Friday, March 11, 2011

कि दोष लगते देर नहीं लगती/ न गाँठ पड़ते



अम्बर रंजना पाण्डेय  की दो नई कविताएं / चित्र : रवि वर्मा ]

१. 
किसी स्त्री की परपुरुष से इतनी
मैत्री ठीक नहीं देवि

कि दोष लगते देर नहीं लगती 
न गाँठ पड़ते

मेरा क्या मैं तो किसी मुनि का 
छोड़ा हुआ गौमुखी कमंडल हूँ 
जो लगा कभी किसी चोर के हाथ 
कभी वेश्या तो कभी किसी ढोंगी ब्रह्मण के

तुम्हारा तो अपना संसार है देवि
अन्न का भंडार हैं शय्या है
जल से भरा अडोल कलश धरा है
तुम्हारे चौके में
संतान है स्वामी हैं 

भय नहीं तुम्हें कि रह जाऊंगा 
जैसे रह
जाता हैं कूकर रोटी वाले गृह में

चोर हूँ तुम्हारी खिड़की से लटका 
पकड़ा ही जाऊंगा 
मेरा अंत निश्चित है देवि
मेरा काल देखो आ रहा है

मसान है मेरा ठिकाना 
शव मेरी सेज
देखो मुझसे उठती है दुर्गन्ध 
युगों जलती चिताओं की

मत लगो मेरे कंठ 
मेरे कंधे पर नाग का जनेऊ 
मेरे कंठ में विष है देवि.
****

२.
अधगीले चौके में वह
छौंकती है खिचड़ी आधी रात
उजाले को बस डिबरी है
सब और सघन अंधकारा है

मावठा पड़ा है पूस की काली रात
शीत में धूजते है
उसके तलुवे
मुझे लगता है मेरे भीतर
बांस का बन जल रहा है

सबसे पहले धरती है पीतल
भरा हुआ लोटा सम्मुख, फिर पत्तल पर 
परसती हैं भात धुन्धुवाता
सरसों-हल्दी-तेल-नौन से भरा

'यहीं खिला सकती हूँ
मैं जन्म की दरिद्र, अभागिन हूँ 
खा कर कृतार्थ करें
इससे अधिक तो मेरे पास केवल यह
देह है
मैल है धूल है, शेष कुछ नहीं'

संकोच से मेरी रीढ़ बाँकी होती 
जाती है ज्यों धनुष 
वह करती रहती है प्रतीक्षा 
मेरे आचमन करने की
कि मांग सकें जूठन 

और मेरी भूख है कि शांत ही नहीं होती
रात का दिन हो जाता है
अन्न का हो जाता है ब्रह्म.
****

16 comments:

Manohar said...

bahut hi sundar kavitayen..Umber ji or Anuraag ji ko badhai :)

पारुल "पुखराज" said...

बहुत-बहुत सुंदर... कविताएँ

वंदना शुक्ला said...

bahut achchee kavitayen

सागर said...

पहली कविता बहुत सघन है, खुद के होने, खुद के होने में प्रेम के होने और उसे नकारने का द्वन्द लिए, एक ऐसी स्थिति ना निगला जाये न उगला जाए.

दूसरी कविता के बिम्ब बहुत प्रिय और सुन्दर हैं...

और चित्र सबद पर हमेशा की तरह लाजवाब... सबद - एक क्लासिक ब्लॉग, ब्लॉग नहीं सुसंपादित पत्रिका.

anjule shyam said...

वाह कमाल का रचा है ये कविता.....बार बार पढ़ रहा हूँ...और समझने की कोशिश कर रहा हूँ...

प्रवीण पाण्डेय said...

दोनों ही बहुत अर्थमयी कवितायें।

चण्डीदत्त शुक्ल said...

उफ! आह!! वाह!!! आप हंसेंगे संभवतः पर यह सत्य है कि मैं रचनाकार के स्थूल अस्तित्व से अपिरिचित हूं पर उनका काव्य संसारातीत है। आपसे मिलें, तो कहिएगा...स्तब्ध है एक पाठक और अतीत के बिंबों से जूझ रहा है।

Travel Trade Service said...

मत लगो मेरे कंठ
मेरे कंधे पर नाग का जनेऊ
मेरे कंठ में विष है देवि......

यहीं खिला सकती हूँ
मैं जन्म की दरिद्र, अभागिन हूँ
खा कर कृतार्थ करें
इससे अधिक तो मेरे पास केवल यह
देह है
मैल है धूल है, शेष कुछ नहीं'

.आरे वाह भाई वाह ...दोनो बहुत गज़ब की जीवन की अन छुए पलों की या इन्सान को दोराहो पर लाकर खड़े करने की प्रासंगिक अभिव्यक्ति शब्दों की अम्बर रंजना जी की ....बहुत दिनों बाद इस तरह की कविता पड़ने को मिली ...धन्यवाद अनुराग जी शेयर करने का

dinesh trapathi said...

dono hi kavitayen prabhavpoorn. aapko va ambar ji ko badhayee.

रवि कुमार said...

उम्दा कविताएं...

प्रशान्त said...

बेहतरीन कविताएं!!!
शीत में धूजते है उसके तलुवे/मुझे लगता है मेरे भीतर बांस का बन जल रहा है...
वह करती रहती है प्रतीक्षा/मेरे आचमन करने की/कि मांग सकें जूठन/
और मेरी भूख है कि शांत ही नहीं होती/रात का दिन हो जाता है/अन्न का हो जाता है ब्रह्म..
--- अद्भुत पंक्तियां!!!

sudipti said...

कविताएँ और चित्र दोनों एक दूसरे को पूरा करते दिखते है
चित्र काव्यात्मक है और कविता चित्रात्मक
अम्बर ओर अनुराग दोनों को धन्यवाद

sushobhit saktawat said...

hamesha ki tarah sunder, maulik aur ek vilakshan kavya parampara ko pradarshit karti hui aapki ye kavitayein.

Teji Grover said...

Umber, beech beech me tumhari kavitaen jugnuon kee tarah ekdam paas aa jaati hain, bachpan kee yaad ho jaise koi, kyonki ab jugnu kahan!

RAJESHWAR VASHISTHA said...

पठनीय कविताएँ।

akhilesh srivastava said...

वाह, गीत जी के कहने पर पढ़ा। बेहतरीन कविताएं ।