Monday, January 31, 2011

शताब्दी स्मरण : शमशेर बहादुर सिंह



[हिंदी में शमशेर होने के अलग मानी हैं, जैसा सरल वाक्य बनाने पर शमशेर शायद ऐसे ही मुस्कराते, जैसे कि यहां दी गई तस्वीर (सौजन्य : एक जिद्दी धुन) में मुस्करा रहे हैं. सच तो यह है कि शमशेर एक कठिन लिपि में निबद्ध हैं, जिन्हें सिर्फ़ अर्थ की संभावनाओं में पढ़ा जा सकता है. उनकी ज़िन्दगी और उनके बारे में किस्से इस मामले में नाकाफी साबित हुए हैं. शमशेर के टेक्स्ट को पढ़ने के लिए 'कठिन प्रस्तर में अगिन सुराख़' की दरकार है. और इस कठिनाई से हिंदी आलोचना कितना बचती रही है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है. शमशेर पर लिखे साही और मलयज के निबंध और डायरियों को छोड़ दें तो उन्हें समझने के छिट-पुट तरीके यादगार नहीं और उनके जन्म-शताब्दी वर्ष के आते-आते भी इनका रवायती, पूर्वानुमेय और अंततः अपर्याप्त होना सालता है. जैसे हर बड़े कवि को, उसी तरह शमशेर की इबारत को भी उनकी अनेक अर्थ-छवियों में पढ़ने की ज़रूरत इसीलिए बरक़रार है. यहां कवि-आलोचक व्योमेश शुक्ल ने उनके भाषिक संसार में प्रवेश कर कुछ विशिष्ट के अर्थापन की कोशिश की है.]

जहाँ तारे जुगनू होने चले गए हैं
व्योमेश शुक्ल

‘‘देखो, रात
बिछलन से भरी हुई है
(तारे जुगनू होने चले गए हैं :
चाँद, चाँद-सा दिल में है, बस :
दिल, कि बहकती हुई रात है...)
यह रात फिसलन से भरी हुई है।

हाँ,
शरमाओ न मानी में
तुम लफ्ज़ नहीं हो;
कठिन अर्थ हो कोई
तुम लय भी हो अगर,
पर्दा हो (मान लिया)
तुम
गीत खुले हुए हो, वही
जो मैंने
कल रात को गलियों में
गाया था (...काली उन
कीचड़ से भरी हुईतनहा
गलियों में)
शरमाओ न धड़कन की तरह
दिल में तुम तो
धड़कन का इ ला ज हो
तुम तो हो मह़ज अता-पता मेरा
अरे
वह नाम कहाँ हो
जो बूझ लिए जाओ शरमाओ मत।

(‘सावनशीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ, शमशेर बहादुर सिंह)

एक

शमशेर बहादुर सिंह की रचनात्मक श़िख्सयत शब्द की ज्यादातर संभावनाओं से मु़खातिब है। जाहिर है, शब्द और अर्थ के बीच के संबंध भी उनकी रचनावली में उतनी ही अनेकान्तता में खुले हुए और गतिमान हैं। इसे भ्रम, उत्पात, लीला या कलाकार का — ‘एक जेनुइन कविका वक्तव्यकुछ भी कहा जा सकता है। यहाँ कुछ भी हो सकता है, ‘कुछ नहींभी हो सकता है; लेकिन इतना तय है कि यहाँ कविता अर्थ, तात्पर्य या आग्रह की किसी खास पद्धति में स्थिर न है, न हो सकती है। वह अग्रगामी है, उपलब्ध से अलग जाती है और दूर तक चली जाती है। यहाँ जो स्थिर है, शव है स्थिर है शव-सी बात। 

