Tuesday, January 25, 2011

स्मरण : भीमसेन जोशी



नश्वर देह का अमर राग


उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी वर्षों में उस्ताद अब्दुल करीम खां की जादुई आवाज ने जिस किराना घराने को जन्म दिया था, उसे बीसवीं शताब्दी में सात दशकों तक नयी ऊंचाई और लोकप्रियता तक ले जाने वालों में भीमसेन जोशी सबसे अग्रणी थे। किराना घराने की गायकी एक साथ मधुर और दमदार मानी जाती है और इसमें कोई संदेह नहीं कि जोशी इस गायकी के शीर्षस्थ कलाकार थे। अर्से से बीमार चल रहे जोशी का निधन अप्रत्याशित नहीं था, हालांकि उनके न रहने से संगीत के शिखर पर एक बड़ा शून्य नजर आता है। लेकिन सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि भीमसेन जोशी किराना घराने के सबसे बड़े संगीतकार थे। दरअसल उनकी संगीत-दृष्टि अपने घराने से होती हुई बहुत दूर, दूसरे घरानों, संगीत के लोकप्रिय रूपों, मराठी नाट्य और भाव संगीत, कन्नड़ भक्ति-गायन और कर्नाटक संगीत तक जाती थी। 

यह एक ऐसी दृष्टि थी जिसमें समूचा भारतीय संगीत एकीकृत रूप में गूंजता था। कर्नाटक संगीत के महान गायक बालमुरलीकृष्ण के साथ उनकी विलक्षण जुगलबंदी से लेकर लता मंगेशकर के साथ उपशास्त्रीय गायन इसके उदाहरण हैं। दरअसल भीमसेन जोशी इस रूप में भी याद किये जायेंगे कि उन्होंने रागदारी की शुद्धता से समझौता किये बगैर, संगीत को लोकप्रियतावादी बनाये बगैर उसका एक नया श्रोता समुदाय पैदा किया। इसका एक कारण यह भी था कि उनकी राग-संरचना इतनी सुंदर, दमखम वाली और अप्रत्याशित होती थी कि अनाड़ी श्रोता भी उसके सम्मोहन में पड़े बिना नहीं रह सकता था।

धारवाड़ के गदग जिले में १९२२  में जन्मे भीमसेन जोशी की जीवन कथा भी आकस्मिकताओं से भरी हुई है। वे ११ वर्ष की उम्र में अब्दुल करीम खां के दो ७८ आरपीएस रिकॉर्ड सुन कर वैसा ही संगीत सीखने घर से भाग निकले थे और बंगाल से लेकर पंजाब तक भटकते, विष्णुपुर से लेकर पटियाला घरानों तक के सुरों को आत्मसात करते रहे। अंततः घर लौटकर उन्हें पास में ही सवाई गंधर्व गुरू के रूप में मिले जो अब्दुल करीम खां साहब के सर्वश्रेष्ठ शिष्य थे। उन्नीस वर्ष की उम्र में पहला सार्वजनिक गायन करने वाले भीमसेन जोशी पर जयपुर घराने की गायिका केसरबाई केरकर और इंदौर घराने के उस्ताद अमीर खां की मेरुखंड शैली का प्रभाव भी पड़ा। 

इस तरह उन्होंने अपने संगीत का समावेशी स्थापत्य निर्मित किया जिसकी बुनियाद में किराना था, लेकिन उसके विभिन्न आयामों में दूसरी गायन शैलियां भी समाई हुई थीं। भीमसेन जोशी अपने गले पर उस्ताद अमीर खां के प्रभाव और उनसे अपनी मित्रता का जिक्र अक्सर करते थे। कहते हैं कि एक संगीत-प्रेमी ने उनसे कहा कि आपका गायन तो महान है लेकिन अमीर खां समझ में नहीं आते। भीमसेन जोशी ने अपनी सहज विनोदप्रियता के साथ कहा : ‘ठीक है, तो आप मुझे सुनिए और मैं अमीर खां साहब को सुनता रहूंगा।

