Friday, June 10, 2011

समर्थ वाशिष्ठ की नई कविताएं




जन्म लेता है एक शब्द
हौले-हौले जन्म लेता है
एक शब्द
जैसे जुड़ी हो उसके साथ
भरे-पूरे किरदारों वाली
कोई कथा
आप कहेंगे ज़मीन
तो मौजूद हो सकती है वहां
बख़्तरबंद सिपाहियों की पूरी कतार
भूमि पर चढ़ाई करती
यूंहि नहीं कह सकते
आप किसी फल को आम
अपनी जिव्हा पर टपक आए
रस का आस्वादन किए बगैर
दर्द से बिलबिला उठेंगे आप
ततैया के दंश से
पर कुछ भी नहीं होगा वह
भिरड़ के लड़ने के दर्द के मुक़ाबले
बैंगलोर्ड हो  जाएगा अमरीका में कोई
डूब जाएगी आर्नल्ड श्वाज़ेनेगर की छवि
प्लूटो के ग्रहत्व की तरह।
हौले-हौले जन्म लेता है एक शब्द
उसे गढ़ता है तीन साल का एक बच्चा
भूल जाता है, फिर करता है याद
तीन बरस के अपने बच्चे से खेलता हुआ।
नदी सा बन जाता है कभी कोई शब्द
जैसमीन के फूल की सफ़ेदी में
जुड़ जाता है क्रांति का रंग
हौले-हौले यूं बना कोई शब्द
जब देता है शब्दकोश पर दस्तक
तो चौंक जाती है अचानक भाषा
कि अरे, देखा ही नहीं मैंने
आते हुए दबे-पांव तुम्हें!
****
स्ट्रीट रैट
मेरी दिल्ली में बसने की
ख़ास मुसीबत ये नहीं थी
कि ताज़ा, सस्ता और गर्म खाना खाने
चलना पड़ता पांच किलोमीटर रोज़ाना
न ही ये कि एक के बाद एक आते ’नगर’
अच्छी ख़ासी नींद भी कर देते उचाट
बस में
ये भी नहीं कि बढ़ता ही जाता था पीठ का दर्द -
बॉस के सामने भी होने लगती महसूस ज़रूरत
गर्दन झटकाने की
पर यह कि जहां भी मैं जमता हलक़ से निवाला कोई उतारने
काला लिजलिजा चूहा कोई आ पड़ता सामने
        उन-उन आकारों में
        जिन-जिन आकारों में वो रहा होता
        कल्पना से एकदम परे
अभूतपूर्व।
घुस जाता नासिका के रास्ते
        मस्तिष्क में
पतीली के नीचे से सरकते
प्याज़ के छिलकों में
भी देता दिखाई
(अब जो भी अर्थ दें आप इसे
सचमुच सरका था गुलाबी एक छिलका
पतीली के नीचे से
गर्म एक दुपहर)
और शायद चलता भी रहता यही सब बदस्तूर
अगर बहुत दिन गायब रहने के बाद
आ न जाता उधम मचाता वो यकबार
मेरे पांव के बिल्कुल पास।
दुनिया के शायद सबसे विशाल चूहे को
दर्द से बिलबिलाते
पीठ दिखाकर भागते देखना।
पर फिर मैंने समझी उसकी आंत्रों की कुलबुलाहट
और ज़मीन पर गिराकर रोटी कोई नर्म
कहने लायक बना उससे कई बार --
कि आओ मियां
        मिल बांटे खाएं जो कुछ भी है
                दो भूखे दोस्त।
****

पतन
ओह कैसा समय
कैसे तौर-तरीके
कहते हैं सिसेरो
भरे सिनेट में
कैटेलीन को लताड़ते
दोहराते हैं हम ये शब्द
हां में हिलाते हैं गर्दन
दो हज़ार साल आगे
****

आकलन
जब पसंद आ रहे होते हैं
मुझे आप
तब पसंद आ रही होती हैं
मुझे
आपकी कुछ ख़ास बातें
आकलन के जोख़िम हैं
इस पसंद आने में
तमाम
जैसे सीमा रेखा पर
उछाल लेता क्षेत्ररक्षक
दे जाए छ: रन अचानक
कैच लेता-लेता।
****
मां
(सिरहाने ’मीर’ के आहिस्ता बोलो...)
सोचते-सोचते
नींद में प्रवेश कर गया होगा
उसका मस्तिष्क
जिव्हा के कसैलेपन को
आत्मसात करते
धीरे-धीरे
घुल रहें होंगे
रक्त प्रवाह में
दवाइयों के अवयव
घुल रही होगी
शर्करा।
कैसे कल्पित करूं
उसके डरावने सपनों के रंग
उनमें हाथ
थोड़ा गीला किए बगैर?
धीरे से छोड़ दूं
माथे पर एक चुंबन
इससे पहले कि
वो उठे
और पूछे वे प्रश्न
जिनके उत्तर
वो जानती है
पर जानना नहीं चाहती।
****

