Friday, April 22, 2011

मनोज कुमार झा की नई कविताएं


Painting : Vladimir Fedin

सहमति

अब इस जर्जर काया पर मत खर्च करो धन
एक दिन जाना ही है तो जो बच जाए बचा लो
सड़क किनारे बिक रही खेत खरीद लो उसको
मुझे भी साथ ले चलना दो पैसा कम करवा दूँगा
अब मुझे जाने दो, जो बच रहा है बचा लो
    घर में एक-दो तो तुरत सहमत हुए
जो सहमे शुरू में वे भी सहमत हुए
पड़ोसी भी सहमत हुए

सब आए श्राद्ध में मुखिया, सरपंच, एमएलए का भी एक खास आदमी
जय जय हुआ, सब ने माना कि अभी ही खरीदी थी जमीन इतनी मँहगी
और अभी ही ऐसा भव्य श्राद्ध !
                पराक्रम की बात है।
****

बाहरी

वृक्ष ने कुछ नहीं कहा
पत्ते एक काँप भर असमंजस में नहीं थे मेरे वहां होने से
मोर ने भी कुछ नहीं कहा
    वो नाचा मेरे होने से स्वाधीन
चिड़िया को तो मैंने अंडे सेते देखा
रास्तों ने साथ दिया
    एक भी काँटा नहीं मेरे लिए अतिरिक्त
जल ने तो प्राण दिया उस ताप में
जो उठी वो अंगुलियाँ थीं
            मनुष्य की
मेरी माँ के से उदर में जिन्होंने पाया था आकार।
****

पुनश्च


आग थी लहलह
और करीब, और करीब जाने का मन था
त्वचा मना कर रही थी
दसेक लोग थे - बीड़ी, तमाखू, हँसी, ठहाके और ठहरा हुआ दुःख
बातें चलती रही - नेता, चोर, उल्लू के पट्ठे, सरसों का साग
ग्यारह तक सब अपने अपने घर

राख में अभी भी गर्मी थी
दो कुत्ते आए, एक उसके बाद, एक और - सब पसर गए

सुबह किसी ने ठंढ़ी राख को हटा दिया
शाम में आग फिर लहलहा।
****

अनुपस्थिति

तुम नहीं तो यहाँ अब मेरे हाथ नहीं हैं
            एक जोड़े दस्ताने हैं
पैर भी नहीं
            एक जोड़ी जूते की
देह भी नहीं
            बस माँस का एक बिजूका जिसमें रक्त और हवायें घूम रही है।

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[ मनोज कुमार झा हिंदी के चर्चित युवा  कवि हैं . विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित हुए हैं. चॉम्सकी, जेमसन, ईगलटन, फूको, जिजेक इत्यादि बौद्धिकों के लेखों का उन्होंने अनुवाद भी  प्रकाशित कराया है. एजाज अहमद की किताब ‘रिफ्लेक्शन ऑन ऑवर टाइम्स’ का हिन्दी अनुवाद पुस्तकाकार संवाद प्रकाशन से छपा है. सराय / सी. एस. डी. एस. के लिए ‘विक्षिप्तों की दिखन’ पर उनका शोध भी दृष्टव्य है. कविता के लिए उन्हें  2008 के भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. ]

15 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

मनोज में जो आंचलिकता दिखती है, वह बाहर से भीतर नहीं - भीतर से बाहर, बिलकुल सही राह पर जाती है....उसने कविता की निकट परंपरा से कुछ लिया है, अगर ये बात उसकी कविताओं में प्रकट होती है, तो इससे ज़्यादा ये प्रकट होता है कि उसने परंपरा में एक युवा कवि की सामर्थ्य भर बहुत कुछ जोड़ा भी है....ये कवि मुझे बहुत पास पड़ोस का लगता है...इसकी कवितायेँ अन्दर बनी रहती हैं...उनमें स्मृतियों का हिस्सा बन जाने की अद्भुत ताक़त भी है.

बहुत अच्छी पोस्ट अनुराग.

सागर said...

इनकी कविताओं का मैं भी फैन हूँ. अनुनाद, नयी बात आदि पर इनकी कवितायेँ पढ़ी हैं.. बिम्ब बिलकुल अनछुए होते हैं...

यहाँ सारे बेहतरीन हैं, और अंतिम वाले ने तो रुला ही दिया....

प्रवीण पाण्डेय said...

सारी कवितायें बहुत ही सशक्त हैं।

Vimlesh Tripathi said...

