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तीन नई कविताएं : व्योमेश शुक्ल



[ चित्र-कृति   :  बिलासेंदु शील ] 


जनगणना

और जब बग़ैर किसी ख़ास वजह के आप उनसे पूछते हैं कि आपका नाम क्या है, आप कौन सी नौकरी करते हैं तब पता चलता है कि विजय प्रकाश लाल जनगणना नहीं प्रेम करने निकले हैं. एक कानूनी दिन में सिर्फ़ ५ घरों की जनगणना की जा सकती है, लेकिन वह सुबह से ३४ घरों को निबटा चुके हैं और सूर्यास्त तक पूरे मुहल्ले का हिसाब साफ़ कर देने का इरादा रखते हैं. वह चाय पीने और दूसरी औपचारिकताओं के सामने लगातार सख्त होते इंसान हैं. यों, आजकल जनगणना नहीं इश्क़ हो रहा है मेरे देश में.


जीवन के उन्तालीस मनहूस नागरिक विवरण नोट कराते हुए मालूम हुआ कि अत्यन्त रूढ़ सरकारी हिंदी में अपने निम्नमध्यवर्गीय वाक्य का विन्यास ज़बान पर क़रीने से उठाये विजय प्रकाश अगर इतनी जल्दी-जल्दी अपने कर्त्तव्य पूरे कर रहे हैं तो अपने लिये नहीं, अपनी आभा के लिये. आभा आंगनवाड़ी में काम करती हैं और ऐसे ही किसी सरकारी सिलसिले में उनकी टांग टूट गयी है. 

तो आभा आजकल विजय की आभा हैं. विजय के सुर्ती ठोंकने की लयगति की आभा, पस्ती और स्याह, उनके पास इकठ्ठा पोथी-पतरे और जनगणना के झोले की आभा हैं आभा. विजय के धीरज की रफ़्तार हैं आभा. विजय 'आभा'-'आभा' नहीं कर रहे हैं लेकिन उनमें कितनी आभा 'हैं'. और जब विजय काम में या आभा में हैं, यह ख़याल है कि चुनौती कि नंदन नीलकेणी के इस महाभियान में आबादी जैसा कितना कुछ है जो गिनती बनकर है और प्रेम जैसा कितना, जो गिनती भी नहीं.  
****

सड़क

सड़क बनती है पिछली सड़क बीत जाती है
तब तक उस पर पड़े क़दम बीत जाते हैं
उसके पहले की सड़कों पर पड़े क़दम और भी बीत जाते हैं
मज़दूर नेता की शवयात्रा में उसी सड़क पर एक मज़दूर का चप्पल टूट जाने की घटना बीत जाती है
मामूलियत बीत गयी महानताएं बीत गईं जोश बीता लड़ाइयाँ बीतीं
पटाक्षेप का भी पटाक्षेप हो गया

और अब,

पीले और हरे पत्ते गिरते हैं उसी क्षण कोलतार बिछा दिया जाता है
ताज़ा कोलतार पर गाय के गोबर करते ही रोलर चलने लगता है
खत्री जी की हवेली नयी सड़क से कुछ इंच और नीचे हो जाती है

बिल्कुल अभी के अनुभव जीवाश्म बनते हैं झाँकते हैं सड़क के आईने में से
लोग देखते हैं अपनी बीती हुई शक्लें
कभी पत्ता, कभी पीक, कभी गोबर
इस बात के मरणधर्मा प्रमाण कि कभी थे
****