भीमसेन जोशी के व्यक्तित्व में एक दुर्लभ विनम्रता थी।  किराना में सबसे मशहूर होने के बावजूद वे यही मानते रहे कि उनके घराने की सबसे बड़ी गायिका उनकी गुरू-बहन गंगूबाई हंगल हैं। एक बार उन्होंने गंगूबाई से कहा, ‘बाई, असली किराना घराना तो तुम्हारा है। मेरी तो किराने की दुकान है। अपने संगीत के बारे में बात करते हुए वे कहते थे : ‘मैंने जगह-जगह से, कई उस्तादों से संगीत लिया है और मैं शास्त्रीय संगीत का बहुत बड़ा चोर हूं। यह जरूर है कि कोई यह नहीं बता सकता कि मैंने कहां से चुराया है।' दरअसल विभिन्न घरानों के अंदाज भीमसेन जोशी की गायकी में घुल-मिलकर इतना संश्लिष्ट रूप ले लेते थे कि मंद्र से तार सप्तक तक सहज आवाजाही करने वाली उनकी हर प्रस्तुति अप्रत्याशित रंगों और आभा से भर उठती थी।

किराना का भंडार ग्वालियर या जयपुर घराने की तरह बहुत अधिक या दुर्लभ रागों से भरा हुआ नहीं है, लेकिन किसी राग को हर बार एक नये अनुभव की तरह, स्वरों के लगाव, बढ़त और लयकारी की नयी रचनात्मकता के साथ प्रस्तुत करने का जो कौशल भीमसेन जोशी के पास था वह शायद ही किसी दूसरे संगीतकार के पास रहा हो। मालकौंस, पूरिया धनाश्री, मारू विहाग, वृंदावनी सारंग, मुल्तानी, गौड़ मल्हार, मियां की मल्हार, तोड़ी, शंकरा, आसावरी, यमन, भैरवी और कल्याण के कई प्रकार उनके प्रिय रागों में से थे और इनमें शुद्ध कल्याण और मियां की मल्हार को वे जिस ढंग से गाते थे, वह अतुलनीय था। 

उनके संगीत में एक साथ किराना की मिठास और ध्रुपद की गंभीरता थी, जिसे लंबी, दमदार और रहस्यमय तानें, जटिल सरगम और मुरकियां अलंकृत करती रहती थीं। एक बातचीत में उन्होंने कहा था : ‘गाते हुए आपकी साधना आपको ऐसी सामर्थ्य देती है कि यमन या भैरवी के स्वरों से आप किसी एक प्रतिमा को नहीं, बल्कि समूचे ब्रह्मांड को बार-बार सजा सकते हैं।

भीमसेन जोशी करीब सत्तर वर्षों तक अपने स्वरों से किसी एक वस्तु या मूर्ति को नहीं, समूची सृष्टि को अलंकृत करते रहे। यही साधना थी जो उन्हें बीसवीं सदी में उस्ताद अमीर खां साहब के बाद इस देश के समूचे शास्त्रीय संगीत का सबसे बड़ा कलाकार बनाती है और उन्हीं की तरह वे अपनी देह के अवसान के बावजूद अपने स्वरों की अमरता में गूंजते रहेंगे।
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6 comments:

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

मंगलेश जी ने बहुत सधा हुआ मूल्यांकन किया है पण्डित जी की गायकी का.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

पंडितजी मेरे प्रिय रहे हैं। हां, उनसे मिलने का सौभाग्य भी पाया है// यकीन मानिये..इन दिनों उनकी ही आवाज़ गूंज रही है मेरे आस पास। मंगलेश डबरालजी की सधी लेखनी ने मुझे फिर से पंडितमय कर दिया है..। एक कुमार गंधर्वजी जब कूच कर गये थे तब और अब मन अज़ीब से दौर में विचर रहा है..। खैर..

anjule shyam said...

