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निगाह की पहनाई क्या सिर्फ़ तुम्हें आती है




तो तुम सिगरेट इसलिए पीते रहे?
हाँ, बिलकुल.
हद है!, तब पूरे पागल थे क्या?
फ़र्क कर लो.
और तुम्हें क्या लगा कि मैं तुम्हें मना ही करुँगी. क्या होता गर मैं भी पीती?
कुछ नहीं. मैं छोड़ देता.
उफ्फ़. एक बात बताओ, मेरे इतने डिटेल्स कैसे याद रख सके, जबकि कितना कम देखना होता था हमारा.
आसान रहा यह मेरे लिए.
कैसे?
मैं तुम्हारी निगाह पहन लेता था.
अच्छा,...लोग टोकते नहीं थे ?
हाँ, पर उनकी परवाह कौन करे. तुम अपनी फेवरेट ख़ुद को बताती रही करीना की तरह, तो मुझे लगा, अपनी निगाह से तुम्हें देखना कम देखना होगा.


तुम्हें पता है, मुझे यह फ्लर्ट कितनी अच्छी लगती थी.
ओहो! पता होता तो कम करता.
एक लड़की के लिए जो यह बहुत नहीं सोच पाती कि उसे कोई देखने लायक भी मानता है, तुम क्या-क्या नहीं कहते रहे. यह मेरे लिए सबसे कम फ़िल्मी था क्योंकि तुम्हारी आवाज़ किसी परदे से नहीं निकलती थी. उसे मैं अपने रोओं पर रेंगता हुआ महसूस कर सकती थी.
तुम आज रौ  में हो.
मैंने भी पहली दफ़ा तब अपने लिबास से ज़्यादा तुम्हारी निगाह पहनना ज़रूरी समझा.
अच्छा, फिर तुम्हारे साथ तो बड़ी छेड़-छाड़ हुई होगी ?
नाह, तुम क्या समझे, निगाह की पहनाई सिर्फ़ तुम्हें आती है?
अरे नहीं.
मेरा कभी न कहना मानने वाले बालों को मैंने अपने कन्धों पर 'हलके खुले बाल' की तरह उससे पहले कभी नहीं देखा था.


एक बात बताओ, क्या तुम इस तरह शुरू हुई?

शायद इससे पहले.
कब से?
जब से तुम्हारी आवाज़ के लिए जगह बनाना शुरू किया तब से.
तुम्हें पहला वाक्य याद है?
हाँ, वह तुम्हारा दनदनाता हुआ सा मेल जिसका सब्जेक्ट रोमन में लिखा 'तुम' था और टेक्स्ट : मुझे एक भूली हुई भाषा की तरह मिली जिसे खोना नहीं चाहता.
अजब है, तुम इसे सुन सकी ?
हाँ, मेरे कान तुम्हारी आवाज़ चख चुके थे. इसलिए तुमने जो लिखा उसे बाद के दिनों में पढ़ा कम सुना ज़्यादा.
****

(साथ में दी गई चित्र-कृति सिंडी वॉकर की है)

Comments

Rahul Singh said…
प्‍यारी और नाजुक सी सबद-साखी.
... bahut sundar ... behad romaanchak ... sach kahoon ... behad prasanshaneey abhivyakti ... bahut bahut badhaai !!
manoj chhabra said…
'मैंने भी पहली दफ़ा तब अपने लिबास से ज़्यादा तुम्हारी निगाह पहनना ज़रूरी समझा...'
बहुत अलग, बहुत सुंदर...
आवेश said…
उफ़ ये निगाह की पहनाई ,हम भी सीखना चाहेंगे |अनुराग की एक खासियत है वो जो भी लिखते हैं उनमे आप खुद को खड़ा पाएंगे ऐसे में उनका लिखा कुछ भी एकाधिकार खो देता है वो सबकी रचना हो जाती है |इसके लिए सिर्फ धन्यवाद कहा जा सकता है |
pushpendra singh rajput said…
लाजबाब रचना है इसमें कोई शक नहीं है ..बहुत अच्छा,,उम्दा..
yunus said…
अहा। निगाह की पहनाई।
निगाह की पहनाई और भूली हुई भाषा की तरह मिलना. बहुत प्यारा....
हाँ, मेरे कान तुम्हारी आवाज़ चख चुके थे. इसलिए तुमने जो लिखा उसे बाद के दिनों में पढ़ा कम सुना ज़्यादा.............वाह ....मुझे ये आश्चर्य होता है अनुराग जी की आप इस तरह नितांत एकांत पलों की अभिव्यक्ति को केसे शब्दों में उकेर देते हो .....अद्भुद !!!!!!!!!!!
nand bhardwaj said…
नजर और आवाज को आकार लेते रिश्‍ते के बीच बहुत सुन्‍दर बयान में ढाला गया है, इससे कविता की संप्रेषणीयता में एक खास तरह की अन्‍तरंगता पैदा हो सकी है। बधाई।
खूबसूरत.....अच्छा पढ़कर आनंद आ जाता है
बिल्कुल एक नया और मस्त अंदाज लिखने का। युवा दिलों को छूता हुआ-सा। बधाई।
गुलज़ारिश सा टच है
Puja Upadhyay said…
निगाह की ये पहनाई बेहद नाज़ुक और हसीन लगी. सागर की बज़ से आज इधर आना हुआ.
purvi said…
"तुम अपनी फेवरेट ख़ुद को बताती रही करीना की तरह, तो मुझे लगा, अपनी निगाह से तुम्हें देखना कम देखना होगा."

