Monday, August 29, 2011

गीत चतुर्वेदी की तीन नई कविताएं





पथरीला पारितोषिक

इस दुनिया में जितनी भी पत्थरदिल औरतें हैं उनसे प्रेम करो
और उन्हें पवित्र मूर्तियों में तब्दील कर दो
जान लो वे निर्जन में छूट गई हैं अपनी कठोरता में उन्मत्त
जिनके आगे कोई दिया नहीं जलता
पथरीला पारितोषिक है यह प्रेम का कि
उनके स्वप्नों में हमेशा रुदन में लहराती अखंड ज्योति आती
आता जीवन में जो भी उनके आकार पर बेहद मस्ताता
वे अपने मुलायम रेशों को कुबेरकोष की तरह छिपातीं
कुछ सदियां ही एक पत्थर को मैं रुई कहता आया
एक सुबह उठा उसे रुई में बदला हुआ पाया
****

टूटकर भी तनी हुई

जीवन जैसा भी था वर्तुल था
सीधी रेखा बीच से टूटा हुआ वर्तुल थी
टूटकर भी तनी हुई
टूटने से भी तन सकता है कोई का आकार में अनुवाद वह
जो चौरस था वह भी वर्तुल
उसके चार केंद्र थे जो अपनी जगह से इतने अनमने
कि ग्रामदेवताओं की तरह केंद्रीयता का बहिष्कार कर सीमाओं पर जा बसे
हर आकार में वर्तुल होने का आभास था
और यह भी कि जीवन का अर्थ आकार में नहीं, आभास में बसा होता है
एक पत्थर थी भाषा के भीतर स्त्रीलिंगी होने की हैरत से भरी
उसका स्त्रीत्व पहुंचा मुझ तक पहले फिर उसका पत्थर होना
स्त्रीलिंगी पत्थरों का उद्धार पवित्र हृदयों से नहीं पवित्र पैरों से होता है
इस हैरत से भरा मैं इस सोग में ख़ाली हुआ
कि मेरे पैरों में हमेशा मैल रही
इतना प्रेमा मैं तुमसे कि तुम्हें उद्धार की ठोकर भी न मार पाया
कि पवित्र हृदयों की अहमियत पवित्र पैरों के मुक़ाबले कम ही रही हमेशा
हर पत्थर की कामना यह कि पानी से हवा से किनारों की रेत से घिसे उनका अनाकार
हर आभास में पाए वह वर्तुल होने का आकार
जैसे बांस-वृक्ष की संधियां वर्तुल अंगूठियों से जड़ी हुई
बीसियों केंद्रों के अनमनेपन का अचंभा जो वर्तुल, तुम वह जीवन थीं
जोबन जिस जीवन का जोगनें ले गईं
ज्यों यह जीवन-संध्या नहीं
पूरा जीवन ही संध्या है
****

मनमाना

मैं रात की बग़ल में लेटा हूं
मेरी पीठ पर तुम्हारी चूड़ी का सिकुड़ा हुआ निशान है
एक करवट लेता हूं तो दब-दब जाती है सदियों पुरानी कोई नींद
मेरी उबासी स्मृति है तुम्हारे सहस्त्राब्दियों ताज़े यौवन की
मैं क्लांत मनाधीश नींद को अपना मानने की भूल करता
तुम्हारी समस्त भावनाओं का सलाद है यह क्लांति
तुम्हारा ही चमत्कार है ओ प्रेम मेरे जीवन के और जीवन के पार के भी, ओ प्रेम
कि हर्ष के बीज से अवसाद का फल उगाते हो
हृदय के रक्त में थलगंगा की क़लम लगाते हो
स्वप्नों का कौमार्य अक्षुण्ण भला क्यों होता है?
नींद का सौंदर्यशास्त्र हैं स्वप्न
नींद आती उसी तरह जैसे मनमाना करने में प्रेम जितना आनंद पाने वाली प्रेमिका
मनमाना करके प्रेम जितनी ही पीड़ा देने वाला प्रेमिका
जिसे मन से माना
उससे असंभव प्रेम की उम्मीद करता
रात की बग़ल में लेट नींद को अपनी देह पर उसके होंठों की छुअन की तरह उतरता पाने की उम्मीद में
मन को मारता उसी के इंतज़ार में डूबता अपनी थिरता में तिरता
मनमाना करने वाली आती जब तब तक प्रेम की इच्छा बारिश के बाद सूख चुकी सड़क जैसी चितकोबरी हो जाती
अपनी-सी लगने वाली नींद उगती मन और देह के क्षितिज पर
उगती रात के ख़त्म हो जाने के नारंगी घोषणापत्र की तरह
तब तक करवटों की सिलवटों से उठकर काम पर जाने की हड़बड़ी मुझे अंकवारी भर चुकी होती
****

