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कथा : ६ : जार्ज लुई बोर्हेस




[
बोर्हेस हिन्दी के लिए अब अपरिचित नहीं हैं। वे अर्जेन्टाइना के सुप्रसिद्ध लेखक हैं, जिनका जन्म 1899 में हुआ था। वे हमारे समय के महान लेखकों में गिने जाते हैं। उनके अनेक कथा संग्रह और कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। यह कहानी उनकी किताब 'द बुक ऑफ सैण्ड' से ली गयी है (संयोग से इस कहानी का शीर्षक भी यही है)। बोर्हेस को लेखकों का लेखक कहने का चलन है। उनकी अनेक कहानियाँ 'आस्तित्त्विक गुत्थियों' को उद्घाटित करने की कोशिश में लिखी गयी हैं। वे हमें 'होने' के उन प्रश्नों के सामने निष्कवच ला खड़ा करती हैं जिन्हें टालकर ही सामान्य बौद्धिक व्यापार चला करता है। इस अर्थ में वे हमें गहन स्तर पर इस तरह झकझोरती हैं कि हम अस्तित्त्व के आष्चर्य पर विचार करने को विवश हो उठते हैं। ]
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अनुवादक
                                             

रेत की किताब       

'' तुम्हारी रेत की रस्सी''
-- जॉर्ज हर्बर्ट (1593-1623)

रेखा असंख्य बिन्दुओं से बनी होती है; सतह असंख्य रेखाओं से; घन असंख्य सतहों से; अतिघन असंख्य घनों से...। नहीं, निश्चय ही यह ज्यामितीय ढंग अपनी कहानी शुरू करने का बेहतर ढंग नहीं है। हर मनगढ़न्त कहानी की सच्चाई का दावा करने का आजकल रिवाज़ है। हालांकि मेरी वाकई सच्ची है।

मैं ब्यूनेस आयर्स की बेलग्रानों गली के चार मंज़िले अपार्टमेण्ट में अकेला रहता हूँ। कुछ महिने पहले, देर शाम, मेरे दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला, बाहर एक अजनबी खड़ा था। वह लम्बा था और उसके नाक-नक्श विशेष नहीं थे, या अपनी अल्पदृष्टि के कारण मुझे वे ऐसे लगे हों। भूरे कपड़े पहने और हाथ में भूरा सूटकेस लिए वह विनम्र लग रहा था। मैंने तुरन्त जान लिया कि वह किसी और देश से आया है। पहले मुझे वह बूढ़ा जान पड़ा, बाद में समझ में आया कि मुझसे यह भूल उसके महीन और सुनहले बालों के कारण हुई है, जो स्केण्डिनेवियाई ढंग के सफे़द थे। एक घण्टे से भी कम हुई हमारी बातचीत से मुझे पता चल गया कि वह आर्कनीज़ से आया है। मैंने उसे भीतर बुलाया और कुर्सी की ओर इशारा किया। वह बोलने से पहले कुछ देर ठिठका रहा। उससे एक तरह का अवसाद फूट रहा था, जो अब मुझसे फूट रहा है।
'मैं बाइबिल बेचता हूँ,' वह बोला।

मैंने अपना ज्ञान दर्शाया, 'इस घर में अनेक अंग्रेज़ी बाइबिल हैं, जिनमें जॉन वायक्लिफ़ की पहली अंग्रेज़ी बाइबिल भी शामिल है। मेरे पास सिप्रानो डी वलेरा की, लेखन की दृष्टि से कमज़ोर लूथर की और वल्गेट की लातिन प्रति भी है। तुम जान ही गये होगे कि मुझे बाइबिल की ज़रूरत नहीं है।'

कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोला, 'मैं सिर्फ़ बाइबिल नहीं बेचता, मैं आपको बीकानेर के बाहरी इलाके में मिली एक पावन-पुस्तक दिखाना चाहता हूँ जिसमें आपकी दिलचस्पी हो सकती है।'

उसने सूटकेस खोला और एक पुस्तक मेज़ पर रख दी। वह कपडे़ के ज़िल्द में 'अठपेजी’* पुस्तक थी। वह बेशक कई हाथों से गुज़र चुकी थी। उसके असाधारण वज़न से मुझे हैरानी हुई। उसके स्पाईन पर 'पावन लेख' लिखा था और उसके नीचे 'बम्बई।'