किसी और की निगाह से खुद को देखना और खुद की निगाह औरों को देना, विचारों के जरिये, सब के बस की बात नहीं होती, रूमानी और सुन्दर संवाद सम्प्रेषण है . बधाई अनुराग.
निगाह की पहनाई, वाह, सच में।
humdum said…
har bhagyashaali logon ke zindagi me beetne wale kuch aise hi lamho ko jis prakar srinkar kar ke aapne dikhaya hai,,,kaabile taarif!!

Nigaah ki pehnaai!!behad najuk aur samvedanshil Visheshta!!

good job sir ji !!

great great!! :)
निगाह की पहनाई क्या सिर्फ़ तुम्हें आती है
कुछ हट के प्यारा सा। वैसे अनुराग जी सही फरमा रहे है।
nilm said…
the dialogue form of the poem making it a wonderful read....
मैंने भी पहली दफ़ा तब अपने लिबास से ज़्यादा तुम्हारी निगाह पहनना ज़रूरी समझा.....बहुत उम्दा.... बधाई
बेहद सुन्दर !
Hindi Sahitya said…
कविता अपने फॉर्म और कंटेंट दोनों में एक ताजा अहसास की तरह है.
Meena Kandasamy said…
beautiful :)
and very contemporary

all the allusions to fonts and subject lines and the reality of today! wow, to read a love poem of our time!

liked this a lot:
तुम्हें पता है, मुझे यह फ्लर्ट कितनी अच्छी लगती थी.
ओहो! पता होता तो कम करता.
कविता समकालीन एहसासों के साथ जिस तरह की ताजगी लिए उपस्थित होती है वह रेखांकित करने योग्य है.जीवन के छूट रहे मनकों को संजोने के साथ जब बीत रहे पलों को टटोलने की कोशिश हो तब आपाधापी की व्यर्थता का स्वाभाविक रूप से बोध होता है . ये कविता जिस समय पर आई है वह ज्यादा महत्वपूर्ण है.अनुराग भाई बधाई.
ssiddhant said…
मुझे नहीं पता कि आप क्या लिखना चाहते हैं लेकिन एक बात तो साफ़ तौर पर ज़ाहिर है कि आप "फिनामिनल" लिखते हैं और वो लिखा गया कई नई terminologies को जन्म देता दीखता है, ये संवाद-क्रिया बेहद ख़ूबसूरती से सिक्त और इतने अधिक आयामों से परिपूर्ण है कि क्या कहना!लेकिन ये आयाम किसी "जगह" को न्यौता नहीं देते बल्कि पहले से मौज़ूद जगहों का विस्तार करते हैं.
निग़ाह की पहनाई - इसे शायद और विस्तार चाहिए जितना आवाज़ की जगह को मिला.
बहुत ही भावुक और गहरी अनुभूति
Manish said…
I do not have a poetic sense to illustrate my word. Simply Outstanding.
रचनाओं में प्रतिमानों के अद्भुत प्रयोग को सबलता प्रदान करती इस पोस्‍ट ने मुझे बेहद आकर्षित किया है। रचना में रचनाकार का कौशल इस प्रकार के प्रयोगों में ही निखर कर सामने आता है। निगाह को पहनना, आवाज को चखना इत्‍यादि प्रयोगों में भविष्‍य के सशक्‍त मुहावरे हैं, इस बात से भला किस रचनाकार को इंकार होगा ? रचना की सुखद सार्थकता भी इसी में है।
Pawan Nishant said…
bahut payara likha hai bhai.
kamal ka, bilkul mere taste ka
bahut achchha, jo mujhe badi mushkil se achchha lagta hai
alag hai, bilkul alag
madhumita said…
:-) :-) somehow reminded of Harld Pinter's The Lovers
Manohar said…
nigaah ki pahnayi...apne aapko apne se bahar hokar dekhna, kisi or ki nigaho se dekhna or usko bhi unhi ki nigaho se dekhna..ek pure intersubjective experience ki tarah laga...kaash hum sab nigah ki pahnayee paa jaate shayad dekhna or samajhna kitna aasan ho jaata.
yah nigah ki pahnayi ek freedom deta hai or apne aap se duur bhi le jata hai jisme sahayd hum jaana bhi chahte or fir wo freedom is tarah ka hota jisko shayad ek intersubjective shared form of life kah sake jaha shayad insaan ek dusare ko swikar kar, ek dusare ko transcend bhi kar lete hai...tabhi to likhna sirf likhna nahi rah jaata sunana bhi ho jaata, tabhi to use ham apne royen par mahsus karne lagte hai....lajawab
बहुत ही उम्दा प्रेम कविता.... बधाई
अच्छा लगा...बधाई...
sidheshwer said…
बीते कल से इसे पढ़ने का सुरूर तारी है और इसका रिजोनेंस व्याप रहा है मेरे गिर्द!
alok mishra said…
tumhari kavitae unique hoti hai
honestly u r not traditional and u r creating your own stream
बहुत सुंदर है...
वैसे ये ऎसी ही एक कविता का दूसरा भाग लगा.. शायद तुम्हारी ही कविता थी.. सबद पर ही पढी थी..
geeta said…
प्यार को ऐसी बातें ख़ास बनाती हैं और प्यार करने वाले को भी, खासकर लड़की को....एक लड़की के लिए जो यह बहुत नहीं सोच पाती कि उसे कोई देखने लायक भी मानता है, तुम क्या-क्या नहीं कहते रहे. यह मेरे लिए सबसे कम फ़िल्मी था क्योंकि तुम्हारी आवाज़ किसी परदे से नहीं निकलती थी. उसे मैं अपने रोओं पर रेंगता हुआ महसूस कर सकती...