( चित्र - फ्रांस के मशहूर फोटोग्राफ़र ब्रास्‍साई की कृति- ग्रैफि़टी. 1933)

25 comments:

mahendra kumar kushwaha said...

अद्भुत...काफी समय बाद अच्छी कविताएं पढ़ाने के लिए धन्यवाद गीत जी...

Vartika said...

पथरीली दिखती पर पथरीली न होती औरत का सटीक चित्रण। कविता एक बार फिर इस बात को साबित करती हुई कि स्त्री के कंपकंपाते जीवन की नब्ज़ को पकड़ने के लिए खुद भी स्त्री होना ज़़रूरी नहीं। स्पंदन हो तो रिश्ते भी समझे जा सकते हैं और संबंध भी। यहां सीमाएं नहीं होतीं।

dinesh tripathi said...

पहली बार गीत जी को पढ़ रहा हूं , अच्छी लगीं उनकी कवितायें . संवेदना के बेहद बारीक तंतुओ को पकडता है ये कवि, शुक्रिया वत्स जी

रीनू तलवाड़ said...

बहुत सुन्दर कविताएँ और चित्र का चयन भी अच्छा है

Anonymous said...

गीत के पास समृद्घ भाषा भी है और विचार की मौलिकता भी... यही उन्हें अपने समकालीनों से अलग और बेहतर बनाती है - प्रदीप जिलवाने

चण्डीदत्त शुक्ल said...

भाषा, भाव, प्रतीक, विचार, प्रभाव...सबमें अव्वल। मुबारक़!

सचिन .......... said...

काम की कुर्सी पर बैठकर पढने योग्य नहीं हैं यह कविताएं गीत दा। सो घर पहुंचकर प्रेम की स्नेह आलिंगन में पढने और गूढार्थों की समझने की नासमझी भरी कोशिश करूंगा। वैसे पहली नजर में सम्मोहक कर देने वाली शब्दावली और झिलमिलाती लय आकर्षित कर रही है। जिस तरल हृदय पर कोहनी टिकाकर आपने इन कविताओं को गढा होगा वह हमारे जीवन में क्षितिज के उस पार से झांकती है, सो कम ही "आशंका" है कि यह कविताएं हृदह गुहा में समा पाएं। एक सपाट बेईमानी और लालची रूखेपन की जिंदगी के लिए ऐसी कविताओं से दूर रहना जरूरी भी है। सो धर देंगे, कहीं अकेलेपन में गुनने के लिए।
और अंत में शुक्रिया,
बेवजह

alok putul said...

गीत चौंकाने का काम नहीं करते. बेहद सहजता से रचते जाते हैं. सुंदर कविताएं.

वंदना शुक्ला said...

behtareen kavitayen ...dhanywad anurag ji khubsurat kavitye padhvane ke liye

sarita sharma said...

teenon hi kavitaon mein prem deh se atma ka safar karta rahta hai. pathreela paritoshik mein prem pathar hriday ko rui sa mulayam banata hai to doosri kavita mein prem sakht kinaron ko ghiskar vartul yani
anakar aur sparsh karne yogya bana deta hai kyonki जीवन का अर्थ आकार में नहीं, आभास में बसा होता है
yahan ram aur ahilya ki katha ka punarkathan bhi hai ki stree ka udhar use thokar marne se nahin balki prem se hi sambhav hai aur premi thokar kaise mar sakta hai
manmana ka bhaw kuch mila jula hai
jismein prem rat need swapn sab ghule mile hain.prem bahut sookshm roop mein vidyman hai.स्वप्नों का कौमार्य अक्षुण्ण भला क्यों होता है?
नींद का सौंदर्यशास्त्र हैं स्वप्न daihik prem simit hota hai magar man mein basa prem kabhi khatm nahin hota. तुम्हारा ही चमत्कार है ओ प्रेम मेरे जीवन के और जीवन के पार के भी, ओ प्रेम
कि हर्ष के बीज से अवसाद का फल उगाते हो
हृदय के रक्त में थलगंगा की क़लम लगाते ismein prem dehateet aur sadiyon shsrabdiyon tak faila hua hai
sthool roop mein to uska astitva rojmarra ke jeewan mein bahut kum hai
antatah sabhi kavitayon ka sar yahi hai ki prem abhas ki cheej hai jo sabhi seemaon ko tod deta hai. vah harsh bhi deta hai aur vishad bhi magar jeewan mein chamatkar usi se sambhav hai

