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कवि कह गया है : ७ : बेन ओकरी



कविता और जीवन

बेन ओकरी
1

ईश्वर जानता है कि किसी भी समय के मुकाबले हमें कविता की ज़रूरत आज कहीं ज़्यादा है। हमें कविता से प्राप्त होने वाले दुष्कर सत्य की ज़रूरत है। हमें उस अप्रत्यक्ष आग्रह की ज़रूरत है, जो 'सुने जाने के जादू’ के प्रति कविता करती है।

उस दुनिया में, जहां बंदूक़ों की होड़ लगी हुई है, बम-बारूदों की बहसें जारी हैं, और इस उन्माद को पोसता हुआ विश्वास फैला है कि सिर्फ हमारा पक्ष, हमारा धर्म, हमारी राजनीति ही सही है, दुनिया युद्ध की ओर एक घातक अंश पर झुकी हुई है- हमें उस आवाज़ की ज़रूरत है, जो हमारे भीतर के सर्वोच्च को संबोधित हो।

हमें उस आवाज़ की ज़रूरत है, जो हमारी ख़ुशियों से बात कर सके, हमारे बचपन और निजी-राष्ट्रीय स्थितियों के बंधन से बात कर सके। वह आवाज़ जो हमारे संदेहों, हमारे भय से बात कर सके; और उन सभी अकल्पित आयामों से भी जो न केवल हमें मनुष्य बनाते हैं, बल्कि हमारा होना भी बनाते हैं- हमारा होना, जिस होने को सितारे अपनी फुसफुसाहटों से छुआ करते हैं।


2

राजनीति की अपेक्षा कविता हमारे कहीं करीब है। वह हमारे लिए उतनी ही स्वाभाविक है जितना चलना और खाना।

जब हम जन्म लेते हैं, तो दरअसल श्वास और कविता की स्थितियों में ही जन्म लेते हैं। जन्म लेना एक काव्यात्मक स्थिति है- आत्मा का देह में बदल जाना। मृत्यु भी एक काव्यात्मक स्थिति है- देह का आत्मा में बदल जाना। यह एक चक्र के पूरा हो जाने का चमत्कार है- यह जीवन की न सुनी गई मधुरता का एक अपरिमेय चुप्पी में लौट जाना है।

जीवन और मृत्यु के बीच जो भी कुछ हमारा दैनंदिन क्षण होता है, वह भी प्राथमिक तौर पर काव्यात्मक ही होता है: यानी भीतरी और बाहरी का संधि-स्थल, कालहीनता के आंतरिक बोध और क्षणभंगुरता के बाह्यबोध के बीच।


3

राजनेता राज्य के हालात के बारे में बात करते हैं, कवि जीवन की बुनियादी धुनों में गूंजते रहने में हमारी मदद करते हैं, चलने के छंद में, बोलने की वृत्ताकार रुबाइयों में, जीने के रहस्यमयी स्पंदनों में।

कविता हमारे भीतर एक अंतर्संवाद पैदा करती है। यह हमारे अपने सत्य के प्रति एक निजी यात्रा का प्रस्थान होती है।

हम पूरी दुनिया से कविता की आवाज़ों को एक साथ ले आएं, और अपने हृदयों को एक उत्सव में तब्दील कर दें, एक ऐसी जगह जहां स्वप्न पलते हों। और हमारा दिमाग़ सितारों की छांव में अनिवार्यताओं की अकादमी बन जाए।


4

कविता सिर्फ़ वही नहीं होती जो कवि लिख देते हैं। कविता आत्मा की फुसफुसाहटों से बनी वह महानदी भी है, जो मनुष्यता के भीतर बहती है। कवि सिर्फ़ इसके भूमिगत जल को क्षण-भर के लिए धरातल पर ले आता है, अपनी ख़ास शैली में, अर्थों और ध्वनियों के प्रपात में झराता हुआ।

5

संभव है कि प्राचीन युगों के त्रिकालदर्शी मौन हों, और अब हम उन विभिन्न तरीकों में कदाचित विश्वास न करते हों, जिनसे ईश्वर हमसे या हमारे माध्यम से बोला करता था। लेकिन ज़िंदा रहने का अर्थ है कि हम कई सारे दबावों के केंद्र में उपस्थित हैं- समाज की मांग के दबाव, अपने होने के बिल्कुल अजीब ही दबाव, इच्छाओं के दबाव, अकथ मन:स्थितियों और स्वप्नों के दबाव और इस नश्वर जीवन के हर प्रवाह के बीच शक्तिशाली हो जाने की अनुभूतियों के दबाव।

