दिमाग में तब दो छवियां बनीं।
पहली छवि थी लियोन फूको का पेंडुलम, जिसे मैंने तीस साल पहले पेरिस में देखा था और जिसने मुझ पर गहरा असर डाला था। वह भी एक ऐसा रोमांच था, जो मेरी आत्मा में कहीं गहरे दफन पड़ा था। दूसरी छवि थी कि मैं इटैलियन रेसिस्टेंस दल के कुछ सदस्यों की अंत्येष्टि में ट्रंपेट बजा रहा हूं। यह एक सच्ची घटना थी, जिसे मैं हमेशा सुनाया करता था और मुझे वह बहुत सुंदर दृश्य लगता था। बरसों बाद जब मैंने जॉयस को पढ़ा, तो मैंने पाया कि जिस तरह का अनुभव मुझे हुआ था, उसे उसने स्टीफन हीरो में आविर्भाव या अवतरण जैसा शब्द दिया था।
इस तरह, मैंने एक कहानी लिखने का फैसला किया, जो पेंडुलम से शुरू होगी और धूप से खिली हुई एक सुबह $कब्रिस्तान में एक छोटे-से वादक द्वारा ट्रंपेट बजाते हुए खत्म होगी। लेकिन पेंडुलम से ट्रंपेट तक कैसे पहुंचा जाए? इस सवाल का जवाब खोजने में मुझे आठ साल लगे, और जवाब जो मिला, वह उपन्यास है।
'आइलैंड ऑफ द डे बीफोर’ की शुरुआत मैंने एक फ्रेंच पत्रकार के पूछे सवाल के कारण की थी। वह सवाल था, 'आप दूरियों का वर्णन इतने अच्छे तरीके से कैसे कर लेते हैं? मैंने दूरियों के वर्णन की तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया था, लेकिन उस सवाल पर सोचते हुए मैंने महसूस किया, जो कि मैं पहले भी बता चुका हूं, कि अगर मैं अपनी दुनिया की एक-एक तफ्सील का रेखांकन बना लेता हूं, तो मुझे उसे दूरियों के आधार पर बताना बहुत आसान हो जाता है, क्योंकि पूरा रेखांकन तो मेरे सामने ही पड़ा हुआ है। पुराने ज़माने में एक साहित्यिक विधा का चलन था, जिसे 'एक्फ्रासिस’ कहते हैं। उसमें किसी पेंटिंग या मूर्ति के बारे में इतनी बारीकी, सावधानी और तफ्सील के साथ लिखा जाता था कि जिन लोगों ने उस पेंटिंग या मूर्ति को कभी देखा भी न हो, उस रचना को पढऩे के बाद उनकी आंखों के आगे सबकुछ स्पष्ट हो जाए। जैसा कि जोसेफ एडिसन ने अपनी किताब 'द प्लेजर्स ऑफ द इमेजिनेशन’ (1772) में लिखा है, 'यदि शब्दों का सही चयन किया जाए, तो उनसे बनने वाले वर्णन किसी चीज़ का ऐसा जानदार विचार प्रस्तुत करते हैं, जो उस चीज़ को असल में देखने से भी नहीं होते।’ ऐसा कहा जाता है कि जब 1506में रोम में 'लाओकून’ पाया गया था, तो इस ग्रीक प्रतिमा को लोगों ने इसी कारण तुरंत पहचान लिया था कि प्लिनी द एल्डर ने 'नेचुरालिस हिस्टोरिया’ में उसका इतना सुंदर और सटीक वर्णन किया था।
तो क्यों न एक ऐसी कहानी लिखी जाए, जिसमें दूरी की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका हो? मैंने खुद से कहा कि अपने दोनों उपन्यासों में मैंने अधिकतर मठों और संग्रहालयों के बारे में बात की है, यानी चारों ओर से बंद सांस्कृतिक जगहों और दूरियों के बारे में। मुझे खुली हुई, प्राकृतिक दूरियों के बारे में लिखना चाहिए। और एक उपन्यास को मैं कैसे विशाल दूरियों से भर सकता हूं--- प्रकृति से, और किसी चीज़ से नहीं? यानी मैं अपने नायक को एक सूने द्वीप पर भेज दूंगा।
उसी समय मुझे उन घडिय़ों का $ख्याल आया, जो इस धरती पर मौजूद हर जगह का स्थानीय समय दिखला देती हैं और180 डिग्री वाली मध्याह्न रेखा पर अंतरराष्ट्रीय डेट लाइन भी दिखा देती हैं। हर कोई जानता है कि सच में यह रेखा है, क्योंकि हर किसी ने जूल्स वर्न की 'अराउंड द वल्र्ड इन ऐटी डेज’ पढ़ी है, लेकिन हम लोग उस पर ध्यान ही नहीं देते।
खैर, मेरे नायक को उस रेखा के पश्चिम में होना था और द्वीप को पूर्व की ओर देखना था, जहां समय एक दिन पहले का होता है। उसके जहाज़ को उस द्वीप पर ही बर्बाद नहीं हो जाना था, बल्कि उसके दृश्य में फंस जाना था, ताकि वह उस द्वीप की ओर निगाह डालने पर मजबूर हो जाए जो कि उससे समय और दूरी के लिहाज से दूरस्थ है।
