Saturday, January 08, 2011

नए कवि : अम्बर रंजना पाण्डेय की कविताएं


[कविता अगर भाषा के साथ-साथ कवि-कर्म की भी स्मृति है, तो अम्बर रंजना पाण्डेय की कविताएं अपने पीठ पीछे कविता की श्रेष्ठ परंपरा की सहचर है. एक उपलब्ध काव्य-भाषा और भंगिमा से दूर जाने के इस कवि-प्रयत्न की भिन्नता और सार्थकता असंदिग्ध है. अनेक शब्दों और छंदों का पुनर्वास इस युवा कवि की कविताओं में सुहानेवाली ताजगी पैदा करता है. आगे अम्बर की कविताएं हैं. वे किसी पत्रिका में इस तरह पहली ही बार छप रहे हैं. वक़्त -वक़्त पर उनका और काम भी सामने आएगा. साथ में दी गई चित्र-कृति रवि वर्मा की है. ]





केश धोना
(परिचय)

शिशिर दिवस केश धो रही थी वह, जब मैंने
उसे पहली बार देखा था भरे कूप पर.
आम पर बैठे शुक-सारिकाएँ मेघदूत
के छंद रटते रटते सूर के संयोगों
भरे पद गाने लगे अचानक. केश निचोड़
और बाएं हाथ से थोड़े से ऊँचे कर
उसने देखा और फटी धोती के टुकड़े
से पोंछ जलफूल उठी नील लता सी. चली.
दो चरण धीमे धरे ऐसे जैसे कोई
उलटता पलटता हो कमल के ढेर में दो
कमल. कमल, कमल, कमल थे खिल
रहें दसों दिसियों. कमल के भीतर भी कमल.

केश काढना
(झगड़ा)

श्यामा भूतनाथ की ; केश काढती रहती
हैं. नील नदियों से लम्बे लम्बे केश
उलझ गए थे गई रात्रि जब भूतनाथ ने
खोल उन्हें; खोसीं थी आम्र-मंजरियाँ
काढतें काढतें कहती हैं 'ठीक नहीं यों
पीठ पर बाल बिथोल बिथोल फंसा फंसा अपनी
कठोर अंगुलियाँ उलझा देना एक एक
बाल में एक एक बाल. मारूंगी मैं
तुम्हें, फिर ऐसा किया तुमने कभी.
देखो कंघा भी धंसता नहीं
गाठों में'. 'सुलझा देता हूँ मैं', कह
कर उसने नाक शीश में घुसा
सूंघी शिकाकाई फलियों की गंध.
'हटो, उलझाने वाले बालों,
जाओ मुझे न बतियाना.' भूतनाथ ने
अंगुली में लपेट ली फिर एक लट.

सिन्दूर लगाना
(डपटना)

छोटे छोटे आगे को गिरे आते चपल
घूँघरों में डाली तेल की आधी शीशी ,
भर लिया उसके मध्य सिन्दूर और ललाट
पर फिर अंगुली घुमा घुमा कर बनाया उसने
गोल तिलक. पोर लगा रह गया सिन्दूर
शीश पर थोड़ा पीछे; जहाँ से चोटी का
कसा गुंथन आरम्भ होता हैं, वहां पोंछ
दिया. उसे कहा था मैंने 'इससे तो बाल
जल्दी सफ़ेद हो जाते हैं.' हंसी वह. मानी
न उसने मेरी बात. 'हो जाए बाल जल्दी
सफ़ेद. चिंता नहीं कल के होते आज हो
जाए. मैं तो भरूंगी खूब सिन्दूर मांग
में. तुम सदा मुझ भोली से झूठ कहते हो.
कैसे पति हो पत्नी को छलते रहते हो
हमेशा. बाल हो जायेंगे मेरे सफ़ेद
तो क्या? मेरा तो ब्याह हो गया हैं तुमसे.
तुम कैसे छोड़ोगे मुझे मेरे बाल जब
सफ़ेद हो जांयेंगे. तब देखूंगी बालम.'
****
स्पर्श
१.
दोपहर का खजूर सूर्य केएकदम निकट
पानी बस मटके में
छांह बस जाती अरथी के नीचे

आँखों के फूल खुलने खुलने को
थे जब
तुमने देखा
शंख में भर गंगाजल भिंगोया शीश

कंधे भींग गए और निकल गया
गुलाबी रंग
सांवले कंधे और चौड़े हो गए
भरने को दो स्तनों को ऊष्ण
स्वेद से खिंचे हुए
खिंचे हुए भार से

पत्थर पर टूटने को और जेल में
कास लेने को
जब निदाघ में
और और श्यामा तू मुझमें एक हुई
पका, इतना पीला
कि केसरिया लाल होता हुआ
रस से
फटता, फूटा सर पर खरबूज
कंठ पर बही लम्बी लम्बी धारें

मैं एकदम गिरने को दुनिया की
सबसे ऊंची ईमारत की छत से

कि अब गिरा अब गिरा अब मैं

अब गिरा
रेत की देह.

