सबद
vatsanurag.blogspot.com

अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं


कवि का वक्तव्य :


एक होता हैं मेहनती आदमी, आत्मनिर्भर. घर से कुछ नहीं लेता, स्वयं जमीन तोड़ कर जीविका चलाता हैं. बुरी आदतों से दूर, ईमानदार. दूसरा होता हैं ऐय्याश. खानदानी रईस. कमाता एक नहीं गँवाता लाख हैं. उसे सब चाहिए-पुरखों के हीरे-मोती, बाप की जमीन, माँ का बक्स, भाई का बटुवा, नानी के लड्डूगोपाल का चांदी का पालना.

ऐसे ही दो कवि होते हैं, मैं शायद दूसरा वाला कवि हूँ. मुझे अपनी पूरी परंपरा चाहिए. उसकी पूरी समृद्धि पूरा श्रम.

वाल्मीकि चोरों में कवि हुए और मैं कवियों में चोर हूँ.

बीते दिनों मध्यप्रदेश के वृक्षों पर एक सौ एक कविता लिखने की योजना हुई हैं. हो सकता हैं यह योजना वर्ष भर में पूरी हो जाएँ या सौ वर्ष की आयु भोग कर जब मैं मरुँ तब भी निन्न्यांबें कवितायेँ ही पूर्ण हों. फिलहाल पांच कवितायेँ प्रस्तुत हैं.
****
[ तस्वीर : मधुमिता दास ]

कविताएं :

गूलर

तुम तो कहते थे गूलर दिख जाने
से दारिद्रय आता हैं. कोढ़ी
बता गए नागार्जुन भी इसे पर
गुंफित डालियों पर गुल्म गोदों
का हर्ष से भरता हैं ज्यों दूध से
यह गूढ़, गुथुवन तना भरा हैं.
मारी गुच्छों पर गुलेल से गोटियाँ
गिरा दिए आठ-दस फल. फूटा
डंठलों से दूध. हेमदुग्धा यों ही
न कह गए पुरातन कवि. ऐसी
श्री किसके निकट हैं, कहो तो! तब क्यों
कटाते हो? रह भी जाने दों.
जब बचेगी न साग न कोदों घर में;
खाया करेंगे गोदों ढेर.
****

कदम्ब

कर्बुर शब्दों से बने वाक्य का एक ही रंग
होता हैं जैसे कदम्ब के सब फूलों का हैं
एक ही रंग. जो होते हैं प्रकट वृक्ष पर
जैसे फूटता हैं अर्थ शब्दों का मस्तिष्क में.
नेपथ्य अभिनेत्रियों का झुण्ड सजा खड़ा हो
मंच पर उजागर संकेत भर में हो,
यों सुन भीषण मेघ डम्बरी इसके पोर
फूट पड़ते हैं फूल औचक. क्लिष्ट, घना
स्वरूप बाणभट्ट की कादंबरी सा इसका
हैं. तर्कशास्त्रियों ने इसके नीचे पाए
जाने वाले अन्धकार पर युगों विवाद ही
किया हैं. इसका फल होता हैं ललछोंहा
सूर्यास्त सा. जब काला पड़कर गिरता हैं
पाषाण जैसा कठोर हो जाता हैं. छोकरों
की कनपटियों पर किशोरियां साधती हैं
निशाना. कादम्ब फलों की अबतक मैंने
मार ही खायी हैं. फल कभी नहीं खाया. स्वाद
पर चर्चा फिर कभी, कहीं करूँगा बाबू.
****

बबूल

टीबे की ओंट खड़ा हूँ. मेरी भी टूम-टिमाक
हैं. टहनियों टसकें हैं फूल टहटहे
मगर टुंच अपनी टीप हैं. टूटरूं टोंट
उठा टहक रहा हैं. आ बैठता एकाकी
कौआ कभी. मेरा यह मजबूत कलेवर
लेकर कृषक सिला पर पैदा कर सकता
धान. ऐसी टांठी काठ हैं मेरी. दातुन लेने
टाँकी मारते हैं बूढ़े बस. टोली ने टांकी
से लौटते टार्च मारी थी मुझपर, टिहुक
उठा था मन मगर वह टोहा-टाई तो
किसी प्रेत को टोंचने के लिए थी. फूलों पर
किसकी नजर जाती? हल की मुठिया बन
जाने की कामना लिए खड़ा हूँ मैं टिढ़-बिंगा
सहता आप-आतप-अपमान-गर्हणा।
****

बेर

मर्कट-दल उत्पात मचा कर
अभी अभी गया हैं.
बदरी का बेचारा बालक वृक्ष इसी बरस तो
फला था .
हरे हरे बेर टूंग टूंग कर
फेंक गए वानर.
तुम दुखी मत हों बदरी गाछ.

