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कथा : ३ : संगीता गुन्देचा





कॉफी हॉउस 

आप में से बहुतो को गली के मोड़ पर, चाय के ठेले पर, पान की दुकान पर, चौराहे या चौपाल पर अक्सर एक ऐसा व्यक्ति दिखायी दे जाता होगा, जिसे देखकर आपको यह लगता हो कि वह हमेशा से वहाँ है। ऐसे लोगों की चाल-ढाल में और चेहरे पर अपने आसपास के प्रति एक खास तरह की सहजता होती है। वह सहजता ही यह अन्दाज़ा लगाने में मदद करती है कि वह व्यक्ति हमेशा से वहाँ है जहाँ आप उसे देख रहे हैं।

बहुत पहले स्कूल से पैदल घर आते हुए कभी-कभी मैं एक ठेले पर चाय पीते हुए लौटती थी। ठेले के पड़ोस में पत्थर की एक बड़ी-सी शिला रखी रहती थी। उस पर एक बूढ़े दादा बैठते थे। उनका धोती-कुरता, कुरते पर बण्डी और सिर पर साफा देखकर यह अन्दाज़ा आसानी से लगाया जा सकता था कि वे शहरी नहीं हैं। उनकी बण्डी की जेब में दियासलाई और बीड़ी रखी होती थी। उनके हाथ में हमेशा छोटा-सा ट्रांजिस्टर रेडियो होता था, जिसे वे अपने कानों से लगाये रखते थे। रेडियो की धीमी-धीमी तरंगे हर ओर फैली रहतीं। उसकी ध्वनि का आवरण वहाँ की हर चीज़ पर पड़ा रहता था। कभी उस पर समाचार सुनायी पड़ते, कभी फ़िल्मी गाने, कभी क्रिकेट का आँखों देखा हाल तो कभी शास्त्रीय या लोकसंगीत बजता रहता।

ग्यारहवीं कक्षा की गर्मी की छुट्टियाँ खत्म हो जाने के बाद जब मैंने फिर से स्कूल जाना शुरू किया, पहले दिन चाय के ठेले के सामने से गुज़रते हुए मुझे कुछ खाली-खाली-सा जान पड़ा। दूसरे दिन ख़्याल आया कि रोडियोवाले दादा वहाँ नहीं हैं। चाय वाले से पूछने पर पता चला कि वे अब नहीं रहे। स्कूल से घर लौटते हुए रोज़-रोज़ उस खाली शिला को देखकर महसूस हुआ था कि असल में वे रेडियो वाले दादा ही थे, जो उस पूरे दृश्य को धारण किए हुए थे। कचनार की छाँव में सोते कुत्ते के बच्चों को। ठेले पर चाय पीने आते लोगों और उनके बीच होते झगड़ों को। बिजली के तारों पर बिछी पक्षियों की कतार को। वहाँ के आकाश को, वहाँ की हर चीज़ को। उनके न रहने से वे सब खाली हो गये थे।

फेरी पर आने वाले लोग भी मुझे ऐसे ही जान पड़ते हैं। मुहल्ला फेरी पर आने वाले या इस किस्म के लोगों से ही बनता है, यदि वे आना बन्द कर दें तो मुहल्ला अपना होना भी बन्द कर देगा। उज्जैन में सुबह-सुबह एक फकीर आते थे। वे पहले इकतारे पर फारसी में कुछ गाकर सुनाते फिर यह कहकर, ‘जो दे उसका भला, जो न दे उसका भी भला’ थोड़ी देर दरवाज़े पर खड़े रहते। यदि आलस्य को तोड़कर आप जल्दी ही उन्हें अनाज या कुछ और देने के लिए उठ जाएँ, तब तो ठीक है वरना वे चुपचाप वहाँ से चले जाते। थोड़ी देर बाद किसी सब्ज़ी, फल बेचने वाले या अटाला खरीदने वाले की आवाज़ का तीखापन सुबह की गहरी प्रशान्ति को चीरकर दो कर देता।

