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Showing posts from May, 2011

सबद पुस्तिका : 6 : एडम ज़गायेवस्‍की

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[पोलिश कवि -लेखकएडम जगायेवस्‍कीकी कविताओं, विचारों और उन पर एकाग्र गद्य की इस पुस्तिका को सबद की तीसरी वर्षगाँठ पर पेश करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है. जगायेवस्‍की कविता के उसी उर्वर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं जहां से रुज़ेविच, मिवोश, शिम्बोर्स्का और हर्बर्ट जैसे कवि आते हैं. उनकी कविताओं और लेख का यह अनुवाद हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कवि-कथाकार और अनुवादक गीत चतुर्वेदी ने किया है. जगायेवस्‍की की कविताओं के साथ गीत ने लम्बी संगत की है और उनके कई अनुवाद किए हैं. इस पुस्तिका में हम एक श्रृंखला के तहत 27 कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं. जगायेवस्‍की की कविताओं पर उनकी भूमिका कवि के बहाने कविता के कई ज़रूरी सवालों की पड़ताल करती है. इससे पहले सबद के लिए ही अब खासे मशहूर चिली के कवि-कथाकार रोबर्तो बोलान्‍योकी कविताओं का भी अनुवाद गीत ने किया था. ]


[ Download this book ] सबद पुस्तिका : 6 : एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य
या यहां से.
लपट

हे ईश्वर, हमें लंबी सर्दियां दो
और शांत संगीत, और धैर्यवान मुख
और थोड़ा-सा गौरव दो
इससे पहले कि हमारा युग ख़त्म हो जाए।
हमें एक गहरा अचंभा दो
और एक लपट दो, ऊंची, चमक…

अम्बर रंजना पाण्डेय की तीन नई कविताएं

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पकड़ नहीं आती छवि

दूती की भूमिका में मंच पर
बांच रही हैं आर्या-छंद मेरी प्रेयसी.
चांदी की पुतलियों का हार और हंसुली
गले में पहनें. संसार यदि छंद-
विधान है तो उसमें
अन्त्यानुप्रास हैं वह. किसी
उत्प्रेक्षा सा रूप जगमग दीपक
के निकट. दूती के छंद में कहती
हैं नायिका से, ''छाजों
बरसेगा मेह, उसकी छवि की छांह
बिन छलना यह जग, जाओ सखी
छतनार वट की छांह खड़ा है
तुम्हारा छबीला'' और मुझे मंच के नीचे
कितना अन्धकार लगता है. कैसे रहूँगा मैं
जब तुम चली जाओगी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय,
दिल्ली. यह अभिनय नहीं सुहाता, नट-
नटियों के धंधे.

रूप दिखता है और अचानक
हो जाता है स्वाद. पकड़
नहीं आती छवि छंद से भी
ज्यादा छंटैत है.
****

ऋतु-स्नान

चैत समाप्यप्राय हैं. आठ-दस हाथ दूर
आलते रचे, मैले पांवों
को तौल तौल धरती
उतरती प्रवाह
में. एक ही चीर से
ढँके सब शरीर.
एक स्नान सूर्योदय से
पूर्व कर चुकी हैं वह. यहाँ
केश धोने आई हैं. पांच
दिनों की ऋतुमती, थकी और
मंथर, अधोमुखी जैसे हो
आम्र-फलों की लता. नर्मदे
मेरे एकांत पर फूलना
लिखा था यों यह ब्रह्मकमल कि
मारता हूँ डुबकी, अचानक
उसके स्तनों पर जमे गाढ़
स्…

कथा : ६ : जार्ज लुई बोर्हेस

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[ बोर्हेस हिन्दी के लिए अब अपरिचित नहीं हैं। वे अर्जेन्टाइना के सुप्रसिद्ध लेखक हैं, जिनका जन्म 1899 में हुआ था। वे हमारे समय के महान लेखकों में गिने जाते हैं। उनके अनेक कथा संग्रह और कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। यह कहानी उनकी किताब 'द बुक ऑफ सैण्ड' से ली गयी है (संयोग से इस कहानी का शीर्षक भी यही है)। बोर्हेस को लेखकों का लेखक कहने का चलन है। उनकी अनेक कहानियाँ 'आस्तित्त्विक गुत्थियों' को उद्घाटित करने की कोशिश में लिखी गयी हैं। वे हमें 'होने' के उन प्रश्नों के सामने निष्कवच ला खड़ा करती हैं जिन्हें टालकर ही सामान्य बौद्धिक व्यापार चला करता है। इस अर्थ में वे हमें गहन स्तर पर इस तरह झकझोरती हैं कि हम अस्तित्त्व के आष्चर्य पर विचार करने को विवश हो उठते हैं। ]
: : अनुवादक

रेत की किताब
'' तुम्हारी रेत की रस्सी''
-- जॉर्ज हर्बर्ट (1593-1623)

रेखा असंख्य बिन्दुओं से बनी होती है; सतह असंख्य रेखाओं से; घन असंख्य सतहों से; अतिघन असंख्य घनों से...। नहीं, निश्चय ही यह ज्यामितीय ढंग अपनी कहानी शुरू करने का बेहतर ढंग नहीं है। हर मनगढ़न्त कहानी की सच्चाई का दावा…

कथा : ५ : शशिभूषण

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छाछ
यह उतरते क्वार और लगते कातिक के एक दिन की बात है।
मुझे अब ठीक से याद नहीं कि कौन सा दिन था। कई साल हो चुके हैं इसलिए तारीख़ और वार याद न रह जाने को समझा जा सकता है। उन दिनों खेतों में जुताई चल रही थी। धान-सोयाबीन की फसलें खलिहान में आ चुकी थीं। बारिश नहीं होने की वजह से परती हो रहे ऐसे खेतों को चने या मसूर की फसल के लिए जल्दी-जल्दी जोता जा रहा था जिन्हें किसी साधन से सींचा नहीं जा सकता। उस दिन पिताजी ने सुबह से ही बैलों को सानी खिलाने के बाद काँधे में हल्दी-तेल लगाकर उन्हें नोन-पिसान पिलाकर तैयार कर दिया था। वे यह ताक़ीद करके पहले ही खेत निकल गए थे कि “जैसे ही छोट्टे भाई आएँ बैलों को लेकर खेत आ जाना।”
गाँव में तब नहर नही आई थी। पिछले बीसेक साल से बाणसागर सिंचाई परियोजनागाँव-गाँव आ रही है। सूखे कुओं का पानी बहाल होने ही वाला है। इसे क्षेत्र की धरती का घटता जलस्तर काबू में न आ जाए तो कहना....आदि-आदि केवल सुनने में आ रहा था। हाँ इस बीच मोबाईल और केबल कनेक्शन खूब आ चुके थे। निजी ट्यूबेल अब भी कम थे। बिजली की सप्लाई अनिश्चित रूप से ऐसी न्यून थी कि खेतों की सिंचाई के बारे में सोचना ही बेवक…