तुमने पहले भी लिखा है, तुम फिर लिखोगे...
लिखते हुए ऐन उस वक़्त रुकना चाहिए जब तुम रौ में होओ और तुम्हे यह पता हो कि आगे क्या लिखना है...इसके बारे में अगले दिन लिखने से पहले सोचना या चिंता करना छोड़ दो. ऐसा करने से तुम्हारा अवचेतन अपने आप इस पर काम करता रहेगा कि क्या लिखना है. लेकिन अगर तुम सचेत होकर इस बारे में सोचने लगोगे तो निश्चय ही उसे नष्ट कर दोगे जो कागज़ पर उतरने के लिए तुम्हारे भीतर घुमड़ रहा है और तुम्हारा दिमाग ऐसा करते हुए इस कदर थक जायेगा कि तुम अगले दिन लिखना शुरू नहीं कर पाओगे...विराम की घडी में जब भी तुम्हारा मन उस ओर जाये, उसे रोको, कहीं और लगाओ. यह तुम्हे रोज़ जतन से सीखना होगा...हो सके तो वर्जिश करो, इससे शरीर थकेगा, और क्या ही अच्छा हो कि तुम जिससे प्रेम करते हो, उसके संसर्ग में जाओ. लेखन के अन्तराल में इससे बेहतर तुम कुछ नहीं कर सकते...वह कुआँ जो मेरे लेखन का जल-स्रोत है, उसे मैंने इसी तरह कभी सूखने नहीं दिया...
तुमने जो शुरू किया उसे ख़त्म करो, तब बिलकुल न रुको जब लिखते हुए अपने को तुच्छ या विषयवस्तु के सामने निरुपाय महसूस करो...याद रहे, ''यह अच्छा बना या नहीं'' का बीहड़ संदेह ही कलाकार का पुरस्कार है...
तुम मुख्यतः दो लोगों के लिए लिखते हो : खुद के लिए ताकि पूर्णता या अचरज के अहसास से भरे रहो और उसके लिए जिससे तुम्हे प्यार है, इस बात से जुदा होकर कि वह तुम्हारा लिखा पढेगी या नहीं या वह अब है भी या नहीं.
किसी लेखक से लोग हमेशा उसकी आखरी कहानी जैसी ही अगली कहानी चाहते हैं...लेखन के साथ यह बड़ी विडंबना है : तुम वैसा कभी नहीं लिख पाते, जैसा लिखा जा सकता था...
अपनी निजी त्रासदी को भुलाओ. ऐसा सबके साथ होता है और तुम्हे गंभीरता से लिखने के लिए बुरे से बुरा का भुक्तभोगी बनना ही होगा. इतना ज़रूर ख़याल रहे कि जब तुम बुरी तरह आहात हो जाओ, तो वह अनुभव किसी तरह ज़ाया न हो. उसके प्रति एक वैज्ञानिक जैसी निष्ठा रखो.
एक लेखक की पहली सबसे अच्छी ट्रेनिंग उसका बचपन होती है : उदास बचपन.
अच्छे लेखन को तुम कितनी ही दफा क्यों न पढ़ जाओ, यह बताना हमेशा कठिन होगा कि वह कैसे लिखा गया होगा...हर महान लेखन में रहस्य का एक तीर बिंधा है...तुम जितनी दफा उसे पढ़ोगे, कुछ नया सीख सकोगे.
एक अच्छा लेखक अपने अनुभवों से जितना सीखता है, अपनी कल्पनाओं में उतना ही सच्चा होता है.
सबसे कठिन है मनुष्यों के बारे में खरी ईमानदारी से लिखना. इसके लिए सबसे पहले तुम्हे अपने विषयवस्तु को जानना होगा और फिर यह कि इसे लिखा कैसे जाये. मेरे ख्याल में दोनों को जानने में एक पूरा जीवन निकल जाता है.
फ़िक्र मत करो. तुमने पहले भी लिखा है, तुम फिर लिखोगे. तुम्हे सिर्फ़ एक सच्चे वाक्य की दरकार है. तुम्हे जो सबसे सच्चा वाक्य सूझता हो, उसी से शुरुआत करो...बतौर लेखक तुम्हे परखने से ज़्यादा चीज़ों को समझने में रूचि लेनी चाहिए.