प्रवीण पाण्डेय said...

अद्भुत कवितायें पढ़वाने का आभार।

Ravindra Swapnil Prajapati said...

गीत तीनों कविताओं को पढ़ा चुका हूं और पढ़ना अभी चल रहा है। भाव के स्तर पर मेरे पास वही सब था जो तुम्हारे पास था। अब मैं उसमें हूं। एक प्रेम की ताकतवर भाषा से रची हुई इन कविताओं से गुजरते हुए लगा कि मैं खुद ही इन अनुभवो ंकी झाड़ियों से टच होता जा रहा हूं।
तुम्हारी भाषा में, चाहे प्रेम की हो या फिर अपने सामाजिक यथार्थ की समय के लंबे इतिहास बोध का गहरा अभार अपने हाथों में लिए चलती है। इन कविताओं में भी यही है। इनके प्रेम और इनके यथार्थ मेरे अपने हैं।
ऐसी भाषा के सृजन के लिए कवि को शहर से बाहर और अपने से बाहर कितनी बार आना जाना पड़ता है। ये कविताएं लगता है ठंडी हो गई पीड़ा में उपजे हुए फूल हैं जिनकी अर्थ ध्वनियां बहुत गहराई से आ रही हैं।

मैँ इनका उपयोग कर सकता हूं क्या?

mark rai said...

इस दुनिया में जितनी भी पत्थरदिल औरतें हैं उनसे प्रेम करो
और उन्हें पवित्र मूर्तियों में तब्दील कर दो
जान लो वे निर्जन में छूट गई हैं अपनी कठोरता में उन्मत्त
जिनके आगे कोई दिया नहीं जलता..........
maine to bhai pahli baar padha hai par kaphi achcha laga...ise save kar kai baar padhna padega...
wakai kuch patthar dil auraten hoti to hai par ...ander se komal hoti hai ...par anuraag bhai aaj ke jamaane me thoda pahchaananaa muskil ho jata hai kya kare bazarwaad ki hawa udhar bhi pahunch gayi hai ..idhar bhi...par kavita bahut achchi hai aur jab bhi aap likhe to mujhe bataya jarur kare ..kyonki aajkal IAS STUDY CIRCLE se fursat nahi milti ....

सुशीला पुरी said...

''एक करवट लेता हूं तो दब-दब जाती है सदियों पुरानी कोई नींद''!!!!!!!!!!!!!!!

अर्थों के अनगिन विज़न ! ...हरे भरे भी ...,घने भी ...,निर्जन भी ...!!!

प्रदीप कांत said...

नींद का सौंदर्यशास्त्र हैं स्वप्न
नींद आती उसी तरह जैसे मनमाना करने में प्रेम जितना आनंद पाने वाली प्रेमिका

_________________________________



अच्छी कविताएँ

आनंद व्‍यास said...

इस दुनिया में जितनी भी पत्थरदिल औरतें हैं उनसे प्रेम करो
और उन्हें पवित्र मूर्तियों में तब्दील कर दो
*****


कुछ सदियां ही एक पत्थर को मैं रुई कहता आया एक सुबह उठा उसे रुई में बदला हुआ पाया
****

जीवन का अर्थ आकार में नहीं, आभास में बसा होता है
***


कि पवित्र हृदयों की अहमियत पवित्र पैरों के मुक़ाबले कम ही रही हमेशा
****


सीधी रेखा बीच से टूटा हुआ वर्तुल थी
टूटकर भी तनी हुई
***

स्वप्नों का कौमार्य अक्षुण्ण भला क्यों होता है?
नींद का सौंदर्यशास्त्र हैं स्वप्न
****


इन तीन कविताओं में इतनी सुन्‍दर लाइनें हैं कि मन इनमें अटक जाता है... मेरा मानना है कि प्रेम और प्रकृति गीत चतुर्वेदी की कविताओं को बहुत रिच बनाता है... उनके जैसी भाषा कहीं नहीं दिखती... उनके विचार हमेशा नये होते हैं... ऐसे जो पहले कभी नहीं पढ़े गए... '''इस दुनिया में जितनी भी पत्थरदिल औरतें हैं उनसे प्रेम करो और उन्हें पवित्र मूर्तियों में तब्दील कर दो...'''

