सबद
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सबद पुस्तिका : 6 : एडम ज़गायेवस्‍की


[पोलिश कवि -लेखक एडम जगायेवस्‍की की कविताओं, विचारों और उन पर एकाग्र गद्य की इस पुस्तिका को सबद की तीसरी वर्षगाँठ पर पेश करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है. जगायेवस्‍की कविता के उसी उर्वर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं जहां से रुज़ेविच, मिवोश, शिम्बोर्स्का और हर्बर्ट जैसे कवि आते हैं. उनकी कविताओं और लेख का यह अनुवाद हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कवि-कथाकार और अनुवादक गीत चतुर्वेदी ने किया है. जगायेवस्‍की की कविताओं के साथ गीत ने लम्बी संगत की है और उनके कई अनुवाद किए हैं. इस पुस्तिका में हम एक श्रृंखला के तहत 27 कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं. जगायेवस्‍की की कविताओं पर उनकी भूमिका कवि के बहाने कविता के कई ज़रूरी सवालों की पड़ताल करती है. इससे पहले सबद के लिए ही अब खासे मशहूर चिली के कवि-कथाकार रोबर्तो बोलान्‍यो की कविताओं का भी अनुवाद गीत ने किया था. ]



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लपट

हे ईश्वर, हमें लंबी सर्दियां दो
और शांत संगीत, और धैर्यवान मुख
और थोड़ा-सा गौरव दो
इससे पहले कि हमारा युग ख़त्म हो जाए।
हमें एक गहरा अचंभा दो
और एक लपट दो, ऊंची, चमकदार भड़कीली


छोटा वाल्ट्ज़ 

इतने चंचल हैं दिन, इतने चमकदार
कि दुबली नन्ही हथेलियां भी
ढंकी हुई हैं उपेक्षा की सफ़ेद धूल से
अंगूर के बग़ीचों में बहुत धीरे सरसराते हैं सांप
लेकिन शाम का समंदर अंधेरे जितना गाढ़ा हो जाता है और
लटकता है सिर के ऊपर जैसे
सर्वश्रेष्ठ लिपियों में लटकते हैं विराम चिह्न
बमुश्किल हिलती है समुद्री चिडियां.
शराब की एक बूंद उत्‍कीर्ण है तुम्हारे होंठों पर
चूने के पहाड़ धीमी गति से पिघलते हैं
क्षितिज पर और एक तारा उगता है.
रात में चौराहे पर बेदाग़ सफ़ेद पोशाकों में नाविकों का एक ऑर्केस्ट्रा
बजाता है शोस्ताकोविच का छोटा वाल्ट्ज़, छोटे बच्चे
रोते हैं जैसे कि वे समझ गए हों
यह ख़ुशदिल संगीत अंतत: कहना क्या चाहता है.
हम दुनिया के संदूक़ में बंद हो चुके हैं,
प्रेम हमें स्वतंत्र करता है, समय हमारी हत्या.

* कम समयावधि का वाल्ट्ज़। अक्सर एक मिनट में समाप्त हो जाने वाला। 
शोपां ने इसकी शुरुआत की थी। 

विरह

मैं लगभग ईर्ष्‍या के साथ पढ़ता हूं अपने समकालीनों की कविताएं :
तलाक़, अलगाव, तकलीफ़देह जुदाइयां;
व्यथा, नई शुरुआतें, छोटी-मोटी मृत्यु भी;
चिट्ठियां जो पढ़ी गईं और फिर जला दी गईं, जलना, पढऩा, आग, संस्‍कृति,
क्रोध और निराशाएं-- कविता के पुंसत्व के लिए बेहद ज़रूरी माल;
निर्मम फ़ैसले, क़द्दावर सदाचारियों के ठहाकों की नक़ल उड़ाते
और अंत में सबकुछ को समा लेने वाले चिरस्थायी आत्म की विजय.

