Friday, April 29, 2011

कला का आलोक : २ : अखिलेश


[ख्यातनाम चित्रकार अखिलेश के साथ पीयूष दईया की बातचीत के असमाप्य सिलसिले की एक नवीनतम कड़ी को हमें सबद पर शाया करते हुए प्रसन्नता हो रही है. अखिलेश के साथ पीयूष की बातचीत का एक बड़ा हिस्सा पुस्तकाकार 'संवाद' नाम से राजकमल प्रकाशन से आया है. पुस्तक से आगे की यह बातचीत एक चित्रकार के मनोजगत और उनकी संगत करने वाली जागरूक मनीषा का भी हमें परिचय देती है. पीयूष की ऐसी कला-वार्ता हमने इससे पूर्व भी कला का आलोक स्तंभ के तहत प्रकाशित की थी. तब सम्मुख थे : हकु शाह. इस बातचीत में शामिल की गई चित्र-कृतियाँ स्वयं अखिलेश की हैं. उन्हें इस प्रस्तुति के साथ देने के लिए हम अखिलेश के आभारी हैं.]


दरअसल रूप, एक रंग अनुभव है 
{अखिलेश के साथ पीयूष दईया की बातचीत}
1.
चित्र बनाना मेरे लिए लुकाछिपी का खेल है। लुकाछिपी में हमेशा खोजने और पाने का सिलसिला जारी रहता है। अक्सर मैं खो जाता हूं फिर खुद को मिल जाता हूं। अक्सर कोई एक रंग खो जाता है, कोई एक रूप खो जाता है। कोई एक रेखा खो जाती है। फिर अचानक मिल जाती है। मैं आनन्दित हो उस के साथ खेलना शुरू कर देता हूं। यह एक अन्तहीन प्रक्रिया की तरह चलने वाला खेल है। मैं लगातार खेलता-खोता-खोजता-पाता रहता हूं। मेरे लिए खेल के नियम कभी तय नहीं होते हैं। नियम कभी तय नहीं ही किये जा सकते हैं। जो नियम मैं एक चित्र पर लागू करता हूं उसी नियम से मेरा दूसरा चित्र नहीं बनता है। बहुत बदलाव आ जाते हैं।

इन बदलावों का एक बड़ा कारण यह भी होता है कि अभी तक के मेरे चित्र बनाने के अनुभव में एक और चित्र जुड़ जाता है। पहले तक के सारे नियम छिन्न भिन्न हो जाते हैं। एक नया चित्र बनाना शुरू करते समय वैसा ही निहत्था होता हूं जैसा कुछ समय पहले उस चित्र के पहले के चित्र बनाते वक़्त था। निहत्थे हो कर ही अपने कैनवास का सामना करता हूं। मुझे ख़ुद नहीं पता होता है कि इस बार खेल के नियम क्या होंगे। इतना भर पता रहता है कि मैं फिर से खेलने जा रहा हूं। हमेशा इसी अनजान का भय सन्देह से भर देता है। घालमेल कर देता है कि पता नहीं इस बार क्या होने वाला है, इस बार क्या मिलने वाला है, इस बार कहां खोने वाला हूं, इस बार ऐसी कौन सी चीज़ होने वाली है जो इस से पहले नहीं अनुभव कर सका हूं। यह सारी चीज़ें कला को एक ऐसी शक्ति प्रदान करती है जिस में बहुत सारी चीज़ों के आने न आने से फ़र्क़ नहीं पड़ता है। कला अपनी गति से, अपनी मजबूती से चलती रहती है।

Akhilesh in his studio, Bhopal.
ऐसे तमाम सारे काम इस दुनिया में होते रहते हैं जो पहले दूसरों ने नहीं किये थे। चित्रकला में वे अचानक हुए काम की तरह नज़र आते हैं। गायतोण्डे अपने चित्रों के लिए कहते हैं कि उन के चित्रों में परिवर्तन अचानक आते हैं। मेरे काम में जिन्हें परिवर्तन की तरह देखा जा रहा है वह दरअसल खेल के नये नियम निर्धारित होने के कारण आये परिवर्तन हैं। उसे परिष्कार नहीं कहना चाहिए। परिष्कार मनजीत बावा के सन्दर्भ में ज़रूर याद आ सकता है। उन के पहले के और बाद के चित्रों में एक तरह का परिष्कार नज़र आता है। परिष्कार में बहुत सारी चीज़ें बदली सी नज़र आती है। मेरे चित्रों में यह खेल के नियमों में हुए परिवर्तनों के कारण आए परिवर्तन हैं। चित्र बनाने की मेरी अपनी प्रकृति है। किसी एक खास शैली में बंध कर काम करने के बजाय मैं चित्र बनाना पसन्द करता हूं।
स्वामीनाथन ने कहा है कि ’’पिक्चर मेकिंग’’ और चित्र बनाने में बड़ा फ़र्क़ है। बहुत कम चित्रकार इस बात को समझ पाते हैं। ज़्यादातर समय वे ’’पिक्चर मेकिंग’’ में संलग्न चित्रकार की तरह नज़र आते हैं। एक खास तरह का ढंग अख्तियार किया हुआ है जिस में सब कुछ तय है। कोई उलझन नहीं है। खेल के नियम भी तय है। एक ही तरह से चित्र में आगे बढ़ना है, एक ही तरह से ख़त्म करना है। यह निश्चित ही उन के कई सालों के परिश्रम से पैदा किया हुआ नियम होता है। इस नियम पर उन्होंने बहुत मेहनत की होती है; अपने जीवन के अनेकों साल लगाये होते हैं एक तरह की शैली को विकसित करने में। लेकिन फिर भयभीत हो उसी को पकड़ कर बैठे रहते हैं जिसे स्वामीनाथन पिक्चर मेकिंग कह रहे हैं। चित्र बनाने के नित नये जोखिम हैं। कैनवास के समक्ष हर बार अपने को ख़ारिज कर फिर से नयी शुरुआत के लिए खड़ा होना मुझे अच्छा लगता है। जिसमें आप की अपनी कोई शैली नहीं होती है, किन्तु चित्रों की एक शैली अपने आप बनती दिखाई देती है। जिसे गायतोण्डे परिवर्तन कह रहे हैं वे चित्रकला में हुए उन एक्सीडेंट्स की तरफ़ इशारा हो सकता है जिस के बारे में किसी चित्रकार ने सोचा नहीं होता है। वह अचानक घटित होता है। कैनवास पर उन रंगों, उन रूपाकारों, उन रेखाओं के साथ जिस की चाहना चित्रकार को नहीं है, किन्तु जिस का होना वहां पर एक संयोग है। ऐसे परिवर्तन को होते समय पहचान कर पकड़ लेना अक्सर मुश्किल होता है।
बहुत ही कम ऐसे चित्रकार हैं जिन्होंने इस तरह की आकस्मिकताओं को अपनी चित्र शैली बनाने में सफलता हासिल की हो। अम्बादास उन में से एक हैं। वे चित्रफलक पर हुए आकस्मिक संयोग को विशेषज्ञ की तरह बरतने लगते हैं। यह अचानक होना दिखाई तब देता है जब दरअसल कैनवास पर घटित हुआ है। इस अचानक होने के पीछे भी एक लम्बी प्रक्रिया रहती है। इस प्रक्रिया को घटित होते वक्त देखा व महसूस नहीं किया जा सकता। इस तरह की आकस्मिकता अकसर चित्रों के लिए महत्वपूर्ण होती है। और यह आकस्मिकता एक लम्बी तैयारी की तरह भी होती है। लियोनार्दो ने कहा है Every great work of art is spontaneous. यह सहजता क्या है? यह सहजता सिर्फ़ कुछ रंगों के बीच होने वाली एक घटना भर नहीं है। यह अनायास होना एक मूड भी है, एक समय भी है, एक अवकाश की भी है: इन सभी का एक साथ मिलना भी है। इन सारी चीज़ों के एक साथ होने पर ऐसा कुछ होता है जो हमें आश्चर्यचकित कर जाता है, जिस की हम ने कल्पना नहीं की होती है। यही जिसे अपनी कल्पना में नहीं ला सके हैं अचानक की तरह प्रकट होता है।
किन्तु क्या यह अचानक है? अम्बादास के चित्रों को देखें। अम्बादास ने इस अनायास होने को इतने कस के पकड़ लिया कि वह उन की शैली की तरह नज़र आता है। इस से निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह अचानक होना दरअसल कुछ है नहीं, वह एक सतत प्रक्रिया से उत्पन्न घटना है जिसे चाहे तो पकड़ सकते हैं। अक्सर ऐसा होता नहीं है। जब ऐसा नहीं होता है तब वह परिवर्तन की तरह गायतोण्डे के चित्र में नज़र आता है और अम्बादास के चित्रों में एक्सीडेंट की तरह नज़र आना बन्द हो जाता है। अम्बादास ने एक अत्यन्त साधारण होने वाली घटना को अपने चित्रों में स्थान दिया। उस पर उन्होंने काम किया। विशेषज्ञता हासिल कर ली। घासलेट से फटने वाले पिगमेंट उन के चित्रों में अब अचानक होने वाली घटना की तरह नहीं दिखाई देते हैं बल्कि वे एक चित्र अनुभव की तरह नज़र आते है। अचानक होने का यह फ़र्क़ दरअसल निरन्तर हो रही प्रक्रिया से पैदा होने वाला प्रभाव है। कैनवास पर दिखाई देता है।

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2.