मेरी घड़ी ने बताया कि ऐसी एक जगह हो सकती है, अलेउशियन द्वीप, लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था कि मेरा नायक वहां जाकर फंसेगा कैसे? क्या मेरे नायक का जहाज़ तेल के किसी भंडार के पास नष्ट होगा? जैसा कि मैंने ऊपर कहा है कि अगर मैं किसी जगह के बारे में लिखना चाहता हूं, तो मैं निजी तौर पर उस जगह एक बार ज़रूर जाता हूं, लेकिन अलेउशियन जैसी कड़ाके की ठंड वाली जगह में जाने का विचार मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।
मैं इस समस्या से जूझता रहा और जब मैंने अपना एटलस पलटना शुरू किया, तो पाया कि यह रेखा तो फिजी द्वीप समूह के पास से भी गुज़रती है। दक्षिणी प्रशांत के द्वीपों का रॉबर्ट लुई स्टीवेंसन के साथ गहरा संबंध रहा है। इस इला$के के बारे में यूरोपीय लोगों को सत्रहवीं सदी में जानकारी मिली थी। मुझे बारोक संस्कृति के बारे में भी अच्छी तरह पता था, यानी थ्री मस्केटियर्स और कार्डिनल रिचलो के दिन। अब मुझे सिर्फ शुरू करना था, और उसके बाद उपन्यास खुद-ब-खुद अपने दो पैरों पर आगे बढ़ जाता।
एक बार अगर लेखक ने अपने लिए एक विशेष आख्यानात्मक दुनिया का निर्माण कर लिया, तो शब्द उसके पास बहते हुए आएंगे और वे विशेष तौर पर वही शब्द होंगे, जिनकी उस दुनिया को ज़रूरत होगी। इसी कारण से मैंने 'द नेम ऑफ द रोज़’ में जिस शैली का प्रयोग किया, वह एक मध्ययुगीन वृत्तांतकार की थी: सूक्ष्म, सटीक, बचकानी, जहां ज़रूरत हो वहां सपाट (चौदहवीं सदी का एक सादा भिक्षुक जॉयस की तरह नहीं लिख सकता या प्रूस्त की तरह चीज़ों को नहीं याद कर सकता)। यह भी था कि मैं उस मध्ययुगीन पाठ को उन्नीसवीं सदी में किए गए अनुवाद के सहारे पढ़ रहा था, उसकी शैली मध्ययुगीन वृत्तांतकारों की लैटिन से अप्रत्यक्ष तरीके से जुड़ती थी, उनके आधुनिक अनुवादकों की शैली का प्रभाव तो मेरे लिए पहले था।
'फूकोज पेंडुलम’ में भाषाओं की बहुलता ने खेल किया। और 'आइलैंड....’ में निर्णायक तत्व था उसका सांस्कृतिक समय। इसने न केवल शैली को प्रभावित किया, बल्कि नैरेटर और किरदार के बीच के संवाद को भी संरचना दी और पाठक इस द्वंद्व के बीच लगातार एक साक्षी और साथी की तरह मौजूद रहा। इस तरह का मेटानैरेटिव चयन इस नाते हुआ कि मेरे किरदारों को तो बारोक शैली में बोलना था, जबकि मैं बोल नहीं सकता था। इसलिए मुझे एक ऐसे नैरेटर की ज़रूरत पड़ी, जो कई मूड्स में रह सके, कई काम निपटा सके। किसी समय वह अपने किरदारों द्वारा बहुत ज्यादा शब्द इस्तेमाल करने की आदत से चिड़चिड़ा महसूस कर सके, दूसरी तरफ वह इन सबका शिकार है और तीसरी तर$फ वह उस शब्दबहुलता को स्थापित करते हुए पाठक से बार-बार माफी भी मांगता जाए।
अब तक जो बातें मैंने कही हैं, वे ये हैं,
1- मेरा शुरुआती बिंदु एक बीज-विचार या एक बीज-छवि होते हैं
2- आख्यान की दुनिया की संरचना उपन्यास की शैली निर्धारित कर देती है
फिक्शन में मेरा चौथा प्रयास 'बॉदोलीनो’ इन दोनों नियमों के विरोधाभास में खड़ा होता है।
बीज विचार के बारे में: लगभग दो साल तक मेरे पास कई विचार थे, और अगर आपके पास कई सारे बीज-विचार हैं, तो इसका अर्थ है कि उनमें से एक भी बीज नहीं है। एक खास समय पर मैंने तय किया कि मेरा नायक एक छोटा बच्चा होगा, जो अलेसांद्रिया में पैदा हुआ होगा, मेरा गृहनगर, जो बारहवीं सदी में स्थापित हुआ था और जिसे फ्रेडरिक बारबोसा ने अपने कब्ज़े में ले लिया था। इसके बाद मैं यह चाहता था कि मेरा बॉदोलीनो महान गागलीयादो का बेटा हो, जिसने शहर जीत लेने की कगार पर खड़े बारबोसा को एक झूठ, धोखे और तरकीब से विफल कर दिया था। अगर आप इसके बारे में और जानना चाहते हैं, तो मेरी किताब पढि़ए।