फल, कालीन, बर्तन, अटाला खरीदने-बेचनेवालों की गुहारें शुरू-शुरू में सिर्फ़ ध्वनियाँ होती हैं, जैसे-जैसे वे पास आती हैं, ध्यान देने पर शब्दों में तब्दील होती जाती हैं। ठण्ड के दिनों में वहाँ अक्सर एक मटर वाला आता था। उसका ठेला सिर्फ़ मटर की फलियों से भरा रहता था। वह दूर से चिल्लाता हुआ आता था - मटर भरे दाने की मटर, मटर भरे दाने की मटर, मटर्रर्रर्रर्रर्र र। जब आखिरी में वह मटर्रर्रर्रर्रर्र र कहकर रूकता तो लगता कि मटर की फलियों से मटर निकल-निकल कर बिखर रहे हों। शायद गृहणियों को यह महसूस कराने कि उनका आधा काम उसने पहले ही कर दिया है।

कई बार शाम को अँधेरा हो जाने के बाद दो सब्ज़ी वाले एक साथ आ जाते। उन दोनों को अपनी-अपनी सब्ज़ियाँ बेचकर घर जाने की जल्दी होती। एक कहता, सब्जीई य्य, सब्जीई ई ई ई य्य, सब्जी... उसकी आवाज़ को बीच से काटते हुए दूसरा आलू बैंगन प्याज टमाटर फूलगोभी पत्तागोभी धनिया गिलकी अरवी भिण्डी बरबटी मैथी पालक लहसून अदरक मिर्च पोदीना एक साँस में बोल जाता। एक और आवाज़ सुनायी पड़ती दे मीठेवाले ये केले, दे मीठेवाले ये केले। और अचानक वाक्युद्ध शायद ध्वनियुद्ध कहना ज़्यादा ठीक हो, शुरू हो जाता। वे यह भूल जाते कि वे कुछ बेचने आये हैं। उनमे तरह-तरह की आवाज़ों को निकालने की प्रतियोगिता चल पड़ती। बात सब्ज़ी या फल बेचने से सीधी आत्मसम्मान पर जा पहुँचती।

सबसे करूण एक कबाड़ा लेने के लिए आने वाले की गुहार होती थी। जब वह तार स्वर में अपनी खरखरी आवाज़ से गुहार लगाता, उसका शब्द बीच से टूटकर चीख में बदल जाता। मग बाल्टी लकड़ी लोहा टी...। मग बाल्टी लकड़ी लोहा टीन टप्पर पीपा पी...। मग बाल्टी लकड़ी लोहा टीन टप्पर पीपा पीतल अखबार किताब लियाओ। इ स्वर पर वह अटक जाता और उसकी ऐसी चीख निकलती जैसे कुत्ते की। जब अचानक उसकी टाँग पर से कोई गाड़ी गुज़र जाती है।

बहरहाल मैं आपसे एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बात कर रही थी, जो आपको कहीं भी दिखायी दे सकता है। पिछले दिनों एक ऐसे ही आदमी से मेरा साबका हुआ। मैं कॉफी हॉउस में बैठकर इस्ताम्बूल नाम का संस्मरण पढ़ रही थी। पढ़ते-पढ़ते मैंने हाथ से टेबिल पर वहाँ टटोला, जहाँ पानी का गिलास हो सकता था। गिलास थोड़ी दूरी पर था। मैंने नज़र पन्ने से हटाकर गिलास की तरफ की। मुझे सामने बैठा कोई दिखायी दिया। पानी पीते हुए मैंने पाया कि वहाँ अधेड़ उम्र का, पूरी बाँह का जामुनी कमीज़ पहने एक आदमी था, जो मुझे घूर रहा था। उसकी नाक लम्बी और काया दुबली थी। जब मैंने भी उसे घूरकर देखा, पहले वह खिसियाया लेकिन जल्दी ही उसके चेहरे पर यह भाव आ गया कि वह अक्सर मुझे यहाँ देखता है, इस नाते उसका मुझसे परिचय है।

कॉफी हॉउस का वह कमरा बहुत बड़ा नहीं था। उसमें टेबिल-कुर्सी की तीन कतारें थीं। पहली कतार की शुरूआत यदि मेरी ओर से मान ली जाय तो उसकी पहली कुर्सी पर मैं बैठी थी, दूसरी कतार की अन्तिम कुर्सी पर मेरी ओर मुँह किए वह आदमी। तीसरी कतार खाली पड़ी थी। एक युवा लड़की वहाँ आयी और दूसरी कतार की लगभग बीचवाली कुर्सी पर जाकर बैठ गयी। वह काले रंग की शलवार पर बंद गले की गुलाबी कमीज़ पहने थी। उसकी बाजू में लम्बी बद्दियों वाला चमड़े का बटुआ लटका था। उसका मुँह मेरी ओर था और पीठ अधेड़ आदमी की तरफ। उसके खुले हुए बाल कन्धों पर फैले हुए थे। अधेड़ आदमी ध्यान से लड़की को घूरने लगा।