मैं बहुत ही धीमी गति से चित्र बनाता रहा हूं। चित्र बनाते समय प्रदर्शनी का खयाल नहीं आता। मेरी आदत है मैं रोज़ ही अपने स्टूडियो में होता हूं: चित्र बना रहा होता हूं या कुछ लिख पढ़ रहा होता हूं। ज़्यादातर कविताएं पढ़ता हूं या उपन्यास, यदि चित्र नहीं बना रहा हूं तो। नये चित्र भी मेरे पुराने चित्रों की निरन्तरता व विस्तार में ही बने हैं। इसमें किसी तरह से नयी ज़मीन तोड़ना नहीं है। मैंने अपने को पुनराविष्कृत भी नहीं किया है। मेरे चित्र मेरे देखने का विस्तार हैं। हर नये चित्र के पीछे पिछले चित्रों का अनुभव काम कर रहा होता है। अपने चित्रों के सन्दर्भ में कुछ नया या नयी ज़मीन तोड़ना कहना मुझे एक दावे सा जान पड़ता है। कला के दावे खोखले सिद्ध हैं। हो सकता है चित्रकार अपने नये ढंग से देखने को प्रस्तावित कर रहा हो। सभी चित्रकार कुछ नया ढूंढ रहे होते हैं। अपने नैरन्तर्य में नये सिरे से खुद को ढूंढना जारी रखते हैं।
एक चित्रकार अपने चित्रों के माध्यम से खुद के देखने के ढंग का प्रस्ताव रखता है। चाक्षुकता ही चित्रकार की भाषा है। स्वामीनाथन ने इसे गुणात्मक बोध की भाषा कहा है। यह गुणात्मक बोध एक अनूठी प्रक्रिया है। व्यक्ति को किसी तरह के प्रमाण या तुलना में लाने के बजाय विस्तार में ले जाने का प्रयास है। दर्शक एक चित्र देख कर अपने कल्पना-लोक के आनन्द में जा सकता है। यह देखने की क्षमता पर निर्भर करता है। एक  visually illiterate के लिए रंगों की भाषा समझ पाना मुश्किल होगा। अनपढ़ को प्रौढावस्था में भी साक्षर बनाया जा सकता है लेकिन एक चाक्षुक रूप से असाक्षर को नहीं। एक चित्र के द्वारा चित्रकार चाक्षुक प्रस्ताव ही रखता है। देखने के स्तर पर महसूस किया जा सकता है।
प्रभाकर बर्वे के लिए रूप वह लंगर है जिस पर उन की चित्र भाषा टिकी हुई है और मेरा लंगर रंगों में है। मैं अपनी चित्र-भाषा में रंगों को स्थान देता हूं। रूपाकार उन रंगों से भी आ जाते हैं। रूप मेरी पहुंच का ना कभी विषय रहा न प्रयास। ऐसा कभी नहीं लगा कि कुछ रूप गढ़ा जाय। अपने चित्रों के बारे में मैंने रंगों के माध्यम से ही सोचा है। मुझे हमेशा रंग ही दिखते हैं, कभी भी रूप नहीं दिखे। मेरे चित्रों में जो कुछ भी प्रस्तावित है उस का नाभिनाल सम्बन्ध रंगों से है। रंग मेरी स्मृति के रंग हैं, मेरे देखे हुए हैं। हम रंग-अनुभव हर क्षण करते हैं। रंगानुभव हर क्षण बदल रहा होता है। हर बार सूर्यास्त का अनुभव अलग रंग का होगा। अनुभव मन में कितनी गहरी छाप छोड़ता है यह देखने पर निर्भर करता है। किसी एक रंग को महसूस करना, किसी एक रंग को देख पाना सब से मुश्किल काम है। अमूमन हम रंगों के द्वारा दुनिया को देखने की कोशिश नहीं करते बल्कि रंगों के प्रति उदासीन रहते हुए अपना जीवन जी रहे होते हैं। जीवन में रंग हैं लेकिन हम रंगों से बचते रहते हैं।
मसलन, अपने पहनने के कपड़े हों या अपने द्वारा खरीदी जाने वाली कई आवश्यक सामग्री या अन्य चीजें, सब में हम रंगों का चुनाव कुछ ऐसा रखते है कि हमारा भय सामने आता है। मैं हमेशा चकित होता हूं--कोई व्यक्ति रंग से कैसे भयभीत हो सकता है? प्रकृति में मनुष्य के इर्द गिर्द इतना विशाल रंग संसार बिखरा हुआ है लेकिन वह सब से उदासीन रंगहीन जि़ंदगी में मशगूल है। रंगों से डरते हुए एक ग्रे जि़ंदगी बिता रहा है।
मेरे चित्रों का नाभिनाल सम्बन्ध हमेशा रंगों से है।

Blue can turn more Blue - Acrylic on Canvas - !00X100 cms - 2009


3.
मेरे चित्रों में कला की गोपन मांग रंग है। मेरे चित्रों को रंग, रूप देता है। रंग का विस्तार ही रूप का विस्तार है। दरअसल, रूप एक रंग अनुभव है। एक काली लड़की देख कर मन में सुन्दरता का भाव रंग से पैदा होता है। हर लड़की में आकर्षण रंग से (भी) है। किसी चीज़ की तरफ़ देखने पर सब से पहले रंग आकर्षित करता है। रंग विस्तार में वस्तु के साथ सम्बन्ध चेष्टा है। सब से पहले हम रंग के द्वारा किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति आकर्षित होते हैं। मेरे चित्रों में दर्शक को रंग आकर्षित करता है और वह रंग के विस्तार में उन रूपों को पा सकता है जो मेरे चित्रों में रंगों से पैदा हुए हैं। इन रूपों ने कई बार मुझे चकित/हतप्रभ किया है: क्या ऐसा सम्भव था जो मैंने देखा, जो मैं कर रहा था?
फ्रेंक स्टेला की तरह हर चित्रकार की अपनी व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। इन समस्याओं को चित्रकला मात्र पर लागू नहीं किया जा सकता। फ्रेंक स्टेला की पहली समस्या यह जानना रहा कि चित्र क्या है और दूसरी समस्या चित्र कैसे बनाया जाय से सम्बन्धित है। यह उन की व्यक्तिगत समस्याएं हैं। पिकासो के लिए मसला भिन्न था। उनका कहना था-- I don’t seek, I find.  पिकासो के लिए चित्र खुद-ब-खुद उद्घाटित हो रहा है। एक चित्रकार का दूसरे से यह फ़र्क़ महत्वपूर्ण है। यह फ़र्क चित्रकार के देखने व उस की अनुभूति में फ़र्क़ पैदा कर रहा होता है। फ्रैंक स्टेला का कहना अपनी जगह ठीक हो सकता है। चित्र कैसे बनाया जाय की समस्या सबसे बड़ी समस्या है।
स्वामीनाथन ने ’’पेंटिंग’’ और ’’पिक्चर मेकिंग’’ में फ़र्क़ किया है। ’’पिक्चर मेकिंग’’ सभी लोग कर सकते हैं लेकिन ’’पेंटिंग’’ करना कम लोगों के बस का है। चित्र कैसे बनाया जाय के बारे में कभी एकमत नहीं हुआ जा सकता। कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती। कोई भी दो चित्रकार एक रास्ते से उस तक नहीं पहुंच सकते। स्टेला के चित्र अपने में बड़े ख़ूबसूरत चित्र हैं। स्टेला के चित्रों में उलझन नज़र नहीं आती। they are finest work, actually.  उन के चित्र देख कर पता चलता है कि वे जानते थे कि चित्र क्या है और कैसे बनाया जाय। सीखने और निर्मित करने की विभाजक रेखा उन के चित्रों में नज़र नहीं आती। वे लगभग निर्मित करते हुए सीखते हैं। ऐसा कुछ नज़र नहीं आता जिस में उन्हें कुछ सीखना बाक़ी बचा हो, ऐसा कुछ जो उन की निर्मिति में नहीं आया हो।
चित्ररत रहते हुए कोई चित्र कैसे बढ़त लेता है? मेरे लिए हमेशा लगाये गये रंगों के माध्यम से संकेत प्राप्त होते हैं। एक रंग लगाने के दौरान ही मुझे यह अंदाज़ा होता है कि अब दूसरा रंग कौन सा लगाना होगा। जब भी मैंने इस intuition से संचरित न हो कर अपनी मर्जी़ से कोई दूसरा रंग लगाने की कोशिश की तब मैं निष्फल रहा।
When It will turn Mauve ? - Acrylic on Canvas -100X100 cms - 2009