'बॉदोलीनो’ एक अच्छा अवसर था, जिसके सहारे मैं मध्ययुग तक वापस पहुंच सकता, मेरी निजी जड़ों के पास, जालसाजि़यों के प्रति अपने निजी आकर्षणों के पास। लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। मुझे पता ही नहीं था कि मुझे शुरू कैसे करना है, मेरी शैली क्या होगी और मेरा असली हीरो कौन होगा।
उसी समय इस तथ्य की ओर मेरा ध्यान गया कि मेरे पुश्तैनी इलाके में उस ज़माने में लोगों ने लैटिन भाषा का प्रयोग लगभग बंद कर दिया था और बातचीत के लिए वे एक बिल्कुल नई बोली का प्रयोग कर रहे थे, जो आज की इतालवी भाषा से बहुत मिलती-जुलती है। ऐसा कहें कि वह इतालवी का शैशवकाल था। लेकिन हमारे पास उत्तर-पूर्व इटली में उस ज़माने की बोली का कोई रिकॉर्ड ही नहीं था। इससे मुझे और स्वतंत्रता मिल गई कि एक लोकप्रिय मुहावरा गढ़ सकूं, बारहवीं सदी में चलने वाली एक काल्पनिक अपभ्रंश बोली, और मुझे लगता है कि मैंने उसे बहुत कामयाबी के साथ निबाहा भी, क्योंकि इतालवी भाषा का इतिहास पढ़ाने वाले मेरे एक दोस्त ने मुझसे कहा कि मेरे इस प्रयोग को तथ्यों के अभाव में कोई चुनौती तो नहीं ही दे सकता, फिर भी बॉदोलीनो की भाषा कहीं से विचित्र नहीं लगती, वह बिल्कुल उसी ज़माने की भाषा लगती है।
इस भाषा ने मेरे साहसी अनुवादकों के सामने कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं रखी। इसी भाषा ने मुझे अपने किरदार बॉदोलीनो की मानसिकता को समझने में मदद की और मेरे चौथे उपन्यास को मेरे पहले उपन्यास 'द नेम ऑफ द रोज़’ के एकदम उलट खड़ा किया, एक चाक्षुष विषमता। पहला उपन्यास उच्च शैली में बात करने वाले बुद्धिजीवियों के बारे में था और यह उपन्यास किसानों, योद्धाओं और अक्खड़ कलाकारों के बारे में था। इस तरह, जिस शैली का मैंने चुनाव किया, उसने यह तय किया कि मेरी कहानी क्या होगी।
फिर भी मैं यह स्वीकार करूंगा कि दूसरे उपन्यासों की तरह 'बॉदोलीनो’ भी थोड़ा-बहुत एक स्पष्ट छवि पर आधारित है। बहुत पहले ही मैं कोन्स्तांतिनोपल के प्रति आकर्षित हो गया था, हालांकि उसे देखा कभी न था। वहां जाने के लिए मुझे उस शहर और बाइज़ेंताइन संस्कृति की एक कहानी लिखनी थी। मैं कोन्स्तांतिनोपल गया, उसके धरातल और उसके भी नीचे के प्रस्तरों का अन्वेषण किया और अपने लिए एक शुरुआती छवि भी पा ली: ईसाई ज़ेहादियों द्वारा 1204 में इस शहर को आग के हवाले कर दिया जाना।
कोन्स्तांतिनोपल आग की लपटों में, एक नौजवान झूठा, एक जर्मन सम्राट और कुछ एशियाई दानव, और उपन्यास तैयार। मुझे पता है, यह कोई बहुत आसानी से पच जाने वाला नुस्खा नहीं है, लेकिन मेरे लिए तो यह काम कर गया।
बाइज़ेंताइन संस्कृति का अध्ययन करते समय मुझे निकेतास कोनिएत्स के बारे में पता चला, जो उस युग के एक इतिहासकार थे। उस समय मैंने तय किया कि पूरी कहानी को मैं बॉदोलीनो द्वारा लिखी जाने वाली एक रिपोर्ट की तरह लिखूंगा, बॉदोलीनो,जोकि महान झूठा है, वह यह रिपोर्ट निकेतास को सुना रहा है। इसमें मैंने मेटानैरेटिव संरचना भी अपनाई: ऐसी कहानी, जिसमें न केवल निकेतास, बल्कि नैरेटर और पाठक भी कभी यह तय नहीं कर पाते कि बॉदोलीनो जो कुछ भी सुना रहा है, वह सच है या झूठ।
****
अनुवाद : गीत चतुर्वेदी
[ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित उम्बेर्तो ईको की पुस्तक 'कन्फेशन्स ऑफ ए यंग नॉवलिस्ट’ (2011) का एक हिस्सा. इस किताब में ईको द्वारा एमरॉय यूनिवर्सिटी में एक शृंखला के तहत अपनी रचना-प्रक्रिया पर दिए गए चार लेक्चर संकलित हैं.
अनुवादक
गीत चतुर्वेदी हिंदी के महत्वपूर्ण कवि-लेखक हैं. उन्होंने सबद के लिए इससे पूर्व भी कई लेखकों को अनूदित किया है. उनका श्रम, समर्पण और सहयोग सबद की निधि है. ]