मच्छर
हवा होगी
तो होंगे
ये महानुभाव भी
आधी रात
उठूंगा अचानक
किसी दंश की
तिलमिलाहट से
ढूंढूंगा इन्हें ख़त्म करने का
कोई भी ज़रिया
हाथ आएगा
तिलचिट्टों के सफ़ाए
के लिए लाया गया
हिट का लाल कनिस्तर
सीधे इनके ऊपर
ज़हर की धार छोड़ते
याद करूंगा
जो बच सकते थे भोपाल
जो नहीं बचे इराक़
नाश्ते की मेज़ पर अगले दिन
दोस्तों से करूंगा मज़ाक़
कि क्यूं न रक्खे मुझे
मच्छरों की दुनिया का ओबामा
अपनी टार्गेटिड किल्लिंग सूची[1] के
ऐन ऊपर?
****

सूर्य

वह रोटी में नमक की तरह प्रवेश करता है
                                - सूर्य (केदारनाथ सिंह)

हमारी कविताओं पर क़ाबिज़ रहते हो
ज़िंदगी से ओझल होकर भी

किसी बहुत सर्द रात
बुद्ध मुद्रा में लीन
हवा के दर्रे सहते यात्रियों के
सपनों में आते हो
नर्म, मख़मली

तुम्हारे आने पर
चहचहाती है चिड़ियाएं
ओस की भौचक बूंदें
उड़ेलकर अपना निर्वात
लगाती हैं छ्लांग

एक चमकती सुबह
तेज़ तेज़तर बिगड़ैल
तुम टटोलते हो मेरी आंखें
धूसर पर्दों के पार

मुस्करा उठता हूं मैं
उदय होता है एक विश्व
हमारे बीच।
****

नवगीत
खाली हो टंकी जब सूखे हों नल
शॉवर में रहता है थोड़ा सा जल
ऐसे ही जाता है जीवन निकल
जगमग उजालों से लगता है डर
घर लौटूं, तकिए पे रखूं जो सर
राहत कि जैसे हो गर्मी में ज्वर
दिनभर निकलते ही रहते हैं काम
खाली सी आंखों में दुनिया तमाम
इंसान होने के सब ताम-झाम
चिल्लाती सुबहों में फैले उजास
जागूं मैं ज्यूंही इक कविता उदास
जम्हाई लेती सी आ बैठे पास।
****
[1]विकिपीडिया पर ये लेख देखें

[ समर्थ की अन्य कविताएं पढ़ने के लिए यहाँ आयें ]

Monday, June 06, 2011

शताब्दी स्मरण : मल्लिकार्जुन मंसूर




( भारतीय शास्त्रीय संगीत में अविस्मणीय योगदान करने वाले 'ख़याल' गायक पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर का जन्म शताब्दी वर्ष गए दिसंबर में संपन्न हुआ है. हम मंसूर जी की  शख्सियत और गायकी की विशिष्टताओं पर एकाग्र उन्हीं के पुत्र पंडित राजशेखर मंसूर के संस्मरण यहाँ दे रहे हैं. दो खण्डों में दी जा रही यह सामग्री पंडित जी की आत्मकथा 'रसयात्रा' से ली गई है, जिसका बहुत सुन्दर अनुवाद संगीत-प्रेमी युवा लेखक मृत्युंजय ने किया है. हम उनके अत्यंत आभारी हैं . सबद में इससे पहले हिंदी के मूर्धन्य कवि-लेखकों के जन्म-शताब्दी वर्ष पर महत्वपूर्ण लेख दिए गए हैं. यह उसी सिलसिले की एक कड़ी है. सबद पर इसके अलावा बिस्मिल्लाह खान और भीमसेन जोशी सरीखे संगीतकारों पर भी आलेख प्रकाशित किये गए हैं. )



रसयात्रा का अंत  

1981 में पिताजी ने अपनी 'रसयात्रा' समाप्त की. 12 सितम्बर 1992 को अपनी अंतिम सांस के पहले के ग्यारह सालों में वे संगीत में रमे रहे. 1983 में उनकी आँखों के सामने, रसयात्रा के हर दुःख-सुख में दृढ़ता और बिना किसी शिकवे-शिकायत के उनका साथ निभाने वाली, पत्नी गंगम्मा मृत्यु की विश्रांति में चली गयीं. इसके पहले मैंने कभी पिताजी को आंसुओं में डूबते नहीं देखा था. जब मां अपनी लम्बी गठिया की बीमारी के बाद मरीं, आंसू थे क़ि आप ही उनके दुखभरे चेहरे पर छलक पड़े. "बेटा, मुझे छोड़ कर चली गयी वह !" कुल यही कह पाए थे पिता.