यहाँ कविता के शब्द रंग हैं या रेखाएँ हैं या चीनी जनता का लोकसत्तात्मक गणतन्त्र राज्य हैं या ग्रीक वर्णों के रूपाकार हैं। यहाँ कविता के शब्द, खुद कवि के शब्दों में, ‘शब्द कहाँ हैं?’ यहाँ युगीन सुविधाओं से इनकार और कठिनके रतजगे हैं। यह कविता मौन, संगीत और नूर की कविता है। वह हम तक किसी इलहाम या एहसास की तरह पहुँचती रही है। ऐसी कविता की शक्तियों या सीमाओं को, उसकी प्रक्रियाओं को, उसके भीतर बन रही सरणियों और समीकरणों को पुकार पाना, उनका नामकरण कर पाना, समीक्षा की भाषा के स्तर पर उसे साबित कर पाना दुश्वार और लगातार चैलेंजिंग है। बकौल श्रीकान्त वर्मा, ‘‘शिल्पी शमशेर के लिये छोटा शब्द है। और भी कवि हैं और भी शिल्पी हैं। मगर कोई भी शमशेर नहीं। शमशेर के लिए एक शब्द की तलाश एक समूचे ब्रह्मांड की तलाश की तरह है। शमशेर का एक-एक शब्द एक-एक अंक की तरह है। एक भी अंक ़गलत हो जाने से सारा हिसाब ़गलत हो जाता है। शमशेर की कविता का हर शब्द कविता है। खड़ी बोली में लिखी गई हिन्दी कविता में किसी भी कवि ने भाषा से इस इंटेंसिटी के साथ प्यार नहीं किया है।’’

दो

बड़े आविष्कार, यों, बुनियादी दि़क्कतें खड़ी कर देते हैं। जैसे यह दि़क्कत कि आप उन्हें शब्द की ओर से देखें या अर्थ की ओर से, प्रगति के पहलू से या प्रयोग के, विचार के कोण से या सौन्दर्य के नु़क्ते से। कथ्य और शिल्प के झमेले अलग हैं और बदस्तूर हैं। यहाँ वर्गीकरण की सुविधाएँ नहीं हैं और सराहनाओं के अतियों में बदल जाने के खतरे हैं। यह कविता अक्सर अर्थ के तयशुदा कॉमनसेंस का, कविता पढ़ने के तर्कपूर्ण व्यावहारिक तरी़के का, अर्थ की तथ्यात्मकता का, अर्थ को ही शब्द का एकमात्र गन्तव्य मानने की रुढ़ि का अतिक्रमण करते हुए खुद को मुमकिन करती है। यहाँ हमेशा तथाकथित अर्थों के विकल्प मौजूद हैं, निष्कर्ष नहीं हैं या अनेक हैं, काव्यानुभूति की अनेक तहें साथ-साथ जीवन्त और सक्रिय हैं और समानान्तरों का एक मेला लगा हुआ है।

तीन

उनकी कविता उषा। शुक्र है कि यह शमशेर की उन कुछ कविताओं में से है जिसकी अंतर्वस्तु बतायी जा सकती है। मसलन ऐसे कि यह एक सुबह का वर्णन है, अन्यथा शमशेर अंतर्वस्तु की सतह को, कथ्य के क्षणिक चालू वक्तव्य को गुम करके और रचना-विशेष के रेशों में उसे अंत:सलिल करके कविता हासिल करने की प्रतिश्रुतियों के कलाकार हैं। इस कविता में जाहिर है कि कई खासियतें हैं जो एक दूसरे से भिन्न दिशाओं में सक्रिय और द्वन्द्वरत हैं। इन खूबियों की शक्ति इनके एक दूसरे से अलहदा, विरोधी, समान्तर या परस्पर संबंधहीन होने में भी है।

चार

इस कविता में निहित वस्तुओं को देखें वे कितनी रंग-मंडित हैं। वे वस्तुएँ औसत भारतीय ग्राम्य जीवन के रो़जमर्रा से जुड़ी हुई कभी अपने असल नैसर्गिक रंग और कभी अपने स्रष्टा कवि की कल्पना के रंग में रची हुई आती हैं। ये वस्तुएँ कभी यथार्थ की कल्पनाएँ हैं, कभी कल्पना का यथार्थ। कवि के अन्दा़ज में कहें तो इस और ऐसी कविताओं का आसमान यथार्थ और कल्पना के बीच की धुँधली बादल रेखा पर टिका हुआ है। बहुत नीला शंख’ ‘जरा से लाल केसर से धुली हुई बहुत काली सिलजैसे असंभव-से उपमान और ज़िन्दगी के साधारणतम सामान राख से लीपा हुआ चौका, स्लेट, लाल खड़िया चाक। लेकिन आप इनमें कोई दूरी, फाँक या वर्गान्तराल देखने की बजाय उनके बीच किसी घटना की तरह निर्मित और कविता के ज़रिये व्यक्त हो रहे नए मानवीय संबंध देखने लगते हैं। शमशेर सृष्टि में बिखरी हुई ची़जों, लोगों, घटनाओं को अपनी अंतर्वस्तु में, जैसा कि ध्वनिकारने कहा है, एक अपूर्ववस्तुनिर्माणक्षमा प्रतिभाके साथ स्वीकार करते हैं। 

