Tuesday, April 19, 2011

शताब्दी स्मरण : नागार्जुन


[हिंदी के श्रेष्ठ कवियों को उनके जन्म-शताब्दी वर्ष में स्मरण करते हुए हम शमशेर और अज्ञेय के बाद नागार्जुन पर लेख प्रकाशित कर रहे हैं. इसे युवा आलोचक मृत्युंजय ने लिखा है. नागार्जुन के सुदीर्घ और विविध काव्य-संसार की एक लेख में समाई असंभव है, फिर भी मृत्युंजय ने अपने आकलन में नागार्जुन के कवि-छवि को रोशन करने की भरसक कोशिश की है. ]


नाग जी अर्जुन यही उवाच

मृत्युंजय 

'समरगाथा' (हारवर्ड फास्ट) में जन नेता के लिए एक शब्द है- 'मकाबी'. मकाबी वह जो जनता से पैदा होता है, उसी के लिए लड़ता है, और आखिरकार उसी में बिला जाता है. यह पदवी छीनी नहीं जा सकती, जुटाई नहीं जा सकती. प्रतिष्ठान और सत्ता इससे डरते हैं. यह सिर्फ जनता किसी को दे सकती है. नागार्जुन भारत की जनता के कवि-मकाबी हैं. यों 'जनकवि' के खिताब की कीमत बहुत ज्यादा होती है और कसौटियां काफी खरी. लगभग यह 'तरवार की धार पे धावनो' है.

आज़ादी के पहले से लेकर अपनी जिन्दगी की आख़िरी सांस तक जनता के साथ कंधा भिड़ाकर लड़ने-भिड़ने, उससे सीखने और उसे सिखाने की यह जिद नागार्जुन के कविता के क्रोड़ में है. सत्ता के खिलाफ खड़ा होना, समकालीन आलोचकों की कुटिल भ्रू-भंगिमा से मोर्चा लेना और साहित्य की पवित्र भूमि से बर्खास्तगी, यही तो मिलता है जनकवि को. पर रुकिए, उसे जनता का प्यार मिलता है. दिल्ली की बसों के चिढ़े-खिझलाये ड्राइवरों से लेकर बिहार के धधकते खेत-खलिहानों के खेत-मजूर तक उसे सर-आँखों पर रखते हैं. 

अब सवाल बचा लोकप्रियतावाद का. लोकप्रिय होना किसी कवि की कमजोरी नहीं, उसकी मजबूती है, अगर वह लोकप्रियता के लिए अपने ईमान का सौदा नहीं करता. अगर वह सत्य, जनता और अपने आप से दगाबाजी नहीं करता. नागार्जुन ने लोकप्रिय होने के लिए कोई समझौता नहीं किया. जब-जब उन्हें लगा क़ि जनता बदलाव के अपने रास्ते पर है, वे उसके साथ रहे- सीखते-सिखाते. 'जन-आन्दोलनों का इतिहास' नाम की किताब अगर आप लिखने की सोचें तो एकबार नागार्जुन के काव्य-संसार की ओर पलट कर देख लें. तेभागा-तेलंगाना से लेकर जे.पी. की सम्पूर्ण क्रान्ति तक और भगतसिंह से लेकर भोजपुर तक आप यहां दर्ज पायेंगें, और पायेंगे कितने ही स्थानीय प्रतिरोध, जिनको इतिहास की मुख्यधारा हमेशा ही भुला देती है. पर यह कोई अंध आन्दोलन भक्ति का सबब नहीं. आन्दोलनों का टूटना-बिखरना, उनकी कमी-कमजोरी, सब अपनी सम्पूर्णता में यहां मौजूद है. जे.पी. आन्दोलन पर क्रमशः लिखी कवितायेँ इसकी गवाही हैं- 'क्रान्ति सुगबुगाई है' से 'खिचड़ी विप्लव देखा हमने' तक. 

ध्यान रखिये, सिर्फ कवि ही आंदोलनों पर प्रभाव नहीं डालते, आन्दोलन भी उनपर असर छोड़ते हैं. केदार, त्रिलोचन और नागार्जुन, जो क़ि खेती-किसानी की जिन्दगी के कवि हैं, कवितायें वे पहले से ही लिख रहे थे पर सुधीजनों की नज़र उनपर तब पड़ी जब नक्सल आन्दोलन ने जमीन के सवाल को राजनीति के केंद्र में स्थापित कर दिया. सो कविता और जनांदोलन का यह गहरा द्वंद्वात्मक संबंध गौरतलब है.