और हमारे लिए? कोई मर्सिया नहीं, हमारे विरह पर कोई छंद नहीं,
हमारे बीच कविता का कोई पर्दा नहीं
सटीक उपमाएं भी हमें एक-दूसरे से अलग नहीं कर पातीं
नींद ही है वह एकमात्र जुदाई जिससे हम बच नहीं पाते
नींद की गहरी गुफा, जिसमें हम अलग-अलग उतरते हैं
-- और मैं पूरी तरह ध्यान रखता हूं इस बात का कि
जो हाथ मैंने पकड़ रखा है उस समय
वह पूरी तरह सपनों से बना होता है.


जहां सांस है

वह अकेले खड़ी है मंच पर
और उसके पास कोई साज़ नहीं

वह अपने वक्षों पर बिछाती है अपनी हथेलियां
जहां सांसों का जन्म होता है
और जहां मरती हैं वे

हथेलियां नहीं गातीं
वक्ष भी नहीं गाते

गाता वही जो ख़ामोश बचा रहता है
****



17 comments:

विचार श्रंखला की एक अलग विमा।


इससे पहले कि हमारा युग ख़त्म हो जाए।
हमें एक गहरा अचंभा दो .............

सबद को अनगिनत युगों की यात्रा करनी बाकि हँ ............ Keep the flame alive ........

मधु


Badhai meri taraf se Anurag Bhai. Ek arsha ho gaya aapke blog ko padhte huye. Hamesha nai lagi.. Utni hi tazgi bhari jitni ki Ramcharit manas. Mujhe sukhad anubhuti hoti hai jab app kisi mahan rachna ke kisi khas ansh ke bare me charcha karte hain. Kai yese vishai pe jana samjha hai jiski pari kalpana nahi ki thi maine. Ye sab aapke blog ke madhyam se hi sambhab ho saka.. Aapko dhanyabad hai.


I would call it a great day Day, Geet ! The day when my belief in poetry becomes greater than my belief in mortality. It has been a day when one can tangentially touch the peace of the dead and the fear of the living people and can move to and fro with beguiling agility and determination to weave peace and fear in the knots of her braid and ask them to stay tucked there forever. Your introduction, besides making insightful comments about the paradigms of evaluating poetry and its problems, holds a mirror to your own intensity to engage with the poetry that promises excruciating joy. This joy hangs like the farthest fruit (proverbially, sweetest too) almost invisibly on the highest branch, blurred by thousand leaves around that it is almost taken to be ‘not there’ but if one persists to chew its kernel, it takes you straight to the minerals in the roots of the tree that had bore this fruit of joy. Your introduction connects Adam, his mentor and all the readers who will read it in the next millennium. The readers who will want to distinguish among small, big and large death (that waits for them inevitably because every city will become Jerusalem one day) and who will see snails talking of mortality. I tell you that professors really come out from schools with empty faces like Iliad had assigned them interminable defeat. I am one such daily commuter. It is amazing to know that the globe promised meadows and rivers to all the children at whatever place they chose for their summer vacation.

Adam is a unique poet of displacement whose displacement is imagined and contrived in the same instant. As you have said, any reductive reading can make him a spiritual poet whereas he prays for longer winters and pride and wonders before his age ends. His is a cumulative experience that eternalizes the moment and exposes the moment to its eternal mother. Rightly said that Adam longs to touch the space and duration between two moments and that’s what motivated his philosophical and material world view. Wonderful the way Adam redefines value of precision and selection in the experience of writing poetry.

I also see around clamoring voices announcing a divorce between wisdom and bliss. It was a great reassurance to read Adam’s essay about his mentor that initiates a beautiful talk on the value of logic and rationality and abandonment to choose afresh like a real picker. The political commitment of his mentor poet is reflected so profusely in his own poetry also. It is an awful wonder to be able to write about one’s favourite poet. It is not a tribute but an urgent letter to the one who had apparently anchored his boyish anxiety so that he could grow into a seasoned and grounded man.

I thank Geet Chaturvedi and Anurag Vats for making the day beautiful. The day with a good poem (s) is a day doubly lived. A day that can be ‘saved’ now and ‘spent’ later on the days that gets dry in autumns.