Wednesday, September 14, 2011

बही-खाता : १४ : निर्मल वर्मा




कथ्य की खोज


क्या 'खोज' अपने में ही तो ग़लत शुरुआत नहीं है ? जो है, सामने दिखाई देता है, चारों ओर से घेरे है, जन्म की पहली विस्मयकारी नज़र से लेकर मृत्यु की अंतिम बुझती लौ तक, भला उसकी खोज कैसी ? वही तो सारी कहानी है...सारी पर क्या असली भी ?

असली
क्या है, यह भी तो एक खोज हो सकती है, जो है, उसके भीतर से 'जो नहीं है', ( पर जो हर बन्द खिड़की से बाहर झाँकता है ) उसकी खोज ? कथ्य के कितने आवरण हैं, कितने परदे, कितनी खिड़कियाँ. लिखते हुए हम एक-एक के पास से गुजरते हुए छिपे को थोड़ा उघाड़ पाते हैं...पढ़ते हैं तो हँसी सुनाई देती है ; कहाँ, किस जगह, किसके साथ पहली बार सुनी थी ?

वह
बार-बार समुद्र की लहरों की तरह हमसे टकराती है, मुड़ जाती है, फिर आती है, खाली, तट पर अपनी फेनिल झाग छोड़ जाती है, कुछ अपने साथ बहा ले जाती है, कुछ छोड़ पाती है.

बचे
हुए अवशेष, जो हैं, उस पर जो बीत गया, उसके खुदे हुए 'हियरोक्लिफ'.. क्या हम उन्हें पढ़ सकते हैं ? कथ्य अनुवाद है, जो अबूझा है, उसे बूझे हुए में अनूदित करता हुआ. वह लिखे हुए को पढ़कर पढ़े हुए को लिखने का खेल है.

पाँचों इन्द्रियां आखेट करती हैं -- कान लगाकर सुनती हैं, बचपन के बाग़ में दिल की अँधेरी गुहारें चखती हैं जो धूल भरे बालों से आती गंध है, बेहोशी की हालत में भागती हैं, जो नंगे पैरों की आहट है, देखती हैं, बन्दूक की नाल से अपनी बहती हुई ज़िन्दगी का सुराख.

सृष्टि
के बीहड़ में शिकारी कुत्ते इसी तरह इशारा पाकर भागते होंगे, सूंघते होंगे, इकठ्ठा कर रख पाते होंगे, खोई हुई गंध को भूले हुए रास्तों पर पाते होंगे, खून में लथपथ शिकार को लाते होंगे.

आखिर तक पता नहीं चलता, दांतों और नाखूनों से छलनी देह का कथ्य कहां से आता है ?

पता नहीं चलता, पर कुछ-कुछ आभास तो होता है ? वह क्या था, जब तुम बुदापेस्त के रेस्तराँ में बैठे थे और बाहर सड़क पर लोगों की भीड़ थी, और कुछ हो रहा था, जब तुमने सोचा था, यह मुझे याद रहेगा, यह रेस्तराँ के शीशे के आर-पार बहता हुआ शहर.

या
शायद चोट कहीं बहुत गहरी थी और दर्द का कहीं पता नहीं था...वह सामने की बर्थ पर बैठी थी और उसका चेहरा मैं सीधा न देखकर रेल की खिड़की के शीशे में देख रहा था, जहां वह रोशनी की छाया में टिमटिमा रहा था और तब मुझे पता चला, यह वहां है, दर्द, अँधेरे में भागती हुई ट्रेन की खिड़की पर टिमटिमाता हुआ --जो अपने में कभी कथ्य नहीं बनता, पर कथ्य के साथ संगत देता है, तब सबसे ऊंचा, जब कहानी सबसे चुप, कराहता हुआ...जिसे कथ्य स्वयं कान पर हाथ रखकर हैरत में सुनने लगता है, जैसे उसे पता ही नहीं था, मेरे भीतर जो भरा था, उसे वह इस तरह उघाड़ सकता है.