जन-इतिहास की बातें बहुत इतिहासकारों ने कीं, लिखा भी पर आईये, नागार्जुन के शानदार कलम के मार्फ़त भारत के संक्षिप्ततम जन-इतिहास से रू ब रू हों-

पांच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूंखार
गोली खाकर एक मर गया, बाकी बच गए चार
चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश निकाला मिला एक को, बाकी बच गए तीन
तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच गए दो
दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया एक गद्दी से, बाकी बच गया एक
एक पूत भारतमाता का, कंधे पर था झंडा
पुलिस पकड़ कर जेल ले गई, बाकी बच गया अंडा !


बचपने की संख्याओं और गिनतियों के सम्मोहक संसार से बावस्ता कराती यह कविता कौतूहल और जिज्ञासा के हमारे आदिम मनोभाव से खेलती है, उसी को अपनी जमीन के बतौर इस्तेमाल करती है. यह खासा मुश्किल काम है किसी कवि के लिए क़ि वह लगभग प्रतीक में बदल गए रूप का इस्तेमाल नए कथ्य के लिए करे. यहां रूप का पारंपरिक अर्थ नए अर्थ पर भारी पड़ सकता है और कविता आतंरिक असंगति से गड़बड़ा सकतीहै. पर यही तो कवियों को लुभाता भी है. बचपने की लय और तुक में जन-इतिहास भरने की दिलचस्प ललक में नागार्जुन यहां हाज़िर हैं. इस लय में मौजूद कूतूहल और जिज्ञासा का इस्तेमाल करते और उसे आधुनिक इतिहास की समीक्षा के लिए बरतते हुए.

कविता भारतमाता के पांच बलिदानी, लड़ाकू सपूतों के संघर्ष से शुरू होती है. पहले दोनों को क्रमशः हत्या और देशनिकाला मिलता है. आजादी के लिए लड़ी पुरानी पीढ़ी को नागार्जुन अपनी इस कविता में गौरव से याद करते हैं. भगतसिंह जैसे ढेरों भारतमाता के बेटों को खूंखार दुश्मन के खिलाफ लड़ने के लिए फांसी और गोली ही मिली. लेकिन जो बाकी बचे, उनको तो उस शहादत का आधार बना हुआ मिला. उन्होंने क्या किया? नागार्जुन ने सीधे देश के विभाजन पर कुछ नहीं लिखा. क्यों नहीं लिखा, इस विषय पर विद्वानों के ढेरों कयास हैं. पर इस कविता की आंतरिक संगति को समझते हुए उस बेटे के बारे में, जो उधर अलग हो गया, पर बार-बार ख्याल अटकता है. क्या यह विभाजन के अलावा और कुछ है? क्या अलग होना और देश निकाला जैसी घटनाओं को विभाजन के दर्द से जोड़ा जा सकता है?

हालांकि अलगाव के दूसरे संदर्भ मसलन हिंदू-मुसलमान भी पाठ में मौजूद हैं. भारतमाता के बेटों ने कुर्बानी देकर, देशनिकाला झेलकर जो आधार तैयार किया, उसका फल क्या हुआ? एक बेटा अलग हो गया. संयुक्त परिवार के विघटन के मुहावरे में नागार्जुन बहु-सांस्कृतिक, बहुभाषी भारतीय समाज के बारे में दर्ज करते हैं कि जब तक साम्राज्यवादविरोधी  संघर्ष चला, तब तक सारे बेटे आपस में मिलकर लड़े. अनायास नहीं कि कविता जैसे-जैसे नागार्जुन के समकाल की तरफ बढ़ती है, बंटवारा और बढ़ता जाता है. अब बाकी बचे दो बेटे, जिन पर आजादी और लोकतंत्र की रखवाली का जिम्मा था, उनमें से एक गद्दी से चिपक गया. इसी गद्दी से चिपके बेटे के राज की पुलिस आखिरी बचे बेटे को पकड़कर जेल ले गई. सो कविता में लगातार दुख बढता जाता है और अंत में आंदोलनकारियों के दमन से एक अवसाद छा जाता है. शायद यही कारण रहा होगा, जिसके नाते नागार्जुन को आखिरकार इस दुःख को काव्य-युक्ति से संयत करना पड़ा- 'बाकी बच गया अंडा’. हिन्दुस्तान की 'जय हो' मार्का ज़म्हूरियत की यह विडम्बना बिनायक सेन और इरोम शर्मिला जैसे लोगों के ज़रिये आज हम बखूबी महसूस कर रहे हैं.