२.
तुमने मुझे छुआ पहली बार
और फल पकने लगा भीतर ही भीतर
सूर्य पर टपकने लगी
नीम्बू की सुगंध
जिसमें वह कसमसा रहा हैं अब तक

छटपटा रहीं हैं मछली की पूँछ
जैसे दुनिया
धूज रहा हूँ मैं बज रहीं हैं हड्डियाँ
यह वहीँ हड्डियाँ हैं
जो तुमसे मिलने के बाद
पतवार सी छाप छाप करती हैं
शरीर नौका हो गया हैं

''छूना जादू हैं'' हज़ारों हज़ारों बार
इस बात को दोहराता हूँ मैं
मुझे दोहराने दो यह, तुम
यदि डिस्टर्ब होते हो

तो मुझे गाड़ दो ज़मीन में
या धक्का दे दो किसी खाई में

मेरी आँखें खराब हो चुकी हैं. कानों
को कुछ सुनायी नहीं देता.
मैं कुछ सूंघ नहीं पाता मोगरे के
अलावा. नमक और गुड का अंतर
ख़तम हो गया हैं मेरे लिए

मैं बस छू पाता हूँ. तुम मुझे छुओं
इस छूने के लिए मैं जल चुका हूँ
पूरा का पूरा.
****
लखुंदर

नदी में दोलते है सहस्रों सूर्य,

स्वच्छ दर्पण झिलमिला रहा हैं.

मुख न देख
पाओगी तुम स्नान के पश्चात्,
छांह ज्यों ही पड़ेगी
सूर्य का चपल बिम्ब घंघोल
देगा आकृति,
पुतलियाँ ही दिखेंगी तैरती मछलियों सी,

इस वर्ष वर्षा बहुत हुई है इसलिए
अब तक ऊपर ऊपर तक भरी है नदी.

पूछता हूँ
'नदी का नाम लखुंदर कैसे
पड़ गया?'
युवा नाविक बता नहीं पाता
'लखुंदर' का तत्सम रूप
क्या होगा...

नांव हो जाती है
तब तक पार
दिखती हैं मंदिर की ध्वजा

अगली बार
'नहाऊंगा नदी में' करते हुए संकल्प
चढ़ता हूँ सीढियां.

पीछे जल बुलाता हैं.
****
महानदी

मध्यदेश का सीना
ताम्बई, स्थूल व रोमिल. पड़ी
है महानदी उस पर,
पहनकर वनों की मेखला
घिसे रजत की श्याम

द्रोण के सूती नीलाम्बर से
ढंके देह मेदस्वी,
बाट जोह रही सूर्ज की.

मछलियाँ पेट में कर
रही है निरंतर उत्पात. दिनों
से मछुआरों का दल
नहीं आया. उदबिलावों
का झुण्ड ही उदरस्थ
करता हैं शैतान मछलियाँ पर
यह तो सहस्र हैं. अब
सहन न होती यह चपलता.

कब आएँगी यहाँ
घनचुम्बी पालों वाली नांवें,
डालेंगी जाल, तब
आराम से सोऊँगी मैं.

कीच में गिरी गेंद
सी मैली और बैचैन महानदी
पार की छत्तीसगढ़
में, जाता था जब बंगाल.
****

12 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सूक्ष्म अवलोकन, विस्तृत परिचय।

purvi said...

लीक से हटकर एक अलग सा माहौल बनाती कवितायें हैं, मोहक सी भाषा में प्रणय को दर्शाती हैं. धन्यवाद अनुराग जी.

Arpita said...

बेहतरीन कवितायें!!!
सुंदर बिंब..अदभुत...सूक्ष्म-अवलोकन.. "महानदी" पढ़ते-पढ़ते आँखों के आगे नदी अपनी पूरी खूबसूरती के साथ तैर गयी...आभार आप दोनों का....

आवेश said...

कविता यूँ भी होती है !खूब ,अदभुत |

An-emoticon said...

बहुत दिनों बाद कुछ नया-सा पढ़ने मिला कविता में... "स्पर्श" ने वाकई छू लिया...

Geet Chaturvedi said...

