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शताब्दी स्मरण : शमशेर बहादुर सिंह



[हिंदी में शमशेर होने के अलग मानी हैं, जैसा सरल वाक्य बनाने पर शमशेर शायद ऐसे ही मुस्कराते, जैसे कि यहां दी गई तस्वीर (सौजन्य : एक जिद्दी धुन) में मुस्करा रहे हैं. सच तो यह है कि शमशेर एक कठिन लिपि में निबद्ध हैं, जिन्हें सिर्फ़ अर्थ की संभावनाओं में पढ़ा जा सकता है. उनकी ज़िन्दगी और उनके बारे में किस्से इस मामले में नाकाफी साबित हुए हैं. शमशेर के टेक्स्ट को पढ़ने के लिए 'कठिन प्रस्तर में अगिन सुराख़' की दरकार है. और इस कठिनाई से हिंदी आलोचना कितना बचती रही है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है. शमशेर पर लिखे साही और मलयज के निबंध और डायरियों को छोड़ दें तो उन्हें समझने के छिट-पुट तरीके यादगार नहीं और उनके जन्म-शताब्दी वर्ष के आते-आते भी इनका रवायती, पूर्वानुमेय और अंततः अपर्याप्त होना सालता है. जैसे हर बड़े कवि को, उसी तरह शमशेर की इबारत को भी उनकी अनेक अर्थ-छवियों में पढ़ने की ज़रूरत इसीलिए बरक़रार है. यहां कवि-आलोचक व्योमेश शुक्ल ने उनके भाषिक संसार में प्रवेश कर कुछ विशिष्ट के अर्थापन की कोशिश की है.]

जहाँ तारे जुगनू होने चले गए हैं
व्योमेश शुक्ल

‘‘देखो, रात
बिछलन से भरी हुई है
(तारे जुगनू होने चले गए हैं :
चाँद, चाँद-सा दिल में है, बस :
दिल, कि बहकती हुई रात है...)
यह रात फिसलन से भरी हुई है।

हाँ,
शरमाओ न मानी में
तुम लफ्ज़ नहीं हो;
कठिन अर्थ हो कोई
तुम लय भी हो अगर,
पर्दा हो (मान लिया)
तुम
गीत खुले हुए हो, वही
जो मैंने
कल रात को गलियों में
गाया था (...काली उन
कीचड़ से भरी हुईतनहा
गलियों में)
शरमाओ न धड़कन की तरह
दिल में तुम तो
धड़कन का इ ला ज हो
तुम तो हो मह़ज अता-पता मेरा
अरे
वह नाम कहाँ हो
जो बूझ लिए जाओ शरमाओ मत।

(‘सावनशीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ, शमशेर बहादुर सिंह)

एक

शमशेर बहादुर सिंह की रचनात्मक श़िख्सयत शब्द की ज्यादातर संभावनाओं से मु़खातिब है। जाहिर है, शब्द और अर्थ के बीच के संबंध भी उनकी रचनावली में उतनी ही अनेकान्तता में खुले हुए और गतिमान हैं। इसे भ्रम, उत्पात, लीला या कलाकार का — ‘एक जेनुइन कविका वक्तव्यकुछ भी कहा जा सकता है। यहाँ कुछ भी हो सकता है, ‘कुछ नहींभी हो सकता है; लेकिन इतना तय है कि यहाँ कविता अर्थ, तात्पर्य या आग्रह की किसी खास पद्धति में स्थिर न है, न हो सकती है। वह अग्रगामी है, उपलब्ध से अलग जाती है और दूर तक चली जाती है। यहाँ जो स्थिर है, शव है स्थिर है शव-सी बात। 

यहाँ कविता के शब्द रंग हैं या रेखाएँ हैं या चीनी जनता का लोकसत्तात्मक गणतन्त्र राज्य हैं या ग्रीक वर्णों के रूपाकार हैं। यहाँ कविता के शब्द, खुद कवि के शब्दों में, ‘शब्द कहाँ हैं?’ यहाँ युगीन सुविधाओं से इनकार और कठिनके रतजगे हैं। यह कविता मौन, संगीत और नूर की कविता है। वह हम तक किसी इलहाम या एहसास की तरह पहुँचती रही है। ऐसी कविता की शक्तियों या सीमाओं को, उसकी प्रक्रियाओं को, उसके भीतर बन रही सरणियों और समीकरणों को पुकार पाना, उनका नामकरण कर पाना, समीक्षा की भाषा के स्तर पर उसे साबित कर पाना दुश्वार और लगातार चैलेंजिंग है। बकौल श्रीकान्त वर्मा, ‘‘शिल्पी शमशेर के लिये छोटा शब्द है। और भी कवि हैं और भी शिल्पी हैं। मगर कोई भी शमशेर नहीं। शमशेर के लिए एक शब्द की तलाश एक समूचे ब्रह्मांड की तलाश की तरह है। शमशेर का एक-एक शब्द एक-एक अंक की तरह है। एक भी अंक ़गलत हो जाने से सारा हिसाब ़गलत हो जाता है। शमशेर की कविता का हर शब्द कविता है। खड़ी बोली में लिखी गई हिन्दी कविता में किसी भी कवि ने भाषा से इस इंटेंसिटी के साथ प्यार नहीं किया है।’’