मेरी मां ज़बरदस्त सहयोगिन महिला थीं. मैंने अक्सर महसूस किया क़ि मां की समझदारी और प्यार की उन उंचाईयों को पिताजी नहीं छू सके थे. बंगलौर में अपने  65वें जन्मदिन के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में पिताजी ने सरेआम, श्रोताओं की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उनकी तारीफ़ की- 'मैं आज यहां हूं, वह सिर्फ इन्हीं के नाते. मेरी जीवनसंगिनी, जो बिना किसी सवाल के मेरी संगीत और ज़िंदगी की यात्रा में मेरे साथ कंधा जोड़े खड़ी रहीं.' अपने आध्यात्मिक गुरुओं के प्रवचनों और आशीर्वादों की छाया में ही पिताजी इस और ऐसी दूसरी दुखद घटनाओं से उबर पाए.

मई 1991 में उनकी किडनी में तकलीफ हुई और पहले हुबली के अस्पताल में, फिर बंगलौर के किडनी फाउंड़ेशन ऑफ़ डाइलिसिस में भर्ती कराये गए. और दूसरी चीजों की तरह ही इसे उन्होंने समभाव से यह कहते हुए ग्रहण किया क़ि 'बेटा, ऐसा तो होता ही रहता है.' उनके बच्चे, दामाद और घनिष्ठ मित्र, सब उनको घेरे हुए थे. देश के कोने-कोने से उनके संगी संगीतकार और शुभेच्छु लगातार उनके स्वास्थ्य के बारे में दरियाफ्त कर रहे थे. गलत सूचना पाए एक ख्यातिनाम संगीतकार ने शुभेच्छा में उनके स्वास्थ्य खर्चों के लिए एक ख़ास रकम का एक चेक भी भेजा और बाद में यह बात अखबारों के सामने कही भी. पिताजी काफी नाराज़ थे, सो मैंने लौटती डाक से चेक वापस किया.

बंगलुरु किडनी संस्थान में उनकी देखभाल करने वाले डाक्टर तलवलकर बेहद नम्र और इंसान को समझने वाले आदमी थे. डायलिसिस का पहला दिन मुझे साफ़-साफ़ याद है. ज्यों ही शुद्ध होने के लिए रक्त नलियों के जाल में बहना शुरू हुआ, पिताजी ने मुझे इशारे से बुलाया- 'बेटा, मेरे लिए भैरव की वह बंदिश गाओ, 'दुःख दूर करिए.' हकबकाया हुआ  मैं डाक्टर तलवलकर की ओर देखने लगा. वे भी मुझे प्रोत्साहित कर रहे थे क़ि मैं पिताजी की फरमाइश पूरी करूं. दुःख के घूँट को भीतर धकेलते हुए मैंने गाना शुरू किया. हमेशा की तरह ही पिताजी गायन में संशोधन करते हुए मेरी हौसलाफजाई करते रहे. बाद में डाक्टर तलवरकर ने मुझसे कहा- 'तुम्हारे पिता सच में एक अद्भुत आदमी हैं. उनकी रगों में हकीकतन संगीत बहता है!'

दो महीनों में वे बहुत हद तक चंगे हो गए और डाक्टरों ने उन्हें घर वापस लाने की इजाज़त दे दी. पर स्वास्थ्य की बेहतरी को जांचने का पिताजी का पैमाना अलहदा और अपना था. उन्होंने एक तानपूरा मंगवाया और अस्पताल के बिस्तर पर पंद्रह-बीस मिनट तक गाते रहे. अब जाकर उनको अपने स्वास्थ्य की बेहतरी पर यकीन आया और हमें घर वापस लौटने की इज़ाज़त मिली. कर्नाटक की राज्य सरकार ने चिकित्सा खर्चों का काफी हिस्सा वापस किया. छह महीने बाद ही अस्पताल के लिए एक चैरिटी शो कर के पिताजी ने यह क़र्ज़ उतार दिया.