एक प्रेम था

एक प्रेम था. पहले प्रेम-सा था. प्रेम क्या, पूरा निबंध था. उसमें सोलह की गंध थी, यानी नहीं भी थी. वह पृथ्वी पर टहलने की बकवास प्रस्तावना था. उसमें आगामी हस्तमैथुन उबड़-खाबड़ एक-दूसरे के ऊपर चढ़े हुए थे. उसमें शिश्न का भूरा था. वीर्यपात के बाद का वैराग्य था उसमें. अब हम मरे नहीं तो इस बात पर क्या हँसने लगें कि जीने-मरने की कसमें थी वहाँ. उसमें '' बेटा! मामा जी को नमस्ते करो '' था. उसमें बनारस का एम.पी. बन जाने की भीषण योजना थी. उसमें सामंत और आगामी माफिया के संवेदन और प्राप्त कर लेने की लालसा थी. उसमें बचने की उम्मीद और तत्काल की प्रागैतिहासिकता थी. उसमें क्लर्कनुमा सुंदर हस्तलिपि थी. उसमें एक अवसरवादी के जूते की बदबू थी.  
****

[ व्योमेश शुक्ल की अन्य रचनाएँ  यहाँ  ]
14 comments:

sundar rachnaayen hain...


बिल्कुल अभी के अनुभव जीवाश्म बनते हैं झाँकते हैं सड़क के आईने में से
लोग देखते हैं अपनी बीती हुई शक्लें
कभी पत्ता, कभी पीक, कभी गोबर
इस बात के मरणधर्मा प्रमाण कि कभी थे

अच्छा प्रयोग


अनुराग बहुत सुन्‍दर प्रस्‍तुति। ऐसी प्रस्‍तुतियों के चलते ही सबद की नयी पोस्‍ट का इंतजार रहता है।


प्रिय अनुराग,
यह तीसरी कविता के बारे में है.मैं उस पर अटका और थोड़े थोड़े अंतराल के बाद उसे चार-पांच बार पढ़ा .हालांकि मैं कोई भी बात स्थापना के स्वर में नहीं कहना चाहता ,फिर भी कहने की इच्छा है (और व्योमेश की कुछ पुरानी कविताओं की छवियाँ भी हैं यह कहते हुए )हम शायद कविता के ज्ञानरंजन को बनते हुए देख रहे हैं.


युवा पीढ़ी में भाई व्योमेश की कविताएं मुझे हमेशा आकर्षित करती रही हैं. उनकी कविताओं का एक अलग ही मिजाज और स्वाद है.


बहुत अच्छी कविताएं......


कविता के 'ज्ञानरंजन' होने की सीमाएं भी झलक रही हैं । प्रयोगों के आकर्षण से कविता मुक्त हो जाए तो ज्ञानरंजन की जगह व्योमेश दिखेंगे । शुभकामनाएँ !


अनुराग जी, में हतप्रभ हूँ.
वाह, क्या तो लिखा है जनगणना पर. फिर सड़क का चरित्र इंसानी चरित्र के साथ कितना जुड़ता है यहां. आईने की तरह साफ शब्द . और अंत में प्रेम की व्यथा. बहुत सुन्दर.
बधाई व्योमेश जी को ...और आप को भी धन्यवाद इसे शेयर करने के लिए


बैक टु बैक तीनों नोट.


मामूलियत बीत गयी महानताएं बीत गईं जोश बीता लड़ाइयाँ बीतीं
पटाक्षेप का भी पटाक्षेप हो गया
बहुत खूब. प्रस्तुतकर्ता एवं रचनाकार दोनों को बधाई


प्रयोगों का स्वागत होना चहिए. पता नही ये अच्छी कविताएं हैं या कुछ और, लेकिन पठनीय हैं. प्रेरक हैं,और रोचक भी.

ये कविता का ज्ञान रंजन क्या है?


सभी कवितायेँ श्रेष्ठ हैं. मेरा व्योमेश जी से निवेदन है कि वे अपना ई मेल पता दे दें. मैं एक संकलित संग्रह के सिलसिले में उन्हें संपर्क करना चाहता हूँ.


बिल्कुल अभी के अनुभव जीवाश्म बनते हैं झाँकते हैं सड़क के आईने में से
लोग देखते हैं अपनी बीती हुई शक्लें
कभी पत्ता, कभी पीक, कभी गोबर
इस बात के मरणधर्मा प्रमाण कि कभी थे.


शुभकामनाएँ !


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