दो

बड़े आविष्कार, यों, बुनियादी दि़क्कतें खड़ी कर देते हैं। जैसे यह दि़क्कत कि आप उन्हें शब्द की ओर से देखें या अर्थ की ओर से, प्रगति के पहलू से या प्रयोग के, विचार के कोण से या सौन्दर्य के नु़क्ते से। कथ्य और शिल्प के झमेले अलग हैं और बदस्तूर हैं। यहाँ वर्गीकरण की सुविधाएँ नहीं हैं और सराहनाओं के अतियों में बदल जाने के खतरे हैं। यह कविता अक्सर अर्थ के तयशुदा कॉमनसेंस का, कविता पढ़ने के तर्कपूर्ण व्यावहारिक तरी़के का, अर्थ की तथ्यात्मकता का, अर्थ को ही शब्द का एकमात्र गन्तव्य मानने की रुढ़ि का अतिक्रमण करते हुए खुद को मुमकिन करती है। यहाँ हमेशा तथाकथित अर्थों के विकल्प मौजूद हैं, निष्कर्ष नहीं हैं या अनेक हैं, काव्यानुभूति की अनेक तहें साथ-साथ जीवन्त और सक्रिय हैं और समानान्तरों का एक मेला लगा हुआ है।

तीन

उनकी कविता उषा। शुक्र है कि यह शमशेर की उन कुछ कविताओं में से है जिसकी अंतर्वस्तु बतायी जा सकती है। मसलन ऐसे कि यह एक सुबह का वर्णन है, अन्यथा शमशेर अंतर्वस्तु की सतह को, कथ्य के क्षणिक चालू वक्तव्य को गुम करके और रचना-विशेष के रेशों में उसे अंत:सलिल करके कविता हासिल करने की प्रतिश्रुतियों के कलाकार हैं। इस कविता में जाहिर है कि कई खासियतें हैं जो एक दूसरे से भिन्न दिशाओं में सक्रिय और द्वन्द्वरत हैं। इन खूबियों की शक्ति इनके एक दूसरे से अलहदा, विरोधी, समान्तर या परस्पर संबंधहीन होने में भी है।

चार

इस कविता में निहित वस्तुओं को देखें वे कितनी रंग-मंडित हैं। वे वस्तुएँ औसत भारतीय ग्राम्य जीवन के रो़जमर्रा से जुड़ी हुई कभी अपने असल नैसर्गिक रंग और कभी अपने स्रष्टा कवि की कल्पना के रंग में रची हुई आती हैं। ये वस्तुएँ कभी यथार्थ की कल्पनाएँ हैं, कभी कल्पना का यथार्थ। कवि के अन्दा़ज में कहें तो इस और ऐसी कविताओं का आसमान यथार्थ और कल्पना के बीच की धुँधली बादल रेखा पर टिका हुआ है। बहुत नीला शंख’ ‘जरा से लाल केसर से धुली हुई बहुत काली सिलजैसे असंभव-से उपमान और ज़िन्दगी के साधारणतम सामान राख से लीपा हुआ चौका, स्लेट, लाल खड़िया चाक। लेकिन आप इनमें कोई दूरी, फाँक या वर्गान्तराल देखने की बजाय उनके बीच किसी घटना की तरह निर्मित और कविता के ज़रिये व्यक्त हो रहे नए मानवीय संबंध देखने लगते हैं। शमशेर सृष्टि में बिखरी हुई ची़जों, लोगों, घटनाओं को अपनी अंतर्वस्तु में, जैसा कि ध्वनिकारने कहा है, एक अपूर्ववस्तुनिर्माणक्षमा प्रतिभाके साथ स्वीकार करते हैं। 

इस कौशल को बहुधा उनके सुर्रियलिस्ट आग्रहों के साथ जोड़कर देखने की कोशिश की गई है, जिसमें कोई हर्ज भी नहीं है, लेकिन बुनियादी ची़ज है वह सहोदरत्व या सहव्याप्ति, जो वैभिन्य के बावजूद उनकी काव्यभाषा के भीतर तेजस्क्रिय तत्वों को गैरबराबरी से आ़जाद करती है। उन्हें एक दूसरे के बराबर और एक दूसरे के करीब ला देती है। उनके बीच की भौतिक दूरियाँ अपार्थिव ऩजदीकियों में तब्दील हो जाती हैं। क्या प्रदत्त अर्थ की छाया से दूर हुए ब़गैर ये ची़जें इतने आस-पास आ सकती थीं? वे ची़जें, जो ज़िन्दगी में एक दूसरे से बहुत दूर और असंबद्ध मानी जाती हैं, कविता के परिसर में परस्पर हो जाती हैं। कवि ऐसे ही काव्यात्मक और काव्येतर के फ़र्क को धुँधला करता है।

बहरहाल, हम कविता की ओर लौटें और उसे तनिक तालबद्ध शिल्प में, रिद्म में पढ़ें। यह शमशेर की प्रिय रिद्म है। संगीत की दुनिया में रुपकनाम से मशहूर सात मात्राओं का यह छिप्र चंचल ताल, ‘तीन ताल’, ‘कहरवाऔर दादराके बाद चौथा सर्वाधिक लोकप्रिय ताल है। इसके बोल हैं ती ती ना धी ना धी ना। कोई चाहे तो इस सिम्फनी को चौदह मात्रा़ओं के ताल धमारमें भी विन्यस्त कर सकता है, लेकिन बात वही होगी। सात मात्रा के रूपक को दो बार अर्थात् दो आवर्तनों में बजा लिया जाय या चौदह मात्राओं के धमार को एक बार, कोई खास फ़र्क नहीं पड़ता। 

