Tuesday, February 08, 2011

अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं


कवि का वक्तव्य :


एक होता हैं मेहनती आदमी, आत्मनिर्भर. घर से कुछ नहीं लेता, स्वयं जमीन तोड़ कर जीविका चलाता हैं. बुरी आदतों से दूर, ईमानदार. दूसरा होता हैं ऐय्याश. खानदानी रईस. कमाता एक नहीं गँवाता लाख हैं. उसे सब चाहिए-पुरखों के हीरे-मोती, बाप की जमीन, माँ का बक्स, भाई का बटुवा, नानी के लड्डूगोपाल का चांदी का पालना.

ऐसे ही दो कवि होते हैं, मैं शायद दूसरा वाला कवि हूँ. मुझे अपनी पूरी परंपरा चाहिए. उसकी पूरी समृद्धि पूरा श्रम.

वाल्मीकि चोरों में कवि हुए और मैं कवियों में चोर हूँ.

बीते दिनों मध्यप्रदेश के वृक्षों पर एक सौ एक कविता लिखने की योजना हुई हैं. हो सकता हैं यह योजना वर्ष भर में पूरी हो जाएँ या सौ वर्ष की आयु भोग कर जब मैं मरुँ तब भी निन्न्यांबें कवितायेँ ही पूर्ण हों. फिलहाल पांच कवितायेँ प्रस्तुत हैं.
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[ तस्वीर : मधुमिता दास ]

कविताएं :

गूलर

तुम तो कहते थे गूलर दिख जाने
से दारिद्रय आता हैं. कोढ़ी
बता गए नागार्जुन भी इसे पर
गुंफित डालियों पर गुल्म गोदों
का हर्ष से भरता हैं ज्यों दूध से
यह गूढ़, गुथुवन तना भरा हैं.
मारी गुच्छों पर गुलेल से गोटियाँ
गिरा दिए आठ-दस फल. फूटा
डंठलों से दूध. हेमदुग्धा यों ही
न कह गए पुरातन कवि. ऐसी
श्री किसके निकट हैं, कहो तो! तब क्यों
कटाते हो? रह भी जाने दों.
जब बचेगी न साग न कोदों घर में;
खाया करेंगे गोदों ढेर.
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कदम्ब

कर्बुर शब्दों से बने वाक्य का एक ही रंग
होता हैं जैसे कदम्ब के सब फूलों का हैं
एक ही रंग. जो होते हैं प्रकट वृक्ष पर
जैसे फूटता हैं अर्थ शब्दों का मस्तिष्क में.
नेपथ्य अभिनेत्रियों का झुण्ड सजा खड़ा हो
मंच पर उजागर संकेत भर में हो,
यों सुन भीषण मेघ डम्बरी इसके पोर
फूट पड़ते हैं फूल औचक. क्लिष्ट, घना
स्वरूप बाणभट्ट की कादंबरी सा इसका
हैं. तर्कशास्त्रियों ने इसके नीचे पाए
जाने वाले अन्धकार पर युगों विवाद ही
किया हैं. इसका फल होता हैं ललछोंहा
सूर्यास्त सा. जब काला पड़कर गिरता हैं
पाषाण जैसा कठोर हो जाता हैं. छोकरों
की कनपटियों पर किशोरियां साधती हैं
निशाना. कादम्ब फलों की अबतक मैंने
मार ही खायी हैं. फल कभी नहीं खाया. स्वाद
पर चर्चा फिर कभी, कहीं करूँगा बाबू.
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बबूल

टीबे की ओंट खड़ा हूँ. मेरी भी टूम-टिमाक
हैं. टहनियों टसकें हैं फूल टहटहे
मगर टुंच अपनी टीप हैं. टूटरूं टोंट
उठा टहक रहा हैं. आ बैठता एकाकी
कौआ कभी. मेरा यह मजबूत कलेवर
लेकर कृषक सिला पर पैदा कर सकता
धान. ऐसी टांठी काठ हैं मेरी. दातुन लेने
टाँकी मारते हैं बूढ़े बस. टोली ने टांकी
से लौटते टार्च मारी थी मुझपर, टिहुक
उठा था मन मगर वह टोहा-टाई तो
किसी प्रेत को टोंचने के लिए थी. फूलों पर
किसकी नजर जाती? हल की मुठिया बन
जाने की कामना लिए खड़ा हूँ मैं टिढ़-बिंगा
सहता आप-आतप-अपमान-गर्हणा।
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बेर

मर्कट-दल उत्पात मचा कर
अभी अभी गया हैं.
बदरी का बेचारा बालक वृक्ष इसी बरस तो
फला था .
हरे हरे बेर टूंग टूंग कर
फेंक गए वानर.
तुम दुखी मत हों बदरी गाछ.