6

हम अपने मतभेदों पर बहुत ज़्यादा ध्यान देते हैं। कविता हमें, हमारे यकसांपन के अचंभे की ओर ले आती है। यह हमारे भीतर विलीन हो चुके उस बोध को फिर से जगा देती है कि अंतत: हम सब एक अनंत परिवार के ही हिस्से हैं और उन अनुभूतियों को एक-दूसरे से साझा कर रहे हैं, जो नितांत हमारे लिए अद्वितीय हैं, और उन अनुभूतियों को भी, जो सिर्फ़ हमारी नहीं, दरअसल हर किसी की हैं।

हमें राजनीति की अपेक्षा कविता की अधिक आवश्यकता है, लेकिन हमें कविता की संभावनाओं में वृद्धि भी करते रहना होगा। कविता अनिवार्यत: दुनिया को बदल नहीं देगी। (अत्याचारी भी कई बार कवि-रूप में जाने जाते हैं, कहना चाहिए कि बुरे कवि के रूप में।) जब तक कविता हमारी बुद्धि को सवालों के दायरे में भेजती रहेगी, हमारी मुलायम मनुष्यता को गहरे से छूती रहेगी, तब तक वह हमेशा सौंदर्य का तेज बनी रहेगी, भलाई का वेग बनी रहेगी, तमंचों और नफ़रतों के शोर को धीरे-धीरे शून्य करती हुई।

7

कविता की असाधारणता का कारण बहुत स्पष्ट है। कविता उस मूल शब्द का वंशज है, जिसे हमारे संतों ने सृष्टि की उत्पत्ति का कारक माना है।

कविता, अपने उच्चांक पर, सृष्टि की सर्जनात्मक शक्ति को अपने भीतर जीवित रखती है। वे सभी चीज़ें, जिनके पास आकार होता है, जो परिवर्तित होती हैं, जो अपना कायांतरण कर लेती हैं- कविता उन सभी चीज़ों का सशरीर अवतार है। शब्द भी कैसी मिथ्या है न! शब्द का वज़न कौन माप सकता है, भले एक पलड़े में आप सत्य का हल्का पंख रख दें, दूसरे में शब्द- क्या वैसा संभव है? फिर भी हृदय के भीतर शब्दों का कितना वज़न होता है, हमारी कल्पनाओं, स्वप्नों में, युगों-युगों से चली आ रही अनुगूंजों में, उतने ही टिकाऊ जितने कि पिरामिड। हवा से भी हल्के होते हैं शब्द, फिर भी उतने ही रहस्यमयी तरीक़े से चिरस्थायी, जितना कि जिया गया जीवन। कविता हमारे भीतर की देवतुल्य उपस्थितियों के प्रति एक संकेत है और हमें अस्तित्व के उच्चतम स्थानों तक ले जा एक गूंज में बदल जाने का कारण बनती है।

8

कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की गहनतम ध्वनि को सुनें। वे राजनेताओं की तरह आपसे वोट नहीं मांगते।

सच्चे कवि सिर्फ़ यही चाहते हैं कि आप इस पूरी सृष्टि के साथ किए गए उस अनुबंध का सम्मान करें, जो आपने इसकी वायु के अदृश्य जादू से अपनी पहली सांस खींचते समय किया था।
*****

{ बेन ओकरी के नये नॉन-फिक्शन टाइम फॉर न्यू ड्रीम्स’ (राइडर बुक्स)
के पहले अध्याय का हिंदी अनुवाद-
गीत
चतुर्वेदी
बेन ओकरी का चित्र नेट के स्रोतों से.
मुख्यक चित्रकृति- क्रेग वार्ड, लंदन, जिनकी विश्वप्रसिद्द विशेषज्ञता है
कि वह अक्षरों के माध्यम से चित्रों की रचना करते हैं।
इस स्तंभ की अन्य कड़ियाँ
यहाँ }

7 comments:

निस्संदेह हमें कविता की जरुरत बहुत ज्यादा है |बेन ओकरी तुमने जो कहा ,वो हम सुनना चाहते थे ,कवि के कहने से बात पक्की हुई |


बहुत सुन्दर रचना का बहुत सुन्दर अनुवाद....एक अच्छे लेखक का एक अच्छे कवी द्वारा किया अनुवाद ....! चित्र लाज़वाब ......धन्यवाद अनुराग जी