जिस तरह पौधे को जमीन से उखाड़ते हैं और उसकी जड़ों पर मिट्टी का गीला, लिथड़ा, अँधेरा बाहर निकल आता है, वैसा ही होता है कला का कथ्य...कोई भी चीज़ अचानक चटककर, उखडकर, हड़बड़ाकर बाहर आती है...वह अभिन्न को भिन्न करती है, संलग्न को विगलित करती है, सुरक्षित को जोखिम में डालती है. वह एक फड़फडाती प्राणवत्ता है, खंडित, उखड़ी हुई मिट्टी में अपनी छाया टटोलती हुई. भाषा के भीतर एक करंट, कुंडली-सी जगाती हुई, जिसका झटका खाते ही सब बिखरे हुए अनुभव-खंड एवं तस्वीर, एक इमेज, एक पैटर्न में सिमटने लगते हैं. पाँचों इन्द्रियां जिस 'शिकार' को खून में लिसा क्षत-विक्षत लाई थीं, वह अपनी आँखें खोलता है और पाता है, जिन तीरों से वह धराशायी हुआ था, वे उसके नहीं, शिकारी की देह में बिंधे हैं --कला का 'कथ्य' वह आईना है, जिसमें दुनिया का यथार्थ नहीं, आत्म (सेल्फ़) की दुनिया प्रतिबिंबित होती है --उसके भीतर झांकते हुए पता नहीं चलता, कौन मैं हूँ, कौन तुम, कौन वह ? प्रूस्त क्या 'लेखक' है जो मार्सेल के वेश में 'खोये हुए समय' की भूलभुलैया में अपने को ढूंढ रहा है ?

कला का 'कथ्य' अनूठा आखेट स्थल है, जहां शिकारी अपने लहू के चिह्नों का पीछा करता हुआ ख़ुद अपना ही शिकार करने निकलता है.

कहां से 'कथ्य' की पहली लहर उठती है ? पहला शब्द वह गाँठ है, कथ्य के भीतर उठी हुई 'ग्रोथ' जिसका पता तब चलता है, जब यह पता चलाना असंभव हो जाता है, वह कितना फैलेगा, कहां होगा इसका विस्फोटन, किन मिथुन-पक्षियों की चीख, किस विगत के पश्चाताप, किस आर्तनाद की गाथा में ?

समुद्र का ज्वार उठता है और लहरें पछाड़ खाकर गिरती हैं...गिरती हैं, उठती हैं, वापस लौट आती हैं. समुद्र वहीं रहता है, किंतु हर लहर पर उन्मत्त ऊँचाई को छूकर नीचे गिरता है, निन्यानबे डिग्री से ऊपर. वह होरी के शव पर धनिया की पछाड़ है. सारे उपन्यास के कथ्यस्थल को भूचाल की तरह हिलाती हुई. मरते सब हैं, विधवाएं विलाप करती हैं, जो बच जाते हैं, उनकी अपनी बेचारगी है, पर धनिया की पछाड़, उसका कोई जोड़ है ? हमें आश्चर्य होता है, हम 'बचे' रह गए हैं. कला का 'कथ्य' हमारे बचे रहने का --सर्वाइवल का--साक्ष्य है, संदिग्ध साक्ष्य, क्योंकि हम सचमुच बच गए हैं, क्या इसका प्रमाणित सबूत कभी मिल सकता है ?

वह एक मायानगरी है, धूप में चमकते इन्द्रप्रस्थ के बीच एक चलना महल. दीवारों को देखकर लगता है, पानी का झरना है, खाली सूखी जगह में तालाब झिलमिलाता है, पर जब नहाने जाओ, तो सूखा का सूखा. कुछ भी वह नहीं जो दिखाई देता है, जो दिखाई देता है, वह कितना दूर है, हम उसे पास बुलाना चाहते हैं पर वह एक इंच अपना सफेद पाँव बढ़ाती है, और दो इंच पीछे हट जाती है --हमारे पास आते-आते ओझल हो जाती है --भला जिसका नाम ही दूरी है, वह पास कैसे आएगी ? कथ्य एक जमी झील है, जहां द्रौपदी की हंसी सुनाई देती है और वह हड़बड़ाकर बहने लगती है.

वह अपरिमेय है, अपरिमेय में अपने को रूपायित करता हुआ कथ्य, पास बुलाता हुआ नहीं, दूरी को पाटता हुआ भी. बल्कि उसी के परिदृश्य में अपने को रचाता हुआ...हम बीच के गड्ढों को पार करते हुए, गिरते-पड़ते उस 'सच' के पास पहुँचते हैं. तभी दिल के भीतर सिरसिराता साँप छाती पर लोटता दिखाई देता है, हाथ से छूते हैं, तो आश्वस्त होते हैं, यह साँप नहीं, पीड़ा है, जिसे हर दूरी अपने कथ्य के भीतर केंचुल की तरह छोड़ जाती है. यह धुकधुकी है, सफ़ेद पन्ने पर घड़ी की टिक-टिक करती हुई. कहानी समाप्त होने पर भी 'कथ्य' की साँस बराबर चलती रहती है.

क्या हम उसे पहचानते हैं, जो कथ्य को शुरू करता है, किंतु वह 'पहला शब्द' नहीं ; एक ही शब्द बार-बार दूसरे शब्दों में अपने को दुहराता है, एक अभाव को पूरा करते ही एक दूसरे अभाव को खोलता हुआ, धड़धड़ाती ट्रेन व पटरियों के नीचे अपना सिर धुनता हुआ, जो कभी बचपन में हम सुनते थे और खो देते थे, उन सैंडिलों की आवाज़ की तरह, जो एक लड़की फिल्म की खाली सड़कों पर खटखटाते हुए चली जाती है। अगर हम उसे ध्यान से सुनें तो वह कथ्य की नंगी पाशविक लय है, हमारे अपने दिल की धड़कन, एक शब्द को दूसरे से पिरोती हुई, पैरों और पटरियों के नीचे धुक-धुक करती हुई.