4.
कल्पना तक एक चित्रकार कैसे पहुंचता है? कैसे कल्पनाएं जन्म लेती हैं और चित्रकार उन में संगति ढ़ूंढते-खोजते हुए एक नया रूप कैनवास पर पाता है? कलाकृति एक धोखा है का मतलब वही है जब कोई मेरे चित्रों के बारे में यह कह रहा है -- it’s hard to locate your work.  कि दर्शक मेरे चित्रों का केन्द्र नहीं पा रहा है या वह उन्हें एक ऐसी परिभाषा में डालने में सक्षम नहीं हो पा रहा है जिस से चित्र सभी के लिए उपलब्ध हो जाय। एक कलाकृति हमेशा दर्शक से यह आग्रह करती है कि वह किसी एक तरह के देखने पर भरोसा ना कर अपने दिल और दिमाग़ को खुला रखे; उन सारी सम्भावनाओं तक भी उतनी ही आसानी से पहुंच सके जितनी सहजता से एक चित्रकार पहुंचता है। कला आलोचक का चित्रकार के काम को locate करने की कोशिश करना चित्र को एक परिभाषा में बांधने की कोशिश करना है।
चित्रकला के बारे में किसी दूसरे माध्यम -- भाषा के माध्यम -- में लिखना कुछ संकेत, कुछ प्रमाण पहले से बना कर उस पर आगे बढ़ने की चेष्टा करना है। भाषा के माध्यम में कला आलोचना ऐसे नहीं भटक सकती जैसे चित्रकला भटकती रहती है। वह अपने को ऐसे नहीं बरत सकती जैसे चित्र में रंग अपने को बरत लेते हैं। चित्रकार के केन्द्र को ढूंढ पाना या रेखांकित करना हमेशा एक मुश्किल काम है। स्वामीनाथन का यह कहना कि An image has more meaning than you can pour into it वही बात है जिस में एक मनुष्य की सीमा का जि़क्र है। चित्रकार के लिए इमेज एक ही तरह का अर्थ हो सकती है लेकिन उस इमेज से/के कई अर्थ दर्शक अपने ढंग से निकाल सकते हैं।
स्वामीनाथन इस बात को नहीं मानते थे कि किसी इमेज का कोई एक अर्थ है। उन का कहना था कि चित्र में इमेज अपने अर्थ से मुक्ति पा लेती है। बल्कि संकेत अपने अर्थ से मुक्ति पा कर प्रतीक बन जाते हैं। यह संकेतों का प्रतीक बनना चित्र का एक ऐसी सत्ता में रूपान्तरण है जिस के अनेक अर्थ हैं। यह अर्थ आस्था पर टिके हैं। आस्था व्यक्ति सापेक्ष है। एक इमेज के कैनवास पर सार्थकता प्राप्त कर लेते ही उस के कई अर्थ पैदा हो जाते हैं। वह उस अर्थ से परे चली जाती है जो चित्रकार ने स्वयं सोचा है।
यही वह जगह है जहां  कलाकृति एक धोखा है। एक व्यक्ति का अनुभव है, कुछ अनुभूतियां हैं: वह कल्पना में प्रवेश करता है। चित्र बनाता है। चित्र से कई कल्पनाओं का जन्म हो सकता है। इस अर्थ में एक कलाकृति हमेशा एक धोखा रहेगी। कलाकृति की एक सीमित व्याख्या हो सकती है। कला आलोचक या अध्येता अपने देखने की सीमा में ही देखने की कोशिश कर सकता है। उस से आगे जाने का कोई रास्ता नहीं है। कला आलोचक कलाकृति के उन सारे अर्थो को नहीं खोल सकता है जिन सारे अर्थो को वह कलाकृति छिपाये हो सकती है। वह अपने से पहले और बाद की परिस्थितियों पर बात नहीं कर सकता है न उन सन्दर्भो में सोच सकता है। कलाकृति के बारे में दर्शक अपने सन्दर्भ में सोचेगा, अपने समय के सन्दर्भ में सोचेगा। यहां मनुष्य की अपनी सीमित सीमा का ध्यान रखने की ज़रूरत है। यह कलाकृति की सीमा नहीं है। कलाकृति अनन्त आकाश में है जहां उस के कई अर्थ आने वाली पीढि़यों में भी देखे जा सकते हैं। वान गॉग के चित्रों के कई अर्थ या लियोनार्दो दा विंची की चित्रकृति ’’मोनालिसा’’ के कई अर्थ आज तक लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। बीते पांच सौ सालों में ’’मोनालिसा’’ पर लगातार लिखा गया है और इस चित्रकृति के अनेकानेक अर्थ ढूंढ-खोज लिये गये हैं। यह सारी सम्भावनाएं ’’मोनालिसा’’ चित्र में ही है। चित्र के अनन्त अर्थ हैं।
5.
अपने एक पत्र में अज्ञेय कहते हैं: ’’जीवनानुभव का जो पक्ष तर्कातीत है उसी में से कठिनतर समस्याएं पैदा होती हैं और केन्द्रीय प्रश्न यह है कि किसी भी संस्कृति में इस तर्कातीत का क्या स्थान है?’’ दरअसल, तर्कातीत में से कठिनतर समस्याएं इसीलिए पैदा हो रही हैं कि वे तर्कातीत हैं। तर्क कर कठिन से कठिन समस्या को सुलझाने की कोशिश कर सकते हैं। तर्कातीत अनुभव है। अनुभव की परिणति अनुभूति में नज़र आती है। अनुभूति कलाकृति के रूप में सामने दिखाई देती है। अनुभूति को वापस कैसे तर्क में ले आएं? वह पहले से एक इतनी लम्बी प्रक्रिया से छन कर गुज़री है। पहले अनुभव के स्तर पर, फिर अनुभूति के स्तर पर। एक संस्कृति में तर्कातीत का क्या स्थान है?
इस केन्द्रीय प्रश्न से क्या अज्ञेय कभी जूझे है? या उन्होंने सिर्फ़ इस की तरफ़ इशारा किया है? अज्ञेय ने यह महसूस किया कि तर्कातीत में से कठिनतर समस्याएं पैदा हो रही हैं। यह रचने की समस्याएं हैं। एक कलाकार की अपनी समस्याएं हैं जिन से वह उलझता जूझता और अकसर हारता नज़र आता है। कलाकार के सम्मुख तर्कातीत एक समस्या की तरह खड़ा दिखाई देता है। वह तर्कातीत को अपने हर दूसरे चित्र में तर्क में लाने की कोशिश करता है। हर बार निष्फल रहता है।

6.
हैराल्ड रोज़नबर्ग  ने 1964 में एक कला परिसंवाद में आलोचना की प्रकृति को ले कर उठे सवालों के जवाब में कहा था: To evaluate a modern painting one needs to carry it back to its creator. Taken by itself no single work can be adequately appraised. The connoisseurship which the public expects in its critics cannot be achieved in respect to contemporary works unless the artist is present in a continuum of ideas and practice. 
हैराल्ड रोज़नबर्ग जब कह रहे हैं कि कलाकृति को जांचने परखने के लिए उस के चित्रकार तक पहुंचना होगा तब वे इन सब बातों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि कैसे एक चित्रकार का मन मस्तिष्क अपने परिवेश में, अपनी परम्परा के दौरान, अपनी रूढि़यों, अपनी मान्यताओं के साथ बड़ा हुआ और कैसे उस ने इन सब को आत्मसात् कर अपना चित्रकर्म किया है या नहीं किया है।
रोज़नबर्ग परिसंवाद में आलोचना की प्रकृति को ले कर उठे सवालों के जवाब में बात कर रहे थे। एक खास तरह का सन्दर्भ है। रोज़नबर्ग की बात एक आलोचक दृष्टि से आती है। वे कलाकृति के सारे अर्थो तक पहुंचने की बात नहीं कर रहे हैं, वे कलाकार के द्वारा कलाकृति में खोजे गये उस अर्थ-अनुभव-अनुभूति-कल्पना की बात कर रहे हैं जिसे दर्शक तक पहुंचना चाहिए। हो सकता है परिसंवाद में यह बात चल रही हो। यह बात सारी कलाकृतियों के बारे में या स्वयं कलाकृति के बारे में नहीं कही जा सकती।
’’गुएर्निका’’ के बाद और पिकासो के बाद भी ’’गुएर्निका’’ चित्र पर कई तरह से लिखा जाता रहा है। यह लिखना पिकासो के बगै़र हो रहा है। जब गुएर्निका, गुएर्निका की तरह पहचानी गयी तब पिकासो पेरिस में थे और इस चित्र पर लन्दन में बात हो रही थी। यह कहना मुश्किल है कि एक चित्र की समझ के लिए एक चित्रकार का होना ज़रूरी है। मुझे लगता है एक चित्र बनाने के बाद चित्रकार का अपने चित्र से सम्बन्ध ख़त्म हो जाता है। वह एक नयी दुनिया में, एक नयी जगह पहुंच जाता है जहां चित्रकार के नये ढंग के अपने सम्बन्ध बनना शुरू होते हैं। ऐसा खुला रूप रखना-देखना ही उचित जान पड़ता है।
गांधी लिखते हैं: ’’इसकी क्यों ज़रूरत हो कि चित्रकार स्वयं अपनी पेंटिंग मुझे समझाएं, पेंटिंग ही स्वयं अपनी बात मुझ तक क्यों नहीं पहुंचा सके? मैंने वेटिकन में क्रॉस पर लटके ईसा की एक मूर्ति देखी, जिसे देख कर मैं स्तब्ध रह गया। बेलूर में एक प्रतिमा देखी जो मुझे अलौकिक लगी, जिस ने मुझ से ख़ुद बातें की, बिना किसी समझाने वाले की मदद के।’’ गांधी जी का यह कहना कि कोई चित्रकार क्यों मुझे चित्र समझाये, स्वयं चित्र क्यों नहीं मुझ तक खुद पहुंचे, बिलकुल ठीक बात है।
दरअसल, देखने का स्तर इतना ऊंचा होना चाहिए कि चित्रकार ही क्यों किसी कला आलोचक की भी ज़रूरत न हो। एक कलाकृति अपने में सम्पूर्ण है, एक दर्शक अपने में सम्पूर्ण है और दोनों के बीच किसी तीसरे का आना हड्डी की तरह होगा। कबाब में किसी को हड्डी की ज़रूरत है तब वह ज़रूर तीसरे का इंतज़ार करेगा अन्यथा कलाकृति से सीधे अपना सम्बन्ध बनाने की कोशिश करेगा। कलाकृति को पहचानने की कोशिश करेगा, समझेगा। कलाकृति के साथ स्वयं ही रिश्ता बन सकता है।
इस सन्दर्भ में किसी तीसरे की ज़रूरत मनुष्य के अधूरेपन की ज़रूरत की तरह लगती है। यह अधूरापन अपने तक नहीं पहुंच पाने का है। अपनी अनुभूतियों, अपनी इन्द्रियों को महसूस नहीं कर पाने का है और अपने देखने-सुनने पर भरोसा नहीं कर पाने का है। लोग अपने बोलने तक पर भरोसा नहीं करते हैं; बिला वजह शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, बगैर सोचे-समझे करते हैं। कहते हैं कल शाम को चार बजे आऊंगा और हो सकता है अगले दो दिन तक ना आते हो! जब लोग अपने बोलने को ही गम्भीरता से नहीं ले रहे हैं तब उसी से समझ में आता है कि उन के देखने-सुनने का क्या होगा।
मुझे नहीं लगता कि रोज़नबर्ग और गांधी के विचारों को एक दूसरे के बरक्स रखा जा सकता है। गांधी एक दर्शक की हैसियत से बात कर रहे हैं और रोज़नबर्ग एक आलोचक की हैसियत से बात कर रहे हैं। आलोचक ऐसा मान लेता है कि उस की आलोचना से ही एक समझ का विकास हो सकता है जबकि एक दर्शक अपनी समझ से ख़ुद भी चित्र तक पहुंच सकता है। समझ के सन्दर्भ में विकास का विचार झूठा लगता है। आलोचना के लिए झूठा हो सकता है। हो सकता है साहित्य में वह कलाकृति की आलोचना एक दूसरे ढंग से करे। अपने सामने कलाकृति का नया अर्थ प्रस्तुत कर दे। इस अर्थ तक एक सच्चा रसिक खुद भी पहुंच सकता है, अपने सन्दर्भ में।
Virtually untitled - Acrylic on Canvas 100X100 - cms - 2009


