Friday, April 15, 2011

नए कवि सुशोभित सक्‍तावत की कविताएं


[सुशोभित की कविताएं एक आदिम भित्तिचित्र, एक शास्‍त्रीय कलाकृति और एक असंभव सिंफनी की मिश्रित आकांक्षा हैं. ये असंभव काग़ज़ों पर लिखी जाती होंगी- जैसे बारिश की बूंद पर शब्‍द लिख देने की कामना या बिना तारों वाले तानपूरे से आवाज़ पा लेने की उम्‍मीद. 'जो कुछ है' के भीतर रियाज़ करने की ग़ाफि़ल उम्‍मीदों के मुख़ालिफ़ ये अपने लिए 'जो नहीं हैं' की प्राप्ति को प्रस्‍थान करती हैं. पुरानियत इनका सिंगार है और नव्‍यता अभीष्‍ट. दो विरोधी तत्‍व मिलकर बहुधा रचनात्‍मक आगत का शगुन बनाते हैं. कम लिखने वाले, और उस लिखे को भी छुपा ले जाने की आदत वाले सुशोभित सक्‍तावत हिंदी में लोर्का के पत्रों का पुस्‍तकाकार अनुवाद कर चुके हैं. कविता के अलावा दुनिया के संगीत और सिनेमा में गहरी दिलचस्‍पी रखते हैं.] --गीत चतुर्वेदी 




एक असंभव समुद्र में नक्शों से लदी नाव की तरह

दोपहर के बाद दफ्तर अपनी दीवारें बदलता है
एक अधूरा पुल ढहता है और निशानदेही के साथ
काटे जाते हैं दिन के दरख्त
मैं एक गुलाबी रंग को गुलाबी रंग की तरह
पहचानने से इनकार करता हूं
आलपिनों से छिदे क्षितिज पर
टांगता हूं अपनी उतरी हुई परछाइयां
कुछ पुराने चरित्र
एक उपन्यास के भीतर
कुचलकर मर जाते हैं

ठीक वक्त पर सुबह किसी सायरन की तरह बजती है
मैं सायरन की चेतावनी का
समझाइश की शक्ल में
गलत तर्जुमा करता हूं
सांसों की खोह मुझे निगलती है सांप के पेट की तरह
और मैं अस्थियों का मुकुट पहने
डूबता रहता हूं

एक आवाज मेरी डेस्क पर आकर गिरती है
जिसे मैं हमेशा एक फासले से देखता हूं
भौंहों की धुंध के बीच औंधी पड़ी रहती हैं
संगीन चुप्पी की तश्तरियां
अंधेरे में उसके चश्मों के शीशे
उसकी आंखों से ज्यादा चमकते हैं
मैं उसे सोचता हूं और सोच के बीचोबीच
एक लकीर खिंच जाती है
उसे मैंने कभी एक असंभव समुद्र में
नक्शों से लदी नाव की तरह पहचाना था

एक गुंजाइश और एक ट्रेन मेरी आंखों से सामने से छूट जाती है
मैं पटरियों से उसके छूट जाने के निशान नहीं मिटाता
शल्कों और शैवालों से भरा एक दरिया मेरे भीतर से होकर गुजरता है
मैं वमन करता हूं विचार और निगलता हूं सीढिय़ां और सडक़ें
शहर के चौराहे पर ट्रैफिक महकमे का रंगरूट
एक नई गाली ईजाद करता है
और मैं उसे जरूरी चीजों के बीच
एक हिदायत और एक नुस्खे की तरह
नत्थी कर देता हूं

दुनिया के अंतिम पत्थर के पास
मुझे एक रक्तरंजित देवता का शव मिलता है
मैं उसके झुलसे हुए पंख देखता हूं और मेरी आंखें
झाडिय़ों में गेंद की तरह गुम जाती हैं
मैं उन्हें खोजता नहीं न शव की शिनाख्त करता हूं
इस दौरान अखबारों के रोजनामचों से हटाई जाती रहती हैं
खबरें और जरूर तफसीलें

मैं सीखता हूं रेंगना उन चींटियों से
जो जमीन के जख्म सीती हैं
और हमेशा चुप्पी साधे रहती हैं
अपनी इस हरकत
तक के बाबत।
****

ग्रीष्म                  एक चित्रलिपि

रंगों का जल              अचल।

अतल के                  दर्पण में
एक कौंध की परछाईं।
त्वचा की
ऋतु पर                   दीपती।

धूप                    के धागों की सीवन,
जहां उधड़ा था            आकाश
बांस की बर्छियों की
                             धार से

धूप                    दीठ है
दिनमान की।
देखना है उसका-
                          उजाला!