गीतू....
abcd said…
क्या बात है !

"शब्दो मे गेहराई है " कहना अपर्याप्त लग रहा है बेह्तर होगा इसे श्ब्दो की बहुत उची लेहरो की surfing कहा जाये :-)

दैनिक भास्कर की कहानी भी शान्दार थी.....
youth-full writing.....keep writing....

इत्ना अछ्छा लिखा है..की लग रहा है बहुत कम लिखा..और lengthy होना चहिये ही /

as siddheshwarji correctly said:- has resonanace effect !
Fauziya Reyaz said…
ultimate...behad khoobsurat, touching, amazing...
बहुत ही उम्दा प्रेम कविता..
Farhan Khan said…
I would love to call this wonderful opus, an anecdotal poem. बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है !

Such a wonderful picturesque I found here, "तो तुम सिगरेट इसलिए पीते रहे?
हाँ, बिलकुल.
हद है!, तब पूरे पागल थे क्या?
फ़र्क कर लो.
और तुम्हें क्या लगा कि मैं तुम्हें मना ही करुँगी. क्या होता गर मैं भी पीती?
कुछ नहीं. मैं छोड़ देता. "

I think,its Influential innovation of employing such nice words in Hindi, " वह तुम्हारा दनदनाता हुआ सा मेल जिसका सब्जेक्ट रोमन में लिखा 'तुम' था और टेक्स्ट".

From outset to the end,the poem has been chiseled with apt words.

Thank you!
उस दिन आफिस में जब आपने निगाहों की पहनाई का जो अंदाज पेश किया था, तब तक इतनी उम्मीद नहीं थी कि आपकी कविता उस अंदाज-ए-पहनाई की ही तरह बेहद खूबसूरत होगी। ...ज्यादा लिखूंगा तो यह निगाहों की पहनाई - निगाहों की पढ़ाई में बदल जाएगी। बधाई स्वीकार करें। और हां...देर से टिप्पणी देने के लिए क्षमा। 42वां नंबर मिलने जा रहा है टिप्पणी देने वालों में। इसका अफसोस है।
Ganesh said…
Thanks for this beautiful piece Anurag bhai.
बहुत अच्छा लगा पढ़कर.
महानगरों कि विशिष्टता होती है- दिखना और देखते रहना. चाहे वह प्यार हो या हादसा, एक दूरी से सब कुछ देखा जाता रहता हैं.
आपका यह प्यारा पीस पढ़कर यह सुकून हुआ कि महानगरों में कही ऐसी धुप बची हैं, ठंडी सुबह की, यूनिवर्सिटी के किसी हरे मैदान में पड़े बेंच पर दो ताज़ातरीन, जिंदा शख्सों के बीच. जहाँ सब कुछ नया होता हैं. अहसास, भाषा, मुहावरे और अभिव्यक्ती के औजार भी-
वह सब कुछ हैं मौजूद "निगाह की पहनाई.." में.
'गुलज़ारिश टच है' वाली कमेन्ट आप पोज़ीटीवली लें. क्यों की अब तो वह सब कुछ आयेगा लिखने में जो हमारे समय में देखने में हैं. फ़िल्में, पोप लिटरेचर, संगीत.,. सब कुछ. पर फिर भी उस में एक नया कुछ तो आयेगाही.
संवाद उठ के खड़े हो गए सामने.
बहुत उम्दा !
Rukaiya said…
Gungunati hui si behad behad khubsurat kavita .

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