Wednesday, February 16, 2011

कवि की संगत कविता के साथ : १० : मोहन राणा



आत्मकथ्य

कविता अपना जनम खुद तय करती है. मैं उसके लिए शब्द नहीं बटोरता, कविता अपने शब्द भी खुद लाती हैहालाँकि यह हमेशा संभव नहीं हो पाता कि उसे पूर्णता से व्यक्त कर पाऊँलगता है जैसे हर कविता, पिछली कविता का कोई छूट गया अंश ही हो जो छूट गया, और फिर रह जाता है अधूरा ही हर नई कविता में.

मेरा मानना है कविता किसी माध्यम पर अंकित-टंकित शब्दों के विन्यास में नहीं वह पाठक के भीतर है. उनमें मौजूद आवाज उन्हें पढ़ कर ही फिर से बोल पाती है कभी हम उसे पहचान लेते हैं कभी वह आवाज हमारे अंर्तलोक के शोर में गुम हो जाती है.


कविता हमें कुछ याद दिलाती है उस वर्तमान की जो घट चुका है, यह वह अतीत जिसे अभी भविष्य बनना है पर हमें याद नहीं है.

पिछले कुछ बरसों से सच
, प्रेम, अस्मिता और यथार्थ प्रकृति के सवालों की ओर मैं बार बार लौटता हूँ या कहें कि वह साथ ही हैं छाया की तरह, अतृप्त अपने ही जवाबों से.  इस हलचल में मैं एक  दूर और पास के दैनंदिन आतंरिक भूगोल के  अन्वेषण में लगा हूँ. मेरा इरादा कोई नक्शा तैयार करना नहीं हैं वह मुझे लगता है पहले से ही बना हुआ है, उपस्थित है प्रकृति के नियमों की तरह ,उसकी पुष्टि भर करनी है.

लेखक कविता और शब्द संरचना के बीच कार्बन पेपर की तरह है,जो हम छपा देखते-पढ़ते हैं वह दरअसल एक अनुभव का अनुवाद है जिसमें एक सच्चाई उकेरा गया है. कविता दो बार किसी भाषा में अनुवादित होती है पहली बार जब उसे शब्दाकार दिया जाता है दूसरी बार जब उसे पढ़ा और सुना जाता है.

कविता अकथनीय सच का अंर्तबोध है और प्रेम का दिशा सूचक, भय मुक्त जीवन को जीने की रास्ता है. हर शब्द इस रास्ते पर एक कदम है. और हर कदम एक रास्ता है.
****




कविताएं 

पानी का रंग
(जेन के लिए)

यहाँ तो बारिश होती रही लगातार कई दिनों से
जैसे वह धो रही हो हमारे दाग़ों को जो छूटते ही नहीं
बस बदरंग होते जा रहे हैं कमीज़ पर
जिसे पहनते हुए कई मौसम गुजर चुके
जिनकी स्मृतियाँ भी मिट चुकी हैं दीवारों से

कि ना यह गरमी का मौसम
ना पतझर का ना ही यह सर्दियों का कोई दिन
कभी मैं अपने को ही पहचान कर भूल जाता हूँ,

शायद कोई रंग ही ना बचे किसी सदी में इतनी बारिश के बाद
यह कमीज़ तब पानी के रंग की होगी !
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अरे यह क्या है

यह सामान कैसा
अब यह रास्ता नहीं
कुछ रखने की जगह है

यह आवाज कैसी
इतने शोर में
कि सन्नाटा भी चुप हो गया सुनकर

यह स्पर्श किसका
कि नग्नता भी हो गई देहमुक्त

यह पहचान किसकी
कि झुक गया सिर सच का भी
देखकर अपना झूठ

यह बात कैसी निजी
कि सब सुन रहें हैं कानों को बंद किये

चोर समय चुरा रहा है अपने आपको ही
पर विलाप कोई और करता ईश्वर के खो जाने का.
****

एक पैबंद कहीं जोड़ना

वो जंगल पहले सूखा मेरे भीतर
पत्थर हुई नदी
आकाश  हुआ बांझ वहाँ
धरती हुई परती सबसे पहले वहाँ
फैला मरूथल
सोखते की तरह सोख लेता हर नमी को
कि हर आकार गिर पड़ता अपनी ही जड़ों में
पहले पहल किया मैंने रेत के पुल को पार वहाँ
उसे शब्दों में कहने से पहले,
पावों तले दिखा कुछ हरा सा सूखता
एक याद जो बालू हो गई छूते ही
वहीं खो गए मेरे पदचिन्ह
बौराई घूमती है एक गरम हवा
उधड़ेती सांसों को फेफड़ों से,

बाहर दिखते भीतर के अंतरलोक में
बचे हैं व्यतीत दिन  मकड़जालों में
टूटी हुई कुदालों के साथ बैठी हैं आशाएँ
दिन के अधूरे छोरों पर
एक पैबंद कहीं जोड़ना
कि बन जाय कोई दरवाजा
इस सदी को रास्ता नहीं मिल रहा समय की अंधी गली में,