खैर, सात मात्राओं का यह रिद्म शमशेर को प्रिय है और उनके वांग्मय की अनेक कविताएँ इस ताल में निबद्ध हैं। भूलकर जब राह जब-जब राह...भटका मैं/तुम्हीं झलके, हे महाकवि’; ‘मौन आहों में बुझी तलवार/तैरती है बादलों के पार’; ‘शाम का बहता हुआ दरिया कहाँ ठहरा/ साँवली पलकें  नशीली नींद में जैसे झुकीं। उदाहरण पर्याप्त हैं और उनमें खूब भटका भी जा सकता है। यों ही, कहरवा, तीनताल और दादरा में लयबद्ध रचनाओं की संख्या भी ज्यादा है। 

पहली ऩजर में इन लयनिबद्ध रचनाओं को देखने पर गद्यपरकता दिखती है, जबकि यहाँ मौजूद खड़ी बोली के पूरे-पूरे-से वाक्य दरअसल एक सघन आंतरिक संगीत का निर्वाह करते हुए आए हैं। इनके होने का तर्वâ संगीत और ताल की योजनाओं पर स्थित है। कविता की भाषा में संगीतबद्ध वाक्य जो संख्या तथा गुणवत्ता दोनों के लिहा़ज से बहुत ज्यादा, बहुत व़जनी हैं, सतही, छद्म, सिनेमाई, सरल और अहर्निश जनता की चापलूसी में लिप्त तुकान्तता और इस तुकान्तता को छन्द मानने और मनवाने वाली अल्पज्ञ और अ़फवाहबा़ज सत्तात्मक आलोचना का विध्वंस कर देते हैं। 

ये वाक्य इस प्रकार आधुनिक युग में ही रोग की तरह फ़ैल गये गेय और गद्य को अलग-अलग मानने वाले भ्रमित बोध को अप्रासंगिक कर डालते हैं। शमशेर की काव्यभाषा का गद्य इस अर्थ में कितना पद्यमय है कि उसे गाया जा सकता है। उस पर तबला, ढोलक, नाल, मृदंग, पखावज, ड्रम, आक्टोपैड - कोई भी तालवाद्य बजाया जा सकता है। इस बिन्दु पर यह कहा जा सकता है कि शमशेर की भाषा का एक स्वप्न संगीत है। यह भाषा संगीत का सपना देखती है और बेशक, उसे पूरा भी करती है। संगीत और भाषा को इस चरम अभेद पर हासिल कर पाने वाले आत्मविश्वास ने ही शमशेर जैसे सुख्यात विनम्र को वह औद्धत्य प्रदान किया है जिसकी शक्ति से वह हिन्दी साहित्य संसार में पूरे वाक्यों वाली रचना के रूप में स्थापित त्रिलोचन की अप्रतिम कृति धरतीके बारे में अपनी एक कविता में यह कुछ उल्टा-सा लगता सवाल पूछते हैं कि तुमने धरती का पद्य पढ़ा है? उसकी सहजता प्राण है।

पाँच

शमशेर गद्य को पद्य कहकर पुकारते हैं और गद्य को संगीत के कायदों में-से खोज पाते हैं। शमशेर के किरदार में, एक स्तर पर पद्य का अर्थ गद्य है और उनकी कविता का गाया जा सकने वाला अंश ऐन उसी मौ़के पर सर्वोत्तम गद्य भी है। भारतीय कविदृष्टि में काव्य का गद्य हो जाना कोई नई बात नहीं है। कई बार गद्य हमारे महाकाव्य में संभव भी हुए। कविता का गद्यपरक स्वभाव महाकाव्यात्मकता के एक लक्षण की तरह उपलब्ध हो सकता है। ऐसे ही शमशेर महाभारतकी सरासर गद्यात्मक परम्परा को अपनी प्रयोगशीलता के ़जरिये अद्यतन और प्रासंगिक कर लेते हैं।

लेकिन हम एक बार फिर उषाशीर्षक कविता की ओर लौटें। ‘‘प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे / भोर का नभ / राख से लीपा हुआ चौका / (अभी गीला पड़ा है) / बहुत काली सिल / जरा से लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो / स्लेट पर या लाल खड़िया चाक / मल दी हो किसी ने / नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह / जैसे हिल रही हो / और...../ जादू टूटता है इस उषा का अब......../’’ इन तेरह पंक्तियों के बाद एक पंक्ति बा़की है। लेकिन दिलचस्प है कि कविता में जैसे ही उषा का जादू टूटता है, वैसे ही यहाँ तक चली आयी तालबद्धता भी टूटकर बिखर जाती है। जैसे उषा के जादू के टूटने के क्षण-विशेष में ही समका आना निश्चित हो, जैसे यहाँ आकर किसी चक्करदार परन की तिहाई पूरी हो गई हो, जैसे उषा के जादू के टूटते ही ताल के जादू के भी टूट जाने का व़क्त हो। यह ़खुद कविता के जैविक ऐक्य का कमाल है कि जैसे ही कविता का कथ्य पूरा होता है, वैसे ही उसका शिल्प और उसमें निहित संगीत भी सम्पन्न हो जाता है। इस टूटन के बाद सूर्योदय मानो किसी बे-ताल या बे-हद में हो रहा है।

