
[ सिद्धान्त अपनी ताज़ा कविताओं के साथ आपके सम्मुख हैं. कविताओं के साथ दी गई चित्र-कृति प्रीती मान की बनाई हुई है.]
फ़िर से...
आज मैं फ़िर से लिखूंगा
पहले से ज़्यादा लिखूंगा
और ज़्यादा
इतना ज़्यादा
कि मुझे फ़िर से प्यार हो जाए
जैसे पहले हुआ था
जब मैनें पहले लिखा था
उसके पहले से ज़्यादा
उसे होना होगा
बार-बार
कई बार
हमेशा
मुझे लिखता हुआ बनाए रखने के लिए
****
अब कुछ जवान होती लड़कियों ने
****
माँ
हमेशा से तुम भरसक लिखी गई
किसी भी काम की तरह
जो शायद अनमने ढंग से किया जाता हो.
तुम कविता में हमेशा आती हो
अपनी मौत के बाद,
लेकिन मेरे लिए
तुम अभी भी मौज़ूद हो,
ज़िंदा हो और ताज़ा हो.
तुम पर लिखे गए को पढ़ना
हमेशा थोड़ा भारीपन लिए होता है
क्योंकि
वहाँ दख़ल होती है,
ख़राब साहित्य की
जो अच्छा दिखने का भ्रम पैदा करता है.
दरअसल,
तुम यहाँ एक ज़रिया बन जाती हो
उस अंतर को ख़त्म करने के लिए
जो एक "अच्छे" और "ख़राब" साहित्य के बीच होता है.
ठीक-ठीक उस आत्मकथा की तरह
जिसके साथ एक छोटा कलाकार भी
सुर्ख़ियों में आ जाता है.
एक साम्य हो तुम.
अभी कल की ही बात है
मैनें तुम्हे नाले में बहता हुआ देखा,
जैसे कोई लाई-चना खा रहा हो
तुम पर रखकर,
क्यों सहती हो इतना,
मना क्यों नहीं कर देती हो,
हमेशा की तरह चुप रहना
तुम्हारी आदत-सी बन गयी है.
अब बस करो,
मत बनो अपने बेटे की ताक़त
या आदर्श
या पैरवीकार
या सबसे अच्छी दोस्त
अपनी लड़की की.
यदि तुम चाहो,
तो जी सकती हो मन मुताबिक़.
बशर्ते, मैं ख़ुश रहूँ,
क्योंकि मेरा ख़ुश होना तुम्हारी मजबूरी होती है.
एक बार सिनेमा वाला रूप भी
अख्तियार करने की कोशिश क्यों नहीं करती,
या किसी अनंतकाल तक चलने वाले धारावाहिक की तरह.
क्यों नहीं मुझे उद्वेलित करती हो
सड़क के गुंडों से भिड़ने के लिये,
रोकने में भला तुम्हें क्या मज़ा मिलता है.
क्यों नहीं मेरे हाथों में पिस्तौल सौंप
छोड़ देती हो बाज़ार में
सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए.
क्यों नहीं देती हो पैसे,
अपनी देवरानी या भाई को
या प्रेमी को
पति का क़त्ल करने के लिए.
माफ़ करना, यहाँ तुम जुड़ जा रही हो,
एक पत्नी के किरदार से भी.
कभी मुझे प्यार नहीं करके भी देखो,
मत रखो जूतिया या गणेश-चौथ का व्रत.
मरने दो मुझे,
यदि मेरा बाप शराबी है
तो छोड़ो करवा-चौथ भी,
मरने दो उसे,
वैसे भी तुम प्रेम कर रही हो
मेरे सौतेले बाप से.
दरअसल, तुम ख़राब नहीं हो,
लेकिन एक बार ख़राब भी बन कर देखो.
तुम "प्रकृति" या "प्रेम" होती जा रही हो
बेकार ढंग से लिखी गई.
एक बार दिन के बीच में
सोकर भी देखो,
या बहिष्कार कर दो
खाना बनाने का,
और कम कर दो
रोना या
घर छोड़ देने या आत्महत्या कर लेने की धमकी.
कम कर दो, सत्संग में जाना और
पड़ोसी सहेलियों से बतियाना,
या उनकी बुराई मुझसे बतियाना.