नागार्जुन की टक्कर सीधे कालिदास से है. 'मेघदूत' का जबरदस्त अनुवाद करने नागार्जुन बार-बार कालिदास की ओर मुड़ते हैं और बारहां उनसे सवाल-जवाब भी करते हैं. 'कालिदास, सच-सच बतलाना / इंदुमती के विरह शाप में/ अज रोया या तुम रोये थे'. मानो कालिदास से एक संगीपना है जिसमें मज़े-मज़े में ही दरियाफ्त की जा सकती है क़ि कविकुलगुरु, तुम्हारी रचनाओं के पीछे की असलियत से मैं काफी बेहतर तरीके से वाकिफ हूं. अब अनुभूति की ठोस परत जाल-ताल को चीरकर निकल आयी है. इसलिए कहो, अपनी वह व्यथा कहो, जिसने अज की व्यथा का रूप धरा था.

बहुत बाद के कवि नागार्जुन ने कालिदास को कवि की तरह परखा तो उसने देखा क़ि यह कवि तो दुःख से आप्लावित है. तन्वी श्यामाओं और लता गुल्मों के पीछे, शिकारी दुष्यंत द्वारा पीछा किये जाते, भय-कातर, ठहकते और गतिशील हिरन का बिम्ब है. कवि के आधुनिक मन ने इस व्यथा की थाह ली, कालिदास के कंधे पर हाथ रखा और कहा- सच कहो मित्र! तुम्हें हुआ क्या है? एक दूसरी कविता से इस सम्बन्ध की और थाह मिलेगी और एक ख़ास स्पर्धा की भी. वह कविता है- 'बादल को घिरते देखा है'.  'कहाँ गया धनपति कुबेर वह, कहाँ गयी उसकी वह अलका/ नहीं ठिकाना कालिदास के व्योमप्रवाही गंगाजल का/ जाने दो वह कविकल्पित था/ मैंने तो भीषण जाड़ों में नभचुम्बी कैलाश शीर्ष पर / महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है/ बादल को घिरते देखा है.' 

वह अद्भुत वैभव, जिसकी सृष्टि कालिदास करते हैं, उसकी तरफ तो नागार्जुन देखते भी नहीं. उनका रचा सब कुछ नागार्जुन को काम्य नहीं. काम्य है प्रकृति. प्रकृति का जो रूप कालिदास के यहां है, वह वैभवशाली होने के बावजूद उद्दीपन मात्र है. यही तो हमारे कवि को नहीं सुहाता. कविता में उसे नायक के भावों की ढोल बजाती, अनुचरी प्रकृति नहीं चाहिए, उसे चाहिए खांटी प्रकृति लीला. मनुष्य के जीवन के उतार-चढाव सब, जिससे अपने को जोड़ सकें. कहिये तो नायक बदल गए. न राजा-रानी रहे, न धीरोद्दात्त और धीर-ललित. अब 'मोतिया नेवले' की बारी है. कालिदास को शायद गर्व ही होता क़ि उनकी प्रकृति कितने जबरदस्त बहुला रूप में नागार्जुन के हाथों संवर-संवर उठती है. परम्परा ऐसे ही हाथों में सुगति प्राप्त करती है.

नाम के विघटन/विखंडन की कार्यवाही (?) से हम बारहा रू-ब-रू हो चुके. आपको याद ही होगा 'राम गोपाल' से 'पॉल गोमरा'. चालू फैशन के लिहाज़ से नाम को विघटित करने का तात्पर्य एक सत्ता को विघटित करना होगा, सो यहां 'राम गोपाल' की सत्ता का विघटन हुआ. पर इस विघटन की एक राजनीति है. इस राजनीति के मुताबिक़ विघटन का अर्थ हुआ- अमेरिका की अगुवाई में नई आर्थिक संरचना के लिहाज़ से राम गोपाल का आधुनिकीकरण. यह विघटन राम गोपाल के चरित्र में आ रहे पूंजीवादी हस्तक्षेप का आईना है.