लड़की ने आने के तुरन्त बाद पानी पिया फिर थोड़ी देर वह अपने दोनों हाथ बाँधकर बैठी रही फिर उसने अपने बटुए से छोटा-सा शीशा निकाला और उसमें अपने तरह-तरह के मुँह बनाकर देखने लगी। कभी वह शीशे को अपने चेहरे के बिलकुल पास ले आती, कभी उसे दूर करके उसमें निहारती। अधेड़ आदमी अपनी जगह से उठकर आगे की ओर झुका जैसे वह लड़की के शीशे में अपना चेहरा देखना चाहता हो। फिर वह अपने दायीं ओर बने बेसिन की तरफ गया, वहाँ उसने जल्दी से अपने हाथ धोये, सामने टँगे रूमाल से उन्हें पौंछा और वहीं पास में तीसरी कतार की ऐसी कुर्सी पर जाकर बैठ गया, जहाँ से वह कम से कम दायीं ओर से लड़की का चेहरा देख सके।

बैरे ने आकर आदमी की टेबिल पर एक कप रखा फिर मुझे कॉफी दी और लड़की से कुछ पूछकर वह चला गया। एक लड़का कमरे के भीतर आया। अधेड़ आदमी ने उसकी तरफ देखा कि कहीं वह लड़की के पास जाकर न बैठ जाए। लड़की ने खड़े होकर अपने दोस्त का स्वागत किया और वह उसकी बाजू में रखी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। थोड़ी ही देर में वे दोनों एक दूसरे की ओर मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बातचीत करने लगे। तीसरी कतार की कुर्सी पर बैठा आदमी जल्दी ही अपनी कॉफी खत्म करके अपनी पहले वाली जगह पर लौट आया। खिड़की से अचानक हवा का एक तेज़ झौंका भीतर आया। लड़की के खुले बाल तितर-बितर हो गये थे। लड़के ने अहिस्ता से उन्हें समेटकर फिर से लड़की के कन्धों पर रख दिया। अधेड़ आदमी उनके बीच की निकटता से विचलित हो रहा था। वह आजू-बाजू से झाँक-झाँककर उन्हें देखने लगा।

वे दोनों यह भूल चुके थे कि वे किसी सार्वजनिक स्थान पर बैठे हैं। उनके लिए संसार की हरेक चीज़ का शायद लोप हो रहा था। मैंने अपनी दायीं ओर बनी खिड़की से बाहर झाँका। आकाश में धीरे-धीरे बादल इकट्ठा हो रहे थे। वृक्षों पर बैठे तोतों में खलबली-सी मची हुई थी। लगता था कि वे एक दूसरे से कुछ मशविरा करने में जुटे हैं। बैरे के आने से लड़का और लड़की का ध्यान टूटा। लड़के ने दो कॉफी लाने को कहा । बैरा जाने लगा । अधेड़ आदमी ने उसे अपनी ओर बुलाकर एक और कॉफी लाने को कहा । बैरा जाने के लिए जैसे ही मुड़ा उसे अचानक कुछ याद आया। अधेड़ आदमी की तरफ घूमते हुए उसने बताया कि पिछले दिन वह अपना जो थैला वहाँ भूल गया था, उसने काउण्टर पर जमा कर दिया है । अधेड़ आदमी उठा और सीढ़ियाँ उतरते हुए नीचे की मंजि़्ाल पर बने काण्उटर की ओर चला गया ।

इसी बीच लड़की ने अपने बटुए से डायरी निकाली, वे दोनों उसमें से कुछ पढ़ते हुए ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे । फिर लड़की के पास से अचानक एक और आवाज़ सुनाइ पड़ी, जो हँसी की नहीं थी । उसका मोबाईल फ़ोन बज रहा था। फ़ोन पर बात खत्म करने बाद उसने अपने दोस्त को इशारा किया। वह उठकर बैरे को बुला लाया। उन्होंने जल्दी से बिल चुकाया और वहाँ से उठकर चले गये। अधेड़ आदमी लौटा और खाली कुर्सी देखकर सीढ़ि़यों के किनारे पर ही भौंचक्का रह गया। उसने मेरी ओर शिकायत भरे भाव से कुछ इस तरह देखा कि मैंने उन्हें कैसे जाने दिया ? मेरे चेहरे पर निस्सहायता थी। मैंने अपनी नज़रें खिड़की से बाहर कर लीं। वहाँ कतार से सेमल के वृक्ष लगे थे। सेमल के फल पककर फट आए थे। उनसे निकलकर धीरे-धीरे सफ़ेद रूई बर्फ की तरह उन गाड़ियों पर गिर रही थी, जो उन पेड़ों के नीचे से लगातार निकलती चली जा रही थीं।
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संगीता गुन्देचा