अच्छी कविताएं...मनोज के यहां लोक की उपस्थतिति सदैव अलग से ध्यान खिंचती है.
बधाई...

महेश वर्मा said...

पत्ते एक काँप भर असमंजस में नहीं थे मेरे वहां होने से
मोर ने भी कुछ नहीं कहा
वो नाचा मेरे होने से स्वाधीन..

मनोज झा की कवितायें हिंदी की समकालीन कविता में अलग दिखाई देती हैं सिर्फ इसलिए नहीं कि उनकी कविताओं में उनका लोकेल सदैव उपस्थित रहता है बल्कि इसके ढेरों अन्य कारणों में से एक यह भी उनकी कवितायें बेचैन कर देने वाली संवेदनाओं के दृश्य धारण किये भी होती हैं . सबद और कवि को शुभकामनाएं .

Upmanyu said...

Mai bhi ek murid hun... Unki kavitawon ka. Kamal ka likhte hain. sabse khas lagta hai unke sabdon ka bejor sangam. Mahan hai unki rachna.

आशुतोष कुमार said...

ख़ास बात ये लगती है कि मनोज कुमार झा की आंचलिकता भूगोल से ज़्यादा इतिहास में है.

tarav amit said...

मनोज जी की कविताओं मे ‘सामान्य’ की ‘विशिष्टता’ दिखाई देती है.. कथ्य मे भी कथन मे भी। बहुत से समकालीन कवियों मे जहां खुद को दर्ज कराने की होड़ मे ‘बहुत बड़ी कोई बात’ या ‘बहुत असाधारण कहने का ढंग’ बना लेने की जददोजहद पायी जाती है मनोज अपनी कविताओं मे बहुत साधारण दिखते हुए भी अलग हो जाते हैं!

‘जो सहमे शुरू में वे भी सहमत हुए’
क्या ये बात समकालीन कविता पर भी लागू नही होती?

सुशीला पुरी said...

गहरी व्यंजना की कवितायेँ ....

गिरीन्द्र नाथ झा said...

मुझे मनोज जी कविताओं में अपनापा लगता है। उनके यहां कविता केले के पत्ते पर भोजन करने की तरह है, अन्न और पत्ते के प्रेम की तरह। आप इसे प्रकृति प्रेम, अंचल प्रेम कुछ भी कह सकते हैं। मैं अनुपस्थिति पढ़ते हुए खो सा गया हूं। उम्दा रचना, बस माँस का एक बिजूका जिसमें रक्त और हवायें घूम रही है.....
शुक्रिया सबद को इसे यहां पढाने के लिए।
गिरीन्द्र

Mita Das said...

sahamati......kavita ...me...kya...gajab ka ..vyang chupa hai.....

Tushar Dhawal Singh said...

मनोज की कविता में सरलता से अपनी गहरी बातों को कह देने की एक सहज ताक़त है. मिटटी से उगा हुआ यह कवि अपनी सहज अभिव्यक्ति से अपनी आंचलिकता को वैश्विक और वैश्विक को आंचलिक सन्दर्भों में ढाल देता है. एक तरह से यह universalisation ऑफ़ parochial और parochialisation ऑफ़ universal है. उनकी कविताओं को पढ़ते हुवे अक्सर निजी से वैश्विक और उसके प्रतिगमन के अवकाश में देश काल से मुक्त होते जाने का आभास मिलता है. मेरी समझ में यही उनकी कविताओं की ताक़त भी है. ख़ास कर आज के समय में जब कुछ युवा कवि हिंदी कविता को शुष्क बौद्धिकता के दबाव से बहार निकलने की कोशिश कर रहे हैं, मनोज की ये कवितायेँ उन प्रयासों के प्रति आशान्वित करती हैं.
इन सुन्दर कविताओं के लिए मनोज और सबद को बधाई.

mithilesh kumar ray said...

MANOJ G KI KAVITAYEN HAMESHA MUJHE ANDAR LE JATI HAIN AUR FIR JAB MAI BAHAR DEKHATA HUN TO WAHI DRISHYA KUCHH ALAG PRATIT HONE LAGATA HAI...

imupasana said...

सुंदर कहन-शैली। लोक की गंध में पगी कविताएँ। पुनश्च और अनुपस्थिति बहुत बढ़िया लगीं।

Abhishek Dubey said...

Sahmati se leker bahri virkch take ka manoj ka kavyatmak adhyan much naveen pahluo ko jorta hai.jismay samay shabd dpersh rad roop gandh sabhi liptay chalay aatay hai.