और सात मात्राओं वाले इस ताल रुपककी लयगति में कितनी व्यंजना है। भारतीय काव्य के न जाने कितने अमर पद इसमें निबद्ध हुए हैं। इस ताल में उन अमर पदों की भी आभा है। तुलसीदास की प्रसिद्ध राम वन्दना – ‘श्री रामचन्द्र कृपाल भजमन् हरण भवभय दारुणमइसी ताल में है। इस राम वंदना की उपस्थिति के वैभव और इसके आगमन की आहट को शमशेर की कविता उषामें महसूस किया जा सकता है। हिन्दी दृश्य में आम तौर पर कविता को भाषा की, काव्यभाषा की, बल्कि अमिधा की स्मृति मान लिया गया है, जबकि पूर्वज कविता की स्मृति के प्रकार कुछ इसी तरह अण्डरग्राउंडरहकर कविता में दर्ज होने चाहिए।

छह

इस राह पर चलते हुए शमशेर आधुनिक हिन्दी कविता और संगीत के रिश्ते की अधुनातन नियमावली भी तैयार कर रहे हैं। गीत-नवगीत आदि में गायी जाने वाली सरल राग-रागिनियों ने हमेशा कविता के शिल्प और कथ्य को अपनी संरचना और दूसरी भौतिक जरूरतों के हिसाब से नियन्त्रित करने की चेष्टा की है। यह तुकों व़गैरह के ़जरिये लोकप्रिय और युगानुवूâल का आधिपत्य है। यह कविता में आसानियत के संगीत की तानाशाही है। यह मंच की वाहवाह गलेबा़जी और हिन्दी फिल्मों के गाने हैं। शमशेर के संगीत के प्रयोग इस तदर्थता का प्रत्याख्यान हैं। उन जैसी लम्बी अप्रतिहत साँसें गिऱफ्त में नहीं आतीं। ये साँसें ताल के छोटे-छोटे मीटर्स में नहीं अँटतीं और निरंकुश और बेसंभाल के निर्माण में लग जाती हैं। 

अगर इस खयाल से कवि की रचना-प्रक्रिया को सोचें तो यह सा़फ दिखाई देता है कि शमशेर छन्द, लय या ताल का कोई पूर्वनिर्धारित खाका हाथ में लेकर कविता लिखना नहीं शुरू करते, बल्कि काव्य का संगीत उनकी रचना-प्रक्रिया के अप्रत्याशित का अनिवार्य हिस्सा बनकर, रचना के पदार्थ की ़जरूरतों के मुताबि़क निर्मित होता है। यह संगीत कविता की आत्यंतिक अनिवार्यताओं की वजह से है, कविता के कारण है और कविता के बाहर की किसी पहले से तय ची़ज का अनुकरण करते हुए नहीं आया है। उसमें महान भक्ति कविता की तरह बढ़त के अवकाश हैं। इस म़काम पर शमशेर की कविता का संगीत अतिनिश्चित छायावादी लयबद्धता और गेयता से आगे की बात है। यह संगीत वर्णों की कोमलता, भाषा की झंकार, तुकों के दोहराव और गाने की सरलता के पार है। यह चेतना में गूँजता हुआ संगीत है। यह गद्य की विषण्णता का संगीत है। यह उचित ही बार-बार कहा गया है कि शमशेर में छायावाद सर्वाधिक उत्तरजीवित है लेकिन ऐसी अमर कार्रवाइयों से छायावाद का पटाक्षेप भी उनसे ़ज्यादा किसने किया है?

सात

वैसे शमशेर के यहाँ स्मृति और कल्पना में ज्यादा फ़र्क  नहीं है। आखिर यथार्थ का अनुभव क्या है? वह या तो स्मृति है या कल्पना। उनकी कविता में से स्मृति और कल्पना के तत्वों को अलग-अलग कर पाना प्राय: नामुमकिन है। ऐसे में यह सरलीकरण सहज संभव है कि शमशेर स्मृति और कल्पना या शब्द और अर्थ या कथ्य और शिल्प के अद्वैत के कवि हैं, लेकिन ऐसा है नहीं। यह कहा गया है कि शमशेर कई बार रूप को ही एक समृद्ध कथ्य की तरह व्यवहार में ले आते हैं या रचना के माध्यम याने भाषा को ही रचना का वक्तव्य बनाकर पेश कर देते हैं। मलयज भी कहते हैं कि भाषा भी शमशेर जी के लिये कविता है, सि़र्पâ माध्यम नहीं।और यह तो उनकी कविता ही कहती है कि ओ माध्यम! क्षमा करना कि मैं तुम्हारे पार जान चाहता रहा हूँ। 