 कवि, कथाकार, निबंधकार और अनुवादक होने के अलावा संस्कृत की विदुषी हैं. भास् का रंगमंच, उदाहरण काव्य तथा जापानी कवि शुन्तारो तानीकावा की कविताओं का पुस्तकाकार अनुवाद 'मटमैली स्मृति में प्रशांत समुद्र' शीर्षक से प्रकाशित है. 'नाट्यदर्शन' शीघ्र प्रकाश्य. इन दिनों वैदिक उच्चारण और दक्षिण पूर्व ऐशियाई उच्चारण परंपरा पर काम करने के साथ-साथ राष्ट्रीय संस्कृत संसथान के लिए 'संस्कृतविद्वतपरिचय' बनाने में सहयोग कर रही हैं.

कहानी के साथ दी गई चित्र-कृति मधुमिता दस के कैमरे से. इस स्तंभ के तहत छपने वाले अन्य कहानीकार हैं : उदयन वाजपेयी तथा हिमांशु पंड्या.]
10 comments:

सार्वजनिक मेल मिलाप के ये स्थान बड़े उपयुक्त होते हैं कल्पना की उड़ानों में उन्मुक्त पंख लगाने को। एक स्थान पर घंटों बैठकर खिड़की से बाहर होती गतिविधियों को देखने का अनुभव है मुझे। सुन्दर आलेख।


सरस अंदाज में लिखी गई बहुत सुन्दर कहानी है। परिवेश का बहुत अच्छा वर्णन किया गया है।

बहूत खूब।


संगीता को पढ़ना अच्‍छा तो लगा,पर क्‍या इसे कथा कह सकते हैं। बीच बीच में वे निबंधकार होती जाती हैं और फिर अचानक कुछ कथाकार। बहरहाल इसमें तो कोई शक नहीं है है कि वे बांधे रखती हैं इस उम्‍मीद में कि अब कुछ चौंकाने वाले बात होगी।


... prabhaavashaalee lekhan .... sundar prastuti !!


सच में जीवन में ऐसेबहुत से लोग है जो अपने ना होते हुए भी हमारी जिंदगी का एक हिस्सा बन जाते है,उनके बिना भी सूना सूना सा लगता है..बहुत ही अच्छी कहानी.


जीवंत चित्रण
कथा है के चलचित्र....
सादर
भरत


sahaj, sunder aur saras ......ab tak parichit nahin tha Sangita se....is sarthak aur samayik post ke liye anurag bhai ko aabhar.....


संगीता जी ने अच्छी कहानी लिखी है...अंतर मन की गहराइयों से ....शब्द भले हैं, उनका प्रभाव व्यापक है...कहानी ने अंत तक बांधे रखा ....बहुत शुभकामनायें संगीता जी ....और धन्यवाद अनुराग जी एक अच्छी कहानी पढ़ाने के लिए !!Nirmal paner


...मुहल्ला फेरी पर आने वाले या इस किस्म के लोगों से ही बनता है, यदि वे आना बन्द कर दें तो मुहल्ला अपना होना भी बन्द कर देगा।...
यह लाइनें मुझे सबसे अच्छी लगीं। मुझे कहानी की बहुत समझ नहीं है। फिर भी अपनी कमअक्ली का इस्तेमाल करते हुए कुछ जरूर कहना चाहूंगा। कहानी बहुत स्तरीय न होते हुए भी प्रभावित करती है। दरअसल, मुहल्ले या मुहल्लों के चरित्र से बात हुए कॉफी हाउस तक पहुंची थी। या तो मुहल्ले के उस रेडियो वाले बाबा पर ज्यादा केंद्रित होती या फिर कॉफी हाउस के माहौल पर ही केंद्रित होती।