नश्वर देह का अमर राग - मंगलेश डबराल..
इस शख्स को हम दूरदर्शन के ज़माने से जानते हैं.....तब अकशर मेरे पशंदिदा धारवाहिक ''चंद्रकांता'' के पहले...मिले सुर मेरा तुम्हारा..के जरिये ये शक्स हमें पूरे मुल्क की शैर कराता था...सुर के लहरों पर बैठा कर...तब नहीं पाता था इस कमाल की सवारी में इतनी जान कहाँ से आती है....लेकिन आपकी पोस्ट से पाता चलता है...वो भी एक आवारागर्द था राहुल सांस्कृत्यायन की माफिक.....जो इस सुर को साधने के लिए राहुल (ज्ञान की तलाश) की तरह देश विदेश के पहाड़ों की खाक छनता रहा...और उसके सुर की कशिश इसी वजह से इतनी सधी हुई है....
''ये आवाज एक सफर है.....देश की ....सुर की .... संगीत की ...और खुद इस आवाज में भारतीय संगीत के इतिहास का सफ़र भी सफर करता है.....''.......कल जब प्रिन्स ने मुंबई से कॉल करके...के कहा ..अब ..सुर नहीं मिएँगे क्योंकि ..सुर साधने वाला एक अंतहीन सफ़र पर निकाल चूका है...तो सन्नाटा फैल गया मेरे चारो तरफ क्योंकि.....यही तो शख्स था जो पूरे देश की आवाज बनता था और वो भी चला गया...देश की आवाज ..जी हाँ....लेकिन आज से एक सल पहले ही...दूरदर्शन के जरुइए देश भर में फैलनी वाला इस सुर को खुद दूरदर्शन के कर्ताधर्त ही भूल चुके है... 50 साल के दूरदर्शन के सफ़र नामें के उपलक्ष्य में जब ...सुर मिलाने की बारी आई तो...इन कर्ताध्र्तावों को सेलिब्रेटीज ही मिलें आज मिलाने को....जो की देश की आवाज नहीं बन सके ऐसे में इस शक्स का जाना सन्नाटा पैदा करता है....देश के हर हिस्से के सुर मिल के सुर साध नहीं पाएंगे...आपकी पोस्ट संगीत के इस दिग्गज के कई पहलूवों से परचित कराती है..शानदार पोस्ट के लिए बधाई...
अनुराग ...कुछ और बाटें आपसे इस ब्लॉग के बारे में...
मुझे जब इसका लिंक पहली बार मिला तो सोचा की होगा कोई कवियाय हुवा शख्स जो अपनी कविता पे वाह वाही चाहता होगा...कावियाए हुवे लोगों ने कविता की क्या हट कर रखी है ये तो बताने की जरुरत नहीं है...लेकिन आपकी कुछ पोस्टें पढने के बाद..अनुराग आपको इस ब्लॉग मुझे देने के लिए आपको शुक्रिया कहने को दिल कह रहा है..शुक्रीय..उम्मीद है सफ़र यूँही चलता रहेगा...
कल भीमसेन जोशी के निधन की खबर पे शफीक सर की एक कमेंट्स आई थी आपसे साझ करने को दिल कर रहा है..मेरी आवाज भी इस कमेंट्स में सममित समझी जाए...

आपको सम्मान के साथ याद करेंगे.
जीवन के प्रत्येक सबक बताने के लिए स्नेह
और एक सुखद अहसास के लिए
सुन्दर सपनो के लिए
शर्धांजलि मुर्दों को दिया करते हैं
पुष्पांजलि भगवानो को शोभती है
आप तब भी दिल में बसते थे अब भी बसे हैं
जब भी मेरे सपनों की रंग बिरंगी तितलियाँ लहरायेंगी
सुर लहरियां आपकी तैरेंगी सोये हुए कानों में भी
हम चाह कर भी नहीं भुला पायेंगे
आपकी सुर लहरियां अब नहीं सोने देंगी हमारे जज्बातों को
अब भी अवसाद में आप ही बजेंगे मेरे टेप रेकार्डर में
आप दिग्यदर्शक थे सो बने ही रहेंगे
आपके गरिमामय जीवन के लिए धन्यवाद..
और धन्यवाद अनुराग....धन्यवाद...

Travel Trade Service said...

सही पूछो तो में दो दिन से विचलित हूँ कही ...मेरे सब CD .कलेक्शन ..जिनमे ये रचे बसें है कही .उनको हाथ में लेकर भी कही उनको स्मरण करना अजीब लगरहा है कही ...क्यू की घर पर /ऑफिस में इनके भजनों से शुरुवात हुआ करती है कही पिछले १५-२० सालों से ...मुझे सबसे ज्यादा दुःख इस बात से की उनके शब्द/राग है... पर वो नहीं है .......एक बार आमना सामना हुआ था ..लाइव में ...खेर .....उनका नाम ,व्यक्तिव हमेंशा अमर ..Nirmal Paneri

प्रवीण पाण्डेय said...

महान विनम्र होते हैं। श्रद्धान्जलि।

सुशीला पुरी said...

उनके संगीत में एक साथ किराना की मिठास और ध्रुपद की गंभीरता थी, जिसे लंबी, दमदार और रहस्यमय तानें, जटिल सरगम और मुरकियां अलंकृत करती रहती थीं। एक बातचीत में उन्होंने कहा था : ‘गाते हुए आपकी साधना आपको ऐसी सामर्थ्य देती है कि यमन या भैरवी के स्वरों से आप किसी एक प्रतिमा को नहीं, बल्कि समूचे ब्रह्मांड को बार-बार सजा सकते हैं।
!!!!!!!!!!
सुरों के सूरज थे वे सचमुच !!!