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Showing posts from March, 2011

कथा : ४ : आशुतोष भारद्वाज

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अंतिम आलाप
म।
तुमने उसे एम नाम इसलिये नहीं दिया होगा कि उसकी दोनो पिंडलियों पर मृत्यु के हस्ताक्षर नीले अक्षरों में खुदे होंगे या कि वह तुम्हारे संग उस पहाड़ी कस्बे के उजाड़ कब्रिस्तान में खो जाने को मचल रही होगी जब तुम उन ढहते पत्थरों का उससे जिक्र करोगे न इसलिये कि तुम्हें वह पहली ही मुलाकात में इसी अक्षर के नाम वाले एक कथाकार के किसी उपन्यास की नायिका लगेगी।

ब तुम उसे पहली बार सात मार्च को अपने शहर के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रात की रोषनियों के बीच काली टी शर्ट, काली स्कर्ट और काले बूट्स में कुलबुलाते देखोगे और फिर उसे होटल ले जाओगे और हॉंलांकि इस बीच वह लगातार तुमसे बात करती रहेगी लेकिन हवाई अड्डे से होटल तक की कार यात्रा में ही तुम अपने और उसके बीच एक ठंडी और तटस्थ दूरी महसूस करोगे जो अटकती भटकती रास्ता टटोलती उसकी बेचैन स्मृति में तुम्हारी ललक और उसके अनुसार तुम्हारी सरफिरी कहानियों में उसकी दिलचस्पी के बावजूद बनी रहेगी -- एक गहरी खाई जो तुम्हें तब तलक नहीं मालूम होगा उसके नाम के अक्षरों में अपनी अकुलाहट हासिल करती होगी। तभी तुम्हें लगेगा आगामी कुछ दिन जो तुम्हें उसके साथ उस पह…

तीन नई कविताएं : व्योमेश शुक्ल

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[ चित्र-कृति   :  बिलासेंदु शील ]

जनगणना

और जब बग़ैर किसी ख़ास वजह के आप उनसे पूछते हैं कि आपका नाम क्या है, आप कौन सी नौकरी करते हैं तब पता चलता है कि विजय प्रकाश लाल जनगणना नहीं प्रेम करने निकले हैं. एक कानूनी दिन में सिर्फ़ ५ घरों की जनगणना की जा सकती है, लेकिन वह सुबह से ३४ घरों को निबटा चुके हैं और सूर्यास्त तक पूरे मुहल्ले का हिसाब साफ़ कर देने का इरादा रखते हैं. वह चाय पीने और दूसरी औपचारिकताओं के सामने लगातार सख्त होते इंसान हैं. यों, आजकल जनगणना नहीं इश्क़ हो रहा है मेरे देश में.


जीवन के उन्तालीस मनहूस नागरिक विवरण नोट कराते हुए मालूम हुआ कि अत्यन्त रूढ़ सरकारी हिंदी में अपने निम्नमध्यवर्गीय वाक्य का विन्यास ज़बान पर क़रीने से उठाये विजय प्रकाश अगर इतनी जल्दी-जल्दी अपने कर्त्तव्य पूरे कर रहे हैं तो अपने लिये नहीं, अपनी आभा के लिये. आभा आंगनवाड़ी में काम करती हैं और ऐसे ही किसी सरकारी सिलसिले में उनकी टांग टूट गयी है. 
तो आभा आजकल विजय की आभा हैं. विजय के सुर्ती ठोंकने की लयगति की आभा, पस्ती और स्याह, उनके पास इकठ्ठा पोथी-पतरे और जनगणना के झोले की आभा हैं आभा. विजय …

शताब्दी स्मरण : अज्ञेय

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[ हिंदी साहित्य में अज्ञेय के अवदान को रेखांकित करना कुछ हद तक इसलिए भी कठिन है क्योंकि लेखक अज्ञेय पर बात करने में कतिपय दिक्कतों से दो-चार होते ही विज्ञ या सामान्य पाठक व्यक्ति अज्ञेय पर बात बनाने में सहूलियत महसूस करते रहे. उनके खिलाफ इस तरह एक पौलिमिक्स ही खड़ी की गई थी, जो हालाँकि वक़्त के साथ निष्प्रभ हो चुकी है, इधर यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि अनेक बुद्धिजीवियों-लेखकों ने उन्हें नए सिरे से पढने-देखने का जतन किया है, जिनका अज्ञेय के विचारों से सीधा जुड़ाव कभी नहीं रहा. चंद्रभूषण उन्हीं के बीच से आते हैं और उन्होंने आग्रह करने पर अज्ञेय की कालजयी कृति ''शेखर : एक जीवनी'' पर एक भिन्न नुक्ते से लिखा है. हमें मालूम है कि अज्ञेय का जीवन, जैसा कि उनका साहित्य भी, भरापूरा और बहुवर्णी रहा है. उसे किसी एक नुक्ते से उभारने से उसकी आभा मिल सकती है, सम्पूर्ण आकर नहीं. उनके जन्म-शताब्दी वर्ष में सबद की ओर से यह विनम्र प्रणति. ]

शेखर :एक जीवनी अज्ञेय की सबसे चर्चित लेकिन अधूरी रचना है। उनके रचना-क्रम में यह कहीं बीच में पड़ती है- न सबसे पहले, न सबसे बाद में। हालांकि इसकी प्रस्…

कि दोष लगते देर नहीं लगती/ न गाँठ पड़ते

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अम्बर रंजना पाण्डेयकी दो नई कविताएं / चित्र : रवि वर्मा ]
१. 
किसी स्त्री की परपुरुष से इतनी मैत्री ठीक नहीं देवि
कि दोष लगते देर नहीं लगती  न गाँठ पड़ते
मेरा क्या मैं तो किसी मुनि का  छोड़ा हुआ गौमुखी कमंडल हूँ  जो लगा कभी किसी चोर के हाथ  कभी वेश्या तो कभी किसी ढोंगी ब्रह्मण के
तुम्हारा तो अपना संसार है देवि अन्न का भंडार हैं शय्या है जल से भरा अडोल कलश धरा है तुम्हारे चौके में संतान है स्वामी हैं 
भय नहीं तुम्हें कि रह जाऊंगा  जैसे रह जाता हैं कूकर रोटी वाले गृह में
चोर हूँ तुम्हारी खिड़की से लटका  पकड़ा ही जाऊंगा  मेरा अंत निश्चित है देवि मेरा काल देखो आ रहा है
मसान है मेरा ठिकाना  शव मेरी सेज देखो मुझसे उठती है दुर्गन्ध  युगों जलती चिताओं की
मत लगो मेरे कंठ  मेरे कंधे पर नाग का जनेऊ  मेरे कंठ में विष है देवि. ****
२. अधगीले चौके में वह छौंकती है खिचड़ी आधी रात उजाले को बस डिबरी है सब और सघन अंधकारा है
मावठा पड़ा है पूस की काली रात शीत में धूजते है उसके तलुवे मुझे लगता है मेरे भीतर बांस का बन जल रहा है
सबसे पहले धरती है पीतल भरा हुआ लोटा सम्मुख, फिर पत्तल पर  परसती हैं भात धुन्धुवाता सरसों-हल्दी-तेल-नौन से भरा
'…