जानता हूँ गौधूलि
लौटती बेर असंख्य शुकों का झुण्ड
विश्राम पाता था तुमपर जरा अबेर.
पियराते बेरों के लिए ललचाता किन्तु अगली
ऋतु और भी फलोगे तुम.
अरुण-पिंगल फूलों से झोल खा जाएँगी
डगालियां.

निराश होना ठीक नहीं यों.
बीत जाने दो शीत-काल, पड़ जाने दो तुषार.
वसंत आते ही
फुनगियों फूल जायेंगे लजीले फूल हज़ार.
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अमरुद वृक्ष

सहस्र दिन पुरातन मूत्र-गंध
से त्रस्त थे नासापुट महू
के रेलगाड़ी स्टेशन पर.
ऊबकाई ले रही थी फिर
फिर प्रौढ़ाएं. नकुट ढंके थे
चन्दन चर्चित मुनियों के दल.
तब अचानक जैसे आकाश
में द्रोणमेघों का झुण्ड हो
उठता. उठी किसी विजयी की
ध्वजा सी अमरूद की गंध.
चौकोर गवाक्ष में छपरे
में तिरछौहे तिरछौहे धर
अमरूद एक श्याम किशोर
खड़ा था. बाहर बाहर हरे
भीतर आरक्त. एक योगी
ने परमहंस परंपरा के
चलाई प्रत्यग्र फल पर छुरी.
ज्ञानी कहते जो आये हैं
कि बीज में वृक्ष हैं. प्रत्यक्ष
हो उठा अमरूद-तरु समक्ष.
रंगों की प्रयोगशाला में
अपूर्व शोध अमरूद वृक्ष
ने किया हैं और तब जाकर
प्रकट हुए हैं हरे रंग के
विविध वर्ण. फुनगियों बाल-शुक
सा हरा. भीतर की टहनियों
का रंग वृद्ध कुटुरु के खीन-
जर्जर पंख सा गहरा. फलों
के हरे रंग के भी अनेक
छंद हैं. कोई कोई वृक्ष
का फल जैसे चौपाई हो-
हरे से हरिद्ररंगी. ऊपर ऊपर
अरुणिम. कोई फल तो
मानों किसी मानिनी के हो
स्तन जो बाहर तनिक पिंगल
प्रतीत तो होते हैं, किंचित
कक्खट भी किन्तु दांत लगते
लाल हो उठते हैं. बालिका
सा बढ़ता हैं अमरूद वृक्ष.
वर्ष में फलता हैं दो बार.
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7 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

वृक्षों पर कविता लिखकर उनको भरापूरा व्यक्तित्व दे दिया आपने।

abcd said...

अद्भुत...
निराली...
सुखद...
informative as well.../

Meenu Khare said...

गहरे अर्थ लिए हुए कविताएँ बहुत मन भायीं.

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

"छोकरों की कनपटियों पर किशोरियां साधती हैं
निशाना. कादम्ब फलों की अबतक मैंने
मार ही खायी हैं.फल कभी नहीं खाया."

आपके चिट्ठे पे आके कभी निराशा नहीं होती,
एक उम्मीद लिए आते हैं और ख़ुशी-ख़ुशी जाते हैं :)

Uday Prakash said...

Vaaaah! This is the only comment I can think of...!

प्रदीप जिलवाने said...

उदयप्रकाशजी की तरह मेरे पास भी इस कविताओं के लिए सिर्फ एक शब्‍द है - अद्भुत ... बधाई

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब...
ऐसा लालित्य और ऐसा सजीला शब्दसंसार....
एक विरल और दुर्लभ अनुभूति हुई कई दिनों बाद।
बधाई स्वीकारें कविवर...