हम भी मूल शब्द के वंशज हैं।


बेन ओकरी ने यहाँ कविता पर जो बातें कहीं हैं, उन्हें कविता की 'ज़रूरत' के सन्दर्भ में नहीं लेना चाहिए. बेन यहाँ कविता के 'महत्त्व की ज़रूरत' के बारे में बात कर रहे हैं. दोनों दो अलग चीज़ें हैं, जिन्हें इस लेख को कई बार पढ़कर समझा जा सकता है. बेन की मानें, तो कविता एक 'गिद्ध' है, जिसके सामने उसके घर को ख़त्म करता और उसकी विलुप्तता के सवाल खड़े करता मनुष्य (राजनीति) है. यह जो राजनीति है न! कविता के लिए आदमखोर आदमी का काम कर रही है, क्योंकि कविता को हम आदमी से अलग करके देखेंगे तो वह कविता नहीं 'कोर्स स्टडी' हो जाएगी. जब किसी विधा पर बात की जाती है, तो अक्सर सिर्फ़ विधा पर ही बात की जाती है, रचनाकार इस तरह की बहसों से दूर भिटक जाते हैं, क्योंकि वहाँ पर - कविता क्या है? आज की कविता कैसी है? कहानी क्या हो सकती थी? - जैसे प्रश्न ही सामने आते हैं. हिन्दी में कवियों पर तो अक्सर तभी बात होती है जब उन पर या उनकी कविता पर राजनीति और फ़िज़ूल बहस करनी हो, लेकिन यहाँ बेन नें कवि और कविता दोनों को अपना मूल बिन्दु बनाया है, ये बात क़ाबिल-ए-तारीफ है. शायद बेन तभी कहते हैं कि "यह हमारे भीतर विलीन हो चुके उस बोध को फिर से जगा देती है कि अंतत: हम सब एक अनंत परिवार के ही हिस्से हैं और उन अनुभूतियों को एक-दूसरे से साझा कर रहे हैं, जो नितांत हमारे लिए अद्वितीय हैं, और उन अनुभूतियों को भी, जो सिर्फ़ हमारी नहीं, दरअसल हर किसी की हैं.".

राजनीति और कविता में से कविता को इंकलाबी तरीक़े से चुनने के लिए बेन आते हैं, और अपने इंकलाबी लहज़े में प्रेम, स्नेह और दुःख समय से लड़ते हुए ले आते हैं. राजनेता और कवि जब सम्मुख होते हैं, तो बेन के द्वारा हम ये पाते हैं कि राजनेता आत्मा नहीं जानते....जबकि कवि आत्मा के सन्दर्भ में ही अपना रचनाकर्म निर्धारित करता है और उसी को संप्रेषित करता है. यही कारण है कि बेन की कविताओं में सूफी और स्थिरता दोनों मिलते हैं. अपनी कविता 'एंड इफ़ यू शुड लीव मी' में बेन का आशय ये है कि तुम्हारे छोड़ने पर मैं कहता कि Cassandra का भूत मेरी आँखों में से गुज़र गया है, तो ये बात जो है वह इस बात को क़ाफ़ी सत्यापित करती है कि "कविता हमारे भीतर की देवतुल्य उपस्थितियों के प्रति एक संकेत है और हमें अस्तित्व के उच्चतम स्थानों तक ले जा एक गूंज में बदल जाने का कारण बनती है." युद्ध और अत्याचार से निकला कवि बेन ओकरी जैसा होता है, जब वे 'ऐन अफ्रीकन एलिजी' लिखते है तो वे बताते हैं कि हम वे चमत्कार हैं, जिन्हें ईश्वर नें समय के कसैले फल का स्वाद लेने के लिए बनाया है.

ख़ुशी इतनी है कि ज़ाहिर नहीं करूंगा. गीत, अनुराग और बेन भाई को धन्यवाद.


kavita ki kitni satik aur sundar paribhasha di gayi haiकविता आत्मा की फुसफुसाहटों से बनी वह महानदी भी है, जो मनुष्यता के भीतर बहती है। कवि सिर्फ़ इसके भूमिगत जल को क्षण-भर के लिए धरातल पर ले आता है, अपनी ख़ास शैली में, अर्थों और ध्वनियों के प्रपात में झराता हुआ


कुछ चीज़ें सोचने, समझने और उनके बारे में कमेन्ट करने से ऊपर उठ जाती है ... उनके बारे में बात नहीं की जा सकती और ना ही कोई बहस! बेन ओकरी के कविता के बारे में यह टेक्स्ट या नोट्स भी कुछ ऐसे ही है... यह एक रिश्ते कि तरह है... रिश्ता जो लिखने और पढने के बीच होता है. किन स्थितियों में यह लिखा गया होगा यह कहना बहुत मुश्किल है लेकिन कविता के बारें में लिखी गई ये सबसे बेहतरीन बातें है. इतनी कि यह पता ही नहीं चलता कि हम कविता के बारें में पढ़ रहे है या जीवन के बारे में... जब तक पढ़ते है तब तक जिन्दा रहते है और जिन्दा रहने के लिए इन्हें बार बार पढ़ते रहना होगा ... बेन ओकरी कौन और क्या था यह नहीं पता लेकिन अनुराग जी और गीत जी ने इस लेखक के इन टेक्स्ट को पहचान लिया यह बहुत सुन्दर बात है.


एक कविता ही है जहाँ सारा तनाव सारा दबाव बह जाता है.बेहतरीन रचना


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