7.
कलाकृतियां एक अवकाश रचती हैं। इस अवकाश-निर्माण में स्वयं कलाकृति भी है और देखने वाला भी। चित्रकला का अवकाश कम है और मूर्तिकला का अवकाश ज़्यादा है, यह सोचना भूल होगी। कम या ज़्यादा कह कर अनुभव करने की कोशिश करना भी। एक चित्र फलक का अवकाश उतना ही अनन्त है जितना की एक अनन्त में रखी गयी मूर्ति: जितना की दो शब्दों के बीच का अन्तराल। यह अवकाश उतनी ही बड़ी अनुभूति पैदा कर सकता है जितना की एक व्यक्ति को एक समय में हुआ हो सकता हो। इस को अलगाने में मैं अपने को अक्षम पाता हूं कि अवकाश को सतह या चित्र-अवकाश या शिल्प-निर्मिति के अवकाश में बांट कर देख सकूं। अवकाश का अनुभव महत्वपूर्ण है। एक स्थापत्य को मैं अवकाश में ही देखता हूं।
उड़ीसा में कोरापुट के एक छोटे से गांव में मैं एक आदिवासी के घर में बैठा था। हम तीन चार चित्रकार सब साथ में बैठे खाना खा रहे थे। आदिवासी परिवार हम लोगों के सामने था। धीरे धीरे रात गहराती जा रही थी। इस बीच उस परिवार का मुखिया और परिवार के दो सदस्य तथा गांव के दो लोग अचानक आ गये। वे हमारे सामने खड़े थे, हम उन के सामने बैठे हुए थे। अचानक मैंने महसूस किया कि ये लोग अनन्त आकाश में खड़े देवताओं की तरह दिखाई दे रहे लोग हैं। सब तरफ़ अंधेरा था। घर की दीवारें अंधेरे में गायब हो चुकी थीं। हमारे घेरे के बीच लालटेन से निकलती रोशनी एक या दो फीट तक पहुंच रही थी। लालटेन का उजाला इन लोगों के चेहरे पर गिर रहा था। वे सभी मुझे देवताओं की तरह खड़े मालूम हुए। जैसे वे आकाश में खड़े हों और हमें देख कर हम से बात कर रहे हों।
यह अनुभूति/अनुभव मेरे लिए महत्वपूर्ण है बजाय इस के कि मैं शिल्प और शब्द और संगीत के दो सुरों और कैनवास की सतह के अवकाश के फ़र्क़ को महसूस करूं। मैं कभी महसूस नहीं कर पाऊंगा। क्या इन में कोई फ़र्क़ है? मोत्ज़ार्ट के दो नोट्स के बीच एक छोटे से अन्तराल का अनुभव उतना ही विशाल है जितना दो शब्दों के बीच का अनुभव। इन सब की भौतिक नहीं बल्कि काल्पनिक उपस्थिति है। मैं महसूस करता हूं। एक मन्दिर के प्रांगण में घूमते हुए लगता है मैं एक अनन्त में विचरण कर रहा हूं। एक जगह मायालोक की तरह दिखाई देती है। इस माया लोक में अस्तित्व बिला जाता है। लगता है ख़ुद कुछ नहीं हैं, ख़ाली चारों तरफ़ एक अनुभव है। यह अनुभव अवकाश का ही है।
यह अनुभव चित्रित करते हुए होता है या दो रंगों को पास में रखने का अन्तराल मुझे वैसा ही नज़र आता है। यह गहराई व अनुभूति मेरे लिए महत्वपूर्ण है; अवकाश का कोई भौतिक रूप मायने नहीं रखता है। ऐसा मैं नहीं मानता हूं कि शिल्प में अवकाश प्रदत्त है और दूसरे में अदृश्य। एक शिल्पी अपने पत्थर के साथ सम्बन्ध बनाते हुए उस के आकार का चुनाव करता है। माइकलएंजेलो ने कहा था कि मैं पत्थर में छुपी हुई मूर्ति को बाहर निकाल लाता हूं। वे शिल्प में से उन पत्थर के कणों/अंशों को हटा देते थे जिस के पीछे एक मूर्ति छिपी हुई उन्हें नज़र आती थी। एक मूर्ति की इस अनुभूति में आकार उतना ही अदृश्य है जितना एक चित्र में अदृश्य है। धीरे धीरे जब एक मूर्तिकार आकार खोलता जाता है तब वह पत्थर में छिपा आकार नज़र आने लगता है। चित्र में इसी तरह रंगों से होता है और शब्दों से कविता में। इसी तरह से संगीत में हो सकता है।

यूं
संगीत में मेरी दिलचस्पी सुनने तक की है। संगीत और चित्रकला के बीच के सम्बन्ध को विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वर्णित कथा प्रारम्भ से रेखांकित कर सकता हूं। जाॅन बर्जर का यह कहना कि
“space is to the painter what time is to the musical composer.”  बिलकुल ठीक बात है। वे ठीक ही उंगली रख रहे हैं। मैं और आगे जाना चाहता हूं। composer के लिए भी अवकाश उतना ही विस्तृत, विशाल व अनन्त है। मेरे पास मोत्ज़ार्ट के हाफनर के चार अलग अलग कम्पोज़रर्स के नमूने मौजूद हैं; चारों का अनुभव अलग है। सब ने मोत्ज़ार्ट को अलग ढंग से अनुभव किया, अलग अवकाश में रखा, रचा। मोत्ज़ार्ट की रचना में यह सम्भव था।

जब मोत्ज़ार्ट रच रहा था तब यह वैरियेशन्‍स उस के अन्दर बुने जा रहे थे। स्वयं मोत्ज़ार्ट को वैरियेशन्‍स पसन्द थे और वह खुद अपनी रचनाओं के कई वैरियेशन्‍स बनाया करता था। यह सारे वैरियेशन्‍स उन कंपोजर्स की रचनाओं की तरह नज़र आते हैं जो कि मोत्ज़ार्ट के खुद के कंपोजीशन में ही बुने जा चुके थे। यह समय नहीं बल्कि अवकाश है जिस में मोत्ज़ार्ट का संगीत रचा जा रहा है। यह अवकाश चित्रकार के लिए भी है। (यूं हो सकता है जॉन बर्जर इस बात को किसी खास मसले पर कह रहे हो।)

8.
प्रेक्षक/दर्शक की समस्याओं के बारे में बात करते हुए शहर में पले बढ़े दर्शक की देखने की सीमा साफ़ नज़र आती है। प्रकृति में पला बढ़ा दर्शक चित्रों के साथ या अपने आसपास की कलाकृतियों के साथ अपना सम्बन्ध बिल्कुल अलग ढंग से देखता समझता है। शहरी मनुष्य अपने देखने को भूल चुका है। शहर में दो तरह के लोगों का चित्रकला से सम्बन्ध नहीं है। एक तो सीधे ही कहते हैं कि हमें कुछ भी समझ में नहीं आता और हमें समझाओ। यह सीधे हथियार डाल देने वाला वाक्य है।

दूसरा यह बताने की कोशिश करता है कि उस का चित्रकला से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। चित्र देखते हुए वह जिस तरह के उदाहरण देता है वे सब ग़लत निकलते जाते हैं। पता चलता है कि अहंकार के कारण अपने हथियार नहीं डाल रहा है। वह यहां तक भी दावा कर सकता है कि जो चित्र बना ही नहीं वह भी उस ने देख लिया था! यदि कोई व्यक्ति देखना नहीं चाहता है तब भला उसे कौन दिखा सकता है? यदि देखना चाहता है तब भला उसे कौन रोक सकता है?
हम अपने अनुभव से जानते ही है कि लोग हमेशा अच्छी चीज़ों के बजाय बुरी चीज़ों से ज़्यादा आकर्षित होते हैं। अच्छा साहित्य पढ़ने की बजाय अश्लील साहित्य की तरफ़ जाते हैं। अच्छा शास्त्रीय संगीत सुनने की बजाय सस्ते फि़ल्मी गाने सुनना पसन्द करते हैं। इन लोगों को कैसे रोक सकते हैं? बल्कि आमफहम इनसान की तरफ़ क्यों जाय, मैं ऐसे बहुत सारे चित्रकारों को भी देखता हूं जिन्हें देखना नहीं आता है या जिन्हें अपने देखने पर भरोसा नहीं है। आमफहम इनसान की तरफ़ न जा कर चित्रकला के लोगों को ही देखें तो उन में बहुत सारे लोगों को देखना नहीं मालूम है। वे अपने चित्रों तक के बारे में यह नहीं बता सकेंगे कि उन का कौन सा चित्र अच्छा है कौन सा बुरा। उन्हें यह पता नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं। जब चित्रकला के लोगों के कला संस्कार नहीं है तब समाज के लोग या उन की देखने की समस्याओं पर कैसे बात करें?

यह
प्रश्न मुझे भाषा से संचारित प्रश्न ज़्यादा लग रहा है। ऐसा लगता है मानो दर्शक उस भाषा में कैसे संलग्न हो जिसे वह नहीं जानता समझता। मैं यह पूछना चाहता हूं कि क्या वह देखना नहीं जानता
? क्या वह देखना नहीं समझता? चित्रकला में कुछ जानने समझने के लिए सिर्फ़ देखने की ज़रूरत है। एक विशेषज्ञ दर्शक हो कर नहीं बल्कि एक सामान्य दर्शक की तरह। अपनी पूर्वधारणाओं, अपनी मान्यताओं, अपने अहंकार, अपने वजूद से देखने की कोशिश न कर चित्र को समर्पण भाव से देखना चाहिए। ऐसा होने से चित्र के ज़्यादा नज़दीक जा सकेंगे। ज़्यादा अपने देखने के नज़दीक जा सकेंगे। मुझे लगता है मनुष्य अपने देखने पर भरोसा करना भूल रहा है। देखना शुरू करना चाहिए।

चित्र-भाषा सिर्फ़ देखने की भाषा है।
देखने की भाषा को देखने से ही जान सकते हैं। दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद के भारत में कला आलोचना नहीं पनपी है। कला आलोचना कलाकृति और दर्शक के बीच पुल का काम करती है। भारत में यह पुल न होने से लगातार खाई बढ़ती जा रही है। भारतीय कला संसार में कोई आलोचक ऐसा नहीं है जो समकालीन कला में हो रहे दृश्य को लिख बतला सके। कुछ ऐसा कर सके कि लोग कलाकृति के साथ अपना सम्बन्ध बनाने की शुरुआत कर सके। शहरी समाज व विद्यालयों में कलाओं के प्रति अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण रवैया है। जैसे कला अछूत कन्या है जिसे दूर रखना ही फ़र्ज़ है। घरों में ऐसे संस्कार भी माता पिता भी नहीं डाल पाते है जिस से एक बच्चे की रूचि कलाओं के प्रति बढ़ सके। यह सब बातें एक चित्रकार के ठीक करने की तो हैं नहीं।
कला आलोचक पैदा करना किसी कलाकार का काम नहीं है। देश में कोई विशेषज्ञ भी नज़र नहीं आता। बहुत सारे कला आलोचना के नाम पर लिख रहे लोगों को पैसे दे कर लिखवा सकते हैं। तब फिर उन की विशेषज्ञता का क्या होता है? उन के कला आलोचक होने के दावे का खोखलापन भी सिद्ध होता है। एक कला आलोचक अपने को दांव पर लगाता है। अपने देश में हो रही कला के प्रति जि़म्मेदार महसूस करता है। फि़लहाल तो यह बढ़ती हुई खाई अपनी जगह है।

