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Showing posts from February, 2011

महेश वर्मा की तीन नई कविताएं

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अनुवाद
      दरवाजे के दो पल्ले अलग-अलग रंगों के, दो आदमियों के बीच अपरिचित पसीने की गंध और एक आदमी की दो पुतलियाँ अलग अलग रंगों की. एक तहजीब में परिचय का हाथ आगे बढाते तो दूसरी सभ्यता के अभिवादन से उसे पूरा करते. शराब मेज़ से उठाये जाने से लेकर होठों तक आने में अपना रंग और असर बदल चुकी होती. उधर से कोई गाली देता तो इधर आते तक खत्म हो रहता उसका अम्ल. एक देश के सिपाही का खून बहता तो दूसरे देश के सिपाही के जूते चिपचिपाने लगते. यहाँ जो चुम्बन था वहाँ एक तौलिया. एक आदमी के सीने में तलवार घोंपी जाती तो दूसरे गोलार्द्ध पर चीख सुनाई देती, यहाँ का आंसू वहां के नमक में घुला होता जो यहाँ के समंदर से निकला था.       एक कविता जो उस देश की ठंडी और धुंधली सांझ में शुरू हुई थी दूसरे देश की साफ़ और हवादार शाम पर आकर खत्म होती. वहां का घुडसवार यहाँ के घोड़े से उतरेगा. यहाँ की नफरत वहाँ के प्रतिशोध पर खत्म होगी लेकिन लाल ही होगा खून का रंग. जहाँ प्यार था वहाँ प्यार ही होगा जहां स्पंदन था वहीं पर स्पंदन, केवल देखने की जगहें बदल जातीं.       अनुवादक दो संस्कृतियों के गुस्से की मीनारों पर तनी …

कवि की संगत कविता के साथ : १० : मोहन राणा

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आत्मकथ्य

कविता अपना जनम खुद तय करती है. मैं उसके लिए शब्द नहीं बटोरता, कविता अपने शब्द भी खुद लाती है, हालाँकि यह हमेशा संभव नहीं हो पाता किउसे पूर्णता से व्यक्त कर पाऊँ, लगता है जैसे हर कविता, पिछली कविता का कोई छूट गया अंश ही हो जो छूट गया, और फिर रह जाता है अधूरा ही हर नई कविता में.
मेरा मानना है कविता किसी माध्यम पर अंकित-टंकित शब्दों के विन्यास में नहीं वह पाठक के भीतर है. उनमें मौजूद आवाज उन्हें पढ़ कर ही फिर से बोल पाती है कभी हम उसे पहचान लेते हैं कभी वह आवाज हमारे अंर्तलोक के शोर में गुम हो जाती है.

कविता हमें कुछ याद दिलाती है उस वर्तमान की जो घट चुका है, यह वह अतीत जिसे अभी भविष्य बनना है पर हमें याद नहीं है.
पिछले कुछ बरसों से सच, प्रेम, अस्मिता और यथार्थ प्रकृति के सवालों की ओर मैं बार बार लौटता हूँ या कहें कि वह साथ ही हैं छाया की तरह, अतृप्त अपने ही जवाबों से.  इस हलचल में मैं एक  दूर और पास के दैनंदिन आतंरिक भूगोल के  अन्वेषण में लगा हूँ. मेरा इरादा कोई नक्शा तैयार करना नहीं हैं वह मुझे लगता है पहले से ही बना हुआ है, उपस्थित है प्रकृति के नियमों की तरह ,उसकी पुष्टि भर कर…

अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविताएं

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कवि का वक्तव्य :

एक होता हैं मेहनती आदमी, आत्मनिर्भर. घर से कुछ नहीं लेता, स्वयं जमीन तोड़ कर जीविका चलाता हैं. बुरी आदतों से दूर, ईमानदार. दूसरा होता हैं ऐय्याश. खानदानी रईस. कमाता एक नहीं गँवाता लाख हैं. उसे सब चाहिए-पुरखों के हीरे-मोती, बाप की जमीन, माँ का बक्स, भाई का बटुवा, नानी के लड्डूगोपाल का चांदी का पालना.

ऐसे ही दो कवि होते हैं, मैं शायद दूसरा वाला कवि हूँ. मुझे अपनी पूरी परंपरा चाहिए. उसकी पूरी समृद्धि पूरा श्रम.

वाल्मीकि चोरों में कवि हुए और मैं कवियों में चोर हूँ.
बीते दिनों मध्यप्रदेश के वृक्षों पर एक सौ एक कविता लिखने की योजना हुई हैं. हो सकता हैं यह योजना वर्ष भर में पूरी हो जाएँ या सौ वर्ष की आयु भोग कर जब मैं मरुँ तब भी निन्न्यांबें कवितायेँ ही पूर्ण हों. फिलहाल पांच कवितायेँ प्रस्तुत हैं. **** [ तस्वीर : मधुमिता दास ]
कविताएं :

गूलर
तुम तो कहते थे गूलर दिख जाने से दारिद्रय आता हैं. कोढ़ी बता गए नागार्जुन भी इसे पर गुंफित डालियों पर गुल्म गोदों का हर्ष से भरता हैं ज्यों दूध से यह गूढ़, गुथुवन तना भरा हैं. मारी गुच्छों पर गुलेल से गोटियाँ गिरा दिए आठ-दस फल. फूटा डंठलो…

शब्दों से गपशप : कुंवर नारायण

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[ कुंवर जी की नोटबुक का एक हिस्सा आपने सबद पर पहले पढ़ रखा है. उसका दूसरा हिस्सा यहां दिया जा रहा है. यह चयन भी थीमैटिक है और मुख्य थीम की ध्वनि शीर्षक में सुनी जा सकती है. कुंवर जी समेत कुछ अन्य लेखकों की नोटबुक से चयन वक़्त-वक़्त पर सबद में प्रकाशित किये जाएंगे . साथ में दी गई तस्वीर गूगल से.  ] .....................................................................................................................................................................
शब्दों से गपशप का शौक़ीन हूँ. आमतौर पर हम शब्दों को मौक़ा ही नहीं देते कि वे अपनी बात भी खुल कर हमसे कहें : उन्हें घेर कर उनसे अपनी ही बात कहलवाना चाहते हैं. लेकिन, खासे गपोड़िया होते हैं शब्द भी - बड़े बूढ़ों की तरह - यादों के अथाह भण्डार. मौक़ा मिले तो न जाने किन-किन ज़मानों के कैसे-कैसे अनुभव सुनाने बैठ जाते हैं. 
कभी-कभी देर रात तक चलती रहती है उनसे बातें. सो जाता हूँ तो नींद में भी अस्फुट कुछ-न-कुछ बोलते ही रहते हैं, अनाप-शनाप सपनों की भाषा में. लेकिन यह गपशप बेकार नहीं जाती. जब वे खुल कर, बेझिझक बोलते हैं तो अपने अंतर्मन…