लेकिन ऐसा करते हुए वह माध्यम की गरिमा को नहीं भूलते। मंगलेश डबराल ने एक खूबसूरत थीसिस में यह प्रतिपादित किया है कि शमशेर अगर सुन्दरता के लौकिक और ऐन्द्रिक आकारों को अनदेखा करके या उन्हें उपेक्षणीय मानकर चले होते वह ज्यादा से ज्यादा एक उत्तर छायावादी या एक आध्यात्मिक कवि होते लेकिन वह उनसे गुजर कर, उनमें से होते हुए उनका अतिक्रमण करने की आकांक्षा रखते हैं। कई बार वह रचनाकार की श़िख्सयत को भी एक माध्यम के रूप में प्रस्तुत कर देना चाहते हैं, लेकिन गौरतलब है कि किस कीमत पर रामविलास शर्मा को लिखे एक पत्र में वह कहते हैं, ‘‘कलाकार स्वयं को बदलेगा, बदलेगा, एक माध्यम बनाने के लिए, अपने को एक अत्यधिक sensitive माध्यम, सक्षम दृष्टा, poet in ancient sense, a maker घोर रूप से तभी.... और इसी हद तक वह अपने पाठक को अपना जितना भी छोटा या बड़ा परिवेश है, उसे प्रभावित कर सकेगा, कुछ बदलने के लिए’’। यों, यह सा़फ है कि शमशेर कोई अद्वैतवादी रचनाकार नहीं हैं, उनके रचना-संसार में वस्तुओं की भिन्न-भिन्न सत्ताएँ हैं जो निरन्तर द्वंद्वरत हैं और एक अपूर्व जैविक संहति में एकाग्र।

आठ

शमशेर ने हमारी यानी वृहत्तर अर्थों में हिन्दी जाति की काव्यानुभूति के केन्द्र में भाषा की अविभाज्य मानवता को प्रतिष्ठित किया है। यह नयी कविता के दौर में हुए रचनात्मक समर का समवेत प्रतिफल है। इसका श्रेय अकेले शमशेर को नहीं है, लेकिन विजय का ध्वज उनके भी हाथ में है। अशोक वाजपेयी ने काव्यानुभूति के केन्द्र में भाषा की अनिवार्यता को रेखांकित किया है। बहुत दूर तक शमशेर इस रेखांकन का सबब होंगे। आजकल जब हम सामाजिक सद्भाव को किसी सुविधाजनक यान्त्रिकता या किसी आधारहीन यूटोपिया से उपलब्ध कर लेना चाहते हैं, शमशेर की याद हमें बड़ी चुनौतियों में डाल सकती है जहाँ स्त्रष्टा अपनी समूची आत्मवत्ता को ही भिन्न-भिन्न भाषाओं के संश्लेषण की तरह एक दोआबकी मानिन्द विकसित करता है।

वैसे शमशेर के यहाँ ऐसे अनेक तथाकथित विरुद्धएक दूसरे में अपूर्व अप्रत्याशित कलात्मक योजना के साथ निमज्जित होते रहे हैं। उन्होंने अपनी एक कविता में खुद माना है कि कवि घंघोल देता है / व्यक्तियों के जल / हिला-मिला देता / कई दर्पनों के जलइस पारस्पारिकता में कला की जागती आँखों से एक आदर्श राजनीति और समतामूलक समाज के ख्वाब देखे गये हैं। यह संश्लेषण सद्भावकी सि़र्पâ अंतर्वस्तु या सदिच्छा नहीं है, उसका शिल्प, उसकी भाषा उसकी चरितार्थता भी है। शमशेर की रचनात्मक श़िख्सयत सेकुलर कविता लिखने की ़खातिर सेकुलर भाषा ईजाद करती है। यों, समसामयिक हिंदी कविता में एक मुद्दे के तौर पर सेकुलरि़ज्मको जो सर्वोच्चता हासिल हुई है और उसे लेकर कविता के कार्यकत्र्ताओं में जितना अभियानात्मक ज़ज्बा है, शमशेर उसके भी आर्विटेक्टहैं।
 ****
{ १३ जनवरी को रज़ा फ़ौंडेशन द्वारा आयोजित 'शमशेर-शती' के अवसर पर पढ़े गए आलेख का संशोधित रूप. }
14 comments:

बहुत बढ़िया ,पठनीय और जरूरी पोस्ट.समशेर को जानने समझने की दिशा में एक और कदम. बहुत श्रम पूर्वक तैयार सामग्री को सामने लाने हेतु धन्यवाद.बधाई भाई.


शमशेर की कविता -
हर्ष से हिलोरते जलमे डूबी एक पेंटिंग ,
कि गहराई पाकर जीवंत हो उठे हों रंग ,
बहार आने को
कुछ उत्सुक ,कुछ व्याकुल .........!


बधाई मेरी ! इसलिए कि आपने आरंभ में ही(परिचय में )शमशेर की कविताई को जैसे उसके गर्भनाल पर खिलाने का सहज प्रयास किया है। "अर्थ की संभावनाएँ" अर्थ की केन्द्रीयता और अर्थ संप्रेषणीयता से बड़ी चीज है, जिसकी चर्चा आपने छेड़ी है । दृश्यों में बोलती शमशेर की कविता किसी आसान टोटके के सहारे आत्मीय नहीं हो सकती, यह अपने बनने की प्रक्रिया के समान ही ईमानदार बेचैनी की अपेक्षा रखती है। इस मौके से कुछ बातें याद आ रही हैं, शमशेर पर 'कसौटी' में नंदकिशोर नवल का एक लेख आया था, और शमशेर को वहाँ 'अर्थहीनता' के कवि के रूप में देखने की वकालत की गई थी।
शमशेर एक तरह से 'सहृदय' की भी जांच करते हैं, उसकी प्यास की और उसकी पहुँच की ।
व्योमेशजी का लिखा सार्थक है । मेरी बधाई उन तक पहुंचे !