देखने
पर पाएंगे कि आज़ादी के बाद देश के महत्वपूर्ण ग्यारह चित्रकार अपना संसार रचते गढते हैं
, लेकिन उन पर अपनी रूचि से किसी ने एक किताब नहीं लिखी है। मुझे नहीं लगता कि आज के युवा चित्रकार को हमारे ही देश के अच्छे चित्रकारों के बारे में पढ़ना लिखना समझना हो तो कोई किताब उपलब्ध है। ऐसा नहीं है कि चित्रकला के संसार में कुछ कम गतिविधियां हो रही हों। बहुत कुछ अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाता नज़र आ रहा है। हो सकता है दूसरे देशों के विशेषज्ञ आधुनिक भारतीय चित्रकला पर पहली बार ऐसा कुछ लिखना शुरू करें जो हमारे लिए सार्थक हो।
what happens to Yellow ? - Acrylic on Canvas - 100X100 - cms - 2009

9.
समकालीन भारत में युवा चित्रकारों के लिए बहुत से मौक़े हैं। वे एक ऐसे समय में आ चुके हैं जहां बहुत सारी चीज़ें आसान हो गयी हैं जो मेरे समय में मुश्किल थी। मसलन, हमें रंगों की इतनी बहुतायत उपलब्ध नहीं थी। इतनी तरह के रंग, इतनी तरह के उपकरण, इतनी तरह के ब्रश उपलब्ध नहीं थे न हमारी कल्पना में थे। कभी कभार किसी एक दूसरी कम्पनी का नाम सुनने को मिलता था। किन्तु वे रंग भी मेरे देखे हुए तो नहीं ही थे। यह बात मैं उस वक्त कह रहा हूं जब मेरे खुद के पिता चित्रकार थे। उन के पास इस प्रकार की दूसरी चीज़ें मौजूद थी। मेरे सहपाठियों के साथ यह सम्भव नहीं था। वे चित्रकला संसार के वैविध्य को बिलकुल ही जानते-समझते नहीं थे न देख पाते थे।
आज के युवा चित्रकारों के लिए इन सब की उपलब्धता इतनी आसान है कि वे फ़ोन कर अपने घर पर मंगवा सकते हैं। बहुत से युवा चित्रकार, इस संसार में बढ़ती जा रही राजनीतिक व्यवस्थाओं के चलते, चित्रकला की अपनी कोशिशों में भी इस राजनीतिक विचारधाराओं को जगह देते जा रहे हैं। आजकल सामाजिक राजनीतिक चित्रों की भरमार है। वे उन सारे विषयों की तरफ़ आकर्षित होते हैं जो इस दुनिया में अलग अलग देशों में चल रही लड़ाइयों के दरमियान उपजी परिस्थितियों के विषय हैं।

युवा चित्रकार के समाज का दायरा भी विस्तृत हो गया है। वह इस भ्रमजाल में उलझा नज़र आता है कि वह एक ऐसा ग्लोबलाइज़्ड चित्रकार है जिस के विषय भी ग्लोबलाइज़्ड होने चाहिए। हो सकता है मेरा कहना पूरी तरह से ग़लत हो। आजकल के भारतीय युवा चित्रकारों के काम
, उन के विषय में बहुत कुछ देखा जा सकता है। वे उन सामाजिक राजनीतिक विषयों पर काम कर रहे हैं जिन का सम्बन्ध उन के अपने पांच मील के दायरे से बाहर का है। फि़लहाल उन की सफलता कुशलता से ही आंकी जा रही है। कि कितनी ख़ूबसूरती से उस ने इन सब चीज़ों का चित्रण किया है: इतनी ख़ूबसूरती से उस ने उस वियतनामी जलती महिला का चित्र बनाया है!

युवा कलाकार चुनौतियों का सामना कर पाते हैं या नहीं या अपने समय की मुश्किलों और सम्भावनाओं से रूबरू हैं या नहीं
, इस पर कुछ कहना लगभग मुश्किल है। यह नितान्त वैयक्तिक मामला है। कोई भी टिप्पणी झूठी साबित हो सकती है। इतना ज़रूर है कि उन्हें बहुत सारे अवसर मिलते हैं। अनेकानेक कला दीर्घाएं हैं। हमारे समय के दौरान यह सब लगभग असम्भव था। मसलन, उन दिनों जब चित्र बनाते थे तब चित्र बिकता है या नहीं, इस पर कोई बात नहीं होती थी। चित्र बिक सकता है, यह हमारे मन में कभी आता भी नहीं था।

अब महाविद्यालय में प्रथम वर्ष का विद्यार्थी चित्रकला पर कम
, चित्र के बिकने पर ज़्यादा बात करता है। उस की जिज्ञासाएं अपने चित्रकर्म से कम प्रेरित हैं। वह अपने चित्र के बिकने न बिकने से ज़्यादा आशंकित है। यह दुर्भाग्य है। गांधी जी ने यूरोप को शैतानी सभ्यता कहा। उस सभ्यता को एक तरह के लालच ने जकड़ लिया था। औद्योगीकरण से होने वाले लाभ का लालच नैतिकता को ताक पर रख चुका था। गांधी जी ने इसी लालच को शैतानी कहा होगा। किसी भी चित्रकार के लिए कोई भी लालच एक शैतानी स्थिति है।

मुझे नहीं लगता कि जिस तरह आज चौतरफ़ा सुविधाएं खुली है उस ने चित्रकला की समझ में कोई इजाफा किया हो। यह ज़रूर हुआ है कि चित्रकला को व्यवसाय की तरह अपनाने के लिए हज़ारों लोग इस तरफ़ दौड़े चले आए हैं। ऐसे भी लोग वापस चित्रकर्म की तरफ़ मुड़े जिन्होंने आज से पच्चीस तीस साल पहले उस को बेकार व नकारा मान कर छोड़ दिया था। वे किसी और काम में लग गये थे। अब जब चित्र बिकने लगे हैं और समकालीन भारतीय चित्रकला अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर फलने-फूलने लगी है तब अचानक इन सब लोगों का ध्यान अपने उस कर्म पर गया जिसे वे तीस साल पहले छोड़ चुके थे। उन्होंने वापस चित्र बनाने शुरू कर दिये। इस दावे के साथ उन युवाओं से टकराने की कोशिश करने लगे कि वे वरिष्ठ हैं। मेरी नज़र में उन्हें इन युवा चित्रकारों की शरण में जा कर उन से चित्रकला सीखना शुरू करना चाहिए। चित्रकार का लक्ष्य यह लालच नहीं है। इन सब से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।


10.
इन दिनों हिन्दुस्तान में बहुत अच्छा काम हो रहा है, बहुत तरह का काम हो रहा है। एक बड़ा तबका उस Popular Art में भी संलग्न है जिसे Sociopolitical Art कहते हैं। वे उन सारी समस्याओं से जूझते दिखाई दे रहे हैं जिन में दुनिया उलझी पड़ी दिखाई दे रही है। वे उन पर comment करते हुए नज़र आते हैं या कलाकृतियां comment करते हुए नजर आती है। ऐसे चित्रकार भी हैं जो अपने ढंग से एक दिशा में काम कर रहे हैं। भारत में कई तरह से एक रचनात्मक माहौल की शुरुआत हुई है।

सभी कलाकारों के लिए एक चुनौती भी है कि वे अपने को कला की दुनिया के आकर्षणों से कैसे बचाये। आकर्षण इतनी तरह के हैं कि उन में किसी भी कलाकार का उलझ जाना साधारण बात की तरह नज़र आता है। जो उलझ गया उस के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। उस में प्रतिभा ही नहीं थी कि रास्ते पर ज़्यादा देर तक चल सके। जो अपने विश्वास व अपने देखने के साथ चल रहे हैं उन के लिए अच्छा माहौल भारत में है। दुनिया के देशों में ऐसे चित्रकार कम देखने को मिलेंगे जो बहुत सार्थक कुछ रच रहे हैं।
****



[अखिलेश की तस्वीर प्रीती मान के कैमरे से ]

Friday, April 22, 2011

मनोज कुमार झा की नई कविताएं


Painting : Vladimir Fedin

सहमति

अब इस जर्जर काया पर मत खर्च करो धन
एक दिन जाना ही है तो जो बच जाए बचा लो
सड़क किनारे बिक रही खेत खरीद लो उसको
मुझे भी साथ ले चलना दो पैसा कम करवा दूँगा
अब मुझे जाने दो, जो बच रहा है बचा लो
    घर में एक-दो तो तुरत सहमत हुए
जो सहमे शुरू में वे भी सहमत हुए
पड़ोसी भी सहमत हुए

सब आए श्राद्ध में मुखिया, सरपंच, एमएलए का भी एक खास आदमी
जय जय हुआ, सब ने माना कि अभी ही खरीदी थी जमीन इतनी मँहगी
और अभी ही ऐसा भव्य श्राद्ध !
                पराक्रम की बात है।
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बाहरी

वृक्ष ने कुछ नहीं कहा
पत्ते एक काँप भर असमंजस में नहीं थे मेरे वहां होने से
मोर ने भी कुछ नहीं कहा
    वो नाचा मेरे होने से स्वाधीन
चिड़िया को तो मैंने अंडे सेते देखा
रास्तों ने साथ दिया
    एक भी काँटा नहीं मेरे लिए अतिरिक्त
जल ने तो प्राण दिया उस ताप में
जो उठी वो अंगुलियाँ थीं
            मनुष्य की
मेरी माँ के से उदर में जिन्होंने पाया था आकार।
****

पुनश्च


आग थी लहलह
और करीब, और करीब जाने का मन था
त्वचा मना कर रही थी
दसेक लोग थे - बीड़ी, तमाखू, हँसी, ठहाके और ठहरा हुआ दुःख
बातें चलती रही - नेता, चोर, उल्लू के पट्ठे, सरसों का साग
ग्यारह तक सब अपने अपने घर

राख में अभी भी गर्मी थी
दो कुत्ते आए, एक उसके बाद, एक और - सब पसर गए

सुबह किसी ने ठंढ़ी राख को हटा दिया
शाम में आग फिर लहलहा।
****

अनुपस्थिति

तुम नहीं तो यहाँ अब मेरे हाथ नहीं हैं
            एक जोड़े दस्ताने हैं
पैर भी नहीं
            एक जोड़ी जूते की
देह भी नहीं
            बस माँस का एक बिजूका जिसमें रक्त और हवायें घूम रही है।

****





[ मनोज कुमार झा हिंदी के चर्चित युवा  कवि हैं . विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित हुए हैं. चॉम्सकी, जेमसन, ईगलटन, फूको, जिजेक इत्यादि बौद्धिकों के लेखों का उन्होंने अनुवाद भी  प्रकाशित कराया है. एजाज अहमद की किताब ‘रिफ्लेक्शन ऑन ऑवर टाइम्स’ का हिन्दी अनुवाद पुस्तकाकार संवाद प्रकाशन से छपा है. सराय / सी. एस. डी. एस. के लिए ‘विक्षिप्तों की दिखन’ पर उनका शोध भी दृष्टव्य है. कविता के लिए उन्हें  2008 के भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. ]

