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महेश वर्मा की तीन नई कविताएं




अनुवाद

      दरवाजे के दो पल्ले अलग-अलग रंगों के, दो आदमियों के बीच अपरिचित पसीने की गंध और एक आदमी की दो पुतलियाँ अलग अलग रंगों की. एक तहजीब में परिचय का हाथ आगे बढाते तो दूसरी सभ्यता के अभिवादन से उसे पूरा करते. शराब मेज़ से उठाये जाने से लेकर होठों तक आने में अपना रंग और असर बदल चुकी होती. उधर से कोई गाली देता तो इधर आते तक खत्म हो रहता उसका अम्ल. एक देश के सिपाही का खून बहता तो दूसरे देश के सिपाही के जूते चिपचिपाने लगते. यहाँ जो चुम्बन था वहाँ एक तौलिया. एक आदमी के सीने में तलवार घोंपी जाती तो दूसरे गोलार्द्ध पर चीख सुनाई देती, यहाँ का आंसू वहां के नमक में घुला होता जो यहाँ के समंदर से निकला था.
      एक कविता जो उस देश की ठंडी और धुंधली सांझ में शुरू हुई थी दूसरे देश की साफ़ और हवादार शाम पर आकर खत्म होती. वहां का घुडसवार यहाँ के घोड़े से उतरेगा. यहाँ की नफरत वहाँ के प्रतिशोध पर खत्म होगी लेकिन लाल ही होगा खून का रंग. जहाँ प्यार था वहाँ प्यार ही होगा जहां स्पंदन था वहीं पर स्पंदन, केवल देखने की जगहें बदल जातीं.
      अनुवादक दो संस्कृतियों के गुस्से की मीनारों पर तनी रस्सी पर बदहवास दौडता रहता, कभी रुककर साधता संतुलन, पूरा संतोष कहीं नहीं था.
****

उन दिनों -१ 

     अक्सर लगता कि कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है, कोई दे रहा है आवाज़, देर से बज रही है फोन की घंटी, बाहर बारिश हो रही है. फोन के मूर्ख चेहरे को घूरना छोड़ कर बाहर आते तो दिखाई देता उड़ता दूर जाता पॉलीथीन का गुलाबी थैला. पता नहीं वे कौन से दिन थे और कौन सा मौसम. एक जिंदा खबर के लिए अखबार उठाते तो नीचे से निकल कर एक तिलचट्टा भाग कर छुप जाता अँधेरे मे.
     सुनाई नहीं देता था कोई भी संगीत कोई चिट्ठी हमारी चिट्ठी नहीं थी, किसी को नहीं करना था अभिवादन, कोई शिकायत नहीं थी सड़क की कीचड से या गड्ढे से.
     रात आती तो देर तक ठहरती कमरे में और आँख में. सारे मजाक खत्म हो चुके थे अपने अधबीच, कोई चिड़िया आ जाती भूल से तो रुकी रहती जैसे दे रही हो सांत्वना फिर ऊबकर वह भी चली जाती शाम के भीतर.
    पेशाब करते हुए सामने के धुंधले आईने में जितना दिखाई देता चेहरा, उसे देखते और हंस देते अकेले.
****

उन दिनों -२

     बातों की सड़क से उतरकर ख्यालों की पगडंडियाँ पकड़ लेते फिर सड़क को भूल जाते और चौंक कर कहीं मिलते कि बात क्या हो रही थी तो वह ख्यालों का ही चौराहा होता. जैसे एक गूँज से बनी सुरंग में अभिमंत्रित घूमते रहते और बाहर की कम ही आवाजें वहां पहुँच पातीं, कभी कोई आवाज़ आकर चौंका देती तो वह भी गूँज के ही आवर्त में अस्त हो जाता - आवाज नहीं चौंक उठाना.
     उन दिनों बहुत कम बाहर आना होता था अपने डूबने की जगह से. धूप की तरह आगे आगे सरकती जाती थी मौत, प्रायः वह खिन्न दिखाई देती. चाँद नीचे झांकता भी तो फिर घबराकर अपनी राह पकड़ लेता, फूल उदास रहते. खिडकी कोई बंद दिखाई देती तो चाहते खड़े होकर उसे देखते रहें देर तक, देर जब तक शाम उतर न आये.
     डूबने से बाहर आते तो बाहर का एक अनुवाद चाहिए होता. इस बीच लोगों के मरने और विवाह करने की ख़बरें होतीं.
****

[ महेश वर्मा हिंदी के चर्चित युवा कवि हैं.
कविता के साथ दी गई तस्वीर गूगल से. ]
9 comments:

अनुवादक सेतु है दो संस्कृतियों का, दो भाषाओं का और दोनों के निशाने पर रहता है।


महेश अपने तरीके से कवितायें लिखते हैं लेकिन अपनी भर नहीं. सुंदर कविताओं के लिये आभार.


उम्‍दा कविताएं. महेशजी की भाषा ने विशेष प्रभावित किया.


सुंदर रचनाएँ...

महेश जी आपको पहली बार पढ़ा...
एक अलग भाषा शैली...अच्छा लगा ...


"अनुवाद" गहनता को और और कुरेदती. बेहद खूबसूरत रचनाएँ !


उम्दा रचनाएं!
अलग अनुभूति इनको पढकर ..


सुन्दर रचनाएँ पढ़वाने के लिए आपका आभार -अवनीश सिंह चौहान


सुमन केशरी

बहुत अलग मिजाज की रचनाएं...


'डूबने से बाहर आते तो बाहर का एक अनुवाद चाहिए होता. इस बीच लोगों के मरने और विवाह करने की ख़बरें होतीं'
गहरे उतर गयीं तीनो ही .


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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