शताब्दी स्मरण के लिये मेरी बधाई स्वीकारें. व्योमेश जी ने श्रमपूर्ण काम किया है. शमशेर के काव्य से जूझना दुरूह कार्य है. यह बिलगाना ही अलग है कि छायावादी और प्रगतिशील कविता क्या है? आपका लेख, छायावादी काव्य गुणों की भांति, अच्छी भाषा का उत्कृष्ट उदाहरण है पर आप शमशेर के कविता चयन मे चूक गये हैं. यह कविता "उषा" इंटरमीडियेट आदि के कक्षाओं मे पढ़ाई जाती है और शमशेर की सरलतम कविताओं मे से है.अनुराग भाई का इंट्रोडक्टरी नोट पढ़ लगा, कोई विशिष्ट आलेख पढ़ने को मिलेगा, टूटी हुई बिखरी हुई, अम्न का राग या अन्य कविताओं पर चर्चा होगी.... किंतु आपका प्रयास अच्छा है.


शमशेर जी पर कितना कुछ बताती पोस्ट।


शमशेर की कविता और उनकी कव्य-भाषा को कुछ और समझ पाया--- धन्यवाद आपको और व्योमेषजी को.


शमशेर जी के बारे में इन्टरनेट पर इतनी सुन्दर प्रस्तुति मेरे संज्ञान में किसी ने नहीं दी । बहुत खूब. बधाई स्वीकारें.


प्रत्येक शुभ कार्य में लगन और मेहनत लगती है, फिर यह तो कत्तई जरूरी नहीं होता कि अर्थार्जन ही हो, लाभार्जन के तहत एक संतोषजनक, राहतभरी सांस छोडना बेहद ही उपजाऊ लगती है..। आपके द्वारा किये जाने वाले साहित्यिक उपक्रम सचमुच सराहनीय है और यह सब आपकी विद्वता दर्शाता है। मुझे प्रसन्नता है कि मैं आपसे जुडा और वो सब पढने को प्राप्त हो रहा है जिसे कहीं छूटा सा महसूस करता रहा हूं। इसक एक मतलब और होता है कि अब आप पर पहले से ज्यादा जिम्मेदारियां आन पडी है..यानि आपको मुझ जैसे पाठक की प्यास बुझाने के लिये यह क्रम न केवल बरकरार रखना होगा बल्कि पुष्ट भी बनाये रखना होगा। शमशेर बहादुर सिंह को पढा हुआ है, मगर पढा हुआ है माने ऐसा नहीं है कि उनकी लेखनी का चस्प विराम पा गया हो..बृहद लेखन की सीमा और उसका छोर पाने हेतु अभी लंबा समय है।
साधुवाद व शुभकामनाओं सहित


क.
शमशेर बहादुर सिंह की कविता के मानी की बात हमेशा मुश्किलात पेश करती है. सुहृद व्योमेश की मानें तो शमशेर की कविता में अर्थ 'खुले' और गतिशील हैं. मतलब यह की कविता स्थिर नहीं, गतिशील है.
बात तो ठीक लगती है. ऐसे मेरे ख़याल में बहुतेरी ऐसी कवितायें आ रही हैं, जहां अर्थ की ऐसी भावभूमि मौजूद है, कविता का ऐसा गठन मौजूद है. मसलन उर्दू की शायरी को ही लें. क्योंकि खुद शमशेर जी का दायरा उर्दू शायरी से पुररौशन रहा है, इसलिए शायद उनपर उसके कुछ असरात दिखें. ग़ालिब की या कहिये तो उर्दू शायरी की पूरी रवायत रही है कि अर्थ को बांधा न जाय, उसके विस्तार के पहलू को छोड़ दिया जाये. इस सिलसिले में यह बात भी साफ़ ही है कि चूंकि उर्दू शायरी की भावभूमि 'मनोविकार' ही हैं, इसलिए भी उसमें यह सिफत पैदा हो जाती है. मेरी समझ से यही उर्दू शायरी की जान है, न कि मुहाविरा, जैसा रामस्वरूप चतुर्वेदी बताया करते थे. देखना चाहिए कि क्या मनोविकारों से बुनी होने के नाते ही शमशेर की कविता में भी अर्थ के अनेकांत और गतिशील रूप मौजूद हैं?
कविताओं में खुलापन और अनेकार्थता कई बार मुनासिब वक्त के इंतज़ार में भी खड़े रहते हैं. मसलन कबीर की कविता की अनेकार्थता समय के साथ बदलती गयी. यही तुलसी और मीरा के साथ हुआ. यही अक्का महादेवी के साथ हुआ. शायद कोई लिखी गयी कविता वक्त के प्रवाह में अपने एक आयाम को विन्यस्त कर लेती है. सो, भले ही टेक्स्ट न बदले, कंटेक्स्ट बदल जाता है. और जब कंटेक्स्ट बदल जाता है तो वह कविता के 'पाठ' में भेद पैदा कर देता है. कविता का टेक्स्ट ही एक मात्र वस्तु नहीं होता. प्राथमिक होने की बावजूद उसे पाठक तक पहुंचने के लिए एक पद्धति का सहारा लेना होता है. अगर वह पद्धति द्वंद्वात्मकता है तो इसके नियमों की मुताबिक़ कविता का टेक्स्ट/पाठ अगर कंटेस्ट को प्रभावित कर सकता है तो कविता का कंटेक्स्ट भी कविता के पाठ/टेक्स्ट में फेरबदल कर सकता है. टेक का सवाल यह कि शमशेर की कविता की अनेकार्थता का समय का आखिर क्या रिश्ता ठहरता है?
रही 'स्थिर है शव सी-बात' की बात, तो मुझे एक मुश्किल है. क्योंकर इसका यह पाठ संभव है कि 'जो स्थिर है, शव है.' फिर 'सी' का क्या रहा जो अनेकान्तता की तरफ ले जाने वाला शब्द है. शव और बात के इतने ही निश्चयात्मक सम्बन्ध होते तो क्या शमशेर जी 'सी' का प्रयोग करते? मुझे तो नहीं लगता.