या '''सीधी रेखा बीच से टूटा हुआ वर्तुल थी
टूटकर भी तनी हुई'''

कविता में ऐसा कहने की साहस और कला गीत चतुर्वेदी के अलावा किसी कवि में नहीं दिखता.... इसीलिये उनको आज का बेस्‍ट कवि कहा जाता है... मैं इन तीनों कविताओं को बार बार पढ़ता रहूंगा...

Sushobhit Saktawat said...

Geetji ki kavitao ko padhne ke baad jis kavya-vyaktitva ka roopak man mein banta hai, wo us Gram-Devta ki tarah hai, jo apni kendriyata ka bahishkar kar seemao par jaa basa hai.

Geetji ke kavya-vyavhaar ki pratiti ke liye doorsathta ke unke swapn ko samajhna zaruri hai. Doorasth unka isht hai. Garbh-gruha mein virajit vigraha tak bhi pahunchna hoga to ve gram-devtao se hokar jayengein. Ve agam ke anveshi hain, sudoor unka swapn hai. Unke yaha Avyakt ka Soundrya-shastra hai, swapno ka akshunn koumarya hai.

Taara gakar Aakash dikha dena, ye unki pravidhi rahi. Rachnakaar ke liye Aakash-tatv ko dharan karna dushkar hota hai.

Apni lambi kavita (Mahakavyatmak nahi, lambi) Ubhaychar mein ek jagah ve kehte hain : ‘Main mukhya yug ko padhta hu/Aur doosri pankti ko dekh/Foot note par base/Doosre yug mein pahunch jaata hu.’ Vishnu Khare ne unhe Kaal-Yatri kaha hai, lekin agar dekhein to Geetji Kaal ko apne liye Desh mein rupayit karte hain. Kaal ko Desh bana lena vaastav mein unki Doorasth ki aakansha ka ashwamedh hai. In ashwo ki koi valgayein nahi hain, kewal vyapti ka vyakaran hai.

‘Ek anyamanask Trijya/Apne kono ka bahishkaar kar/Kendra se hatti hai.’ (Ubhaychar)

Geetji ke liye isse sunder ‘kavy-nyay’ koi doosra nahi ho sakta ki unke Prastut ko unke a-prastut ke paripreksho mein dekha jaaye, kyonki isi tarah un sarniyo ka shodhan hoga, unke rachnakaar ka abhisht rahi hain jo.

Kavitayein bahut sunder hain. Nayi aabha se paripoorna. Kintu ise Prasthan kahna theek na hoga. Ek bindu kahein, Vartul ka ek bindu.

Prem uddhar karne mein aksham hai, ye nihitartha jis kavita mein aata hai, wo kahti hai ‘Jeevan jaisa bhi tha/Vartul tha.’ Agar Jeevan, Prem aur Vartulatva samantar hain, to Mukti ka Deshantar kaha hoga? Mukti ki dhuri kaha hogi? Beesiyo kendro ke anmanepan ke achambhe ke vartul ki jo dhuri hai, wohi to a-vyakt hai. Kavita hai, antah-pravahit.

Kavitao ke saath sanlagna chitra-kruti kisi aadim shail-shilp ka aabhas deti hai. Hamare liye yehi ‘pathreela paritoshik’.

समर्थ वाशिष्ठ / Samartha Vashishtha said...

अद्भुत, अद्भुत कविताएं और एक अद्भुत कवि!

शिरीष कुमार मौर्य said...

गीत की कविताओं का इंतज़ार होता है। इस बार भी एक इंतज़ार के बाद ये कविताएं मिलीं - सुखद ।

Roshi said...

pehli baar aapke blog per aye hain sabhi rachnayein dekhi bahut sunder.........