आग का         पका फल-
दाह के आलोक में
एक झुलसा हुआ-सा
                  सूनापन!

कुंए में गिरतीं पत्तियां       सांसें-
सांसों का यह सूत।

नदी का तीसरा तट          नावें-
जहां रक्त में      रुकी हुईं।

सांझ के कैनवास पर
पारदर्शी पिघलापन।
एक स्वप्न           का रेखांकन।

वृक्षों का एकांत-
पंक्तिबद्ध
अंतराल।

जल में आकांक्षा का ज्वार-
क्लांत           शिथिल
ताप की तृषा!

दीवार से सटा अहाता-
अनमना        उन्मन।
बरामदे में      बेंत की कुर्सियां।

रिक्तियों को भरता,
एक ठोस
खालीपन।

ऊंघता
         निदाघ!
****

तुम्हारी आंखों की सुरंग में बंद होता समुद्र

बारिश और बसंत के बीच स्थगित
एक अधूरे चुंबन और अस्फुट कराह को
रेलवे प्लेटफॉर्म की चिकनी सतह पर
भारी लगेज के नीचे कुचलाते सुनता हूं
और देखता हूं खुद को
एक खुलते चौराहे पर हाथ हिलाते
हवा के पारदर्शी गुंबद में

मैं तैरता हूं सफेद झाग वाली धूप में
डूबती-उतराती इच्छाओं के शंख,
सीपियां और घोंघे बीनते
समुद्र को चीरते चाकू की चमक में दाखिल होता हूं
एक सुरंग के भीतर भूमिगत नदी और
जुगनुओं की भिनभिनाती छतरी के ऐन नीचे
अलविदा कहता हूं तुम्हारी गंध तक को
एक पत्थर पर लिखता हूं विदा

भूरी नदी के देह में गड़ते पानी और
पिछले पतझर के गीले पत्तों-सी
कच्ची ईंटों वाली गंध के बीच
सुनते हुए प्यार की अंतिम प्रत्याशा
मैं तहस-नहस करता हूं
चंद्रमा की घंटियों की खनकती ध्वनि
नींद में देखता हूं बिना तारों वाला
एक तानपूरा बजता
और तुम्हारी आंखों की सुरंग में
बंद होता एक पूरे का पूरा समुद्र

बारिश पर लिखता हूं विदा
****


हमारे बीच बारिशों का परदा है

नीले कोहरे के लहराते परदों के दरमियान
सन्नाटों की सुई सरकती है

ठंडी दीवारों में जज्ब हो चुके हैं
बीते सारे दिन
रातों के गलियारों में
गहराता बैंजनी अंधेरा
तुम छूट जाती हो अधूरी अपनी देह में
मैं उठता हूं बार-बार नीमबेहोशी में
ढांपने तुम्हें अपने इतने अधूरेपन से

मैं ढूंढ रहा नींद का पत्थर
तुम पानी के पुल पे खड़ी हो
सोच और सन्नाटे के अंतराल में
हमारे बीच बारिेशों का परदा है
नशे में नीली पड़ रही है परछाइयों की देह
चुंबनों की चंपई गंध में
एक-दूसरे को खोजते हैं हम
पिछली कई सदियों से
और समय कहीं नहीं है

हमेशा नामुमकिन रहा है मेरे लिए
तुम्हारी सांसों के कोहरे से होकर गुजरना
मैं थम गया हूं
हम थम गए हैं
बीत रहे सदियों से
उडते धुंध में अभिशप्त
उठते हैं बार-बार
एक-दूसरे की ओर
जबकि जानते अपनी सरहद
छूट जाना है बाहर
इतने अधूरे आकाश में

लेकिन
मैं छीजता रहूंगा यूं ही ताजिंदगी
और तुम बिखरती रहोगी बारिश
और पानी की परछाईं में
टूटतीं रोशनी के कतरों-सी
हम बार-बार मरेंगे आधे-अधूरे
बीतते एक-दूसरे के बदन में
और गर्क होते हमेशा
किसी नाउम्मीदी के नुक्ते पर
मैं कुछ नहीं रह जाऊंगा सचमुच
अगर बेदखल हो गया कभी
हमारे अधूरेपन की इस जमीन से
****