यह वही प्रक्रिया है, जिसके अगले चरण में इंसान अपनी सारी जातीय/ सामाजिक पहचान खोकर अंकों में बदला जाएगा, नादकेणी साहब के कुशल हाथों जिसका लाभ अब हम अभागे भारतवासियों को भी हासिल होने वाला है. इस प्रक्रिया से अलग नाम के खंड-खंड करने की एक काव्यात्मक प्रक्रिया की साखी नागार्जुन की कविता से देखें- 'औघड़ मैथिल नाग जी अर्जुन यही उवाच'. यह  'अन्न पचीसी' की आख़िरी पंक्ति है. यहां विखंडन के साथ-साथ योग भी है. अब इस समूची प्रक्रिया/कार्यवाही से अर्थ बनता है- एक व्यक्ति जो स्थापित मानकों के खिलाफ है, मिथिला की अमराइयां, ताल-तलाव, लीचियां और धान जिसके मन को गढ़ते हैं, बौद्ध परम्परा से जिसका गहरा तादात्म्य है, जिसके भीतर आत्मसम्मान की कोई कमी नहीं और जो लक्ष्य पर तीखी निगाह रखता है. पंक्ति के पूरे गठन से व्यंग्य की समझ की ध्वनि अलग गूंजती है. मकसद यह क़ि इस एक पंक्ति की रणनीति-राजनीति एक मनुष्य और उसके बनाव-संभार को पूरी खूबसूरती से पकड़ती है. कहना न होगा क़ि यह रणनीति ऊपर इस्तेमाल की गयी रणनीति के खिलाफ पड़ती है.

जहां तक शिल्प का सवाल है, नागार्जुन सा शिल्प-बहुल कवि निराला के बाद शायद ही कोई हुआ. क्या तो लोकधुनें और क्या तो मध्यवर्गीय कस्बों में गूंजती फ़िल्मी धुनें, नागार्जुन का दखल हर जगह है. लय की जादूगरी देखनी हो, वाक्यों का घिस कर गोल होना देखना हो, खड़ी बोली का हिन्दी की दूसरी बोलियों में घुलना देखना हो, नागार्जुन से बेहतर गाइड आप खोजे न पायेंगें. ज़रा नज़ारा कीजिये 1953 के एक बाइस्कोप का- 'कांग्रेस के लीडर देखो/ उड़ते रंग के गीदड़ देखो/ बेदखली पर नजर न पड़ती/ सर्वोदय के प्लीडर देखो/ जयप्रकाश का अनशन देखो/ सोशलिज़्म का प्रहसन देखो/ दोमुंहिया ढुलमुल नेता के/ पहनावे का पटसन देखो'.

देखने वालों को दिखाने के लिए बुलाती यह कविता भी टी वी के आगमन के पहले उसके स्थानापन्न बाइस्कोप वाले सज्जनों की प्यार भरी बुलाहट की धुन पकड़ती है, और एक-एक पंक्ति में भारतीय राजनीति के अलग-अलग दृश्य पेश करती है. खट-खट, एक के बाद एक दृश्य नज़र से गुजरते हैं, उनमें एक काव्यात्मक संगति के साथ राजनैतिक संगति भी है. और यों बाइस्कोप वाला भारतीय अवाम को उसके रहनुमाओं के चाल, चेहरे और चरित्र से वाकिफ कराता है. कविता सधती है व्यंग्य से. देखने में यह भाव निहित है क़ि देख लो, फिर देख लेंगें.

अब ज़रा यहां गौर करें- 'बाँझ गाय बाभन को दान, हरगंगे!/ मन ही मन खुश है जजमान, हरगंगे! ...उसर बंज़र औ शमसान हरगंगे!/ संत बिनोवा पावें दान, हरगंगे!' पीछे हमारे बचपन में पंवरिया नाम की घुमंतू जाति के लोग आया करते थे. बड़े झोलदार कुरते और चौड़े पायंचे वाले पायजामे या धोती वाले. गा-नाच कर भिक्षा मांगते थे. उनकी खासमखास धुन थी- 'राम करैं तोरे लईका होय/ नांव धरावे हीरा लाल, हरगंगे!' सो अब देखिये क़ि यह छंद कहाँ से आया और बाबा ने किस तरह इसका मार्जन किया.