ख़राब कुछ भी नहीं है,
बस रफ है सबकुछ - रूखा-सूखा
अपने भीतर की जल्दबाज़ी को छिपा पाने में असमर्थ.
बस एक विनती है तुमसे कि
यहीं रहो
और समय-समय पर पानी-चाय
का इंतजाम कर देना.
****
आज मैं फ़िर से लिखूंगा
पहले से ज़्यादा लिखूंगा
और ज़्यादा
इतना ज़्यादा
कि मुझे फ़िर से प्यार हो जाए
जैसे पहले हुआ था
जब मैनें पहले लिखा था
उसके पहले से ज़्यादा
उसे होना होगा
बार-बार
कई बार
हमेशा
मुझे लिखता हुआ बनाए रखने के लिए
****
मोनालीशा ब्यूटी पार्लर
हाँ, उसका नाम मोनालीशा ही होगा
जो शहर और आस-पास के इलाक़ों में
ब्यूटी पार्लरों के नामकरण का सामान बनी
उन जगहों पर
जहाँ एक मोटे परदे सेब्यूटी पार्लरों के नामकरण का सामान बनी
उन जगहों पर
हमसे दूरी बनाई जाती है
और यूँ ही व्याप्त हो जाता है
रहस्य
उस परदे के पीछे क्या है
मैंने और कईयों ने हमेशा जानने की कोशिश की है
परदे के पार की दुनिया
ज़्यादा रोचक होती है
बजाय इधर की दुनिया के
मोनालीशा भी नहीं जान पाई होगी
परदे का खेल
मैनें देखा है
कुछ लोग मान लेते हैं
अन्दर एक वेश्यालय है
और संचालिका
निम्न दर्जे की एक वेश्या
शक़ होता है
अन्दर जाने वाली महिलाओं पर
और दी जाती है उनके पतियों को
नसीहतें और उलाहना
मोनालीशा की कर्मभूमि के सामने से जाने वाला पुरुष
कभी परदे के किनारों से अन्दर देखे बिना
आगे नहीं बढ़ता
क्यों होती है संचालिका वेश्या
क्यों नहीं हमें दबोचकर खींच लेती परदे के उस पार
और क्यों नहीं टूट पड़ती मुझ पर अपनी साथ वालियों के साथ
क्यों वे पसंद करती हैं हर पुरुष को
उनका भौंहों को नुकीला बनाना
क्यों लड़की को एक अलग वर्ग में स्थापित करता है
आने-जाने वाली महिलाओं के उभार
इतने उद्वेलित करने वाले क्यों होते हैं
क्या उन्होंने संचालिका को मार्गदर्शक मान लिया है
इसका प्रमाण क्या है
कि वे नहीं करती होंगी बातें
बिस्तर-तोड़ संबंधों के बारे में
क्या वे अपने पतियों की अदला-बदली की बातें करती होंगी
या तैयार होंगी किसी से भी प्रेम करने के लिए
दुःख तो इस बात का है
और यूँ ही व्याप्त हो जाता है
रहस्य
उस परदे के पीछे क्या है
मैंने और कईयों ने हमेशा जानने की कोशिश की है
परदे के पार की दुनिया
ज़्यादा रोचक होती है
बजाय इधर की दुनिया के
मोनालीशा भी नहीं जान पाई होगी
परदे का खेल
मैनें देखा है
कुछ लोग मान लेते हैं
अन्दर एक वेश्यालय है
और संचालिका
निम्न दर्जे की एक वेश्या
शक़ होता है
अन्दर जाने वाली महिलाओं पर
और दी जाती है उनके पतियों को
नसीहतें और उलाहना
मोनालीशा की कर्मभूमि के सामने से जाने वाला पुरुष
कभी परदे के किनारों से अन्दर देखे बिना
आगे नहीं बढ़ता
क्यों होती है संचालिका वेश्या
क्यों नहीं हमें दबोचकर खींच लेती परदे के उस पार
और क्यों नहीं टूट पड़ती मुझ पर अपनी साथ वालियों के साथ
क्यों वे पसंद करती हैं हर पुरुष को
उनका भौंहों को नुकीला बनाना
क्यों लड़की को एक अलग वर्ग में स्थापित करता है
आने-जाने वाली महिलाओं के उभार
इतने उद्वेलित करने वाले क्यों होते हैं
क्या उन्होंने संचालिका को मार्गदर्शक मान लिया है
इसका प्रमाण क्या है
कि वे नहीं करती होंगी बातें
बिस्तर-तोड़ संबंधों के बारे में
क्या वे अपने पतियों की अदला-बदली की बातें करती होंगी
या तैयार होंगी किसी से भी प्रेम करने के लिए
दुःख तो इस बात का है
चेहरे पर दुपट्टा बाँध
पार्लर आना-जाना शुरू कर दिया है ****
माँ
हमेशा से तुम भरसक लिखी गई
किसी भी काम की तरह
जो शायद अनमने ढंग से किया जाता हो.