1981 से लगाय 1992 तक पिताजी को ढेरों पुरस्कार और सम्मान मिले. इनमें 1988 में विश्वभारती विश्वविद्यालय के देसिकोट्टम, 1991 में हाफ़िज़ अली खान पुरस्कार, और 1992 में मिला पद्मविभूषण जिक्रतलब हैं. उनके आख़िरी सम्मान के मौके पर मैं उनके साथ था और वह नज़ारा मेरे अंतर्मन में आज भी खुबा  हुआ है. समारोह से एक दिन पहले पद्म पुरस्कार से नवाजे गए सभी लोगों को पूर्वाभ्यास कराया गया कि समारोह में वे कैसे पेश हों. पिताजी ने इसमें काफी मज़ा लिया. समारोह के रोज़, हमें राष्ट्रपति भवन, दिल्ली ले जाया गया. समारोह शुरू हुआ, पिताजी का नाम पुकारा गया और उनको पुरस्कार ग्रहण करते हुए देखते हुए मेरे लिए वक्त मानो थम सा गया.

हिन्दुस्तान के अगणित-असंख्य गाँवों में किसी एक गाँव से आया साधारण धोती-कुर्ता पहने एक कमजोर सा आदमी, जिसने अपना सब कुछ संगीत साधना की वेदी पर चढ़ा दिया, वह हिन्दुस्तान के राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन के हाथों मुल्क का सर्वोच्च सम्मान लेने जा रहा था. यह संभव कैसे हुआ? यह सोचते ही मेरे दिमाग में तीन सच्चाइयां कौंध गयीं. अव्वल तो उनके गुरुओं ने उन्हें जी खोलकर दिया, दूसरे यह सब उनकी अनवरत तपस्या का ही फल है और आखिरी बात, उनकी आध्यात्म और संगीत दोनों क्षेत्रों के अपने गुरुओं में अडिग आस्था. वे जब राष्ट्रपति की ओर बढे, मेरे दिल की धड़कन रुकती हुई सी लगी क्योंकि वे रास्ते में बिछे हुए कालीन से बचते हुए बढ़ रहे थे जो उन्हीं के लिए बिछा था. सहज और ईश-प्रिय मंसूर साहब शायद चर्चा के केंद्र से बाहर रहना चाहते थे. उनको पता नहीं था और वे जानना भी नहीं चाहते थे क़ि यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण दिन था और यह लाल कालीन खासकर उन जैसे लोगों के बिछाया गया है.

घर लौटकर मेरी बहनों को समारोह के बारे में वे जोर-शोर से बता रहे थे क़ि मैंने वहां राष्ट्रपति के यहां चाय पार्टी के दौरान अमिताभ बच्चन और मनोज कुमार जैसे फ़िल्मी कलाकारों को देखा. ज़ब बहन ने जिद कर पूछा कि पुरस्कार लेते हुए कैसा लगा, तो सहज सुर में बोले, 'कुछ नहीं, बेटी. ऐसे ही था.' ऐसी निहत्थी कर देने वाली विनम्रता उनकी प्रकृति थी.

तीन महीने बाद, 1991 के अगस्त में मुरुगा मठ पर संगीत सेवा देने के बाद वे दिल्ली, मुंबई, पुणे और कोलकाता में कार्यक्रमों के तूफानी दौरे पर निकल पड़े. मैं हमेशा उनसे कहता क़ि थोड़ा धीमे चलें और कम कार्यक्रमों की हामी भरें. पर क्या आप किसी मछली को जल से बाहर रहने की सलाह दे सकते हैं? इस मामले में वह एकदम ही अदम्य थे. आज भी उनके जीवन के आख़िरी साल में विभिन्न जगहों पर उनके कार्क्रमों में शरीक होने वाले जब मुझसे पूछते है क़ि, 'हमारे यहां ही तो पंडित जी ने आख़िरी प्रस्तुति दी थी, है न ?' और हर बार जवाब में मैं कहता हूं, 'हाँ!'.

मेरे न चाहने के बावजूद 1992 की जनवरी से लेकर अप्रैल तक के समय में अलग-अलग जगहों पर उनकी प्रस्तुतियों का व्यस्ततम कार्यक्रम रहा. सौभाग्यवश अगले दो महीने इतने व्यस्त न थे. 30 जून 1992 को उन्होंने आकाशवाणी, धारवाड़ में रिकार्डिंग करवाई. मेरी गुजारिश पर उन्होंने राग नट और मियाँ मल्हार गाया. उस दिन मैं उनकी संगत कर रहा था. जब उन्होंने 'करीम नाम तेरो' की जानी पहचानी बंदिश को प्रचलित तीन ताल की बजाय रूपक ताल में उठाया तो मैं चकित रह गया. हमारे घर से आकाशवाणी का पैदल का रास्ता है. लौटते वक्त उन्होंने बताया क़ि पिछले दो-तीन दिनों से बाएं कंधे में दर्द बना हुआ है. मैंने तत्काल डाक्टर को दिखाने की जिद की और हमारे पारिवारिक मित्र व आर्थोपेडिक सर्जन डाक्टर दिलीप देशपांडे के पास लिवा गया. कंधे में दर्द की संभावना के अलावा चूंकि उन्होंने डाक्टर को कुछ न कहा सो डाक्टर ने कुछ दर्द निवारक और गले में पहनने के लिए एक पट्टा दे हमें विदा किया.