संगीता गुन्देचा

‘सबद‘ में ‘कॉफी हॉउस‘ पढ़ने वाले पाठकों के प्रति आभार प्रकट करती हूँ कि उन्होंने समय निकालकर कहानी को पढ़ा और उन पाठकों के प्रति विशेष जिन्होंने पढ़कर अपनी प्रतिक्रियाएँ दीं।

प्रकाशित होने के बाद कहानी (कृति) स्वयं लेखक से भी स्वतन्त्र हो जाती है, वह उसे किसी अन्य की कृति की तरह कुछ दूरी से ही पढ़ना पसन्द करती/करती है। जब किसी लेखन को पढ़कर पाठक अपनी प्रतिक्रियाएँ देते हैं, वह लेखन और उस पाठक के बीच का अपना सम्बन्ध होता है, लेखक का स्थान वहाँ लगभग नहीं के बराबर होता है। चूँकि ‘कॉफी हॉउस‘ कहानी मेरे सृजन-अनुभव का हिस्सा है, इसलिए उस पर हुई कुछ प्रतिक्रियाओं पर पाठकों से अपना अनुभव साझा करना आवश्यक समझती हूँ।

जब मैंने यह कहानी लिखना शुरू की थी, तब मुझे भी पता नहीं था कि इसका अन्त क्या होगा ? क्योंकि इसे लिखते हुए मेरे मन पर दो कृतियों का बहुत गहरा असर था; एक उदयन वाजपेयी की कहानी ‘अन्त‘ का और दूसरा कारेल चापेक की कहानी ‘नींद‘ (अनुवाद निर्मल वर्मा) का।

अन्त कहानी में अन्त पहले लिखा जा चुका है और वह लेखक के साथ मिलकर अपनी शुरूआत खोज रहा है। जब उसे वह मिल जाती है, वह लेखक से कहता है कि अब तुम्हारा कोई काम नहीं मुझे मेरी शुरूआत मिल चुकी है। कहानी में लेखक ने आदि, मध्य और अन्त के सिलसिले का उलटफेर कर दिया है।
दूसरी कहानी ‘नींद‘ का ज़िक्र निर्मल जी ने अपने लगभग अन्तिम दिनों में मुझसे किया था। यदि आप इस कहानी को ध्यान से पढ़ेंगे तो पायेंगे कि उसमें आदि, मध्य और अन्त का उच्चावचन न होकर कहानी जैसे लगातार एक समतल (होरिज़ेण्टल स्पेस) में घटती चली जाती है और बिना किसी चमत्कार के खत्म हो जाती है।

‘कॉफी हॉउस‘ लिखते समय इस बात की ऊहापोह रही होगी कि (यदि राजेश उत्साही इसे कहानी लिखने का ही संघर्ष मानने तैयार हों) बहुत देर तक कहानी, कहानी की शक्ल धारण न कर पाए। उसके सामने अनेक पड़ाव आते हैं लेकिन फिर भी वह वहाँ रूकती नहीं। शायद कहानी के बनने की प्रक्रिया कहानी में ही घटित होती चलती है, जो कहानी कहने को विलम्बित करने से पैदा हुई है।

एक पाठक की तरह कहूँ तो मुझे लगा कि इस कहानी में पाठक लगातार कहानी का पीछा कर रहा है। पहले वह चाय के ठेले पर उसे खोजता है, वह उसे वहाँ नहीं मिलती। फिर गुहार लगाने वाले लोगों की आवाज़ में, वह उसे वहाँ भी नहीं मिलती। वह उसे मिलती है, कॉफी हॉउस में अधेड़ आदमी के रूप में बैठी हुई। इसलिए कहानी के पीछे जो दुबकी हुई कहानी होती है, उसे भी पढ़ने की ज़रूरत है।

बोर्खेज़ जैसे लेखक की मौजूदगी के बाद मुझे कहानी और निबन्ध कला में ऐसी साफ-साफ लकीर खींचना ज़रा असहज ही जान पड़ता है। मेरी रूचि चीज़ों को समझने और उनका वर्णन-व्याख्यान करने में अधिक होती है। यह करते हुए मुझे जो आनन्द मिलता है, वह अनिर्वचनीय है लेकिन लेखन स्तरीय हो पाता है या नहीं यह तो पाठक ही तय करेंगे।

अनुराग वत्स का आभार, उन्होंने कहानी प्रकाशित की और उस पर कुछ विचार करने का अवसर दिया।


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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