तुम कविता में हमेशा आती हो
अपनी मौत के बाद,
लेकिन मेरे लिए
तुम अभी भी मौज़ूद हो,
ज़िंदा हो और ताज़ा हो.
तुम पर लिखे गए को पढ़ना
हमेशा थोड़ा भारीपन लिए होता है
क्योंकि
वहाँ दख़ल होती है,
ख़राब साहित्य की
जो अच्छा दिखने का भ्रम पैदा करता है.
दरअसल,
तुम यहाँ एक ज़रिया बन जाती हो
उस अंतर को ख़त्म करने के लिए
जो एक "अच्छे" और "ख़राब" साहित्य के बीच होता है.
ठीक-ठीक उस आत्मकथा की तरह
जिसके साथ एक छोटा कलाकार भी
सुर्ख़ियों में आ जाता है.
एक साम्य हो तुम.
अभी कल की ही बात है
मैनें तुम्हे नाले में बहता हुआ देखा,
जैसे कोई लाई-चना खा रहा हो
तुम पर रखकर,
क्यों सहती हो इतना,
मना क्यों नहीं कर देती हो,
हमेशा की तरह चुप रहना
तुम्हारी आदत-सी बन गयी है.
अब बस करो,
मत बनो अपने बेटे की ताक़त
या आदर्श
या पैरवीकार
या सबसे अच्छी दोस्त
अपनी लड़की की.
यदि तुम चाहो,
तो जी सकती हो मन मुताबिक़.
बशर्ते, मैं ख़ुश रहूँ,
क्योंकि मेरा ख़ुश होना तुम्हारी मजबूरी होती है.
एक बार सिनेमा वाला रूप भी
अख्तियार करने की कोशिश क्यों नहीं करती,
या किसी अनंतकाल तक चलने वाले धारावाहिक की तरह.
क्यों नहीं मुझे उद्वेलित करती हो
सड़क के गुंडों से भिड़ने के लिये,
रोकने में भला तुम्हें क्या मज़ा मिलता है.
क्यों नहीं मेरे हाथों में पिस्तौल सौंप
छोड़ देती हो बाज़ार में
सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए.
क्यों नहीं देती हो पैसे,
अपनी देवरानी या भाई को
या प्रेमी को
पति का क़त्ल करने के लिए.
माफ़ करना, यहाँ तुम जुड़ जा रही हो,
एक पत्नी के किरदार से भी.
कभी मुझे प्यार नहीं करके भी देखो,
मत रखो जूतिया या गणेश-चौथ का व्रत.
मरने दो मुझे,
यदि मेरा बाप शराबी है
तो छोड़ो करवा-चौथ भी,
मरने दो उसे,
वैसे भी तुम प्रेम कर रही हो
मेरे सौतेले बाप से.
दरअसल, तुम ख़राब नहीं हो,
लेकिन एक बार ख़राब भी बन कर देखो.
तुम "प्रकृति" या "प्रेम" होती जा रही हो
बेकार ढंग से लिखी गई.
एक बार दिन के बीच में
सोकर भी देखो,
या बहिष्कार कर दो
खाना बनाने का,
और कम कर दो
रोना या
घर छोड़ देने या आत्महत्या कर लेने की धमकी.
कम कर दो, सत्संग में जाना और
पड़ोसी सहेलियों से बतियाना,
या उनकी बुराई मुझसे बतियाना.
ख़राब कुछ भी नहीं है,
बस रफ है सबकुछ - रूखा-सूखा
अपने भीतर की जल्दबाज़ी को छिपा पाने में असमर्थ.
बस एक विनती है तुमसे कि
यहीं रहो
और समय-समय पर पानी-चाय
का इंतजाम कर देना.