खैर, इससे दर्द घटा नहीं और 15 दिनों बाद हमने उन्हें एक नर्सिंग होम में भर्ती करवाया. यहां दूसरे सभी परीक्षणों के साथ उनकी छाती का एक्स-रे भी लिया गया. फेफड़े छतिग्रस्त लग रहे थे, इसलिए आगे की जांच के लिए ले जाया गया. शुरुआती एक्स-रे में फेफड़ों में घाव दिख रहा था, सो डाक्टरों ने क्षय रोग का इलाज़ शुरू किया. इससे उनकी सेहत में ठीक-ठाक सुधार दिखा और उन्हें नर्सिंग होम से छुट्टी मिल गयी.

अब उन्होंने एक अज़ब फैसला लिया क़ि हमारे साथ रहेंगे! पहले वे हमारे घर कई चक्कर आते थे पर रुके कभी नहीं. हालांकि मैं उनमें आये इस बदलाव का कारण अभी भी समझ नहीं पाया, फिर भी इस निर्णय से मैं बेहद खुश था. पाक-कला निपुणता में उनसे तारीफ़ हासिल करने वाली मेरी श्रीमती जी और मेरी तीनों बेटियां अचरज से खुशी के समुद्र में गोते लगा रहीं थीं. हमने उनके रहने के सारे इंतजामात किये. अपनी बहू और पोतियों के साथ वक्त गुजारते हुए वे काफी खुश थे.

अक्सरहां उनके करीबी दोस्त उनसे मिलने आते. इस तरह हमारे दिन अद्भुत संगत में गुज़र रहे थे. मेरी पत्नी के साथ विश्वस्त स्वरों में वे परिवार के इतिहास, पुरखों और वंशावली के बारे में बतियाते. जिन्दगी में पहली बार मैं अपने ही घर के भीतर 'बाहरी' सा महसूस कर रहा था. निश्चित ही हमारे साथ रहना उनको रास आ रहा था. हमने देखा क़ि उनकी पूजा और दूसरे रोजमर्रा के क्रियाकलाप धार्मिक भाव से चल पड़े. लगभग बीस दिनों के बाद ठीक महसूस करते हुए उन्होंने वापस अपने घर जाने की इच्छा जताई. अनिच्छापूर्वक हमने उन्हें वापस भेजा. आज तक हम उनकी संगत में बिठाये गए उन दिनों को याद करते हैं.

कुछ दिनों बाद उन्होंने फिर से सीने में दर्द की शिकायत की. हम उन्हें फिर नर्सिंग होम ले गए जहां अबकी सघन एक्स-रे लिया गया. अगस्त के पहले हफ्ते में डाक्टरों ने स्तब्ध कर देने वाली खबर सुनाई. उन्होंने बताया क़ि पिताजी को फेफड़ों का कैंसर है, आख़िरी स्टेज का. मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. हम उजड़ा हुआ महसूस कर रहे थे. वही फेफड़े, जिन्होंने पचास सालों से ज्यादा वक्त तक अद्भुत संगीत रचने और हज़ारों श्रोताओं को निहाल करने में उनकी मदद की थी, उनका साथ छोड़ रहे थे, उनसे दग़ा कर रहे थे. जो इतने वर्षों से उनका 'आज्ञाकारी' था, उसने ही
उन्हें धोखा दिया.

हममें से किसी में यह साहस नहीं था क़ि उन्हें बताएं क़ि वे फेफड़ों के कैंसर से जूझ रहे हैं. इस बीच कैंसर विशेषज्ञों ने उनके लिए कीमोथिरेपी तजवीज़ की. मेरा मन इस बात के लिए नहीं मान रहा था क़ि उनसे यह सच छुपाये रखा जाय. मुझे विश्वास था क़ि वे जिन्दगी में जैसे और चीजों को समभाव से लेते आये हैं, इसे भी वे वैसे ही स्वीकारेंगें. लेकिन बहनों, रिश्तेदारों और करीबियों ने मुझे बरज दिया.