'शायद उन्नीसवीं सदी,’ मैंने टिप्पणी की।

'मुझे नहीं मालूम’ वह बोला, ' मैंने कभी यह पता नहीं किया।'

मैंने उस पुस्तक को कहीं से भी खोला, उसकी लिपि मेरे लिए अपरिचित थी। उसके जर्जर पन्ने मुद्रांकन की दृष्टि से ओछे थे व दो कालमों में छपे थे। जैसा कि बाइबिल में होता है। इबारत बिल्कुल पास-पास मुद्रित और संक्षिप्त पद्यों में संयोजित थी। ऊपर के कोने पर अरबी में पृष्ठ-संख्याएँ थीं। मेरा इस ओर ध्यान गया कि अगर बाँयें पृष्ठ पर (मान लो) 40514 छपा था तो उसके सामने के दाँएँ  पृष्ठ पर 999 था। मैंने अगला पन्ना खोला, उस पर आठ अंकों की संख्या पड़ी थी। छोटा-सा रेखांकन भी था, जैसा शब्दकोषों में होता है, पेन और स्याही से किसी बच्चे के-से अदक्ष हाथ से बना लंगर।

अजनबी बोला, 'इस रेखांकन को ध्यान से देखिये, इसे अब आप कभी नहीं देख पाएंगे।'

मैंने वह स्थान नोट कर पुस्तक बन्द कर दी। तुरन्त ही मैंने उसे दोबारा खोला। मैंने एक-एक पन्ना देख डाला, लंगर का रेखांकन कहीं नहीं था।

'यह किसी भारतीय भाषा में लिखे धर्मग्रन्थ का संस्करण जान पड़ती है,' अपना आतंक छुपाते हुए मैंने कहा।

'नहीं', उसने जबाव दिया। फिर, जैसे कोई रहस्य बता रहा हो, वह आवाज़ धीमी कर बोला, 'मैंने यह पुस्तक समतल पर बसे शहर में कुछ रूपयों और बाइबिल के बदले ली है। इसका मालिक पढ़ना नहीं जानता था। मुझे शक है कि उसके लिए 'पुस्तकों की पुस्तक' ताबीज़ थी। वह सबसे नीची जाति का था अलावा अछूतों के कोई भी उसकी परछाई पर बिना अपवित्र हुए नहीं चल सकता था। उसने मुझे बताया कि उसकी पुस्तक को रेत की किताब कहते हैं क्योंकि न उसकी पुस्तक का और न रेत का कोई आदि है न अन्त।'

अजनबी ने मुझसे पहला पन्ना निकालने को कहा। मैंने अपना बाँया हाथ आवरण पर रखा और अंगूठे को फ्लाईलीफ पर रखकर पुस्तक खोली। यह व्यर्थ था। जितनी बार भी कोशिश की, कुछ पन्ने मेरे अंगूठे और आवरण के बीच आ ही जाते थे जैसे वे पुस्तक से ही उग रहे हों।

'अब आखिरी पन्ना निकालिए।' मैं फिर विफल रहा। एक ऐसी आवाज़ में जो मेरी नहीं थी, मैं हकलाकर सिर्फ़ यह कह सका, 'यह हो ही नहीं सकता।’

वह धीमी आवाज़ में ही बोला, 'हो नहीं सकता पर है। इस पुस्तक के पन्नों की संख्या अनन्त से कम है न ज़्यादा। न कोई पहना पन्ना है, न आखिरी। मैं नहीं जानता कि इन पृष्ठों पर मनगढ़न्त संख्याएँ क्यों लिखी हैं। शायद यह इशारा करने कि एक अन्तहीन श्रृंखला की ज़द में कोई भी संख्या आ सकती है।'

फिर, जैसे बोलकर ही सोचते हुए उसने कहा, 'अगर स्पेस अन्तहीन है तो हम स्पेस के किसी भी बिन्दु पर हो सकते हैं। अगर काल अन्तहीन है तो हम काल के किसी भी बिन्दु पर हो सकते हैं।'

उसके विवेचन से मैं चिढ़ गया, ’तुम बेशक धार्मिक हो ?' मैंने कहा।

'हाँ, मैं गिरिजे का सदस्य हूँ। मेरा अन्तःकरण निर्मल है। मुझे ठीक ही विश्वास है कि मैंने इस शैतानी पुस्तक के बदले' इश्वर के शब्द’ देकर उस देशज आदमी से धोखा नहीं किया है।''