****
भगवान अमरीका
गोली तो नहीं मार दोगे
क्योंकि कुछ बार से वो कहने के नतीज़े भोग रहा था
मुझे लग रहा है कि
मेरा लिखा तुम्हें बुरा लगा
ये तुम्हारे पैमानों पर खरा नहीं उतरा
तुम नहीं लिखवा पाए अपने मन-मुताबिक़
जैसे लेखकों और कवियों के साथ सज़ा के तौर पर करते हो
होना भी चाहिए
शायद, मैं इस्तेमाल में ला रहा हूँ
तुम्हारे हथियार तुम्हारे ख़िलाफ़
जैसे इन्टरनेट या कम्प्यूटर
लेकिन मैनें कहा 'शायद'
इसलिए क्षमाप्रार्थी हो सकता हूँ
क्या तुम अभी गुस्साए थे
क्योंकि अभी-अभी मेरा इन्टरनेट कट गया
लिखते-लिखते
कोशिश करना कि मुझे माफ़ करने की नौबत ही न आए
मुझे इस तरह से पालना
मेरी आगे की नस्ल के तुम ही सबकुछ हो
बाप भी हो
बाप ही हो
मेरे दिमाग़ को तैयार करना ऐसे
कि मैं सोच ही न पाऊँ कुछ अलग
या तुम्हारे ख़िलाफ़
या किसी नए आविष्कार के लिए
या बदलाव की धारा में
तुम स्वतंत्र हो मेरा सर तरबूज के माफिक उड़ाने के लिए
अगर बुरी लगी हो कई बात
कोशिश करना
मुझे माफ़ न करने की.
****
मुझे माफ़ करने की कोशिश करना
मेरे भगवान
अगर तुम्हारा मन करे तो
ना मन करे तो
नहीं भी करने की ख़्वाहिश
तुम ज़ाहिर कर सकते हो
मैंने जो भी लिखा
तुम्हारे ख़िलाफ़
मेरे भगवान
अगर तुम्हारा मन करे तो
ना मन करे तो
नहीं भी करने की ख़्वाहिश
तुम ज़ाहिर कर सकते हो
मैंने जो भी लिखा
तुम्हारे ख़िलाफ़
उसे मज़ाक़ ही समझना
हाँ,
वो मज़ाक़ ही था
मुझे माफ़ करना
अगर तुम्हे मज़ाक़ भी बुरा लगा
तुम चाहो तो मेरी गर्दन भी काट सकते हो
क्योंकि यहाँ से होती हुई आवाज़ें निकली हैं
तुम्हारे ख़िलाफ़
तुम चाहो तो मस्तक भी फोड़ सकते हो मेरा
तरबूज की तरह
क्योंकि इसने कसम खाई थी
तुम्हारे सामने न झुकने की
मुझे कोई गुरेज़ नहीं
तुम्हारी आदतों से
मेरा एक दोस्त है
उसका नाम मुसलमान है
हाँ,
वो मज़ाक़ ही था
मुझे माफ़ करना
अगर तुम्हे मज़ाक़ भी बुरा लगा
तुम चाहो तो मेरी गर्दन भी काट सकते हो
क्योंकि यहाँ से होती हुई आवाज़ें निकली हैं
तुम्हारे ख़िलाफ़
तुम चाहो तो मस्तक भी फोड़ सकते हो मेरा
तरबूज की तरह
क्योंकि इसने कसम खाई थी
तुम्हारे सामने न झुकने की
मुझे कोई गुरेज़ नहीं
तुम्हारी आदतों से
मेरा एक दोस्त है
उसका नाम मुसलमान है
अगर तुम्हारा
ख़ून इतने पर ही खौलता है- मतलब कि मैंने सोचा
तो तुम उसे भी मार देना
उसे माफ़ करना
क्योंकि उसे एक दिन लगा
शौच करते वक़्त
कहीं तुम उसेतो तुम उसे भी मार देना
उसे माफ़ करना
क्योंकि उसे एक दिन लगा
शौच करते वक़्त
गोली तो नहीं मार दोगे
- मतलब कि तुम्हारी मस्ती के तरीक़े
अगर माफ़ न कर सको
तो जो ज़रूरी समझो वो करना
कोई नहीं रोकेगा तुम्हे
उसे काफ़ी डर लगता है
उसे एक दिन लगा
उसकी पत्नी के साथ वो नहीं
तुम हमबिस्तर हुए थे
या चढ़े थे उसकी फूल-सी पत्नी पर जबरन
उसके डर को ही समझ लो
उसे डरा हुआ कुत्ता मान
छोड़ दो
जैसे तुम हमेशा करते हो
एक अच्छी आदत
उसने एक दिन हम सभी से कहा
कि मेरे पास कुछ तेल पड़ा है
कच्चा तेल
कुछ सुन्दर औरतें भी है
कटा-फटा लोकतंत्र भी है
लेकिन शायद तुमने ये सब सुन लिया था
और भड़क गए थे
अपनी भड़कन कम करो
तुम्हे अभी काफ़ी प्रार्थनाएं सुननी हैं
भागो! भागो! जल्दी भागो!