इस कौशल को बहुधा उनके सुर्रियलिस्ट आग्रहों के साथ जोड़कर देखने की कोशिश की गई है, जिसमें कोई हर्ज भी नहीं है, लेकिन बुनियादी ची़ज है वह सहोदरत्व या सहव्याप्ति, जो वैभिन्य के बावजूद उनकी काव्यभाषा के भीतर तेजस्क्रिय तत्वों को गैरबराबरी से आ़जाद करती है। उन्हें एक दूसरे के बराबर और एक दूसरे के करीब ला देती है। उनके बीच की भौतिक दूरियाँ अपार्थिव ऩजदीकियों में तब्दील हो जाती हैं। क्या प्रदत्त अर्थ की छाया से दूर हुए ब़गैर ये ची़जें इतने आस-पास आ सकती थीं? वे ची़जें, जो ज़िन्दगी में एक दूसरे से बहुत दूर और असंबद्ध मानी जाती हैं, कविता के परिसर में परस्पर हो जाती हैं। कवि ऐसे ही काव्यात्मक और काव्येतर के फ़र्क को धुँधला करता है।

बहरहाल, हम कविता की ओर लौटें और उसे तनिक तालबद्ध शिल्प में, रिद्म में पढ़ें। यह शमशेर की प्रिय रिद्म है। संगीत की दुनिया में रुपकनाम से मशहूर सात मात्राओं का यह छिप्र चंचल ताल, ‘तीन ताल’, ‘कहरवाऔर दादराके बाद चौथा सर्वाधिक लोकप्रिय ताल है। इसके बोल हैं ती ती ना धी ना धी ना। कोई चाहे तो इस सिम्फनी को चौदह मात्रा़ओं के ताल धमारमें भी विन्यस्त कर सकता है, लेकिन बात वही होगी। सात मात्रा के रूपक को दो बार अर्थात् दो आवर्तनों में बजा लिया जाय या चौदह मात्राओं के धमार को एक बार, कोई खास फ़र्क नहीं पड़ता। 

खैर, सात मात्राओं का यह रिद्म शमशेर को प्रिय है और उनके वांग्मय की अनेक कविताएँ इस ताल में निबद्ध हैं। भूलकर जब राह जब-जब राह...भटका मैं/तुम्हीं झलके, हे महाकवि’; ‘मौन आहों में बुझी तलवार/तैरती है बादलों के पार’; ‘शाम का बहता हुआ दरिया कहाँ ठहरा/ साँवली पलकें  नशीली नींद में जैसे झुकीं। उदाहरण पर्याप्त हैं और उनमें खूब भटका भी जा सकता है। यों ही, कहरवा, तीनताल और दादरा में लयबद्ध रचनाओं की संख्या भी ज्यादा है। 

पहली ऩजर में इन लयनिबद्ध रचनाओं को देखने पर गद्यपरकता दिखती है, जबकि यहाँ मौजूद खड़ी बोली के पूरे-पूरे-से वाक्य दरअसल एक सघन आंतरिक संगीत का निर्वाह करते हुए आए हैं। इनके होने का तर्वâ संगीत और ताल की योजनाओं पर स्थित है। कविता की भाषा में संगीतबद्ध वाक्य जो संख्या तथा गुणवत्ता दोनों के लिहा़ज से बहुत ज्यादा, बहुत व़जनी हैं, सतही, छद्म, सिनेमाई, सरल और अहर्निश जनता की चापलूसी में लिप्त तुकान्तता और इस तुकान्तता को छन्द मानने और मनवाने वाली अल्पज्ञ और अ़फवाहबा़ज सत्तात्मक आलोचना का विध्वंस कर देते हैं। 