नागार्जुन की एक कविता है- 'पछाड़ दिया मेरे आस्तिक ने'. नागार्जुन अपने एक संगी रत्नाकर के साथ सूर्योदय देख रहे हैं, खुश दिल से वे सूर्य को अर्घ्य देते हैं, स्तुति गुनगुनाते हैं और कहते हैं क़ि आज अभी मेरे नास्तिक को मेरे आस्तिक ने पछाड़ दिया है. यह आस्तिकता क्या है? एक चौकन्ने कवि का शब्द, इसे धर्म से जोड़ने की बजाय अस्ति से जोड़ें. रूढ़ अर्थों में आस्तिक यहां नागार्जुन का अभिप्रेत नहीं. वरना यह नीलकंठों, भैंसों, शीशम की टहनियों, पीपल वृक्ष और सैकत चादर से लिपटा न होता. यह कर्मकांडी साईं बाबाओं और दुग्धपान रत गणेश से कई प्रकाश वर्ष दूर की अस्ति है. नदी से उगता हुआ शरद का बाल-रवि जो मनुष्य जाति के बालपने से कवि प्रिय बिम्ब है, उसकी अस्ति का स्वीकार.

यह प्रकृति के प्रति मानव का स्वीकार भाव है. बेहद आदिम. यह अस्ति प्रतिबद्धता की है, सौन्दर्य, जीवन और मनुष्य के प्रति. कहिये तो आदिम वृत्तियां वर्ग विभाजित समाज में गतिशील रहीं, विकृत होती रहीं और उससे लड़ती रहीं, यों विकसित भी होती रहीं. सपनों की एक अगली दुनिया में ही इन आदिम वृत्तियों के सही विकास का मौक़ा होगा. आप जब किसी नदी के किनारे अकेले बैठे हों, शांत, तब नदी आपसे एक बहनापा जोड़ती है. यह भाव ही नागार्जुन की इस कविता का मूल है, जिस तक पहुंचने के लिए उन्हें 'ॐ नमो सूर्याय' और अर्घ्य का रास्ता लेना पड़ता है. दूसरे नागार्जुन आदत से बाज़ नहीं आते और अपने जड़ प्रगतिशील मित्रों को थोड़ा चिढ़ा देते हैं.- यह सूर्य दर्शन और उससे संबंध अगर 'डेविएशन' है तो फिर मुझे थोड़ा डेविएट होने दें, आपके बीच पहुँच फिर कह दूंगा क़ि ऐसा कुछ न था.
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[ आलोचना के अलावा मृत्युंजय को कविता लिखने और संगीत गुनने से फुर्सत मिलती है तो अनुवाद भी करते हैं. लेकिन इन सबसे बढ़कर वे उन  सांस्कृतिक-राजनीतिक गतिविधियों में बराबर हिस्सेदारी करते रहे हैं जिनसे हमारा समय और समाज दो-चार है. उनका मृत्युबोध नाम से एक ब्लॉग भी है. ] 

10 comments:

चन्दन said...

"कवि पर कम कविता पर ज्यादा" कहने का यह तरीका अच्छा लगा. पढ़ते हुए यह एहसास लगातार बना रहा कि नागार्जुन कितने कितने आयामों के कवि हैं !!

Geet Chaturvedi said...

नागार्जुन अंतर्मुखी शास्त्रीय बोध से बहिर्मुखी विडम्बना बोध तक के यात्री रहे. इसीलिए उनका जन शास्त्र से विमुख नहीं दीखता. मृत्युंजय ने बहुत बारीकी से विश्लेषण किया है.

इलाहाबादी अडडा said...

नागार्जुन के बारे में अभी दर्जनों जगहों पर पढ़ा लेकिन कवि के साथ ही कविता पर ऐसा सुन्‍दर आलेख देखने को नहीं मिला। मृत्युंजय के साथ ही अनुराग को भी बधाई

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्दों में नेतृत्व की संभावना है।

आशुतोष कुमार said...