अमरीका गुस्सा रहा है
उस मुसलमान ने मुझसे कहा था
नहीं-नहीं इस बार उसने कुछ कहा नहीं था
अगर माफ़ न कर सको
तो जो ज़रूरी समझो वो करना
कोई नहीं रोकेगा तुम्हे
उसे काफ़ी डर लगता है
उसे एक दिन लगा
उसकी पत्नी के साथ वो नहीं
तुम हमबिस्तर हुए थे
या चढ़े थे उसकी फूल-सी पत्नी पर जबरन
उसके डर को ही समझ लो
उसे डरा हुआ कुत्ता मान
छोड़ दो
जैसे तुम हमेशा करते हो
एक अच्छी आदत
उसने एक दिन हम सभी से कहा
कि मेरे पास कुछ तेल पड़ा है
कच्चा तेल
कुछ सुन्दर औरतें भी है
कटा-फटा लोकतंत्र भी है
लेकिन शायद तुमने ये सब सुन लिया था
और भड़क गए थे
अपनी भड़कन कम करो
तुम्हे अभी काफ़ी प्रार्थनाएं सुननी हैं
भागो! भागो! जल्दी भागो!
अमरीका गुस्सा रहा है
उस मुसलमान ने मुझसे कहा था
नहीं-नहीं इस बार उसने कुछ कहा नहीं था
इस बार वो सोच रहा था
सोचना भी इस तरीक़े से था
कि उसे ख़ुद को भी ख़बर न हो
कि वह क्या और क्यों सोच रहा है
उसने इस बार बड़े शान्त तरीक़े से सोचा
कि अपनी आज़ादी के लिए आवाज़ उठाए
वह उठा भी नहीं पाया थासोचना भी इस तरीक़े से था
कि उसे ख़ुद को भी ख़बर न हो
कि वह क्या और क्यों सोच रहा है
उसने इस बार बड़े शान्त तरीक़े से सोचा
कि अपनी आज़ादी के लिए आवाज़ उठाए
कि तुम तोरा-बोरा में घुस गए
और सारे अफगानिस्तान और ईराक़ को
तुम्हें नाखुश करने की सज़ा मिली
तुम्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है
तुमने जो किया, सही किया
तुम स्वतंत्र हो
जैसे हमेशा से थे
मैं तो नहीं
लेकिन कुछ लोग बोल रहे थे
कि तुमने हमारे देश को अपने हिसाब से चलाना शुरू कर दिया है
उन लोगों को सज़ा की ज़रूरत है
तुम देना सज़ा
अगर दिल बड़ा हो तुम्हारा तो
उन्हें माफ़ भी कर देना
तुम्हारे आगे तो सब बच्चे हैं
और सारे अफगानिस्तान और ईराक़ को
तुम्हें नाखुश करने की सज़ा मिली
तुम्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है
तुमने जो किया, सही किया
तुम स्वतंत्र हो
जैसे हमेशा से थे
मैं तो नहीं
लेकिन कुछ लोग बोल रहे थे
कि तुमने हमारे देश को अपने हिसाब से चलाना शुरू कर दिया है
उन लोगों को सज़ा की ज़रूरत है
तुम देना सज़ा
अगर दिल बड़ा हो तुम्हारा तो
उन्हें माफ़ भी कर देना
तुम्हारे आगे तो सब बच्चे हैं
मुझे लग रहा है कि
मेरा लिखा तुम्हें बुरा लगा
ये तुम्हारे पैमानों पर खरा नहीं उतरा
तुम नहीं लिखवा पाए अपने मन-मुताबिक़
जैसे लेखकों और कवियों के साथ सज़ा के तौर पर करते हो
होना भी चाहिए
शायद, मैं इस्तेमाल में ला रहा हूँ
तुम्हारे हथियार तुम्हारे ख़िलाफ़
जैसे इन्टरनेट या कम्प्यूटर
लेकिन मैनें कहा 'शायद'
इसलिए क्षमाप्रार्थी हो सकता हूँ
क्या तुम अभी गुस्साए थे
क्योंकि अभी-अभी मेरा इन्टरनेट कट गया
लिखते-लिखते
कोशिश करना कि मुझे माफ़ करने की नौबत ही न आए
मुझे इस तरह से पालना
मेरी आगे की नस्ल के तुम ही सबकुछ हो
बाप भी हो
बाप ही हो
मेरे दिमाग़ को तैयार करना ऐसे
कि मैं सोच ही न पाऊँ कुछ अलग
या तुम्हारे ख़िलाफ़
या किसी नए आविष्कार के लिए
या बदलाव की धारा में
तुम स्वतंत्र हो मेरा सर तरबूज के माफिक उड़ाने के लिए
अगर बुरी लगी हो कई बात
कोशिश करना
मुझे माफ़ न करने की.