वे ठीक कहते हैं कि लेखक की मृत्यु हो चकी है --पर इसे स्वीकार करते हुए झिझकते हैं, कि उसकी रुकी हुई साँस उसके 'कथ्य' में एक उच्छ्वास एवं आह की तरह सुनाई देती रहती है --हर शब्द पर उड़ता हुआ एक बादल.

'कथ्य' का शाब्दिक अर्थ है, जो कहना चाहिए --जोर 'चाहिए' पर है, एक ज़बर्दस्त नैतिक बाध्यता से बंधा हुआ। क्या 'कहना' चाहिए, इसका पूर्व ज्ञान किसी के पास नहीं, इसीलिए हर कथ्य की तलाश खाली पन्ने पर शुरू होती है --वह खाली पन्ना नहीं, जिस पर अब तक का कुछ लिखा हुआ नहीं है, बल्कि वह जिस पर अब तक लिखा हुआ मित गया हो, स्मृति से ओझल हो गया हो...हमें वही लिखना है, जो लिखा जा 'चुका' है, वह नहीं, जो अब तक लिखा नहीं गया हो. स्कूली बच्चे की तरह हम तख्ती पर, उसी पर कलम फेरते हैं, जो कभी खाली हो गया है.

खाली हो गया है, पर असल में खाली है नहीं। हम बादल को याद करते हैं, तो पन्ने पर एक छाँव दिखाई देती है, हवा कहते हैं, तो कहीं हूक-सी उठती है, पत्ता कहते हैं, तो मरती हुई उम्र दिखाई देती है, लहर कहते ही साँस ऊपर उठने लगती है, लौटती है, सिर धुनती है.

शब्द की नैतिकता, उसे देखने में है, वह नहीं जो शब्दकोष में है, बल्कि वह जो दुनिया में आदि, पुनीत रहस्य को उद्घाटित करती है, जैसे वह पहली बार की दुनिया हो, जिस पर सूरज उग रजा हो, जिसे हम पहली बार देख रहे हैं, अपनी पारदर्शी पवित्रता में, जब वह अपने 'होने' को टटोल रही थी. हिचक रही थी. कितना अभागा है वह लेखक जो दुनिया की आंख से बचकर दुनिया को रचता है और उसे हमेशा के लिए खो देता है. अभागा लेकिन हमारे लिए मूल्यवान --वही तो स्वप्न देखता है. खोई हुई दुनिया का स्वप्न, जो कला का दुर्लभ सत्य है.
****



[ बही-खाता स्तंभ के तहत आप इससे पहले कई लेखकों को पढ़ चुके हैं. निर्मल जी का यह लेख उनकी निबंध-पुस्तक ''आदि, अन्त और आरम्भ'' से लिया गया है. इसे छापने की अनुमति हमें निर्मल जी की पत्नी और कवयित्री गगन गिल ने दी है. हम उनके शुक्रगुज़ार हैं. सबद पर निर्मल जी से संबंधित अन्य प्रविष्टियों के लिए यहां देखें. पेंटिंग : शागाल ]

Monday, September 05, 2011

कथा : ८ : सिद्धान्त मोहन तिवारी की कहानियाँ





चकती

हम एक देश के बारे में बात करेंगे. एक लड़का था, नाम नहीं था या मालूम नहीं. ये जानना कितना विराट अनुभव है कि हर देश एक आदत है, और हर आदत पैसा है और पैसा समय नहीं है....लड़का एक लड़की का पर्याय भी है – लड़की धर्म भी है.

लड़का जब पैदा हुआ, तो उसके पैदा होने के एक घंटे बाद ही उसके घरवालों नें उसकी दोनों आँखों की पुतलियों के निचले आधे हिस्से में अर्ध-चंद्राकार काली अपारदर्शी चकती लगा दी. चकती किसी फाइबरनुमा चीज़ से बनी हुई थी, तो वह अपनी संरचना में काफ़ी कठोर थी.

चकती लगाते समय लड़का एकदम नहीं रोया, उसे पेट में ही इस बात का अंदाज़ लग गया था कि या तो चकती लगेगी, और अगर सफलता नहीं मिली, तब आँखों में गरम तेल उड़ेला जाएगा.

गर्भ में उसका शारीरिक विकास इस तरीके से हुआ कि चकती को वह अच्छे से जज़्ब कर सके. आँखों की पुतलियाँ और फैलीं, अपनी क्षमता से चार गुना ज़्यादा, आँखों के चमड़ीदार कोने अपनी हद से कुछ ज़्यादा फटे, कि फ़ैली हुई पुतली को कोई दिक्कत न हो और वे उसका पर्याय बन सकें.