Tuesday, April 19, 2011

शताब्दी स्मरण : नागार्जुन


[हिंदी के श्रेष्ठ कवियों को उनके जन्म-शताब्दी वर्ष में स्मरण करते हुए हम शमशेर और अज्ञेय के बाद नागार्जुन पर लेख प्रकाशित कर रहे हैं. इसे युवा आलोचक मृत्युंजय ने लिखा है. नागार्जुन के सुदीर्घ और विविध काव्य-संसार की एक लेख में समाई असंभव है, फिर भी मृत्युंजय ने अपने आकलन में नागार्जुन के कवि-छवि को रोशन करने की भरसक कोशिश की है. ]


नाग जी अर्जुन यही उवाच

मृत्युंजय 

'समरगाथा' (हारवर्ड फास्ट) में जन नेता के लिए एक शब्द है- 'मकाबी'. मकाबी वह जो जनता से पैदा होता है, उसी के लिए लड़ता है, और आखिरकार उसी में बिला जाता है. यह पदवी छीनी नहीं जा सकती, जुटाई नहीं जा सकती. प्रतिष्ठान और सत्ता इससे डरते हैं. यह सिर्फ जनता किसी को दे सकती है. नागार्जुन भारत की जनता के कवि-मकाबी हैं. यों 'जनकवि' के खिताब की कीमत बहुत ज्यादा होती है और कसौटियां काफी खरी. लगभग यह 'तरवार की धार पे धावनो' है.

आज़ादी के पहले से लेकर अपनी जिन्दगी की आख़िरी सांस तक जनता के साथ कंधा भिड़ाकर लड़ने-भिड़ने, उससे सीखने और उसे सिखाने की यह जिद नागार्जुन के कविता के क्रोड़ में है. सत्ता के खिलाफ खड़ा होना, समकालीन आलोचकों की कुटिल भ्रू-भंगिमा से मोर्चा लेना और साहित्य की पवित्र भूमि से बर्खास्तगी, यही तो मिलता है जनकवि को. पर रुकिए, उसे जनता का प्यार मिलता है. दिल्ली की बसों के चिढ़े-खिझलाये ड्राइवरों से लेकर बिहार के धधकते खेत-खलिहानों के खेत-मजूर तक उसे सर-आँखों पर रखते हैं. 

अब सवाल बचा लोकप्रियतावाद का. लोकप्रिय होना किसी कवि की कमजोरी नहीं, उसकी मजबूती है, अगर वह लोकप्रियता के लिए अपने ईमान का सौदा नहीं करता. अगर वह सत्य, जनता और अपने आप से दगाबाजी नहीं करता. नागार्जुन ने लोकप्रिय होने के लिए कोई समझौता नहीं किया. जब-जब उन्हें लगा क़ि जनता बदलाव के अपने रास्ते पर है, वे उसके साथ रहे- सीखते-सिखाते. 'जन-आन्दोलनों का इतिहास' नाम की किताब अगर आप लिखने की सोचें तो एकबार नागार्जुन के काव्य-संसार की ओर पलट कर देख लें. तेभागा-तेलंगाना से लेकर जे.पी. की सम्पूर्ण क्रान्ति तक और भगतसिंह से लेकर भोजपुर तक आप यहां दर्ज पायेंगें, और पायेंगे कितने ही स्थानीय प्रतिरोध, जिनको इतिहास की मुख्यधारा हमेशा ही भुला देती है. पर यह कोई अंध आन्दोलन भक्ति का सबब नहीं. आन्दोलनों का टूटना-बिखरना, उनकी कमी-कमजोरी, सब अपनी सम्पूर्णता में यहां मौजूद है. जे.पी. आन्दोलन पर क्रमशः लिखी कवितायेँ इसकी गवाही हैं- 'क्रान्ति सुगबुगाई है' से 'खिचड़ी विप्लव देखा हमने' तक. 

ध्यान रखिये, सिर्फ कवि ही आंदोलनों पर प्रभाव नहीं डालते, आन्दोलन भी उनपर असर छोड़ते हैं. केदार, त्रिलोचन और नागार्जुन, जो क़ि खेती-किसानी की जिन्दगी के कवि हैं, कवितायें वे पहले से ही लिख रहे थे पर सुधीजनों की नज़र उनपर तब पड़ी जब नक्सल आन्दोलन ने जमीन के सवाल को राजनीति के केंद्र में स्थापित कर दिया. सो कविता और जनांदोलन का यह गहरा द्वंद्वात्मक संबंध गौरतलब है.

जन-इतिहास की बातें बहुत इतिहासकारों ने कीं, लिखा भी पर आईये, नागार्जुन के शानदार कलम के मार्फ़त भारत के संक्षिप्ततम जन-इतिहास से रू ब रू हों-

पांच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूंखार
गोली खाकर एक मर गया, बाकी बच गए चार
चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश निकाला मिला एक को, बाकी बच गए तीन
तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच गए दो
दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया एक गद्दी से, बाकी बच गया एक
एक पूत भारतमाता का, कंधे पर था झंडा
पुलिस पकड़ कर जेल ले गई, बाकी बच गया अंडा !


बचपने की संख्याओं और गिनतियों के सम्मोहक संसार से बावस्ता कराती यह कविता कौतूहल और जिज्ञासा के हमारे आदिम मनोभाव से खेलती है, उसी को अपनी जमीन के बतौर इस्तेमाल करती है. यह खासा मुश्किल काम है किसी कवि के लिए क़ि वह लगभग प्रतीक में बदल गए रूप का इस्तेमाल नए कथ्य के लिए करे. यहां रूप का पारंपरिक अर्थ नए अर्थ पर भारी पड़ सकता है और कविता आतंरिक असंगति से गड़बड़ा सकतीहै. पर यही तो कवियों को लुभाता भी है. बचपने की लय और तुक में जन-इतिहास भरने की दिलचस्प ललक में नागार्जुन यहां हाज़िर हैं. इस लय में मौजूद कूतूहल और जिज्ञासा का इस्तेमाल करते और उसे आधुनिक इतिहास की समीक्षा के लिए बरतते हुए.

कविता भारतमाता के पांच बलिदानी, लड़ाकू सपूतों के संघर्ष से शुरू होती है. पहले दोनों को क्रमशः हत्या और देशनिकाला मिलता है. आजादी के लिए लड़ी पुरानी पीढ़ी को नागार्जुन अपनी इस कविता में गौरव से याद करते हैं. भगतसिंह जैसे ढेरों भारतमाता के बेटों को खूंखार दुश्मन के खिलाफ लड़ने के लिए फांसी और गोली ही मिली. लेकिन जो बाकी बचे, उनको तो उस शहादत का आधार बना हुआ मिला. उन्होंने क्या किया? नागार्जुन ने सीधे देश के विभाजन पर कुछ नहीं लिखा. क्यों नहीं लिखा, इस विषय पर विद्वानों के ढेरों कयास हैं. पर इस कविता की आंतरिक संगति को समझते हुए उस बेटे के बारे में, जो उधर अलग हो गया, पर बार-बार ख्याल अटकता है. क्या यह विभाजन के अलावा और कुछ है? क्या अलग होना और देश निकाला जैसी घटनाओं को विभाजन के दर्द से जोड़ा जा सकता है?

हालांकि अलगाव के दूसरे संदर्भ मसलन हिंदू-मुसलमान भी पाठ में मौजूद हैं. भारतमाता के बेटों ने कुर्बानी देकर, देशनिकाला झेलकर जो आधार तैयार किया, उसका फल क्या हुआ? एक बेटा अलग हो गया. संयुक्त परिवार के विघटन के मुहावरे में नागार्जुन बहु-सांस्कृतिक, बहुभाषी भारतीय समाज के बारे में दर्ज करते हैं कि जब तक साम्राज्यवादविरोधी  संघर्ष चला, तब तक सारे बेटे आपस में मिलकर लड़े. अनायास नहीं कि कविता जैसे-जैसे नागार्जुन के समकाल की तरफ बढ़ती है, बंटवारा और बढ़ता जाता है. अब बाकी बचे दो बेटे, जिन पर आजादी और लोकतंत्र की रखवाली का जिम्मा था, उनमें से एक गद्दी से चिपक गया. इसी गद्दी से चिपके बेटे के राज की पुलिस आखिरी बचे बेटे को पकड़कर जेल ले गई. सो कविता में लगातार दुख बढता जाता है और अंत में आंदोलनकारियों के दमन से एक अवसाद छा जाता है. शायद यही कारण रहा होगा, जिसके नाते नागार्जुन को आखिरकार इस दुःख को काव्य-युक्ति से संयत करना पड़ा- 'बाकी बच गया अंडा’. हिन्दुस्तान की 'जय हो' मार्का ज़म्हूरियत की यह विडम्बना बिनायक सेन और इरोम शर्मिला जैसे लोगों के ज़रिये आज हम बखूबी महसूस कर रहे हैं.

नागार्जुन की टक्कर सीधे कालिदास से है. 'मेघदूत' का जबरदस्त अनुवाद करने नागार्जुन बार-बार कालिदास की ओर मुड़ते हैं और बारहां उनसे सवाल-जवाब भी करते हैं. 'कालिदास, सच-सच बतलाना / इंदुमती के विरह शाप में/ अज रोया या तुम रोये थे'. मानो कालिदास से एक संगीपना है जिसमें मज़े-मज़े में ही दरियाफ्त की जा सकती है क़ि कविकुलगुरु, तुम्हारी रचनाओं के पीछे की असलियत से मैं काफी बेहतर तरीके से वाकिफ हूं. अब अनुभूति की ठोस परत जाल-ताल को चीरकर निकल आयी है. इसलिए कहो, अपनी वह व्यथा कहो, जिसने अज की व्यथा का रूप धरा था.