****
अनुवाद : अनुराग वत्स
****
****
अनुवाद : अनुराग वत्स
****
[ लेखन संबंधी अर्नस्ट हेमिंग्वे के इन विचार बिन्दुओं का कलन उनकी मरणोपरांत छपी पुस्तक ''ऑन रायटिंग'' से किया गया है. इस स्तंभ के अन्य लेखक यहाँ .]

Tuesday, 05 July, 2011
क्या कहूँ अनुराग ,सुबह बनारस कर दी यार ,ये ताउम्र बुकमार्क लगाकर रखने लायक चीज है
Tuesday, 05 July, 2011
सुन्दर और अनुवाद भी बेहतरीन!
Tuesday, 05 July, 2011
* बहुत ही महत्वपूर्ण चीज सुबह- सुबह पढ़ने को मिल गई।
* देखना, लिखना और ( खुद के) लिखे देखना...दिव्य!
*'यह अच्छा बना या नहीं' का बीहड़ संदेह ..
Tuesday, 05 July, 2011
एक लेखक की पहली सबसे अच्छी ट्रेनिंग उसका बचपन होती है : उदास बचपन. ...'यह अच्छा बना या नहीं'' का बीहड़ संदेह ही कलाकार का पुरस्कार है.....हेमिंग्वे जी की ...अनुभवों की कड़ी में जरुरी और आच्छा लेखन केसे लिखा जाता है जबरदस्त शिख देती हुई अभिव्यक्ति है ...सही में इन्सान की खुद की अभिव्यक्ति को निखारना आसन के साथ विस्मय भी है अंतर्द्वंद में उलझा इन्सान कई बार चोराहे पर भटक भी जाता है ....सुंदर अभिव्यक्ति ...शुक्रिया अनुराग जी अच्छा अनुवाद आपका !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
Tuesday, 05 July, 2011
bus,ek chup...........................
Tuesday, 05 July, 2011
बहुत ही बेहतर अनुवाद किया है अनुराग जी ने, इसमें मूल रचना की आत्मा झलकती है, मूल रचना और अनुवाद दोनों ही वेहद सशख्त है...
Tuesday, 05 July, 2011
maine hemingway ki farewell to arma aur old man and the sea padhi hain.itne mahan lekhak ki rachna prkriya se avgat karane ke liye shukriya
Tuesday, 05 July, 2011
स्वर्णिम सूत्र और बेहतरीन अनुवाद .
हम किसके लिए लिखते हैं ... अनुभव और कल्पना का गहन संबंध.... उदास बचपन... अच्छा बना या नहीं का संदेह... ये सब सूत्र हमें परिपक्व बनाते हैं.
रवींद्रनाथ ठाकुर अपनी युवावस्था में जब भी कविता लिखते थे और अपनी भाभी कादंबरी देवी को सुनाते थे तो वे कहती थीं कि अच्छी बनी है. पर रवींद्रनाथ अक्सर संदेह करते थे थे कि ठीक बनी है पर 'बिहारीलाल' जैसी नहीं बन पाई. आज बांग्ला कवि बिहारीलाल चक्रवर्ती(1835-1894) को कम ही लोग जानते हैं. और रवींद्रनाथ के बारे में कुछ कहने की ज़ुरूरत नहीं है.
इधर कई छुटभैये कवियों की अहमन्यता और पतन का एक कारण इस संदेह का न होना भी है.
यह पोस्ट वास्तव में धैर्य से पढ़ने और मनन करने लायक है. पापा हेमिंग्वे अमर रहें !
Tuesday, 05 July, 2011
दिल खुश करने वाला आइटम है :-)
Tuesday, 05 July, 2011
anuraag ji! yah anuvaad shaandar hai! marmsparshi hai!
Tuesday, 05 July, 2011
एक लेखक की पहली सबसे अच्छी ट्रेनिंग उसका बचपन होती है : उदास बचपन.
Tuesday, 05 July, 2011
शानदार। कितनी अनमोल,अमूल्य बातें पढने को मिल गई। बहुत बहुत शुक्रिया क्योंकि आप ना लिखते तो हम कैसे बेहतरीन चीजें पढ पाते।
Tuesday, 05 July, 2011
UDAAS BACHAPAN.... bahoot he asadharan logo ka hota ha...kyoki aksar bachpana sharato aur badmashiyo me he chla jata hai udaasi ka koi naam he nhi hota....