''यह आस्तिकता क्या है? एक चौकन्ने कवि का शब्द, इसे धर्म से जोड़ने की बजाय अस्ति से जोड़ें. .... वरना यह नीलकंठों, भैंसों, शीशम की टहनियों, पीपल वृक्ष और सैकत चादर से लिपटा न होता. यह कर्मकांडी साईं बाबाओं और दुग्धपान रत गणेश से कई प्रकाश वर्ष दूर की अस्ति है. नदी से उगता हुआ शरद का बाल-रवि जो मनुष्य जाति के बालपने से कवि प्रिय बिम्ब है, उसकी अस्ति का स्वीकार.'' ---महत्वपूर्ण अवलोकन .अचरज है की बाबा पर इतना लिखा गया , लेकिन सब से जरूरी और सरल बातें नहीं लिखी गयी... अंडे वाली कविता के महत्व को तुम ने ठीक पहिचाना है. सब से अछ्छा काम तुम ने यह किया की 'अकाल और उस के बाद' का ज़िक्र नहीं किया , क्योंकि उसे बाबा की दस्तखत- कविता जैसा कुछ बना कर बाबा को 'प्रगतिशीलों के बिहारी' जैसी किसी छवि में ठोंक दिया जाता है.

durga said...

जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं जनकवि हूँ मैं साफ़ कहूँगा क्यों हकलाऊं"अभी मृत्युंजय की एक कविता इरोम शर्मीला पर जनमत में छपी है इसके पहले कश्मीर पर एक कविता मृत्युंजय की छपी थी|ये बातें मैं इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि मैं एक सूत्र ढूंढना चाह रहा हूँ मृत्युंजय की इन कविताओं(जंतर मंतर और बीर बिनायक के साथ ) और उनके नागार्जुन पर लिखे इस लेख के बीच और वह यह है कि साफ़ कहने वाला एक युवा जनकवि नागार्जुन को ही याद करेगा|मृत्युंजय ने यह काम बड़ी शिद्दत से किया है जो विचार और भाषा दोनों में झलकता है|

ssiddhant said...

मृत्युंजय भाई के लेख के लिए शुक्रिया. आपने जो 'जनकवि' होने की बात कही है, उसमें कोई दो राय नहीं है, ये बात तो है कि 'जनकवि' ख़िताब का धारक होने के मानक कठिन होते हैं, लेकिन मेरी निग़ाह में नागार्जुन उन कसौटियों या मानकों के निर्धारक साबित होते हैं, न कि उनके अनुयायी. लोकप्रियता से जुड़ी जो पिटी-पिटाई धारणा है, उससे अलग हट लोकप्रिय होना एक असल क्रांतिकारी कवि की छवि होती है. हिन्दी में कुछ समय से उस परम्परा का बोलबाला है, जहाँ लोकप्रियता का सशक्त विरोध होता आया है (कारण = अस्पष्ट), और विरोध में ऐसे लोग खड़े होते आये हैं, जिन्हें दुर्भाग्यवश विद्वान समझा जाता रहा, ऐसे में जनता का साथ पाना और उस साथ के परिमाण से बड़े तन्त्र से लड़ पाना कोई छोटा काम नहीं है, हिन्दी में इस तरह के उदाहरण बड़े आम हैं. नागार्जुन की कविताओं में इतिहास अपने सबसे परिष्कृत रूप में मिलता है, जहाँ से भविष्य (चाहे वह जनान्दोलन का हो या कविता का) का अनुवाद करना सबसे बड़ी चुनौती है. नागार्जुन ने क्रांति के संदर्भ में जो कवितायें कहीं हैं, वे परिष्कृत हो, मातृभूमि का रूप लेती हैं. वे राजनीति नहीं लिखते हैं, बल्कि जो लिखते हैं वह राजनीति की दिशा और दशा को व्यक्त करता है. नागार्जुन ने जो कहा, वह कविता नहीं है, वह मिट्टी और धूल है, जिस पर पानी छिड़का जाए, तो वह सोंधी महक उठती है.

आशुतोष कुमार said...

क्या बात है सिद्धांत जी , बधाई.

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

नागार्जुन से बांधती यह पहली कड़ी है. इस लेख को पढ़ने के बाद उनके खातिर एक तरह की जिज्ञासा व श्रद्धा दिल में बस गयी. बढ़िया!

Mita Das said...

adbhut....lekh......nagarjun....sabhi ko priya hain....itani bareeki se vishaleshan....wahi kr sakta hai....jisame..nagarjun ji basate ho.....badhai...mrityunjay....