ख.
संगीत और कविता के संबंधों को लेकर व्योमेश भाई क़ी फ़िक्र से मैं भी बावस्ता हूं. ऐसे में आचार्य शुक्ल का वाक्य बरबस याद आ रहा है कि 'नाद-सौन्दर्य से कविता क़ी आयु बढ़ती है.' यहाँ नाद के अर्थ में छंद, राग, लय आदि को समाहित मानना चहिये.
हिन्दी कविता में संगीत तत्व क़ी गहरी रवायत चली आयी है. खड़ी बोली क़ी कविता के आने के पहले क़ी बोलियों क़ी कविता में संगीत का गहरा राग मौजूद है. भक्तिकाल हो या रीतिकाल, सब जगह संगीत कविता में बेतरह गुंथा हुआ था. अगर कभी 'राग कल्पद्रुम' नाम का पोथा आपकी नजर के सामने से गुजरा हो तो आप इस बात को बखूबी समझ चुके होंगें. इस पोथे में ढेरों राग-रागीनियों में बंदिशें दी गयी हैं. भक्तिकालीन कवियों से लगाय मुग़ल बादशाहों तक क़ी बंदिशें. गरज यह कि जब नवजागरण के दौर में खड़ी बोली हिन्दी काव्य भाषा बनी तो कवियों के सामने न सिर्फ छंदों क़ी, बल्कि संगीत और कविता के पुराने संबंधों को खड़ी बोली में फिर से व्यवस्थित करने क़ी जरूरत आन खड़ी हुई. भारतेंदु और उनके साथियों ने इस को समझा और कुछ प्रयोग किये. द्विवेदी युग में पाठक जी जैसे कवियों क़ी रचनाएं भी इस मुश्किल से उलझने क़ी कोशिश करती रहीं. पर छायावाद ने इस मुश्किल का तोड़ निकाला. और बातों क़ी तरह निराला ने यहाँ भी अगुवाई क़ी.
निराला का एक गीत है "ताक कमसिन वारि ". आलोचकों ने इसे निराला क़ी तथाकथित विक्षिप्तता के खाते में डालकर अपना फ़र्ज़ अदा किया. पर कभी आप इसे उमाकांत और रमाकांत गुंदेचा से सुनिए (http://mrityubodh.blogspot.com/2010/09/blog-post_25.html) . तब आपको पता लगेगा कि यह ध्रुपद क़ी बंदिश कैसे निभती है, और क्या प्रभाव पैदा करती है.
खैर, काबिले जिक्र यह है कि निराला के सजल उर शिष्य शमशेर ने संगीत क़ी विरासत उन्हीं से हासिल क़ी. खुद निराला पर लिखी कविता भी संगीत के तत्वों से भरी पूरी है. व्योमेश भाई इसका जिक्र करते तो बेहतर होता. दूसरे बात सिर्फ ताल क़ी नहीं है. शमशेर क़ी कविता का राग उसके सम्पूर्ण बाने में रचा हुआ है. उनकी कविता क़ी ऐस्थेटिक्स पर बात करते हुए हमें इसका ख़याल रखना होगा, ऐसी मेरी समझ है.

शमशेर जी क़ी एक कविता याद करें जिसे शायद मैं अपनी बात क़ी सनद बनाना चाहूँगा -
निंदिया सतावे मोहें संझहीं से सजनी...


apko our vyomesh dono logo ka dhanyavad. shamsher ji par idher kayee patrikavon ke visheshank aye hai, par yahan vyomesh ne jo samagri prastut ki hai vah apratim hai.shamsher ji ki bhasha va uski lay ko pakadne me sahayak hai yeh alekh. punah vyomesh ji ko badhayee.
Dr. Dinesh tripathi


हममें इस बात पर शायद कोई मतभेद नहीं है कि शमशेर के यहाँ अर्थवान शब्द की संभावनाएँ अनंत हैं, बल्कि मुद्दा यह है कि,
१. इस अनंत सम्भवन का वक़्त से क्या रिश्ता है, और
२. एक ही वक़्त में कविता के अर्थ की एक से ज़्यादा संभावनाओं की - व्यतीत और आगामी, प्रासंगिक या अप्रासंगिक संभावनाओं की - जगह है या नहीं?

मृत्युंजय भाई की प्रतिक्रिया में कबीर का दृष्टांत बेहद दिलचस्प और मानीखेज़ है. रचना के तीन सौ बरस बाद तक वह लगभग अँधेरे में रहे, उन्हें कवि या साहित्यकार की कोटि की बजाय 'फुटकल' ख़ाते नसीब हुए, बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दशक के पहले तक उनकी कविता के अर्थ की सभी संभावनाएँ सोयी हुई थीं. इसके बाद के समय में कबीर जिस तरह ज़रूरी हो उठते हैं, उसमें युगीन परिस्थितियों की भूमिका कितनी है और क्षितिमोहन सेन और रवीन्द्रनाथ टैगोर की अदम्य कल्पनाशील रचनात्मकता की कितनी, यह गहरी जाँच और बहस का मुद्दा है. मैं सेन या रवीन्द्रनाथ या हजारी प्रसाद द्विवेदी को वक़्त से बाहर करके सोचने की पेशकश नहीं कर रहा हूँ, लेकिन इससे कौन इनकार करेगा कि इनके व्यक्तित्व सिर्फ़ वक़्त की ही नुमाइंदगी नहीं कर रहे थे.