मैं टहलूंगा तुम्हारे भीतर कोहरे की तरह

मैं डूब रहा एक उम्मीद की तरह
सांझ के दूरस्थ सीमांत पर
पेड़ों के हिलते हुए सिर
हवा के कंधों पर जा टिक हैं
छत पर मुंह फाड़े पड़ी हैं
सैटेलाइट की छतरियां
लाल आंख वाले वॉच टॉवर
के पीछे जा गिरी है
धूप की कटी पतंग
मैं धंसता हूं
अपने भीतर के
दर्रों में

तुम कहीं बैठीं मुस्कराती होंगी
सांस और सिरहन के बीच
तोड़तीं समय की सरहदें
गुम होतीं अपनी ही गंध के झुटपुटे में

मैं गर्क करूंगा हमारे अंतराल का यह अंधेरा
तुम सांझ की स्याही से लिख देना सुबह

पाटते सारे दर्रे रास्ते रूकावटें
मैं टहलूंगा तुम्हारे भीतर कोहरे की तरह
टटोलूंगा खामोश परदों में तुम्हारी परछाईं
जबकि शामें बुझती रहेंगी
उचटती रहेगी धूप
मैं तुम्हारी देह की नदी में उतरकर
छू लूंगा तुम्हारे किनारे

और तब
शायद इतनी नाउम्मीदी न होगी
न ऐसी टूटे छाजे-सी
जिंदगी
****

जो एक बारिश की बेवक्ती है

कनखियों से झांकता हुआ समंदर
अपने किनारों पर अधूरा छूट जाता है

सुबह के तट पर
वह समंदर
लहरों को ओढक़र
सुस्ताता

मैं जिसे एक प्यास के साथ याद रखता हूं

एक प्यास की याद
जो के एक बारिश की बेवक्ती है
और समंदर
जो गैरमुमकिन है
अपनी नींद में।
****

 
(सबद पर नए और महत्वपूर्ण कवियों की कविताएं लगातार प्रकाशित की जा रही है. कविताओं का चयन करने  में इधर की युवा कविता के दो सर्वाधिक चर्चित नाम : गीत चतुर्वेदी तथा व्योमेश शुक्ल ने भी वक़्त-वक़्त पर सहयोग किया है. सबद उनका आभारी है. सुशोभित सक्तावत की  कविताओं का चयन और नियोजन गीत चतुर्वेदी द्वारा किया गया है. कहना न होगा कि प्रत्येक चयन में अप्रकाशित कविताओं को ही जगह दी गई है. शीघ्र ही पंकज चतुर्वेदी की कविताओं  का एक चयन व्योमेश शुक्ल सबद के लिए करेंगे. गीत ने इससे पहले नीलेश रघुवंशी की कविताओं तथा व्योमेश ने शिरीष कुमार मौर्य की कविता का चयन किया था.
चित्रकृति- अलफ्रेड गोर्केल)

19 comments:

सिद्धान्त said...

सुशोभित की कवितायेँ समय और प्रकृति के साथ प्रेम और प्रलाप को केंद्र में रखकर जिस बेफ़िक्री के साथ खेल रहीं हैं, सुन्दर है. अपने अभीष्ट फल को पा लेने में सुशोभित बड़े कम हथियारों का प्रयोग कर, सफल रहे हैं. सुशोभित की कविताओं में नयापन जो मिला, वह यह कि यहाँ आवाज़ न सुनाई देती है और न बहती है...यहाँ आवाज़ गिरती है, वो भी एक डेस्क जैसे बे-आवाज़ माध्यम पर. समुद्र असंभव है, एक नाव के साथ जो नक्शों से लदी हुई है.....इस तरह की अपार अनिश्चितता कविता में बहुत कम देखने को मिलती है. यहाँ बारिश की पहली बूँद या पानी की झीनी चादर जैसे पिटे-पिटाए बिम्ब नहीं मिल रहे हैं, जबकि बारिश पर लिखने, पानी की परछाई मिलने और हवा का गुम्बद होने की परम्परा है. सुशोभित की कवितायेँ उन परिस्थितियों से जूझ रहीं है, जहाँ कविता के होने की सम्भावना इतनी कम हो जाती हैं कि वहां सिर्फ 'प्रकृति' को सीधे-सीधे लिखा जा सकता है. बहुत सारे नए कवियों की तरह नहीं, सुशोभित की कविताएँ अपनी पहचान की अनुपलब्धता को नहीं भुना रही हैं. चीज़ों को समझाने का जो नजरिया सुशोभित अपना रहे हैं, वह इतना धारा-प्रवाह है कि कविता कभी क्लिष्ट नहीं होती दीख रही है.
सुन्दर चयन, गीत भाई को धन्यवाद.