मैंने उसे भरोसा दिलाया कि उसे खुद को कोसने की ज़रूरत नहीं है और पूछा कि क्या वह संसार के इस हिस्से से महज गुज़र रहा है ? उसने बताया कि कुछ दिनों में वह अपने देश लौट जाना चाहता है। मुझे तब पता चला है कि वह आर्कनी द्वीपों से आया स्कॉट है। मैंने बताया कि मुझ स्टीवेन्सन और ह्यूम से अपने स्नेह के कारण स्कॉटलैण्ड के प्रति गहरा आकर्षण है।

'तुम्हारा मतलब स्टीवेन्सन और रोब्बी बर्न्स से है', उसने सुधार किया।

अपनी बातचीत के दौरान मैं उस अन्तहीन पुस्तक की लगातार जांच करता रहा। झूठी उदासीनता के साथ मैंने पूछा, 'क्या तुम इस अनोखी चीज़ को ब्रिटिश संग्रहालय को सौंपना चाहोगे ?'

'नहीं, मैं इसे आपको सौंप रहा हूँ।' वह बोला और उसने उस पुस्तक की ख़ासी कीमत लगायी।

मैंने पूरी ईमानदारी से कहा, ’इतना पैसा मेरी सामर्थ्य के बाहर है।’ लेकिन दो-तीन मिनिट में मुझे एक तरकीब सूझ गयी।

'मैं तुमसे एक सौदा करता हूँ’, मैं बोला।' तुमने यह पुस्तक थोड़े-से रूपयों और बाइबिल की एक प्रति के बदले ली है, मैं तुम्हें अभी-अभी मिले अपनी पेंशन के चेक का सारा धन देता हूँ और काले अक्षरों वाली वायक्लिफ़ बाइबिल जो मुझे विरासत में अपने पुरखों से मिली है।’

'काले अक्षरों वाली वायक्लिफ़', वह बुदबुदाया।

मैं शयन कक्ष में जाकर उसके लिए धन और पुस्तक ले आया। उसने पन्ने पलटे और शीर्षक-पृष्ठ को सच्चे बाइबिल-प्रेमी के उत्साह से देखा।

'मंजूर है', वह बोला।

मुझे आश्चर्य हुआ कि उसने भाव-ताव नहीं किया। यह मैं बाद में समझ सका कि वह उसे बेच देने के इरादे से ही मेरे पास आया था। उसने पैसे बिना गिने ही रख लिये।

हमने भारत के बारे में बात की, आर्कनी और उस पर कभी शासन करने वाले नार्वेजियन जार्लों  के बारे में भी। जब वह जाने लगा, रात हो चुकी थी। मैंने उसे फिर कभी नहीं देखा, न ही उसका नाम जानता हूँ।

पहले मैंने शेल्फ में वायक्लिफ़ की छूटी जगह पर रेत की किताब रखनी चाही लेकिन बाद में उसे एक हज़ार एक रातों के सेट में खाली हुई जगह पर छुपा दिया। मैं बिस्तर पर लेट गया और सो नहीं सका। सुबह के तीन या चार बजे मैंने बत्ती जलायी। मैंने उस असम्भव पुस्तक को निकाला और उसके पन्ने पलटने लगा। उसके एक पृष्ठ पर मुझे उत्कीर्ण मुखौटा दिखा। पृष्ठ के ऊपरी कोने पर एक संख्या लिखी थी जो मुझे याद नहीं रही, जिस पर नौ की घात थी।

मैंने अपना यह ख़जाना किसी को नहीं दिखाया। उसके अपने पास होने के सौभाग्य में, उसके चुरा लिए जा सकने का भय भी जुड़ा गया और यह अंदेषा भी कि शायद यह पुस्तक सचमुच अन्तहीन न हो। इन जुड़वाँ पूर्वग्रहों ने मेरे पुराने मानव-द्वेष को और गहरा दिया। मेरे पहले ही बहुत थोड़े-से मित्र थे, अब उनसे भी मिलना मैंने बन्द कर दिया। अब मैं उस पुस्तक का कै़दी था और मैंने घर से बाहर निकलना लगभग बन्द कर दिया। उसके घिसे हुए स्पाईन और आवरणों का लैन्स से परीक्षण करने के बाद मैंने किसी भी तरह के छल का अभाव पाया। मैंने पाया कि संक्षिप्त रेखांकन, दो हजार पृष्ठों की दूरी पर बने थे, मैंने उनकी क्रमवार सूची नोटबुक में बनाना शुरू की, जो शीघ्र ही भर गई। कोई भी रेखांकन दोहराया नहीं गया था। रात में अपनी अनिद्रा से छूटे अन्तरालों में मैं पुस्तक के सपने देखता।