वक़्त के आग्रहों से रचना बेशक प्रासंगिक या अप्रासंगिक होती है, होती रही है, लेकिन इसमें रचना की अनेकान्तता का भी कमाल है, कि उसके विभिन्न हिस्से अलग-अलग दौरों में, अलग-अलग आग्रहों से जगमगाने लगते हैं, या नहीं भी जगमगाते. मैं एक दूसरी बात कहना चाहता था – कि एक ही वक़्त में किसी ख़ास रचना की अर्थमयता के कितने स्तर साथ-साथ जीवंत हैं – जो ज़रूरी हैं वे और जो कम ज़रूरी हैं वे भी. आख़िर इस लक्ष्य की ख़ातिर भी रचना को – शमशेर की रचना को - पढ़ा जाना चाहिए. किसी ख़ास पद्धति के अतिरिक्त दबाव के साथ रचना को पढ़ने के उत्साह में कुछ भटक जाने में भी कोई हर्ज नहीं है, दिक़्क़त अपने ही पाठ को एकमात्र मानने की ज़िद और उस ज़िद के अहाते में समूची रचनात्मक शख्सियत को अँटा लेने से शुरू होती है, दिक़्क़त अपने पैमानों पर पूरे कवि को या पूरे स्रष्टा को हासिल कर लेने की लालसा से शुरू होती है. कबीर को आधुनिक बना लेने के अनर्गल अतिसामयिक हल्ले का आलम यह है कि विद्वान् लोग बड़ी-बड़ी गोष्ठियों में कबीर तो कबीर, व्यास, भवभूति और वाल्मीकि तक को आधुनिक बता रहे हैं. सत्तामक आलोचना की सबसे बड़ी मुसीबत यही है कि उसे अपनी ही शर्तों पर पूरे के पूरे रचनाकार चाहिए. अनेकार्थता इस स्तर पर ऐसी एकायामिता का प्रतिकार भी हो सकती है. यह भी एक समय-संबंध हो सकता है.


विषयांतर के लिये माफ़ी, शेष बातें शीघ्र.


vyomesh ke is lekh ko sunne se vanchit rah gaya thaa, aapne yahan dekar bahut achcha kiyaa. is lekh se kai nai-puraani bahasen phootati hain, between the lines. ise samajhakar hum log aapas mein engage karen to achcha rahega. is smriddha lekh ke liye Vyomesh ko badhai. Pranay


मृत्यंजय भाई कहते हैं : '' निराला का एक गीत है "ताक कमसिन वारि". आलोचकों ने इसे निराला की तथाकथित विक्षिप्तता के खाते में डालकर अपना फ़र्ज़ अदा किया.''

ऐसे भी क्यों न देखा जाए कि गीत में निहित 'अनेकार्थता' ही वह समस्या है जिससे पार न पाने की सूरत में कवि के लिए 'विक्षिप्तता' का अभिनव 'फुटकल' खाता खोल दिया जाता है ?

और ऐसे भी क्यों न देखा जाए कि 'अनेकार्थता' ही 'व्याख्या' के वे विभिन्न अवसर संभव करती है जो कृति के संगीत, नाटक, फ़िल्म, या दूसरी भाषाओँ में अनुवाद के ज़रिये हमें हासिल होते हैं.

'अनेकार्थता' के मुद्दे को ज़रूरत से ज़्यादा तूल देने का इरादा नहीं है. हम सब को अपने-अपने तरीक़ों से मालूम है कि रचना के उत्कर्ष के साथ रचना की अनेकार्थता का क्या रिश्ता है, कि इन दोनों के बीच कोई सरल गणित (मसलन, अनेकार्थता = उत्कर्ष) नहीं काम कर रहा होता. फिर भी, इतना तय है कि 'अनेकार्थता' पाठक के लिए - और आलोचक-पाठक के लिए अक्सर एक असुविधाजनक नैतिक-राजनीतिक स्थिति रही है. वह समय में ज़्यादा जगह की माँग करती है. यों, वह, हमारा यथार्थ-बोध जिस स्पेस-टाइम-कोंटीन्यूअम में निर्मित होता है, उसे भी बदलने की पेशकश है. वह देश और काल के निश्चित अनुपात को कुछ गड़बड़ा देती है. निराला के इसी गीत को लें - गुंदेचा बंधु इसे ही क्यों गाते हैं ? वैसे तो निराला के गीत ख़ूब गाये गये हैं, लेकिन क्या उन गीतों में बढ़त के अवकाश 'ताक......' जितने हैं ? आख़िर इससे भी बहुत कुछ तय होना है कि हम (यानी कवि के अलावा कविता से जुड़े अन्य लोग) इस अनेकार्थता या एकार्थता को सँभालते कैसे हैं. सारा श्रेय सिर्फ़ कवि का नहीं है.

शेष बातें भी शीघ्र.


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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