ये वाक्य इस प्रकार आधुनिक युग में ही रोग की तरह फ़ैल गये गेय और गद्य को अलग-अलग मानने वाले भ्रमित बोध को अप्रासंगिक कर डालते हैं। शमशेर की काव्यभाषा का गद्य इस अर्थ में कितना पद्यमय है कि उसे गाया जा सकता है। उस पर तबला, ढोलक, नाल, मृदंग, पखावज, ड्रम, आक्टोपैड - कोई भी तालवाद्य बजाया जा सकता है। इस बिन्दु पर यह कहा जा सकता है कि शमशेर की भाषा का एक स्वप्न संगीत है। यह भाषा संगीत का सपना देखती है और बेशक, उसे पूरा भी करती है। संगीत और भाषा को इस चरम अभेद पर हासिल कर पाने वाले आत्मविश्वास ने ही शमशेर जैसे सुख्यात विनम्र को वह औद्धत्य प्रदान किया है जिसकी शक्ति से वह हिन्दी साहित्य संसार में पूरे वाक्यों वाली रचना के रूप में स्थापित त्रिलोचन की अप्रतिम कृति धरतीके बारे में अपनी एक कविता में यह कुछ उल्टा-सा लगता सवाल पूछते हैं कि तुमने धरती का पद्य पढ़ा है? उसकी सहजता प्राण है।

पाँच

शमशेर गद्य को पद्य कहकर पुकारते हैं और गद्य को संगीत के कायदों में-से खोज पाते हैं। शमशेर के किरदार में, एक स्तर पर पद्य का अर्थ गद्य है और उनकी कविता का गाया जा सकने वाला अंश ऐन उसी मौ़के पर सर्वोत्तम गद्य भी है। भारतीय कविदृष्टि में काव्य का गद्य हो जाना कोई नई बात नहीं है। कई बार गद्य हमारे महाकाव्य में संभव भी हुए। कविता का गद्यपरक स्वभाव महाकाव्यात्मकता के एक लक्षण की तरह उपलब्ध हो सकता है। ऐसे ही शमशेर महाभारतकी सरासर गद्यात्मक परम्परा को अपनी प्रयोगशीलता के ़जरिये अद्यतन और प्रासंगिक कर लेते हैं।

लेकिन हम एक बार फिर उषाशीर्षक कविता की ओर लौटें। ‘‘प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे / भोर का नभ / राख से लीपा हुआ चौका / (अभी गीला पड़ा है) / बहुत काली सिल / जरा से लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो / स्लेट पर या लाल खड़िया चाक / मल दी हो किसी ने / नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह / जैसे हिल रही हो / और...../ जादू टूटता है इस उषा का अब......../’’ इन तेरह पंक्तियों के बाद एक पंक्ति बा़की है। लेकिन दिलचस्प है कि कविता में जैसे ही उषा का जादू टूटता है, वैसे ही यहाँ तक चली आयी तालबद्धता भी टूटकर बिखर जाती है। जैसे उषा के जादू के टूटने के क्षण-विशेष में ही समका आना निश्चित हो, जैसे यहाँ आकर किसी चक्करदार परन की तिहाई पूरी हो गई हो, जैसे उषा के जादू के टूटते ही ताल के जादू के भी टूट जाने का व़क्त हो। यह ़खुद कविता के जैविक ऐक्य का कमाल है कि जैसे ही कविता का कथ्य पूरा होता है, वैसे ही उसका शिल्प और उसमें निहित संगीत भी सम्पन्न हो जाता है। इस टूटन के बाद सूर्योदय मानो किसी बे-ताल या बे-हद में हो रहा है।