खुली आंखो से दिखता है जो अब
ये दुनिया इसका आसपास
धूल होते शब्द
पहले मेरे भीतर ही उड़ी थी आँधी
****

लार्ड मैकाले का तंबू

मैं वर्नकुलर भाषा में कविता लिखता हूँ
आपको यह बात अजीब नहीं लगती
मैं कंपनी के देश में वर्नकुलर भाषा में कविता लिखता हूँ,

मतलब कागज पर नाम है देखें
मिटे हुए शब्दों में धुँधली हो चुकी आँखें
ढिबरी से रोशन गीली दोपहरों में,
कबीर कह चुके असलियत
माया महाठगनि हम जानी,
और मैं केवल अपने आप से बात कर सकता हूँ
पहले खुद को अनुसना करता हूँ

कोई नहीं संदर्भ के लिए रख लें इस बात को कहीं
आगे कभी जब दिखें लोग आँखें बंद किये
तो पार करा दीजियेगा उन्हें रास्ता कहीं कुछ लिख कर,
मैं खुद भी भूल गया था इसे कहें रख
कुछ और खोजते आज ही मुझे याद आया
मैं भाग रहा था  अपने ही जवाबों के झूठ से
कहता मैं सच की तलाश में हूँ

मैंने अपने बगीचे में बाँध रखीं हैं घंटियाँ पेड़ों से
एकाएक मैं जाग उठता हूँ उनकी आवाजें रात में सुनकर
कहीं वे गुम ना हो जाएँ
मेरे वर्नकुलर शब्दों की तरह
****
[ इस स्तंभ के अन्य कवि को इस रस्ते पढ़ा जा सकता है : ९  इससे पहले यहां. साथ में दी गई तस्वीर मधुमिता दास के कैमरे से. ]

10 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी ही सुन्दर कवितायें। सच है शब्द कोई खोजता नहीं, शब्द स्वयं ही प्रकट हो जाते हैं विचार श्रंखलाओं में।

पारुल "पुखराज" said...

याद का बालू हो जाना
वाह …

विजय गौड़ said...

bahut hi sundar kavitain hain, chayan aur prastuti ke liye badhai evm aabhar.

डॉ .अनुराग said...

अपने बगीचे में बाँध रखीं हैं घंटियाँ पेड़ों से
एकाएक मैं जाग उठता हूँ उनकी आवाजें रात में सुनकर
कहीं वे गुम ना हो जाएँ
मेरे वर्नकुलर शब्दों की तरह
****


vah...vah.....

स्वप्नदर्शी said...

एक याद जो बालू हो गई छूते ही
वहीं खो गए मेरे पदचिन्ह
बौराई घूमती है एक गरम हवा
उधड़ेती सांसों को फेफड़ों से,

बहुत खूब !

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

अनुराग जी... आपकी यह उम्दा ब्लॉग पोस्ट और कविताएँ आज चर्चामंच पर हैं... आप अपने अमुल्य विचारों से अनुग्रहित कीजियेगा ..

http://charchamanch.blogspot.com/2011/02/blog-post_18.html

Atul Shrivastava said...

अच्‍छी कविताएं।
आत्‍मकथ्‍य में सच ही कहा है आपने कि कविताएं लिखी नहीं जाती, वह तो मन के भाव हैं जो कागजों में खुद ब खुद उभर आते हैं।

महेश वर्मा said...

कवि का आत्मकथ्य बहुत साफ़,ईमानदार और जैसे अपने को ढूँढता सा.
''कविता दो बार किसी भाषा में अनुवादित होती है पहली बार जब उसे शब्दाकार दिया जाता है दूसरी बार जब उसे पढ़ा और सुना जाता है''
जैसी पंक्तियाँ बता रहीं कि अपनी इस काव्य यात्रा को भी कवि ने किस कलात्मकता से देखा है .
कवितायें तो मंजी हुई और छूती हुई हैं ही . कवि और अनुराग जी के प्रति आभार .

गिरीन्द्र नाथ झा said...

यदि आप चुप रहकर मन को सुनना चाहते हैं तो अरे यह क्या है पढिए। राणा साब यहां सामान के बहाने जीवन की सच्चाई बयां कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यह सामान कैसा, अब यह रास्ता नहीं। कविता के प्रवाह में यदि आप आगे बढेंगे तो मौन के सिवा आपके सामने कोई विकल्प नहीं बचेगा। मेरे हिसाब से एक कविता की सबसे बड़ी ताकत मौन ही होती है (कभी-कभी मौन से भी क्रांति की लौ उठती है)। यहां कवि कहता है- चोर समय चुरा रहा है अपने आपको ही, पर विलाप कोई और करता ईश्वर के खो जाने का.
पूरी समीक्षा यहां पढ़िए-http://anubhaw.blogspot.com/2011/02/blog-post_16.html

leena malhotra said...

उसे शब्दों में कहने से पहले,पावों तले दिखा कुछ हरा सा सूखताएक याद जो बालू हो गई छूते हीवहीं खो गए मेरे पदचिन्ह bahut sundar rachna. kavi ka maun samvad pathneey bhi hai aur prashansneey bhi . bahut achhi.