Mahesh Agrawal said...

कुछ मित्र कहते हैं गीत चतुर्वेदी को नियमित पढ़ा करो ! पढता हूँ तो कई बार समझ में नहीं आता ! यह कवितायेँ भी पहली बार में समझ नहीं पाया ! ७ दिनों से रोज़ २ बार पढता हूँ. ४थे रोज जाकर कुछ समझ में आया ! उसके बाद एक एक वाक्य को अलग अलग पढ़ा ! हर वाक्य में कविता है. हर शब्द जैसे बहुत सोच कर सूझ से इसमें रखा गया है ! मित्र कहते हैं गीत चतुर्वेदी की कवितायेँ ग़ालिब के sher की तरह होती हैं ! पहली बार में नहीं खुलती, आसानी से नहीं खुलती, लेकिन जब खुलती हैं तो आपके पूरे वजूद पर छा जाती हैं ! अब मैं भी यह बात मान रहा हूँ !

घनश्याम कुमार 'देवांश' said...

कभी सोचता हूँ कि हर अच्छी कविता एक नई दुनिया है...और उसका पाठक उस दुनिया में जन्म लेने वाला शिशु...हर शिशु कविता को पढ़ते हुए अलग अलग तरीके से बड़ा होता है...ये दुनिया बड़ी अलौकिक और विचित्र होती है..सबके लिए अलग...इसलिए अच्छी कविता अपने पाठक को अपने भीतर गहरे उतरने और उसको अपने विशिष्ट सन्दर्भों में एक्सप्लोर करने का मौक़ा देती है...अच्छी कविता पढने में वही सुख मिलता है जो उसको रचने वाले को मिलता है...बेहद उम्दा...बधाई...

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

"कुछ सदियां ही एक पत्थर को मैं रुई कहता आया
एक सुबह उठा उसे रुई में बदला हुआ पाया"

कितनी सुन्दर हैं ये पंक्तियाँ, सपनों-सी सुन्दर!

anita shrivastava said...

सबद' में निकली आपकी कवितायेँ अद्बुध कवितायेँ हैं "'इतना प्रेमा कि उद्धार का ठोकर भी न मार सका " सभी बेजोड़ कविताएँ है आप भाषा कि कूची में शब्दों के रंगों को सराबोर कर के बहुत सुंदर चित्रण करते हैं सुंदर!!!!

sarita sharma said...

तीनों ही कविताओं में प्रेम देह से आत्मा तक का सफ़र करता रहता है . पथरीला पारितोषिक में प्रेम पत्थर ह्रदय को रुई सा मुलायम बनाता है तो दूसरी कविता में प्रेम सख्त किनारों को घिसकर वर्तुल यानि अनाकर और स्पर्श करने योग्य बना देता है क्योंकि जीवन का अर्थ आकार में नहीं, आभास में बसा होता है.यहाँ राम और अहिल्या की कथा का पुनर्पाठ भी है की स्त्री का उद्धार उसे ठोकर मारकर नहीं बल्कि प्रेम से ही संभव है और प्रेमी ठोकर कैसे मार सकता है.मनमाना का भाव कुछ मिला जुला है.जिसमें प्रेम, रात, नीद, स्वप्न- सब घुले मिले हैं. प्रेम बहुत सूक्ष्म रूप में विद्यमान है .स्वप्नों का कौमार्य अक्षुण्ण भला क्यों होता है?नींद का सौंदर्यशास्त्र हैं स्वप्न.दैहिक प्रेम सिमित होता है मगर मन में बसा प्रेम कभी ख़त्म नहीं होता . तुम्हारा ही चमत्कार है ओ प्रेम मेरे जीवन के और जीवन के पार के भी, ओ प्रेम कि हर्ष के बीज से अवसाद का फल उगाते हो हृदय के रक्त में थलगंगा की क़लम लगाते इसमें प्रेम देहातीत और सदियों सहस्राब्दियों तक फैला हुआ है.स्थूल रूप में तो उसका अस्तित्व रोजमर्रा के जीवन में बहुत कम है. इन कवितायों में प्रेम आभास की चीज है जो सभी सीमाओं को तोड़ देता है. वह हर्ष भी देता है और विषाद भी मगर जीवन में चमत्कार उसी से संभव है.