और सात मात्राओं वाले इस ताल रुपककी लयगति में कितनी व्यंजना है। भारतीय काव्य के न जाने कितने अमर पद इसमें निबद्ध हुए हैं। इस ताल में उन अमर पदों की भी आभा है। तुलसीदास की प्रसिद्ध राम वन्दना – ‘श्री रामचन्द्र कृपाल भजमन् हरण भवभय दारुणमइसी ताल में है। इस राम वंदना की उपस्थिति के वैभव और इसके आगमन की आहट को शमशेर की कविता उषामें महसूस किया जा सकता है। हिन्दी दृश्य में आम तौर पर कविता को भाषा की, काव्यभाषा की, बल्कि अमिधा की स्मृति मान लिया गया है, जबकि पूर्वज कविता की स्मृति के प्रकार कुछ इसी तरह अण्डरग्राउंडरहकर कविता में दर्ज होने चाहिए।

छह

इस राह पर चलते हुए शमशेर आधुनिक हिन्दी कविता और संगीत के रिश्ते की अधुनातन नियमावली भी तैयार कर रहे हैं। गीत-नवगीत आदि में गायी जाने वाली सरल राग-रागिनियों ने हमेशा कविता के शिल्प और कथ्य को अपनी संरचना और दूसरी भौतिक जरूरतों के हिसाब से नियन्त्रित करने की चेष्टा की है। यह तुकों व़गैरह के ़जरिये लोकप्रिय और युगानुवूâल का आधिपत्य है। यह कविता में आसानियत के संगीत की तानाशाही है। यह मंच की वाहवाह गलेबा़जी और हिन्दी फिल्मों के गाने हैं। शमशेर के संगीत के प्रयोग इस तदर्थता का प्रत्याख्यान हैं। उन जैसी लम्बी अप्रतिहत साँसें गिऱफ्त में नहीं आतीं। ये साँसें ताल के छोटे-छोटे मीटर्स में नहीं अँटतीं और निरंकुश और बेसंभाल के निर्माण में लग जाती हैं। 

अगर इस खयाल से कवि की रचना-प्रक्रिया को सोचें तो यह सा़फ दिखाई देता है कि शमशेर छन्द, लय या ताल का कोई पूर्वनिर्धारित खाका हाथ में लेकर कविता लिखना नहीं शुरू करते, बल्कि काव्य का संगीत उनकी रचना-प्रक्रिया के अप्रत्याशित का अनिवार्य हिस्सा बनकर, रचना के पदार्थ की ़जरूरतों के मुताबि़क निर्मित होता है। यह संगीत कविता की आत्यंतिक अनिवार्यताओं की वजह से है, कविता के कारण है और कविता के बाहर की किसी पहले से तय ची़ज का अनुकरण करते हुए नहीं आया है। उसमें महान भक्ति कविता की तरह बढ़त के अवकाश हैं। इस म़काम पर शमशेर की कविता का संगीत अतिनिश्चित छायावादी लयबद्धता और गेयता से आगे की बात है। यह संगीत वर्णों की कोमलता, भाषा की झंकार, तुकों के दोहराव और गाने की सरलता के पार है। यह चेतना में गूँजता हुआ संगीत है। यह गद्य की विषण्णता का संगीत है। यह उचित ही बार-बार कहा गया है कि शमशेर में छायावाद सर्वाधिक उत्तरजीवित है लेकिन ऐसी अमर कार्रवाइयों से छायावाद का पटाक्षेप भी उनसे ़ज्यादा किसने किया है?

सात

वैसे शमशेर के यहाँ स्मृति और कल्पना में ज्यादा फ़र्क  नहीं है। आखिर यथार्थ का अनुभव क्या है? वह या तो स्मृति है या कल्पना। उनकी कविता में से स्मृति और कल्पना के तत्वों को अलग-अलग कर पाना प्राय: नामुमकिन है। ऐसे में यह सरलीकरण सहज संभव है कि शमशेर स्मृति और कल्पना या शब्द और अर्थ या कथ्य और शिल्प के अद्वैत के कवि हैं, लेकिन ऐसा है नहीं। यह कहा गया है कि शमशेर कई बार रूप को ही एक समृद्ध कथ्य की तरह व्यवहार में ले आते हैं या रचना के माध्यम याने भाषा को ही रचना का वक्तव्य बनाकर पेश कर देते हैं। मलयज भी कहते हैं कि भाषा भी शमशेर जी के लिये कविता है, सि़र्पâ माध्यम नहीं।और यह तो उनकी कविता ही कहती है कि ओ माध्यम! क्षमा करना कि मैं तुम्हारे पार जान चाहता रहा हूँ। 