****

Wednesday, 19 January, 2011
बेहद अच्छी कविताएँ हैं । मुझे मोनालीशा ब्यूटी पार्लर और ’भगवान अमरीका’ ज़्यादा पसन्द आईं। ’माँ’ और ’मोनालीशा ब्यूटी पार्लर’ को पढ़कर साफ़-साफ़ लगता है कि कवि की मानसिकता निम्न मध्यवर्गीय है । कविता में यह मानसिकता का झलकना ही कविता को कमज़ोर करता है। फिर भी कुल मिलाकर कविताएँ मुझे पसंद आईं । कवि को शुभकामनाएँ और सबद का आभार।
Wednesday, 19 January, 2011
दुःख तो इस बात का है
अब कुछ जवान होती लड़कियों ने
चेहरे पर दुपट्टा बाँध
पार्लर आना-जाना शुरू कर दिया है
... prabhaavashaalee lekhan ... prasanshaneey rachanaayen ... shaandaar-jaandaar post !!
Thursday, 20 January, 2011
jabardast kavitayen>>>>khastaur se kehna: Koshish karna mujhe maaf na karne ki>> Dhanyavad Anurag bhai>>>
Thursday, 20 January, 2011
चारों बेहतरीन कवितायें, बस लिखते रहिये।
Thursday, 20 January, 2011
मुझे माफ़ करने की कोशिश करना
मेरे भगवान
अगर तुम्हारा मन करे तो
ना मन करे तो
नहीं भी करने की ख़्वाहिश
तुम ज़ाहिर कर सकते हो....
...बहुत ही भावपूर्ण.
Thursday, 20 January, 2011
४रों कविताएं बहुत अच्छी लगीं ...इस में""" फिर से ""में काफी सकारत्मक सोच है कही खुद को जीने की या अभिव्यक्त करने की ....तिवारी जी को बहुत बहुत शुभकामनायें...nirmal paneri
Wednesday, 27 July, 2011
अपनी साफबयानी, मौलिक-मुखर शिल्प-शैली और जबरदस्त संप्रेषनीयता से सुखद आश्चर्य में डाल देने वाली कविताएं... कवि को बधाई और उपलब्ध कराने के लिए 'सबद' का आभार...
Friday, 07 October, 2011
इनके भीतर का उफ़ान इनकी कविताओं में झलक रहा है. सुन्दर कवितायेँ.
कुछ शब्दों की वर्तनी दुरुस्त हो जाए तो ये और इफेक्टिव लगेंगी जैसे कि फ़िर कि जगह फिर, नतीज़ा की जगह नतीजा. कुछ जगहों पर अनावश्यक नुक्ते जड़ गए हैं. (शायद सॉफ्टवेयर की प्रॉब्लम रही हो.)
आखिरी कविता में घिघियाता हुए विद्रोह का स्वर नोटेबल ( और नया सा भी ) है. आखिरी कविता यानी 'भगवान अमरीका' बहुत भायी.
Saturday, 23 March, 2013
बेहतरीन अभिव्यक्ति,बोलते हुए से शब्द...
Post a Comment