This is beautiful work. Thanks.


आखिरी कविता बेहद सटीक है ....बेहद !


बेहतरीन पैकेज !!

निसन्देह कविताएँ बहुत अच्छी हैं. ऐसी कविताएँ अदीठ हो चली हैं जहाँ कविता में कहानी या एक थीम परोसने की कोशिश न हो. एडम ऐसा नहीं करते.

एडम की कविताओं की तरलता साम्प्रत उनके विचारों का बाह्य स्वरूप जान पड़ती हैं.

गीत जी के आभारी हैं पर अनुराग 'जी' को धन्यवाद नहीं, क्योंकि धन्यवाद वगैरह एक बार या दो बार दिया जाता है, बार बार नहीं...:-)


yah blog ek khoobsurat patrika ka roop leta ja raha hai...., ek aisi patrika ka roop jiske paas kahne ke liye kuch naya aur hatkar hai.'Adam' ki kavitao se parichay karane ke liye dhanyavaad.


F R Leavis ne kahi kaha hai : Peculiar completeness of Response. Albatta unhone ye baat critics ke liye kahi thi, lekin ye readers aur writers ke liye bhi utni hi such ho sakti hai.

Jis din maine is pankti ki khoj ki, main bahut utsahit tha, theek usi tarah, jaise barf, chumbak aur samudra ko aavishkrut karne par mocondowaasi utsahit the.

Main kavi chandrakant Deotale se milne pahuncha aur unhe Leavis ke is kathan ke baare mein bataya. Unhone kaha : Bahut sunder kathan hai, kintu ye Asambhav hai.

Ve sahi the.

Lekin aaj main sochta hu ki kabhi-kabhi kuchh Asambhavnao ki aakansha karne mein koi harz nahi hai, jaise 'manushyta ka mahaswapn'

Geetji ne likha hai : Kavi ki rajneeti roti ki tarah hoti hai, jo ek taraf se nahi sink sakti. Lekin unse poochha ja sakta hai ki kya us roti ke dono taraf ki sinkai ko ek saath dekha ja sakta hai? Kya sikko aur pratibaddhato ke dono pahluo ko ek saath dekha ja sakta hai? Is alok mein unka ye kathan ek vastunishth (?) ya vyavharik (??) satya na sahi, lekin ek zaruri aagrah (!) ya hastakshep (!!) to hai hi.

Sanshalesh ka swapn ek asambhavna ka swapn hai - sampoornta ki tarah, comleteness of response ki tarah- lekin aksar hamare liye swapn hamare satyo se zyada zaruri ho jaate hain, kyonki ve hamare dishasoochak hote hain - bheetri satya ke sanketak.

Kaviyo ko dussahas karna shobha deta hai!

Geetji ko shukriya ki unhone Adan ki itni sunder kavitao ko hamare liye aur arthpoorna bana diya!

Sushobhit.


एक से बढकर एक उम्दा रचनाएं।
उस मेहनत का दिल से शुक्रिया जिसने इनका अनुवाद किया और जिसने हमतक पहुंचाया। कहां मिल पाती है हिंदी में अनुवादित विदेशी रचनाएं।


खूबसूरत लफ्ज़ .. अँधेरे-सी गाढ़ी होती शाम.

अलग संसार, नया सूरज, रुपहली रात .. सबद जादुई है.

डाकिये को ढेर सारी बधाइयां और प्यार !


eeshvar se kee hui prarthna ek gahre achambhe me nishabd chhod deti hai.ek aushasan chhane lagta hai bheetak . behad saarthak...

prem hame swatantr karta hai samy hamari hatya.. abhootpoorv anubhav hua blog, adam ko padhkar. anurag aapka shukriya geet ji ko sabhaar naman.


Geet jee adbhut kaam karte hain. Shandar anuvad kiye hai.


शुद्ध मन के गीत सी कविताये। जैसे कबीरदास ने कोरी चदरिया फैलाई हो।


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संपादन : अनुराग वत्स.

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सम्‍मुख - 1

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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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