आवेश said...

सुशोभित की कविता जहाँ -तहां निर्मम नजर आती है ,लेकिन ये निर्ममता भी ऐसी है कि इसे स्वीकार करने को जी चाहता है ,या फिर ये कहें पलायन का कोई रास्ता ही नजर नहीं आता |उनके प्रेम में जितनी ईमानदार आत्म-विवेचना हैं (मैं गर्क करूंगा हमारे अंतराल का यह अंधेरा,तुम सांझ की स्याही से लिख देना सुबह)उतना ही संजीदा उनका समर्पण भी हैं (मैं सीखता हूं रेंगना उन चींटियों से,जो जमीन के जख्म सीती हैं,और हमेशा चुप्पी साधे रहती हैं)

ravindra vyas said...

sushobhit! aaj meri khushi ka thikana nahi! yakin karo anuragji aapne jo kiya uske liye mere paas shabd nahi!! aur geet pyaare tumhare liye kya kahoon yaar?

in kavitaon pe kuchh bhi kahne k liye thoda waqt chahiye!! main is waqt bahut bhavuk ho raha hoon!

tinon ko dher saari badhai!

डॉ .अनुराग said...

अद्भुत.......कवि अपने साथ कई विम्बो को लेकर चला है ....जो कही भी टाँगे हुए नहीं लगते....
मसलन.......
आलपिनों से छिदे क्षितिज पर
टांगता हूं अपनी उतरी हुई परछाइयां
कुछ पुराने चरित्र
एक उपन्यास के भीतर
कुचलकर मर जाते हैं

कवि थोडा विद्रोही प्रतीत होता है पर कविता की लय नहीं खोता
मैं ढूंढ रहा नींद का पत्थर
तुम पानी के पुल पे खड़ी हो
सोच और सन्नाटे के अंतराल में
हमारे बीच बारिेशों का परदा है

सुभान अल्लाह !

अमूमन कविताओं में नज़्म सी नरमी नहीं मिलती..कवि उसे तोड़ता है मसलन.....
तुम कहीं बैठीं मुस्कराती होंगी
सांस और सिरहन के बीच
तोड़तीं समय की सरहदें
गुम होतीं अपनी ही गंध के झुटपुटे में

मैं गर्क करूंगा हमारे अंतराल का यह अंधेरा
तुम सांझ की स्याही से लिख देना सुबह

मीनाक्षी said...

मैं सीखता हूं रेंगना उन चींटियों से
जो जमीन के जख्म सीती हैं//

और तुम्हारी आंखों की सुरंग में
बंद होता एक पूरे का पूरा समुद्र//

मैं कुछ नहीं रह जाऊंगा सचमुच
अगर बेदखल हो गया कभी
हमारे अधूरेपन की इस जमीन से//

मैं टहलूंगा तुम्हारे भीतर कोहरे की तरह
टटोलूंगा खामोश परदों में तुम्हारी परछाईं//

सबद के इस लोक में शब्द और उनमें छिपे भाव अपनी खूबसूरती से मन मोह गए...

kirti said...

सुशोभित का यह कवि रूप उसी तरह चौकाने वाला है जैसे अधेरे मे छुपे बच्चे को पीछे से आकर कोई दूसरा बच्चा "थप्प" कर दे. अखबार के दफ्तर और हमारे आसपास बिखरे शब्दो को सहेज कर सुशोभित ने एक तरह से आधुनिक चित्र ही उकेर दिए है. गीत जी को बधाई कविताओ के चयन के लिए और उन्होने जो लिखा है वह सोने पर सुहागा समान ही है. उन्हें और "सबद परिवार" को भी बधाई जो "कवि सुशोभित" से परिचय कराया.

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर कवितायें, सब की सब।

Aparna Manoj Bhatnagar said...