गर्मियाँ आयीं और लौट गयीं। मैं समझ गया कि यह पुस्तक शैतानी है। लेकिन यह समझ कर मुझे क्या हासिल हुआ क्योंकि उस पुस्तक को अपनी आँखों से देखने व अपने हाथों से छूने वाला खुद मैं क्या कुछ कम शैतान हूँ। मुझे लगा यह पुस्तक दुःस्वप्नात्मक है, एक ऐसी अश्लील वस्तु जो यर्थाथ को ही लज्जित और लांछित कर रही है।

मुझे आग का ख्याल आया लेकिन मुझे डर था कि एक अन्तहीन पुस्तक का जलना कहीं अन्तहीन साबित न हो और सारा ग्रह धुएँ  से भर जाये। मैंने कहीं पढ़ा था कि पत्ती को छुपाने की सबसे अच्छी जगह जंगल है।

सेवा-अवकाश प्राप्त करने से पहले मैं मैक्सिको गली में, अर्जेन्टाईन राष्ट्रीय पुस्तकालय में काम करता था, जहाँ नौ सौ हज़ार किताबें हैं। मुझे मालूम था कि प्रवेश-द्वार के दाँयी ओर एक घुमावदार सीढ़ी तलघर को जाती है, जहाँ किताबें, नक़्शे और पत्र-पत्रिकाएँ रखे जाते हैं। एक दिन मैं वहाँ गया और पुस्तकाध्यक्ष के अन्यमनस्क होने का फायदा उठाकर और यह ध्यान देने से बचता हुआ कि दरवाज़े से कितनी ऊँचाई या दूरी पर हूँ, मैंने रेत की किताब को तलघर के धूसर शेल्फों में से किसी एक पर छोड़ दिया।

अब मुझे कुछ-कुछ हल्का लग रहा है पर मैक्सिको गली** से गुज़रने के ख़याल तक को मैं अपने पास फटकने देना नहीं चाहता।
####


                              [ अंग्रेजी से अनुवाद- उदयन वाजपेयी संगीता गुन्देचा .
साथ में दी गई चित्र-कृति यहाँ से . इस स्तम्भ के अंतर्गत छपी अन्य कथाओं को  पढने के लिए यहाँ आएं. ]

सन्दर्भ
*वह पुस्तक जिसके पन्ने एक शीट को आठ भागों में विभक्त करके बनाये जाते हैं, जो साधारणतः पाँच से आठ इंच लम्बी और छः से साढ़े नौ इंच चौड़ी होती है।

**अर्जेण्टाईना का राष्ट्रीय पुस्तकालय ब्यूनेस आयर्स में जिस जगह पर स्थित है उसे 'मैक्सिको गली' कहा जाता है।
5 comments:

एक हज़ार और एक रातों का सेट असल में 'अल्फ़ लैला वा लैला' है।


'अगर स्पेस अन्तहीन है तो हम स्पेस के किसी भी बिन्दु पर हो सकते हैं। अगर काल अन्तहीन है तो हम काल के किसी भी बिन्दु पर हो सकते हैं।'
beautiful way to capture our selves in realtion to time and space ............. tx for sharing truly amazing piece of art ....


कोई ऎसी किताब सच में होती जिसे हम नहीं पढते, जो खुद हमें पढती। जिसे कभी भी किसी मूड में किसी भी पन्ने से पढा जा सकता। मन जो कुछ ढूंढ रहा होता, वो उन्हीं पन्नो की भूलभुलैया में छुपा होता। एक नर्म मुलायम बच्चे का हाथ सा होता जो हमें पकड कहीं भी चलता रहता और पन्नो से होते हुये हम उसके पीछे पीछे उसके दिखाये रास्तों पर भटकते.. इक रोशनी होती जो हथेली पर उतर आती, इक आईना होता जो रोशनी पर उभर आता...


I had read this story i english and was quite enamoured by it...reading it in hindi gives the same feeling....a really good translation. Thanks Anurag ji


पत्ती को छुपाने की सबसे अच्छी जगह जंगल है।



good stoy


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