Sach he hai kisi lekhak ko jitni bar padho utni bar kuch nya sikhne ko milta he hai...
Adbhut hai ye anuvaad...
Tuesday, 05 July, 2011
You have redefined your efficiency of excellent writing. I have thoroughly enjoyed and deeply felt the value out of it. Hope you will continue with your shower of great picks and portray of words. I appreciate and hats off to your brilliant mind. Thank you Anurag bhai!
Tuesday, 05 July, 2011
likhne se pahle aur likhne ke baad ek lekhak jitne utaar chadhavo se gujarta hai uski sachi bangi...
'mool ki sugandhi' liye anuvaad bhi acha laga.
Tuesday, 05 July, 2011
अच्छे लेखन को तुम कितनी ही दफा क्यों न पढ़ जाओ, यह बताना हमेशा कठिन होगा कि वह कैसे लिखा गया होगा...हर महान लेखन में रहस्य का एक तीर बिंधा है...तुम जितनी दफा उसे पढ़ोगे, कुछ नया सीख सकोगे. (हेमिंग्वे) बहुत ही गज़ब लिखा है
Tuesday, 05 July, 2011
"तुम मुख्यतः दो लोगों के लिए लिखते हो : खुद के लिए ताकि पूर्णता या अचरज के अहसास से भरे रहो और उसके लिए जिससे तुम्हे प्यार है, इस बात से जुदा होकर कि वह तुम्हारा लिखा पढेगी या नहीं या वह अब है भी या नहीं." Bahut hi sundar.
lekhan k bhitar jo rahasya chhupa hai use acche se ubhaar kar laya hai hemingway ne, hame nahi pata hum kab likh paate hai kab nahi, kiske liye likhte, kaun si shakti hamare lekhan ko jodti hai, kaha se hum suru karte hai, likhne k liye jaruri kya hai? in sabhi sawalo k jawab kahi na kahi in panktiyon me chuupe hai,lekhak k bachpan se lekar uske pyaar me, uske apne ekant or shunyata me, un palo me jab lekhak swyam k saath hote hue shabdo ki duniya me gote laga raha hota hai.....bahut hi sundar anuvaad anuraag ji,...dhanyawad.
Wednesday, 06 July, 2011
adbhut . thoda sa chori kiya apne status k liye.
Thursday, 07 July, 2011
बहुत सुंदर विषय वस्तु और प्रस्तुति। अनुवाद में मूल का मजा मिला अर्थात बहुत मन से काम किया गया है और विषय पर पकड़ भी है। बधाई अनुराग!
Friday, 08 July, 2011
lekhan par sateek lekhan.. lekhak ko kabhi padha nahi lekin ab padne ki ichcha hai..
anuvad ki bhi daad deni hogi.
Thursday, 14 July, 2011
सकारात्मक और महत्वपूर्ण नोट्स
Thursday, 14 July, 2011
बहुत बढ़िया पीस... देर से पढ़ा लेकिन कहूंगा कि उम्दा... आभार...
Friday, 15 July, 2011
bahut sundar!
Sunday, 07 August, 2011
अनुराग जी बहुत ही महत्वपूर्ण लेखन बिंदुओं से परिचय करवाया. अर्नस्ट हेमिंग्वे अपने बाद सरल शब्दों में हमारे लिए जो अपने अनुभव छोड़ गए हैं उस से उरिण होना संभव ही नहीं. आप को अनुवाद के लिए बहुत आभार.
Friday, 21 October, 2011
behad khubsurta anwaad ..
Wednesday, 11 January, 2012
"अपनी निजी त्रासदी को भुलाओ. ऐसा सबके साथ होता है और तुम्हे गंभीरता से लिखने के लिए बुरे से बुरा का भुक्तभोगी बनना ही होगा. इतना ज़रूर ख़याल रहे कि जब तुम बुरी तरह आहात हो जाओ, तो वह अनुभव किसी तरह ज़ाया न हो. उसके प्रति एक वैज्ञानिक जैसी निष्ठा रखो."
nice post as always!!!
sangrahniya!
Wednesday, 11 January, 2012
Wonderful translation of a great work.
Wednesday, 11 January, 2012
अनुराग भाई, जितना 'लिखने' के लिए उतना ही 'जीने' के लिए सच लगा... जीने और लिखने की अद्भुत संगति..... सलाम मेरा .....
Post a Comment