मृत्यु के ठीक पच्चीस दिन पहले पिताजी ने हठ ठाना क़ि वे वार्षिक संगीत सेवा देने के लिए मुरुगा मठ जायेंगे. हम सब हक्के-बक्के थे. हमारे पारिवारिक मित्र डाक्टर वागले, डाक्टर देशपांडे और डाक्टर आर.सी.धुलप्पनवार ने आपातकालीन चिकित्सा का सामान मठ तक ले जाने का फैसला किया. उनके आध्यात्मिक गुरुओं के सम्मुख 17 अगस्त 1992 को उनकी आख़िरी प्रस्तुति हुई. वे राग हेम नट में देर तक गाते रहे, तुम बिन हमको कल ना परत है, बीत गए दिन भजन बिना रे....

संगीत
सेवा के आखीर में उन्होंने एक वचन गाया. यह वचन हममें से किसी ने कभी पहले नहीं सुना था. शायद वे अपना आख़िरी ठहाका लगा रहे थे! मैं अभी तक नहीं जानता क़ि वह कौन सा वचन था. हालांकि यह रिकार्ड पर है, मैंने इसे सुनने से मना कर दिया. उस दिन का कोई भी ख़याल दुखद स्मृतियों से भर देता है. 12 सितम्बर को सुबह तीन बजे चाचाजी ने, जो उस समय उनके साथ थे, मुझे जगाकर बताया क़ि वे अपनी अंतिम साँसें ले रहे हैं. मैं भीतर भागा, उनका सर अपनी गोद में टिकाकर तानपूरा बजाने लगा. दुःख से डबडबाई बहनों को न रोने के लिए समझा-बुझा मैंने उनका सर अपनी गोद में टिकाया और तानपूरा बजाने लगा. बेचारे बच्चे, वे मजबूर थे. अपने इतने दिनों की संगीत यात्रा के साथी तानपूरे की आवाज सुनने का उन्होंने कमज़ोर सा आभाष दिया और फिर शान्ति में लीन हो गए. रसयात्रा अब समाप्त हो गयी थी.
****



बहीखाते से


[ सूचनाओं के जंजाल के साथ मैं यहां हूं, पिताजी की प्रस्तुतियों से संगीत के कुछ यादगार मौकों, लोगों और घटनाओं को अपनी स्मृतियों में तलाशता हुआ. आगे मैं उनकी कुछ एक विलक्षण प्रस्तुतियों का वर्णन करूंगा. इन प्रस्तुतियों में उनके द्वारा गाए गए उत्कृष्ट रागों पर मैंने कुछ संक्षिप्त टिप्पणियाँ की हैं. मैंने जो स्वरलिपियाँ दी हैं, उनमें से कुछ सिर्फ असली संगीत सभा के करीब लगभग ही पहुँच पायी हैं. अलावा इसके, मैं रागों के विस्तार में नहीं जा रहा. मेरे लेखे स्वरलिपि का कोई भी रूप गुणात्मक रूप से हिन्दुस्तानी ख़याल गायकी का परिमाण नहीं निर्धारित कर सकता क्योंकि यह बेहद संजटिल परिघटना है. ]


मीराबाई की मल्हार

{ जून 1956 , गदग, राजीव पुरंधरे के गंडाबंधन संस्कार के मौके पर } 

पंडित
सिधाराम जम्बल्दिन्नी के बाद गदग के राजीव पुरंधरे मेरे पिताजी के दूसरे पूरावक्ती शिष्य थे. पुरंधरे संगीत-विशेषज्ञ  थे और उन्होंने कन्नड़ में संगीत पर कुछ बेहद उपयोगी किताबें लिखीं. उन्हीं ने संगीत विशारद की परीक्षा के लिए मेरी तैयारी करवाई थी. कई सालों तक वे पिताजी की छत्रछाया में रहे और कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़ में संगीत के परास्नातक पाठ्यक्रम चलाने में उनकी मदद की.

गंडाबंधन संस्कार के मौके पर मैं अट्ठारह साल का था. एक घंटे या कुछ और ही अधिक समय तक बजाते बजाते अँगुलियों में छाले फूट गए और तानपूरे का तार टूट गया. मुझे बखूबी याद है क़ि राग मीराबाई की मल्हार में पिताजी लगभग चालीस मिनट तक बंदिश तुम घन से  गाते रहे. इस प्रस्तुति के कुछ महीनों पहले मेरा इस राग से थोड़ा-बहुत परिचय बना था, हालांकि मैं इसका नाम नहीं जानता था. कुछ ही दिन पहले पिताजी अजीजुद्दीन खान साहब से मिलने कोल्हापुर गए थे, जहां वे एक संगीतकार को यही बंदिश सिखा रहे थे. बढ़त के लिहाज़ से बंदिश से पार जाने में दोनों को मुश्किल पेश आ रही थी. (पिताजी पर लिखे एक आलेख में अजीजुद्दीन खान साहब ने पूरी घटना का ज़िक्र किया है.) तब उन्होंने इसे पिताजी को सौंपा. पिताजी ने बंदिश सीखी और इसकी रूपरेखा को समझने के लिए इसे कई बार साधा. बाद इसके वहीं के वहीं उन्होंने राग को "पल्लवित" करना शुरू किया. जब दो घंटे के बाद राग पुष्पित हो उठा तो अजीजुद्दीन खान साहब की आँखें खुशी और संतोष से छलकने लगी. घर लौटकर पिताजी ने इस राग को और वक्त दिया और तब वे राग की 'आत्मा' तक पहुँच गए.