अम्‍बर को इससे पहले फेसबुक पर, कभी-कभार, पढ़ा है. उनके नोट्स में. बहुधा, प्रभावित करने वाली कविताएं. एक अलग भावलोक की मार्गदर्शिका हैं ये. केश वाली कविताएं तो भीतर गूंजती हैं और रवि वर्मा की पेंटिंग्‍स जैसे समय की कहानी कहती हैं.
भारतेंदु के इत्रदान पर लिखी इनकी एक सुंदर कविता भी मेरी स्‍मृति में है.
अम्‍बर लगातार और बढि़या लिखते रहें, मेरी शुभकामनाएं.

नया सवेरा said...

... 'हो जाए बाल जल्दी
सफ़ेद. चिंता नहीं कल के होते आज हो
जाए. मैं तो भरूंगी खूब सिन्दूर मांग
में. तुम सदा मुझ भोली से झूठ कहते हो.
कैसे पति हो पत्नी को छलते रहते हो
हमेशा. बाल हो जायेंगे मेरे सफ़ेद
तो क्या? मेरा तो ब्याह हो गया हैं तुमसे.
तुम कैसे छोड़ोगे मुझे मेरे बाल जब
सफ़ेद हो जांयेंगे. ...
... bahut khoob ... bhaavpoorn lekhan !
... तुमने मुझे छुआ पहली बारऔर फल पकने लगा भीतर ही भीतर ...
... kyaa kahane ... behatreen !!
... तुम यदि डिस्टर्ब होते हो
तो मुझे गाड़ दो ज़मीन मेंया धक्का दे दो किसी खाई में
मेरी आँखें खराब हो चुकी हैं. कानोंको कुछ सुनायी नहीं देता.मैं कुछ सूंघ नहीं पाता मोगरे केअलावा ...
.... atisundar ... prasanshaneey rachanaayen ... shaandaar prastuti !!!

सुशील कुमार छौक्कर said...

यहाँ आकर हमेशा कुछ हट के और सुंदर रचनाएं पढने को मिलती है। इन सुंदर और बेहतरीन कविताओं को पढकर ना जाने क्यूँ घर्मवीर भारती की कनुप्रिया की याद हो आई। पढ़ते वक्त एक चित्र सा खींचता चला जाता है दिमाग में। बहुत बेहतरीन। और हाँ आप जो चित्र लगाते है रचनाओं के साथ वो भी कम सुंदर नही होते जी ललचा जाता कि इन्हें अपने कमरे में लगा लूँ।

Travel Trade Service said...

स्त्री की प्रकति इस प्रकृति की तरह होती है ....सोलह श्रृंगार शायद ये ही है ....खुद को अभिव्यक्त करना होता है उस प्रकृति के सामने ....अब इस में प्यार के बिम्बों को बखूबी दर्शाती हुई कविता ...अलग लगती है ...पर शब्दों की भेदने की ताकत काफी ....शुभ कामनाएं अम्बर रंजना जी को ..और आप को धन्यवाद की एक खूब सूरत लेखक से परिचयी कराया !!!!!निर्मल पानेरी

विमलेश त्रिपाठी said...

आज की एकरस कविताओं से अलग अंबर की कविताएं एक ताजगी का अहसास कराती हैं...अंबर में कथ्य की नवीनता तो है ही अपनी बुनावट में ये कविताएं एक तरह की अद्भुद् लयात्मकता को भी लिए हुए हैं।
आज जब कविता अपनी जमीन को छोड़कर वैश्विक बनती जा रही है और एक ही तरह से(लगभग) लिखी जा रही हैं ऐसे में अंबर की कविताएं उस एकरसता को तोड़ने में सक्षम हैं और एक अद्वितीय सौंदर्यबोध से संपन्न होने के साथ ही अपनी भारतीय जमीन से गहरे संपृक्त हैं। मेरे मुंह से इन कविताओं के लिए बस एक ही शब्द निकल रहा है...वह कि अद्भुद्....अद्भुद्....

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

इतने दिनों बाद कुछ भारी पढ़ा है .. खूबसूरत जटिलता लिए ..ये कविताएँ अजंता एलोरा के अंधेरों में उभरी उन आकृतियों के पास ले जाती हैं, जिन्हें कोई चाहे तो एक सरसरी निगाह ने जांचे ..या फिर दिन भर वहां सोच बूझ करने के बाद भी कल और कभी आने कि आशा रखे .. कुछ इसी रूप में दूसरी बार ये सब रचनाएँ पढ़ रही हूँ और आशा के मुताबिक जायेका अभी क़रारा है ..फिर आने कि इच्छा है!

SHREY62 said...

Atulaniya