कहते हैं कि लड़का हिंदू नहीं था, अब किसी के ‘हिंदू न होने’ का मानी मुसलमान ही हो सकता है. शायद यही दो कौमें ऐसी हैं, जो एक-दूसरे से ही डरती हैं और लड़ती हैं, और फिर डरती हैं. चकती इसलिए लगाई गई ताकि वह लड़का ‘किसी’ को उसके कन्धों से नीचे न देख सके. उसका चेहरा ही देख पाए, थोड़ा गला, और गले के आधे का आधा सीना. तमाम शारीरिक विकास इसलिए हुए थे क्योंकि उस लड़के को उस चकती को नकार देना था, उसके उपस्थित रहते हुए भी अपने सभी काम करने थे....जैसे कालीन बुनना, अच्छी शेरवानियों की सिलाई करना, अच्छी बिरयानी बनाना, अच्छी शहनाई बनाना और अच्छी शहनाई बजाना.... बहुत से काम थे उसके जिम्मे.

जिन परिजनों नें चकती लगाई थी, कहा जाता है कि वे मुसलमान नहीं थे. अब किसी के ‘मुसलमान न होने’ का मानी हिन्दू ही हो सकता है. तो, वे यानी जिन्होनें चकती लगाई थी...उसके ‘पुकारे गए’ परिजन...उन्होंने सारी संभावनाओं को खत्म करते हुए उसकी आँख के निचले आधे हिस्से में चकती सिल दी थी.

वह अब नीचे नहीं देख सकता है, सारी स्त्रियाँ उससे बची हुई हैं – जैसा कि लोग कभी नहीं कहते हैं, फिर भी जताते हैं – वह शहनाई भी नहीं बजा रहा है कि शहनाई सो चुकी है, कालीन नहीं बना रहा है, शेरवानी भी बेताला हो जाती है, बिरयानी में भी मसाला कम है, नमक तो और भी कम है – लेकिन, नमक तो गुजरात से आता है न – बिरयानी में हमेशा मिलने वाला गोश्त भी नहीं है, कुछ छोटे हिसाब नहीं हो पातें हैं, बड़े तो एकदम नहीं.

सुना है, जिन लोगों नें चकती लगाई थी, वे उसके घरवाले नहीं थे. लेकिन ये भी सुना है कि वे ही उसके घरवाले होने के हक़दार भी थे, क्योंकि शायद उसके पूर्वजों की घरवालियाँ उनकी शायद कुछ लगती हों?

सुना है, जिन लोगों नें चकती लगाई थी, उन्हें भी चकती लगी हुई है – उनकी आँख के ऊपरी आधे हिस्से में – फिर भी वह सिली हुई नहीं होती है, वे उसे एडजस्टेबल चकती कहते हैं.

सुना है, बिरयानी के गोश्त में कुछ सिली हुई आधी चकतियाँ मिल जाती हैं.

****

तमीज

यह एक तमीज़ के बारे में है, व्यवहार के बारे में और साथ में उस समय के बारे में, जिसमें हम जीते हुए भी अतीत को भविष्य में ढ़ालने की इच्छा रखते हैं. सब कुछ हमेशा चूल्हे-भाड़ में जाता रहा है, सृष्टि की सारी चीज़ें स्थानीयता के अर्थों में 'तेल लेने' चली गईं. अतीत का वर्तमान भी 'तेल लेने' क्यों नहीं चला गया? उसकी उपस्थिति हमेशा मानकों की रचना करती रहती है.

दो बच्चे सड़क पर थे, कन्धों पर बस्ते और गले में थर्मस लटकाए, वे अपने स्कूल की तरफ बढ़ रहे थे, जहां पानी की बोतल लाना मना था, क्योंकि बोतल लाना समय के साथ एक समझौता है, तो स्कूल के लोगों को बोतल-वोतल से कोई खास परेशानी नहीं होती थी.

जैसे दुनिया की हर सड़क अपने हर मोड़ पर असफल हो जाती रही है क्योंकि मोड़ के पहले वाली सड़क हमेशा मोड़ के बाद वाली सड़क से एकदम अलग होती है...दोनों बच्चे ऐसे ही दुनिया के किसी मोड़ के मध्यांतर पर पहुँच रहे थे. एक लड़का था और उसके साथ उसकी छोटी बहन लड़की थी. वे चल नहीं रहे थे, वे दौड़ भी नहीं रहे थे, उनकी गति चलने और दौड़ने की गति के बीच की गति थी. आठ बजे के स्कूल में वे सवा आठ बजे सही-सही पहुंचना चाह रहे थे.

मोड़ के कुछ पहले से एक कार आ रही थी, तेज़ – इतनी तेज़ कि बच्चों को आगाह हो जाना चाहिए. कार वाले ने अपनी का हॉर्न जोर से भनभनाया. किसी भी गाड़ी का हॉर्न, सृष्टि में बेसुरी न रहते हुए भी अप्रिय चीज़ होने का सबसे सफल उदाहरण है. बच्चों नें नहीं सुना. कार रुकी और कार चला रहे आदमी नें खिड़की से निकलकर चिल्लाकर कहा – अबे! किनारे हट जा.