गदग में गंडाबंधन के मौके  पर पिताजी ने पहली बार इसे किसी महफ़िल में गया. बंदिश की स्थाई को तीन-चार बार गाते हुए उन्होंने बढ़त में राग को अन्वेषित और विकसित करना शुरू किया तो मानो उन्होंने राग को पल्लवित करने के मर्म को लगभग थिर कर दिया. ज्यों ही उन्होंने राग को पल्लवित करना शुरू किया, महफ़िल में मौजूद उनके बहुतेरे प्रशंसकों की तालियों की गड़गड़ाहट तत्काल ही गूंज पड़ी. इसके प्रशंसा के बाद वे आगे ही बढ़ते गए. गायन के मध्य में श्रोताओं को राग के बारे में चकित होते हुए देख उन्होंने घोषणा की, 'यह है मीराबाई की मल्हार.' तभी से यह राग पिताजी की संगीतशाला का हिस्सा बन गया. भूलवश पहले मैंने इसे मियाँ की मल्हार सुन लिया था, पर बाद में सही नाम सिधाराम जम्बल्दिन्नी ने बताया. कई सालों बाद जब मैंने खुद इस राग को गाना शुरू किया तब पिताजी के निष्ठावान शिष्य शिवयोगप्पा से उनके गाए इस राग की एक रिकार्डिंग मुझे हासिल हुई.


बिभास
{ 9 सितम्बर, 1978 , गोवा, केसरीबाई स्मृति दिवस }


यह सुबह के समय की प्रस्तुति थी. पिताजी ने यहां राग बिभास, शुक्ल बिलावल, मदमत सारंग और बिलावली गाया. तबले पर उनकी संगत कर रहे थे निज़ामुद्दीन खान. पिताजी ने राग बिभास में तीन ताल में निबद्ध बंदिश ए हो नरहरा नारायण का ज़बरदस्त गायन किया. कोमल धैवत की जगह इस बंदिश में शुद्ध धैवत और ऋषभ लगता है. (चूंकि हमलोग घराने से हैं, पिताजी ने मुझसे कहा, हम इसे 'शुद्ध बिभास' कहते हैं.)

सारेगरेगप, पपध, पगरेसा, गरेसा, पगरेसा, पपध, पगरेसा. राग की समूची बढ़त इन्हीं स्वर-समूहों पर निर्भर है और शुद्ध धैवत को प्रमुखता देते हुए स्वर भव्य आवृत्ति में इस्तेमाल किये जाते हैं- गपध, गध, पगरेसा. साफ़-साफ़ यहां तीव्र ऋषभ, षडज को टहोकते हुए बढ़ता है- सारे, सा, सासारे, सा. पिताजी के इसी ख़ास गायन से मुझे बिभास में शुद्ध धैवत के सटीक 'समय' का भान हुआ था. समझने की दूसरी जरूरी बात यह क़ि इस गायन में आवृत्ति के बावजूद वे धैवत का इस्तेमाल न्यास या आधार स्वर की तरह नहीं कर रहे थे. बहुतेरे स्वर-समूह धैवत से शुरू होते हैं.

न्यास के लिहाज़ से ठहरने/रुकने की ताकत की बजाय समय या वज़न के लिहाज़ से मुझे यहां अनुकम्पनमय धैवत का 'बाहुल्य' लगा. एकाध बार, तार षडज की ओर जाते हुए कोमल धैवत विवादी लगा- पधपसा. पर यह  इतनी सफाई से लगा क़ि श्रोता चकित रह गए. उपरोक्त टुकड़े पर देर तक टिकने के बाद, जब श्रोता तार षडज सुनने को व्यग्र हो रहे थे, तब श्रोताओं को आह्लादित करते हुए वे गपधसा पर पहुंचे. यों जब वे विलंबित षडज के खुले आकार पर पहुंचे, चारो तरफ से वाहवाही की आवाजें गूंज उठी.