बहुत बाद के कवि नागार्जुन ने कालिदास को कवि की तरह परखा तो उसने देखा क़ि यह कवि तो दुःख से आप्लावित है. तन्वी श्यामाओं और लता गुल्मों के पीछे, शिकारी दुष्यंत द्वारा पीछा किये जाते, भय-कातर, ठहकते और गतिशील हिरन का बिम्ब है. कवि के आधुनिक मन ने इस व्यथा की थाह ली, कालिदास के कंधे पर हाथ रखा और कहा- सच कहो मित्र! तुम्हें हुआ क्या है? एक दूसरी कविता से इस सम्बन्ध की और थाह मिलेगी और एक ख़ास स्पर्धा की भी. वह कविता है- 'बादल को घिरते देखा है'.  'कहाँ गया धनपति कुबेर वह, कहाँ गयी उसकी वह अलका/ नहीं ठिकाना कालिदास के व्योमप्रवाही गंगाजल का/ जाने दो वह कविकल्पित था/ मैंने तो भीषण जाड़ों में नभचुम्बी कैलाश शीर्ष पर / महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है/ बादल को घिरते देखा है.' 

वह अद्भुत वैभव, जिसकी सृष्टि कालिदास करते हैं, उसकी तरफ तो नागार्जुन देखते भी नहीं. उनका रचा सब कुछ नागार्जुन को काम्य नहीं. काम्य है प्रकृति. प्रकृति का जो रूप कालिदास के यहां है, वह वैभवशाली होने के बावजूद उद्दीपन मात्र है. यही तो हमारे कवि को नहीं सुहाता. कविता में उसे नायक के भावों की ढोल बजाती, अनुचरी प्रकृति नहीं चाहिए, उसे चाहिए खांटी प्रकृति लीला. मनुष्य के जीवन के उतार-चढाव सब, जिससे अपने को जोड़ सकें. कहिये तो नायक बदल गए. न राजा-रानी रहे, न धीरोद्दात्त और धीर-ललित. अब 'मोतिया नेवले' की बारी है. कालिदास को शायद गर्व ही होता क़ि उनकी प्रकृति कितने जबरदस्त बहुला रूप में नागार्जुन के हाथों संवर-संवर उठती है. परम्परा ऐसे ही हाथों में सुगति प्राप्त करती है.

नाम के विघटन/विखंडन की कार्यवाही (?) से हम बारहा रू-ब-रू हो चुके. आपको याद ही होगा 'राम गोपाल' से 'पॉल गोमरा'. चालू फैशन के लिहाज़ से नाम को विघटित करने का तात्पर्य एक सत्ता को विघटित करना होगा, सो यहां 'राम गोपाल' की सत्ता का विघटन हुआ. पर इस विघटन की एक राजनीति है. इस राजनीति के मुताबिक़ विघटन का अर्थ हुआ- अमेरिका की अगुवाई में नई आर्थिक संरचना के लिहाज़ से राम गोपाल का आधुनिकीकरण. यह विघटन राम गोपाल के चरित्र में आ रहे पूंजीवादी हस्तक्षेप का आईना है.

यह वही प्रक्रिया है, जिसके अगले चरण में इंसान अपनी सारी जातीय/ सामाजिक पहचान खोकर अंकों में बदला जाएगा, नादकेणी साहब के कुशल हाथों जिसका लाभ अब हम अभागे भारतवासियों को भी हासिल होने वाला है. इस प्रक्रिया से अलग नाम के खंड-खंड करने की एक काव्यात्मक प्रक्रिया की साखी नागार्जुन की कविता से देखें- 'औघड़ मैथिल नाग जी अर्जुन यही उवाच'. यह  'अन्न पचीसी' की आख़िरी पंक्ति है. यहां विखंडन के साथ-साथ योग भी है. अब इस समूची प्रक्रिया/कार्यवाही से अर्थ बनता है- एक व्यक्ति जो स्थापित मानकों के खिलाफ है, मिथिला की अमराइयां, ताल-तलाव, लीचियां और धान जिसके मन को गढ़ते हैं, बौद्ध परम्परा से जिसका गहरा तादात्म्य है, जिसके भीतर आत्मसम्मान की कोई कमी नहीं और जो लक्ष्य पर तीखी निगाह रखता है. पंक्ति के पूरे गठन से व्यंग्य की समझ की ध्वनि अलग गूंजती है. मकसद यह क़ि इस एक पंक्ति की रणनीति-राजनीति एक मनुष्य और उसके बनाव-संभार को पूरी खूबसूरती से पकड़ती है. कहना न होगा क़ि यह रणनीति ऊपर इस्तेमाल की गयी रणनीति के खिलाफ पड़ती है.

जहां तक शिल्प का सवाल है, नागार्जुन सा शिल्प-बहुल कवि निराला के बाद शायद ही कोई हुआ. क्या तो लोकधुनें और क्या तो मध्यवर्गीय कस्बों में गूंजती फ़िल्मी धुनें, नागार्जुन का दखल हर जगह है. लय की जादूगरी देखनी हो, वाक्यों का घिस कर गोल होना देखना हो, खड़ी बोली का हिन्दी की दूसरी बोलियों में घुलना देखना हो, नागार्जुन से बेहतर गाइड आप खोजे न पायेंगें. ज़रा नज़ारा कीजिये 1953 के एक बाइस्कोप का- 'कांग्रेस के लीडर देखो/ उड़ते रंग के गीदड़ देखो/ बेदखली पर नजर न पड़ती/ सर्वोदय के प्लीडर देखो/ जयप्रकाश का अनशन देखो/ सोशलिज़्म का प्रहसन देखो/ दोमुंहिया ढुलमुल नेता के/ पहनावे का पटसन देखो'.

देखने वालों को दिखाने के लिए बुलाती यह कविता भी टी वी के आगमन के पहले उसके स्थानापन्न बाइस्कोप वाले सज्जनों की प्यार भरी बुलाहट की धुन पकड़ती है, और एक-एक पंक्ति में भारतीय राजनीति के अलग-अलग दृश्य पेश करती है. खट-खट, एक के बाद एक दृश्य नज़र से गुजरते हैं, उनमें एक काव्यात्मक संगति के साथ राजनैतिक संगति भी है. और यों बाइस्कोप वाला भारतीय अवाम को उसके रहनुमाओं के चाल, चेहरे और चरित्र से वाकिफ कराता है. कविता सधती है व्यंग्य से. देखने में यह भाव निहित है क़ि देख लो, फिर देख लेंगें.

अब ज़रा यहां गौर करें- 'बाँझ गाय बाभन को दान, हरगंगे!/ मन ही मन खुश है जजमान, हरगंगे! ...उसर बंज़र औ शमसान हरगंगे!/ संत बिनोवा पावें दान, हरगंगे!' पीछे हमारे बचपन में पंवरिया नाम की घुमंतू जाति के लोग आया करते थे. बड़े झोलदार कुरते और चौड़े पायंचे वाले पायजामे या धोती वाले. गा-नाच कर भिक्षा मांगते थे. उनकी खासमखास धुन थी- 'राम करैं तोरे लईका होय/ नांव धरावे हीरा लाल, हरगंगे!' सो अब देखिये क़ि यह छंद कहाँ से आया और बाबा ने किस तरह इसका मार्जन किया.

नागार्जुन की एक कविता है- 'पछाड़ दिया मेरे आस्तिक ने'. नागार्जुन अपने एक संगी रत्नाकर के साथ सूर्योदय देख रहे हैं, खुश दिल से वे सूर्य को अर्घ्य देते हैं, स्तुति गुनगुनाते हैं और कहते हैं क़ि आज अभी मेरे नास्तिक को मेरे आस्तिक ने पछाड़ दिया है. यह आस्तिकता क्या है? एक चौकन्ने कवि का शब्द, इसे धर्म से जोड़ने की बजाय अस्ति से जोड़ें. रूढ़ अर्थों में आस्तिक यहां नागार्जुन का अभिप्रेत नहीं. वरना यह नीलकंठों, भैंसों, शीशम की टहनियों, पीपल वृक्ष और सैकत चादर से लिपटा न होता. यह कर्मकांडी साईं बाबाओं और दुग्धपान रत गणेश से कई प्रकाश वर्ष दूर की अस्ति है. नदी से उगता हुआ शरद का बाल-रवि जो मनुष्य जाति के बालपने से कवि प्रिय बिम्ब है, उसकी अस्ति का स्वीकार.

यह प्रकृति के प्रति मानव का स्वीकार भाव है. बेहद आदिम. यह अस्ति प्रतिबद्धता की है, सौन्दर्य, जीवन और मनुष्य के प्रति. कहिये तो आदिम वृत्तियां वर्ग विभाजित समाज में गतिशील रहीं, विकृत होती रहीं और उससे लड़ती रहीं, यों विकसित भी होती रहीं. सपनों की एक अगली दुनिया में ही इन आदिम वृत्तियों के सही विकास का मौक़ा होगा. आप जब किसी नदी के किनारे अकेले बैठे हों, शांत, तब नदी आपसे एक बहनापा जोड़ती है. यह भाव ही नागार्जुन की इस कविता का मूल है, जिस तक पहुंचने के लिए उन्हें 'ॐ नमो सूर्याय' और अर्घ्य का रास्ता लेना पड़ता है. दूसरे नागार्जुन आदत से बाज़ नहीं आते और अपने जड़ प्रगतिशील मित्रों को थोड़ा चिढ़ा देते हैं.- यह सूर्य दर्शन और उससे संबंध अगर 'डेविएशन' है तो फिर मुझे थोड़ा डेविएट होने दें, आपके बीच पहुँच फिर कह दूंगा क़ि ऐसा कुछ न था.
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[ आलोचना के अलावा मृत्युंजय को कविता लिखने और संगीत गुनने से फुर्सत मिलती है तो अनुवाद भी करते हैं. लेकिन इन सबसे बढ़कर वे उन  सांस्कृतिक-राजनीतिक गतिविधियों में बराबर हिस्सेदारी करते रहे हैं जिनसे हमारा समय और समाज दो-चार है. उनका मृत्युबोध नाम से एक ब्लॉग भी है. ] 

Friday, April 15, 2011

नए कवि सुशोभित सक्‍तावत की कविताएं


[सुशोभित की कविताएं एक आदिम भित्तिचित्र, एक शास्‍त्रीय कलाकृति और एक असंभव सिंफनी की मिश्रित आकांक्षा हैं. ये असंभव काग़ज़ों पर लिखी जाती होंगी- जैसे बारिश की बूंद पर शब्‍द लिख देने की कामना या बिना तारों वाले तानपूरे से आवाज़ पा लेने की उम्‍मीद. 'जो कुछ है' के भीतर रियाज़ करने की ग़ाफि़ल उम्‍मीदों के मुख़ालिफ़ ये अपने लिए 'जो नहीं हैं' की प्राप्ति को प्रस्‍थान करती हैं. पुरानियत इनका सिंगार है और नव्‍यता अभीष्‍ट. दो विरोधी तत्‍व मिलकर बहुधा रचनात्‍मक आगत का शगुन बनाते हैं. कम लिखने वाले, और उस लिखे को भी छुपा ले जाने की आदत वाले सुशोभित सक्‍तावत हिंदी में लोर्का के पत्रों का पुस्‍तकाकार अनुवाद कर चुके हैं. कविता के अलावा दुनिया के संगीत और सिनेमा में गहरी दिलचस्‍पी रखते हैं.] --गीत चतुर्वेदी 