सुशोभित की कविताएँ बहुत सुन्दर हैं . उनका शिल्प और नए बिम्ब आकर्षित करते हैं . क्या कवि से संपर्क हेतु उनका email पता मिल सकता है ..
आभार !

love verma said...

sushobhit maza aa gaya yaar, badhai

geet ji ka bhi bahut abhar tumhari kavitaye post karne ke hetu

शिरीष कुमार मौर्य said...

गीत लाया है सुशोभित की कविता, ये देखना भी कविता पढ्ने जैसा ही सुखद लगा. गीत की पकड और समझ निर्विवादित रूप से हमारे दोस्तो मे सबसे तेज़ है और इसे वो बहुत अच्छे से लगातार सिद्ध करता आ रहा है.

सुशोभित को अभी बहुत सारी बधाई और आगे लम्बे और खुले रचनात्मक जीवन के लिये शुभ्कामनाये.

अनुराग बहुत दिन से नेट कनेक्शन नही था मेरे पास इसलिये कटा कटा सा था.....कभी कभार कैफ़े मे जाकर अनुनाद पर कोइ पोस्ट लगा आता था...बस....अब जुडा हू तो ये पोस्ट देख कर बहुत अच्छा लगा...आभार ये खुशी देने के लिये.....जैसे कि कई कवियो पर लिखने का सन्कल्प किया है...अब सुशोभित पर भी कर रहा हू....

shabd said...

sushobhit ki kavitaon me tazgi hai. shabdchitra ankhon ke aage tairne lagte hain. badhai.
R C Yadava
Editor SHABD
C-1104 Indiranagar, Lucknow

dhirendra said...

pyare sushobhit ki pyari kavitayen...

ek nai soch, ek naya ujala, ek nai oorja... kuch panktiyon mae ye sab muhaiyya karane wale vicharon ko pranam. shubhkamnayen...

dhirendra.

Amrita Tanmay said...

Sushobhit jee ki kavita bhavon ka ek alag bimb bikherta hai.unke saath shabdo ki naiya par savari karna ek alag anubhuti pradan kar raha hai..aapko hardik dhanyvad unki kavita ka aasvadan karane ke liye.

आशीष said...

Bhai tumhara ye rup dekhkar bahut acha laga...

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

"लाल आंख वाले वॉच टॉवर
के पीछे जा गिरी है
धूप की कटी पतंग"
कितना दूर ले गयीं ये पंक्तियाँ !!

sarita sharma said...

बोलते चित्र और चित्रात्मक कवितायेँ सुशोभित की खासियत है. सांयकाल, असहज रिश्ते,खालीपन,देह के संवाद, बारिश और रसमंदर किनारे प्यास के बिम्बों से युक्त, मनोभूमि को दर्शाती अद्भुत कवितायेँ.

बाबुषा said...

कैमरे से लिखी कविताएँ खूब पढ़ीं इन मोहतरम की.
घुंघराले बालों में कितना कुछ छुपा रक्खा है ?
इनके बाल और घुंघराले हों. खूब तरक्क़ी करें सुशोभित. दुआ.

Anju said...

मैं वमन करता हूं विचार और निगलता हूं सीढिय़ां और सडक़ें.....

[ कच्ची ईंटों वाली गंध के बीच -बारिश पर लिखता हूं विदा ]


{बारिेशों का परदा..
खोजते हैं हम
पिछली कई सदियों से
और समय कहीं नहीं है....

मैं छीजता रहूंगा यूं ही ताजिंदगी
और तुम बिखरती रहोगी बारिश...
गर्क होते हमेशा
किसी नाउम्मीदी के नुक्ते पर
मैं कुछ नहीं रह जाऊंगा सचमुच
अगर बेदखल हो गया कभी
हमारे अधूरेपन की इस जमीन से...अह्ह्ह! }


{तुम कहीं बैठीं मुस्कराती होंगी
........
गुम होतीं अपनी ही गंध के झुटपुटे में

मैं गर्क करूंगा हमारे अंतराल का यह अंधेरा
तुम सांझ की स्याही से लिख देना सुबह ..}
}

{कनखियों से झांकता समंदर ...
छूटता किनारों पर अधूरा सा
मैं जिसे एक प्यास के साथ याद रखता हूं...}


अहा ! मखमली दूब पर ठहरी ओस में सुबह का नंगे पाँव चलना .....अद्भुत दृश्यावली ....!!!
sweet basil .....
सु-शोभित ...निस्संदेह ...

Anonymous said...

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