बिहंग/विहंग
{ 28 मई, 1978 , धारवाड़ में श्रीपाद राव जोशी के जन्मदिन पर }


धारवाड़
के संगीत-रसिक श्रीपाद राव केसरीबाई के संगीत के भक्त थे और उन्हें अक्सर सुना करते. हमेशा उन्हीं के बारे में बातें किया करते.  मेरे हिसाब से उनमें और पिताजी में 'तुम्हीं से मोहब्बत, तुम्हीं से लड़ाई' वाला रिश्ता था क्योंकि श्रीपाद राव की नज़र में केसरीबाई के संगीत के आगे कोई भी संगीत ऊना पड़ता था. पिताजी उन्हें अक्सर समझाया करते क़ि यह उनका दुर्भाग्य है क़ि उन्होंने उनके गुरु माज़ी खान साहब के 'अपूर्व सुन्दर गायन' को ज्यादा नहीं सुना. दोनों अपनी बात पर अड़े रहते. जन्मदिन के इस मौके पर पिताजी ने विहंग, रैस कानडा, कुछ वचन और एक भैरवी गाया.

मेरे हिसाब से उन्होंने राग विहंग, तीन ताल में आली ती किन्नी मोसो नाहीं आज नहीं चातर बंदिश की ज़बरदस्त प्रस्तुति की. इसमें दोनों मध्यम सामान्य चलन में इस्तेमाल हुए थे- धमपगमगरेग, पपपधधनी, धनी, धपम, गमगमधमगमगरेसा (जैसा क़ि जैत में होता है). मधसानीरेनीधनीधप. नी, धनी, धपमगमग एक विस्तारित मींड के घुमाव के रूप में लिए गए थे पर सारे स्वरों का उच्चार स्पष्ट था. इसलिए लगता था क़ि स्वर अवरोही क्रम में झरने से प्रवहमान हो रहे हों. राग की जटिल संरचना के नाते इस बंदिश की तानें काफी दुरूह हो गयी थीं पर पिताजी जी ने हरएक तान में इस सूक्ष्मता को बरकरार रखा.

श्रीपाद राव कुछ यूं प्रभावित हुए क़ि उनकी आंखों से आंसू बह चले. कार्यक्रम के आखीर में उन्होंने पिताजी को आलिंगन में भरते हुए कहा, 'आज मैंने मांजी खान को तुम्हारे भीतर गाते हुए सुना, मल्लेशप्पा! मैं कितना अभागा हूं क़ि उन्हें और अधिक सुनने का मौक़ा नहीं पा सका. तुम्हारे जरिये अब जाकर मैं उनको सुन पाया.' और दोनों वहीं, सबके सामने रोने लगे. और जन्मदिन के भोज में खाए-पिए बिना ही पिताजी घर लौट आये.

बसन्ती केदार
{ मुंबई, आर.एच.बेंगरी के बेटे सुहास की शादी में }



विले
पार्ले के अपने घर पर बेंगरी साहब तीन महान संगीतकारों- पिताजी, पंडित भीमसेन जोशी और पंडित कुमार गन्धर्व के बढ़िया मेज़बान हुआ करते थे. शादी के मौके पर कुमार जी मेहमान के रूप में मौजूद थे और पिताजी प्रस्तुति दे रहे थे. पीछे मैंने कई बार राग बसन्ती केदार सुना था और इससे काफी परिचित भी था, पर उस दिन का बसंती केदार कुछ अलग ही था. शायद इसलिए क़ि कुमार जी सामने की कतार में मसनद के सहारे आसीन थे. उस दिन मुझे यह बात कौंधी क़ि दो सर्जक (मेरे मुताबिक़ बिलकुल अलग ढंग के "सर्जक") उस्ताद राग के ज़रिये एक दूसरे से बात कर रहे हैं. एक राग 'कह'रहा है, और दूसरा 'समझते हुए' सर हिला रहा है.

उस समय जो कुछ घट रहा था, उसको अंगीकार करते हुए उनकी आँखें आपस में मिल रही थीं. मैं खासतौर पर दो मध्यमों के विशिष्ट खेल पर मुग्ध था. केदार के ममग की जगह मममग और बसंत के खुले मध्यम की जगह मगरेसा.  दो मध्यमों वाले स्वर-समूह तीक्ष्ण और घुमावदार ढंग से इस्तेमाल किये गए. ऐसे में हर बार कुमार साहब अपनी ओजस्वी आवाज में दाद दे रहे थे. मालूम होता था क़ि पिताजी और कुमार साहब दोनों के लिए अन्य किसी श्रोता का वहां कोई वजूद ही न हो. मेरे लिए यह ख़ास स्वर-समूह को इस्तेमाल करने के लिहाज से यह सीखने वाला अनुभव रहा. मैंने तो यहां-वहां, जब-तब  अपने गुरु की प्रस्तुतियों से नए रत्न बटोरे हैं.
****