एक असंभव समुद्र में नक्शों से लदी नाव की तरह

दोपहर के बाद दफ्तर अपनी दीवारें बदलता है
एक अधूरा पुल ढहता है और निशानदेही के साथ
काटे जाते हैं दिन के दरख्त
मैं एक गुलाबी रंग को गुलाबी रंग की तरह
पहचानने से इनकार करता हूं
आलपिनों से छिदे क्षितिज पर
टांगता हूं अपनी उतरी हुई परछाइयां
कुछ पुराने चरित्र
एक उपन्यास के भीतर
कुचलकर मर जाते हैं

ठीक वक्त पर सुबह किसी सायरन की तरह बजती है
मैं सायरन की चेतावनी का
समझाइश की शक्ल में
गलत तर्जुमा करता हूं
सांसों की खोह मुझे निगलती है सांप के पेट की तरह
और मैं अस्थियों का मुकुट पहने
डूबता रहता हूं

एक आवाज मेरी डेस्क पर आकर गिरती है
जिसे मैं हमेशा एक फासले से देखता हूं
भौंहों की धुंध के बीच औंधी पड़ी रहती हैं
संगीन चुप्पी की तश्तरियां
अंधेरे में उसके चश्मों के शीशे
उसकी आंखों से ज्यादा चमकते हैं
मैं उसे सोचता हूं और सोच के बीचोबीच
एक लकीर खिंच जाती है
उसे मैंने कभी एक असंभव समुद्र में
नक्शों से लदी नाव की तरह पहचाना था

एक गुंजाइश और एक ट्रेन मेरी आंखों से सामने से छूट जाती है
मैं पटरियों से उसके छूट जाने के निशान नहीं मिटाता
शल्कों और शैवालों से भरा एक दरिया मेरे भीतर से होकर गुजरता है
मैं वमन करता हूं विचार और निगलता हूं सीढिय़ां और सडक़ें
शहर के चौराहे पर ट्रैफिक महकमे का रंगरूट
एक नई गाली ईजाद करता है
और मैं उसे जरूरी चीजों के बीच
एक हिदायत और एक नुस्खे की तरह
नत्थी कर देता हूं

दुनिया के अंतिम पत्थर के पास
मुझे एक रक्तरंजित देवता का शव मिलता है
मैं उसके झुलसे हुए पंख देखता हूं और मेरी आंखें
झाडिय़ों में गेंद की तरह गुम जाती हैं
मैं उन्हें खोजता नहीं न शव की शिनाख्त करता हूं
इस दौरान अखबारों के रोजनामचों से हटाई जाती रहती हैं
खबरें और जरूर तफसीलें

मैं सीखता हूं रेंगना उन चींटियों से
जो जमीन के जख्म सीती हैं
और हमेशा चुप्पी साधे रहती हैं
अपनी इस हरकत
तक के बाबत।
****

ग्रीष्म                  एक चित्रलिपि

रंगों का जल              अचल।

अतल के                  दर्पण में
एक कौंध की परछाईं।
त्वचा की
ऋतु पर                   दीपती।

धूप                    के धागों की सीवन,
जहां उधड़ा था            आकाश
बांस की बर्छियों की
                             धार से

धूप                    दीठ है
दिनमान की।
देखना है उसका-
                          उजाला!

आग का         पका फल-
दाह के आलोक में
एक झुलसा हुआ-सा
                  सूनापन!

कुंए में गिरतीं पत्तियां       सांसें-
सांसों का यह सूत।

नदी का तीसरा तट          नावें-
जहां रक्त में      रुकी हुईं।

सांझ के कैनवास पर
पारदर्शी पिघलापन।
एक स्वप्न           का रेखांकन।

वृक्षों का एकांत-
पंक्तिबद्ध
अंतराल।

जल में आकांक्षा का ज्वार-
क्लांत           शिथिल
ताप की तृषा!

दीवार से सटा अहाता-
अनमना        उन्मन।
बरामदे में      बेंत की कुर्सियां।

रिक्तियों को भरता,
एक ठोस
खालीपन।

ऊंघता
         निदाघ!
****

तुम्हारी आंखों की सुरंग में बंद होता समुद्र

बारिश और बसंत के बीच स्थगित
एक अधूरे चुंबन और अस्फुट कराह को
रेलवे प्लेटफॉर्म की चिकनी सतह पर
भारी लगेज के नीचे कुचलाते सुनता हूं
और देखता हूं खुद को
एक खुलते चौराहे पर हाथ हिलाते
हवा के पारदर्शी गुंबद में

मैं तैरता हूं सफेद झाग वाली धूप में
डूबती-उतराती इच्छाओं के शंख,
सीपियां और घोंघे बीनते
समुद्र को चीरते चाकू की चमक में दाखिल होता हूं
एक सुरंग के भीतर भूमिगत नदी और
जुगनुओं की भिनभिनाती छतरी के ऐन नीचे
अलविदा कहता हूं तुम्हारी गंध तक को
एक पत्थर पर लिखता हूं विदा

भूरी नदी के देह में गड़ते पानी और
पिछले पतझर के गीले पत्तों-सी
कच्ची ईंटों वाली गंध के बीच
सुनते हुए प्यार की अंतिम प्रत्याशा
मैं तहस-नहस करता हूं
चंद्रमा की घंटियों की खनकती ध्वनि
नींद में देखता हूं बिना तारों वाला
एक तानपूरा बजता
और तुम्हारी आंखों की सुरंग में
बंद होता एक पूरे का पूरा समुद्र

बारिश पर लिखता हूं विदा
****


हमारे बीच बारिशों का परदा है

नीले कोहरे के लहराते परदों के दरमियान
सन्नाटों की सुई सरकती है

ठंडी दीवारों में जज्ब हो चुके हैं
बीते सारे दिन
रातों के गलियारों में
गहराता बैंजनी अंधेरा
तुम छूट जाती हो अधूरी अपनी देह में
मैं उठता हूं बार-बार नीमबेहोशी में
ढांपने तुम्हें अपने इतने अधूरेपन से

मैं ढूंढ रहा नींद का पत्थर
तुम पानी के पुल पे खड़ी हो
सोच और सन्नाटे के अंतराल में
हमारे बीच बारिेशों का परदा है
नशे में नीली पड़ रही है परछाइयों की देह
चुंबनों की चंपई गंध में
एक-दूसरे को खोजते हैं हम
पिछली कई सदियों से
और समय कहीं नहीं है

हमेशा नामुमकिन रहा है मेरे लिए
तुम्हारी सांसों के कोहरे से होकर गुजरना
मैं थम गया हूं
हम थम गए हैं
बीत रहे सदियों से
उडते धुंध में अभिशप्त
उठते हैं बार-बार
एक-दूसरे की ओर
जबकि जानते अपनी सरहद
छूट जाना है बाहर
इतने अधूरे आकाश में

लेकिन
मैं छीजता रहूंगा यूं ही ताजिंदगी
और तुम बिखरती रहोगी बारिश
और पानी की परछाईं में
टूटतीं रोशनी के कतरों-सी
हम बार-बार मरेंगे आधे-अधूरे
बीतते एक-दूसरे के बदन में
और गर्क होते हमेशा
किसी नाउम्मीदी के नुक्ते पर
मैं कुछ नहीं रह जाऊंगा सचमुच
अगर बेदखल हो गया कभी
हमारे अधूरेपन की इस जमीन से
****

मैं टहलूंगा तुम्हारे भीतर कोहरे की तरह

मैं डूब रहा एक उम्मीद की तरह
सांझ के दूरस्थ सीमांत पर
पेड़ों के हिलते हुए सिर
हवा के कंधों पर जा टिक हैं
छत पर मुंह फाड़े पड़ी हैं
सैटेलाइट की छतरियां
लाल आंख वाले वॉच टॉवर
के पीछे जा गिरी है
धूप की कटी पतंग
मैं धंसता हूं
अपने भीतर के
दर्रों में

तुम कहीं बैठीं मुस्कराती होंगी
सांस और सिरहन के बीच
तोड़तीं समय की सरहदें
गुम होतीं अपनी ही गंध के झुटपुटे में

मैं गर्क करूंगा हमारे अंतराल का यह अंधेरा
तुम सांझ की स्याही से लिख देना सुबह

पाटते सारे दर्रे रास्ते रूकावटें
मैं टहलूंगा तुम्हारे भीतर कोहरे की तरह
टटोलूंगा खामोश परदों में तुम्हारी परछाईं
जबकि शामें बुझती रहेंगी
उचटती रहेगी धूप
मैं तुम्हारी देह की नदी में उतरकर
छू लूंगा तुम्हारे किनारे

और तब
शायद इतनी नाउम्मीदी न होगी
न ऐसी टूटे छाजे-सी
जिंदगी
****

जो एक बारिश की बेवक्ती है

कनखियों से झांकता हुआ समंदर
अपने किनारों पर अधूरा छूट जाता है

सुबह के तट पर
वह समंदर
लहरों को ओढक़र
सुस्ताता

मैं जिसे एक प्यास के साथ याद रखता हूं

एक प्यास की याद
जो के एक बारिश की बेवक्ती है
और समंदर
जो गैरमुमकिन है
अपनी नींद में।
****

 
(सबद पर नए और महत्वपूर्ण कवियों की कविताएं लगातार प्रकाशित की जा रही है. कविताओं का चयन करने  में इधर की युवा कविता के दो सर्वाधिक चर्चित नाम : गीत चतुर्वेदी तथा व्योमेश शुक्ल ने भी वक़्त-वक़्त पर सहयोग किया है. सबद उनका आभारी है. सुशोभित सक्तावत की  कविताओं का चयन और नियोजन गीत चतुर्वेदी द्वारा किया गया है. कहना न होगा कि प्रत्येक चयन में अप्रकाशित कविताओं को ही जगह दी गई है. शीघ्र ही पंकज चतुर्वेदी की कविताओं  का एक चयन व्योमेश शुक्ल सबद के लिए करेंगे. गीत ने इससे पहले नीलेश रघुवंशी की कविताओं तथा व्योमेश ने शिरीष कुमार मौर्य की कविता का चयन किया था.
चित्रकृति- अलफ्रेड गोर्केल)