छोटा लड़का घूमा और पूछा : कहाँ जाऊं हटके?
लड़की घूमी : अपने आप से किनारे कैसे हटें?

कारवाला कुछ देर तक सोच में पड़ा रहा और फिर उसने झुंझलाकर पूछा : किनारा नहीं पता तुम्हें?

लड़की बोली : किनारा कैसा होता है?
फिर लड़का बोला : किनारे से जो चीज़ लगी होती है, वह भी तो अपने मूल का किनारा होती है... अब हम किनारे जैसी किसी जगह पर जायेंगे तो दूसरे किनारे के मूल में रहने वाले लोग हमें इस किनारे आने को कहेंगे, आप तो जानते ही हैं कि इस तरफ़ का किनारा मानी इस तरफ़ के मूल का बीच होता है, मतलब, आपके ठीक सामने.
कारवाला कमीनी हंसी के साथ बोला : मैं कहाँ हूँ? इस किनारे पर...
लड़की : आप तो अभी अंतरिक्ष में हैं, एक मोड़ एक अंतरिक्ष होता है...क्योंकि सड़क ही भारयुक्त है, मोड़ भारहीन है.
अब तक कारवाला कार की बोनट पर आ चुका था.
लड़का : क्यों क्या हुआ..
अब कारवाले ने कहा : तुम लोगों का नाम क्या है?
दोनों कुछ मेल के-से स्वर में बोले : हम आत्मा जैसी कोई चीज़ हैं, हमारा नाम ‘ये’ और ‘वे’ है...हम अपनी आत्मा को अपनें मुंह के अंदर रखते हैं. हमारी आत्मा के पास पूंछ है, वह पेट तक लटकी रहती है.
लड़के ने हवा में हाथ लहराते हुए पूछा : आपके पास कैसी आत्मा है...उसका शरीर कैसा है?
कारवाले ने हँसते हुए कहा : आज मैं घर से आत्मा लेकर निकला था, मेरी जेब में पर्स के अंदर रखकर...अभी कहीं मिल नहीं रही है, कुछ देर पहले उसनें मेरी जेब कटने से बचाया था...पता नहीं कहाँ खो गयी...पैसा, कागज़ और पर्स सभी मौजूद हैं, लेकिन आत्मा का हिसाब गड़बड़ाया हुआ लग रहा है.

दोनों बच्चों नें एक दूसरे की तरफ़ देखकर बहुत हल्की-सी मुस्कान दी.

कारवाले ने पूछा : तुम्हें पता है कि आत्मा अगर पर्स में न हो तो कहाँ हो सकती है?
बच्चों नें कहा : शायद वह आपको छोड़कर चली गई है...आप अपने शरीर के साथ लड़ रहे हैं, इसलिए इतने अनमने ढंग से बात कर रहे हैं.
अब कारवाले ने पूछा : खून कैसा होता है?
बच्चों नें कहा : अगर आत्मा का साथ हो तो खून लाल होता है.
कारवाले ने कहा : मेरा खून तब पीला होना चाहिए!!
लड़के ने उत्तर दिया : आपका खून किसी रंग का नहीं है, पारदर्शी या सफ़ेद भी नहीं..वह तरल भी नहीं है. आपके बताए के अनुसार आपका खून रेत और लेई जैसी किसी चीज़ के बीच का है. वह जमता भी नहीं है, और बहता भी नहीं है. इस तरह आपके अंदर बहुत सारा अखून-खून है.
कारवाले ने कार की स्टेयरिंग पर बैठ कर पूछा : तुम लोगों के अंदर कितना खून है? वह तो लाल होगा न!
बच्चों नें कहा : हाँ, वह लाल ही है, लेकिन बहुत थोड़ा-सा है.
कारवाले ने कहा : तो ठीक है.

कारवाला अब उन बच्चों के ऊपर से गुज़रकर जा चुका था, पीछे दुनिया के उस अन्तरिक्षीय मोड़ पर दो गिलास खून दो स्कूली कपड़ों से निकल रहा था, वहाँ किसी शरीर की कोई उपस्थिति नहीं थी.

आगे किसी ठेले पर रूककर कारवाले ने कुछ खाया. पैसे देने के लिए उसने पर्स निकाला. उसके पर्स में पैसे और कागज़ सब थे, लेकिन कोई चीज़ गायब थी...वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या गायब है, पर्स में सृष्टि की सबसे बड़ी जगह खाली थी.

अगले चौराहे पर उस कारवाले को कुछ रंगदारों नें गोली मार दी. चश्मदीदों नें बताया कि उसके शरीर से जो निकल रहा था, वह खून जैसा न महक रहा था न ही दिख रहा था और न ही उसका स्वाद खून जैसा था(उसका खून चखा गया था?)...वह न बह रहा था, न जम रहा था. सुना है, कारवाला मुस्कुराते हुए भी नहीं मर रहा था.
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