जानता हूँ गौधूलि
लौटती बेर असंख्य शुकों का झुण्ड
विश्राम पाता था तुमपर जरा अबेर.
पियराते बेरों के लिए ललचाता किन्तु अगली
ऋतु और भी फलोगे तुम.
अरुण-पिंगल फूलों से झोल खा जाएँगी
डगालियां.

निराश होना ठीक नहीं यों.
बीत जाने दो शीत-काल, पड़ जाने दो तुषार.
वसंत आते ही
फुनगियों फूल जायेंगे लजीले फूल हज़ार.
****

अमरुद वृक्ष

सहस्र दिन पुरातन मूत्र-गंध
से त्रस्त थे नासापुट महू
के रेलगाड़ी स्टेशन पर.
ऊबकाई ले रही थी फिर
फिर प्रौढ़ाएं. नकुट ढंके थे
चन्दन चर्चित मुनियों के दल.
तब अचानक जैसे आकाश
में द्रोणमेघों का झुण्ड हो
उठता. उठी किसी विजयी की
ध्वजा सी अमरूद की गंध.
चौकोर गवाक्ष में छपरे
में तिरछौहे तिरछौहे धर
अमरूद एक श्याम किशोर
खड़ा था. बाहर बाहर हरे
भीतर आरक्त. एक योगी
ने परमहंस परंपरा के
चलाई प्रत्यग्र फल पर छुरी.
ज्ञानी कहते जो आये हैं
कि बीज में वृक्ष हैं. प्रत्यक्ष
हो उठा अमरूद-तरु समक्ष.
रंगों की प्रयोगशाला में
अपूर्व शोध अमरूद वृक्ष
ने किया हैं और तब जाकर
प्रकट हुए हैं हरे रंग के
विविध वर्ण. फुनगियों बाल-शुक
सा हरा. भीतर की टहनियों
का रंग वृद्ध कुटुरु के खीन-
जर्जर पंख सा गहरा. फलों
के हरे रंग के भी अनेक
छंद हैं. कोई कोई वृक्ष
का फल जैसे चौपाई हो-
हरे से हरिद्ररंगी. ऊपर ऊपर
अरुणिम. कोई फल तो
मानों किसी मानिनी के हो
स्तन जो बाहर तनिक पिंगल
प्रतीत तो होते हैं, किंचित
कक्खट भी किन्तु दांत लगते
लाल हो उठते हैं. बालिका
सा बढ़ता हैं अमरूद वृक्ष.
वर्ष में फलता हैं दो बार.
****

7 comments:

वृक्षों पर कविता लिखकर उनको भरापूरा व्यक्तित्व दे दिया आपने।


अद्भुत...
निराली...
सुखद...
informative as well.../


गहरे अर्थ लिए हुए कविताएँ बहुत मन भायीं.


"छोकरों की कनपटियों पर किशोरियां साधती हैं
निशाना. कादम्ब फलों की अबतक मैंने
मार ही खायी हैं.फल कभी नहीं खाया."

आपके चिट्ठे पे आके कभी निराशा नहीं होती,
एक उम्मीद लिए आते हैं और ख़ुशी-ख़ुशी जाते हैं :)


Vaaaah! This is the only comment I can think of...!


उदयप्रकाशजी की तरह मेरे पास भी इस कविताओं के लिए सिर्फ एक शब्‍द है - अद्भुत ... बधाई


बहुत खूब...
ऐसा लालित्य और ऐसा सजीला शब्दसंसार....
एक विरल और दुर्लभ अनुभूति हुई कई दिनों बाद।
बधाई स्वीकारें कविवर...


सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी