Thursday, January 27, 2011

कुछ कविताएं




डिठौना

एक तिल है बाईं आंख की सरहद पर तुम्हारी
जो मेरी निगाह से रार ठाने रहता है.
उसे समझाओ !... या थोड़ा काजल बढ़ा कर छिपा ही दो.
डिठौना करीब २८ में ठीक नहीं.
इसे हमारे बच्चों के लिए रख छोड़ो.
****

गुदगुदी

तुम्हारी हंसी की अलगनी पर मेरी नींद सूख रही है.
तुम उसे दिन ढले ले आओगी कमरे में, तहा कर रखोगी सपने में.
मैं उसे पहन कर कल काम पर जाऊंगा और मुझे दिन भर होगी गुदगुदी.
****

कोई भाषा नहीं

तुम्हारे होठों पर सर्जरी के बाद छूट गई खंरोच का तर्ज़ुमा मैं 'दाग़ अच्छे हैं'
करता था जैसे बहुत खुश को तुम 'कुछ मीठा हो जाए' कहा करती थी.
विज्ञापनी भाषा की सारी चातुरी की ऐसी-तैसी कर हम वस्तुओं की जगह
ख़ुद को कितनी आसानी से नत्थी कर लेते थे और हमारी ख़ुशी ने उस बेहोश वक़्त में
'प्रेम न हाट बिकाय' कभी हम पर ज़ाहिर नहीं होने दिया.
जबकि तुम जिन वजहों से सुन्दर और करीबतर थी उन वजहों की कोई भाषा नहीं.
****

एक यह भी सही

देख कर तुम्हें कभी यह नहीं लगा कि तुम्हारी उजली हंसी पर प्रेम की वह छाया भी पड़ती है जो तुम्हें चुप और उदास बनाती है और मुझे उन सब अभिनेय भूमिकाओं के लिए धीरे से तैयार जो अक्सर त्रिकोण उभरने पर कुछ कम हीरो के हिस्से बदी होती है. एक तो अभिनय के इस अच्छेपन में मेरा यकीन नहीं दूसरे मैं इस नियति को बहुत शक्की निगाह से देखता हूँ. देखने के इस सयाने, बचकाने या बेढंग ने 'जो पसंद है सो पसंद है' की दलील पर मेरा ऐतबार ही बढ़ाया और इससे कुछ हो न हो कहानी के दो एकांत नहीं रह गए. तीसरा एकांत मेरे मन का अहाता है जिसकी चौहद्दी पर तुम्हारा यह अफ़सोस फ़िलहाल ठिठक गया है कि 'हम अक्सर उसे क्यों चाहने लगते हैं जो पहले से किसी और के प्यार में मुब्तिला रहता है'. मैं इसमें प्रेजेंट इम्परफेक्ट टेंस का एक वाक्य घटित होने से ज़्यादा कुछ देख नहीं पाता और इसी कमनज़री से अपने कोने में आबाद हूँ. जैसे त्रिकोण में कहीं तुम हो. जैसे दुनिया में हर शै है. वह भैया होगा जिसके साथ तुम भाग जाना चाहती हो. अब इतना कुछ अजीबोगरीब ढंग से पैबस्त है जीवन में तो एक यह भी सही.
****

[ ऊपर इधर लिखी गई कुछ कविताएं दी गई हैं. कवितानुमा कुछ और चीजें इससे पहले यहां : , ,
साथ में दी गई तस्वीर 'वर्टिकल रे ऑफ़ सन ' नाम की फिल्म का एक दृश्य है. ]

46 comments:

Fauziya Reyaz said...

main intzaar kar rahi thi aapki post, aur beshaq naummidi haath nhi lago...

anuragji...itne masoom aur paak jazbaat ki kya kahun...

just amazing...

भरत तिवारी said...

तुम्हारी हंसी की अलगनी पर मेरी नींद सूख रही है
...
सादुवाद
हार्दिक बधाई

idharsedekho said...

really very touchy.

सुनील कुमार 'सुमन' said...

अति सुन्दर... मार्मिक...

Dinanath said...

The latest one is the another feather in the cap. Nice one. It seems that you have poured your feelings in the words and the life has come in the words. Very worth reading.. Again and again. Thanks!

mujshe said...

विज्ञापनी भाषा की सारी चातुरी की ऐसी-तैसी कर हम वस्तुओं की जगह
ख़ुद को कितनी आसानी से नत्थी कर लेते थे

these lines have so much of meaning.............. simple yet dense

An-emoticon said...

’एक यह भी सही’-- लाजवाब!!!
’कोई भाषा नहीं’ -- अच्छी लगी...
हंसी की अलगनी पर सूखती नींद--- क्यूं न गुदगुदाए!!
--------
"तुम जिन वजहों से सुन्दर और करीबतर थी उन वजहों की कोई भाषा नही” और यह कहता कवि शब्दों से एक कविता नहीं एक खूबसूरत चित्र पूरा करता है.......

और लिखिये - लिखते रहिये..
बधाई.

'उदय' said...

... umdaa bhaav ... prasanshaneey rachanaayen !!

मनोज पटेल said...

जबकि तुम जिन वजहों से सुन्दर और करीबतर थी उन वजहों की कोई भाषा नहीं.
बहुत खूब !
मुबारक !

सुभाष मौर्य said...

सबद पर आपकी कविताएं पढ़ीं....लाजवाब हैं...इनका शिल्प और कथन बेहद मार्मिक और दिल को छू जाने वाला है। कविताएं पढ़नी शुरू की तो लगा कुछ अच्छा पढ़ रहा हूं..। बधाई..।

pushpendra singh rajput said...

सारी कवितायें दिल में बस जाने वाली हैं ..बहुत खूब,, आपकी अगली कविता का इन्जार रहेगा,,,

शेखर मल्लिक said...

क्या गजब की शाब्दिक कलाकारी है, जिसमें भावो का गुम्फन इतना बढ़िया... वाह ! अपनी कलम की यह नजाकत बनाये रखें... आपको और भी पढ़ने की इच्छा हो रही है.

Travel Trade Service said...

'मैं उसे पहन कर कल काम पर जाऊंगा और मुझे दिन भर होगी गुदगुदी''

वाह अनुराग जी प्यार की चादर को क्या तो सलीकों से आप ने ओढा है
उस हलकी महीन कंपकंपी को जैसे रोके रखा है भीतर कहीं ताकि वो महसूस होती रहे जीवन में

बधाई जी Nirmal Paner

rabi bhushan pathak said...

नई व ताजी कविताएं । पढा ,मजा आया ।

Dhananjay sharma said...

आपके जैसा बड़ा दिलवाला ही ऐसा सृजन कर सकता है। आपकी हर कविता एक-दूसरे से अलग है। सब अपने आप में लाजबाब और बेहतरीन पढ़कर दिल बाग-बाग हो गया। इन कविताओं को हम सभी से शेयर करने के लिए शुक्रिया

ohpakheru said...

शब्दों का जो सूक्ष्मतर स्पंदन अभिव्यक्ति का कवितापन पूरी तरह समेट लेता है, वह इन कविताओं में सघन है. संवेद्य छवियाँ अपनी निश्छलता बचाए रखते हुए अपनी प्रौढ़ता से परहेज़ नहीं करतीं, फिर भी रचना का उद्दाम अतिरेक कहीं खंडित नहीं होता... अद्भुत काव्य संव्यूहन है भाई... मन में देर तक हलचल रचाने वाला आलोडन है...बधाई.
अशोक गुप्ता

parag mandle said...

कोई भाषा नहीं और एक यह भी सही कविताएं अच्छी लगीं। खासकर दोनों कविताओं की अंतिम पंक्तियां मिलकर एक प्रभावी संयोग बनाती हैं -
जबकि तुम जिन वजहों से सुन्दर और करीबतर थी उन वजहों की कोई भाषा नहीं. अब इतना कुछ अजीबोगरीब ढंग से पैबस्त है जीवन में तो एक यह भी सही।

चण्डीदत्त शुक्ल said...

डिठौना लगाकर रख जालिम, नज़र लग जाएगी। बस शब्दों में ना रखना, ऐसे ही टूटके चाहना, देखना कोई शब्द, ना कोई देह आड़े गाएगी और मनभाषा में बजेगा मद्धम-मद्धम सितार।

purvi said...

प्यारी सी कल्पना है डिठौना .
गुदगुदी सपनों को गुदगुदा गई.

"जबकि तुम जिन वजहों से सुन्दर और करीबतर थी उन वजहों की कोई भाषा नहीं."

'हम अक्सर उसे क्यों चाहने लगते हैं जो पहले से किसी और के प्यार में मुब्तिला रहता है'

बेहतरीन अनुराग. प्यार के, हसीन साथ के सारे सुन्दर भावों को खूबसूरती से बयां किया है. बधाई.

mark rai said...

तुम्हारी हंसी की अलगनी पर मेरी नींद सूख रही है.

तुम उसे दिन ढले ले आओगी कमरे में, तहा कर रखोगी सपने में.
....thase lines r very touchy...
really Anurag ji i have no word to explain these lines..i can only read and praise it.u know my limitations in literature....

सागर said...

यह लिखा ऐसे ही इतना खुबसूरत नहीं है. यह सब आपके बहुत पढने और प्रेम में पड़ने का नतीजा है.

dinesh trapathi said...

vah Anurag bhayi. behad khoobsoorat bayan hai.aap behad apnepan se bharebimb uthate hain,jaise bilkul kahin apna dekha,mahsoos kiya ho.bahoot khoob-'jabki tum jin vajahon se sunder our kareebtar thi un vajahon ki koyee bhasha nahin.' 'ise hamare bachchon ke liye rakh chhodo'. 'hansi ki algani par sookhti neend' badi atmiye abhivyaktiyan hain ye. aapi ki bhasha ka flow mujhe behad prabhavit kar raha hai. shukriya, to share these poems.

Parul said...

kya kehoon...uljh gayi hoon..itna khoobsurat likha hai!

anjule shyam said...

तुम्हारी हंसी की अलगनी पर मेरी नींद सूख रही है.तुम उसे दिन ढले ले आओगी कमरे में, तहा कर रखोगी सपने में.मैं उसे पहन कर कल काम पर जाऊंगा और मुझे दिन भर होगी गुदगुदी................- हुजुर ने शब्द को अहसासों के रंग से रंग कर रखा है...बेहद शानदार......लाजवाब...क्या कहूँ इस कविता के लिए समझ नहीं आता....शब्दों को दिल की तिजोरी से इस खूबसूरती से चुन चुन के रखा है की दिल साला इन सबके बीच ही मटरगस्ती करने में मगन हो जाता है...और कमेंट्स करने को कुछ समझ नहीं आता....

rajeev matwala said...

तुम्हारी हंसी की अलगनी पर मेरी नींद सूख रही है..........
मार्मिक अहसास के साथ लिखा गया आपका काव्य हृदय को स्पर्श करता है|खूबसूरत आकृति उभर कर आती है, वास्तव में ये इन्द्रधनुष सा आभासित कटा है....आप साधुवाद के पात्र है...मेरी शुभकामनाये आपके साथ है...

प्रवीण पाण्डेय said...

अलग से लगे चित्रण, उलझे से भी, नहीं भी।

Arpita said...

ताज़ी....लाजवाब...कुछ हट के...सुंदर.....उम्दा भाव...शाब्दिक कलाकारी....touchy....प्रभावी संयोग और जाने कितनी अनुभूतियों से गुज़री आप की कवितायें....स्वाभाविक है मेरी भी अनुभूति शामिल है इनमें. अब सबकी अनुभूतियों के बीच मैं भी शामिल हूं..बिन कुछ कहे..यानि एक कमेंट के लिये आप कह सकते हैं "एक ये भी सही"......नहीं

मृत्युंजय said...

अनुराग भाई,
पहले तो बधाई!

दूसरे प्रेम कवितायें हमेशा 'दूसरे' के गहरे सानिद्ध्य से, फ़िक्र से ही पैदा होती हैं. हमारी अपनी फ़िक्र उसमें गुंथ जाये तो कोई बात नहीं. वह जो है, उसके इन कविताओं में उसके कई अक्स उभरते हैं. अक्स, जो बिम्बों के बाद बनते हैं. इन कविताओं की खासियत है इनमें मौजूद रोजमर्रापन. समय का बेहद छोटा वक्फा, जो बार बार हमारे सामने से गुजरता है, जो एक ख़ास किस्म की ऐन्द्रिय विराटता में डूबा रह जाता है अक्सर. यही वक्फा इन कविताओं में है, और कहना चाहिए, बेहद अच्छा है. सो इनका मूल भाव चुहल ही है न?

विज्ञापनी भाषा की चातुरी का ऐसा वैसा कर देने की बात कवि के लिए स्मृति में घटी चीज है. प्रेम को याद करते हुए, प्रेम के सुख को याद करते हुए. कविता शायद नीचे से शुरू होती है. ऊपर की तरफ बढ़ने पर स्मृति ही मिलती है, जिसके बारे में गिरिजा कुमार माथुर ने कभी लिखा था- 'छाया मत छूना मन, होगा दुःख दूना मन'. इस स्मृति की हाट में बेहोश वक्त की भी साझेदारी है.

और यह तीसरा! इसमें तो दम है. अपने एकांत का आविष्कार कर लिया है इसने. जूझा यह. यहाँ तक कि विनम्रता के हथियार का भी इस्तेमाल किया. पर अंत में जब उसके मुंह से 'पैवस्त' शब्द निकलता है तो ऊपर की इमारत भहरा जाती है. इतने जतन से जुटाए गए तर्क, जवाब, आत्मतोष, विनम्रता, किसी का तो तुक इस पैवस्त से नहीं बैठता.

खैर,
ग़ालिब का यह शेर कवि के लिए-
कहाँ का इश्क कैसी वफ़ा जब सर फोड़ना ठहरा,
तो फिर ऐ संगदिल तेरा ही संगे-आस्तां क्यों हो.

Pawan Nishant said...

इतने से ही कुछ नहीं होना था
यह जो जादुई डिठोना था
पढ़ा है मुंह से गूंज रहा है कानों में
पढ़ रहा हूं जितना उड़ रहा हूं आसमानों में..

Farhan Khan said...

Such a mesmerizing beauty of poetical art.
All the ditties are beautiful but the first poem (डिठौना) is much enchanting to me. I find uncluttered dexterity in all these wonderful poems.

Thank you!

महेन said...

आपसे पिछली बार चैट करते हुए आपकी डायरी के अंशों के बारे में मैनें कहा था कि ये किसी महान पश्चिमी उपन्यास के अनुवाद के अंश लगते हैं पढ़ते हुए।
आज फ़ुर्सत हुई तो इस पोस्ट के साथ डायरी वाली पोस्ट फिर पढ़ने बैठा और आखरी लाइन तक आते-आते मुझे यकायक त्रिलोचन की एक कविता याद हो आई, ‘क्या क्या नहीं चाहिये’ और मेरा विश्वास फिर से दृढ़ हुआ कि आप कविता को ज़बर्दस्ती गद्द में लिखने की ज़िद लिये बैठे हैं। आपने इधर अपनी बहुत कम कवितायें लगाई हैं और उनके आधार पर दावे से नहीं कह सकता कैसी कविता लिखते हैं मगर आपके लिखे साधारण से वक्तव्य, ब्लॉग पर किसी पोस्ट के इन्ट्रो और डायरी के् अंश पढ़ने के बाद आश्वस्त हूँ कि अच्छी ही लिखते होंगे। मेरे मायने कंसिस्टेंसी से हैं। आखरी दो कविताएं पढ़ते हुए कन्फ़्यूज़ हो गया कि कविता कहां शुरु होती है और गद्य कहां खत्म होता है मगर ट्रांज़िशन बहुत खूबसूरत है।

kahana hai kuch aur said...

kya baat hai, tumne likhi...great

rabi bhushan pathak said...

अनुराग वत्‍स की कविता बाजार व विज्ञापन के मारक शोर के बीच में भी प्रेम के गीत को खोज पाती है ।यहां याद की केन्‍द्रीय भूमिका है । कभी वह प्रेमिका के तिल से रार करता है,तो कभी प्रेमिका के हंसी की अलगनी पर अपनी नींद को सुखाता है ।यह प्रेम नई कविता की ही तरह वाचाल नहीं है,बल्कि इससे भी आगे बढकर आम जिन्‍दगी के नित्‍यकर्म में राग की पहचान करता है । 'कोई भाषा नही ' कविता में यह विज्ञापनी भाषा की निरर्थकता को बडी आसानी से साबित कर आगे बढ जाती है । इस कविता में विज्ञापन की चतुरता किसी बाजारूपन का निर्माण करने में असफल रहती है ।यहां कवि आसानी से बाजार के मायाजाल को निशक्‍त करते हुए अपनी राह निकल जाता है ।

Priyankar said...

भाषा की तनी हुई रस्सी पर चलते समय बहुत-से नागर कवियों के अतिरिक्त चौकन्नेपन से उनकी भाषा उत्कर्ष के नए मानक नहीं गढ़ पाती, नतीज़तन कविता में सूक्ष्म भावों की चुटकी ढीली पड़ जाती है और प्रेम का सूत बहुत मोटा तैयार होता है.

अनुराग के कवि का चौकन्नापन सहज-स्वभावी है और काव्य-भाषा की कसावट और ताज़गी सहज-प्रभावी . उनकी प्रेम कविताएं भाव और भाषा के अनुकूलतम संयोग-बिंदु पर आरोहण करती दिखाई देती हैं.

एक पंक्ति में कहें तो अनुराग की चुटकी साफ़ है और उनका सूत महीन . बधाई !

डॉ .अनुराग said...

"एक यह भी सही"..... दिलचस्प है ओर अपने आप में मुकम्मल ....प्रेम बड़ी अजीब शै है ...कित्ता लिखो ...कित्ता पढो..कम पड़ता है ....

जैसे त्रिकोण में कहीं तुम हो. जैसे दुनिया में हर शै है.

वैसे प्रेम भी बदल रहा है अब अपनी सूरत ......

merinajrmeranajria said...

निगाह पहनने से लेकर हसी पहनने तक का सफ़र खुबसूरत है वाकई पढ़ कर अच्छा लगा उम्मीद है इसमें आप कुछ और पंक्तियाँ भी जोड़ेंगे...

Umber Ranjana Pandey said...

सोच ले और उदास हो जाए.

manoj chhabra said...

...तुम्हारी हंसी की अलगनी पर मेरी नींद सूख रही है.
तुम उसे दिन ढले ले आओगी कमरे में, तहा कर रखोगी सपने में.
मैं उसे पहन कर कल काम पर जाऊंगा और मुझे दिन भर होगी गुदगुदी...
...kamaal ...

Geet Chaturvedi said...

सुंदर कवितायेँ. कोमल इमेजेस की बारिश हो रही है. और ऐसा लगता है, जैसे बारिश एक नितांत निजी अनुभव है.

akash said...

विज्ञापनी भाषा की सारी चातुरी की ऐसी-तैसी कर हम वस्तुओं की जगह ख़ुद को कितनी आसानी से नत्थी कर लेते थे...कोई ये ज़रा उनको भी बता दे, कोई तो उनकी सोई हुई
दूम हिला दे....

Manohar said...

yah padh kar mujhe hamesha yahi mahsus hota hai ki wo kaun sa thikana hai jaha par aap le jaate hai, jaha pahuchne ka eshas kabhi nahi ho pata ...jaise lagta hai ki ye yatra to abhi suru hi honi thi, magar achanak pata bhi chalta hai jaise kitna kuch beet chuka hai..ya kabhi kabar kuch apne saa ehsaas bhi hota hai ...jaise lagta hai apki diary k panne padh kar kitna kuch isme ankaha rah gaya or shayad wah ankaha hi isme ek mahatvapurn hissa bhi dikha jaata hai..wahi kabhi jo ham nahi bolte ya likhte hai, wahi jo likha jata hai use sundar bhi bana jaata hai..magar aapki lekhni usi ko bacha le jaati hai or shayad yahi inka jaadu bhi hai..aabhar padhane k liye...

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

आज ४ फरवरी को आपकी यह पोस्ट और शताब्दी स्मरण - शमशेर बहादुर सिंह जी वाली पोस्ट चर्चामंच पर रखी हैं .. इन सुन्दर पोस्ट के लिए आपका शुक्रिया ... आप चर्चामंच में आये और अपने विचारों से हमें अनुग्रहित कीजिये ...

http://charchamanch.uchcharan.com/2011/02/blog-post.html

shradha said...

ghazab... bhasha aur bhav behtreen hai, shaili par thoda paschatya prabhav nzar ata hai...raah se hat kar chalne wale hi nai manjile khoz nikalte hai,keep experimenting.

lee said...

अनूठी कविता है. बेहद आत्मीय अहसास. कवि से रश्क हुआ इतनी अच्छी कैसे लिखी और आपने लिखी हमने क्यों नहीं लिखी. बहुत धन्यवाद बहुत से अहसास जगाने के लिए. डिठौना और गुदगुदी बेहद खूबसूरत हैं. अनायास ही खुद के करीब ले आती है. साभार लीना मल्होत्रा

Rukaiya said...

एक तिल है बाईं आंख की सरहद पर तुम्हारी
जो मेरी निगाह से रार ठाने रहता है
;
तुम्हारी हंसी की अलगनी पर मेरी नींद सूख रही है
मैं उसे पहन कर कल काम पर जाऊंगा और मुझे दिन भर होगी गुदगुदी
;
जबकि तुम जिन वजहों से सुन्दर और करीबतर थी उन वजहों की कोई भाषा नहीं
;

देख कर तुम्हें कभी यह नहीं लगा कि तुम्हारी उजली हंसी पर प्रेम की वह छाया भी पड़ती है जो तुम्हें चुप और उदास बनाती है
... kuch kahte nahi banta itna khubsurat padhne ke baad ..Iam just speechless...

sarita sharma said...

बिलकुल नई भाषा में लिखी अलग रंग की प्रेम कवितायें जो प्रेम को वायवीय नहीं बनने देती हैं और भावनों को बाजार समाज के परिप्रेक्ष्य में दिखाती हैं.