लेकिन ऐसा करते हुए वह माध्यम की गरिमा को नहीं भूलते। मंगलेश डबराल ने एक खूबसूरत थीसिस में यह प्रतिपादित किया है कि शमशेर अगर सुन्दरता के लौकिक और ऐन्द्रिक आकारों को अनदेखा करके या उन्हें उपेक्षणीय मानकर चले होते वह ज्यादा से ज्यादा एक उत्तर छायावादी या एक आध्यात्मिक कवि होते लेकिन वह उनसे गुजर कर, उनमें से होते हुए उनका अतिक्रमण करने की आकांक्षा रखते हैं। कई बार वह रचनाकार की श़िख्सयत को भी एक माध्यम के रूप में प्रस्तुत कर देना चाहते हैं, लेकिन गौरतलब है कि किस कीमत पर रामविलास शर्मा को लिखे एक पत्र में वह कहते हैं, ‘‘कलाकार स्वयं को बदलेगा, बदलेगा, एक माध्यम बनाने के लिए, अपने को एक अत्यधिक sensitive माध्यम, सक्षम दृष्टा, poet in ancient sense, a maker घोर रूप से तभी.... और इसी हद तक वह अपने पाठक को अपना जितना भी छोटा या बड़ा परिवेश है, उसे प्रभावित कर सकेगा, कुछ बदलने के लिए’’। यों, यह सा़फ है कि शमशेर कोई अद्वैतवादी रचनाकार नहीं हैं, उनके रचना-संसार में वस्तुओं की भिन्न-भिन्न सत्ताएँ हैं जो निरन्तर द्वंद्वरत हैं और एक अपूर्व जैविक संहति में एकाग्र।

आठ

शमशेर ने हमारी यानी वृहत्तर अर्थों में हिन्दी जाति की काव्यानुभूति के केन्द्र में भाषा की अविभाज्य मानवता को प्रतिष्ठित किया है। यह नयी कविता के दौर में हुए रचनात्मक समर का समवेत प्रतिफल है। इसका श्रेय अकेले शमशेर को नहीं है, लेकिन विजय का ध्वज उनके भी हाथ में है। अशोक वाजपेयी ने काव्यानुभूति के केन्द्र में भाषा की अनिवार्यता को रेखांकित किया है। बहुत दूर तक शमशेर इस रेखांकन का सबब होंगे। आजकल जब हम सामाजिक सद्भाव को किसी सुविधाजनक यान्त्रिकता या किसी आधारहीन यूटोपिया से उपलब्ध कर लेना चाहते हैं, शमशेर की याद हमें बड़ी चुनौतियों में डाल सकती है जहाँ स्त्रष्टा अपनी समूची आत्मवत्ता को ही भिन्न-भिन्न भाषाओं के संश्लेषण की तरह एक दोआबकी मानिन्द विकसित करता है।

वैसे शमशेर के यहाँ ऐसे अनेक तथाकथित विरुद्धएक दूसरे में अपूर्व अप्रत्याशित कलात्मक योजना के साथ निमज्जित होते रहे हैं। उन्होंने अपनी एक कविता में खुद माना है कि कवि घंघोल देता है / व्यक्तियों के जल / हिला-मिला देता / कई दर्पनों के जलइस पारस्पारिकता में कला की जागती आँखों से एक आदर्श राजनीति और समतामूलक समाज के ख्वाब देखे गये हैं। यह संश्लेषण सद्भावकी सि़र्पâ अंतर्वस्तु या सदिच्छा नहीं है, उसका शिल्प, उसकी भाषा उसकी चरितार्थता भी है। शमशेर की रचनात्मक श़िख्सयत सेकुलर कविता लिखने की ़खातिर सेकुलर भाषा ईजाद करती है। यों, समसामयिक हिंदी कविता में एक मुद्दे के तौर पर सेकुलरि़ज्मको जो सर्वोच्चता हासिल हुई है और उसे लेकर कविता के कार्यकत्र्ताओं में जितना अभियानात्मक ज़ज्बा है, शमशेर उसके भी आर्विटेक्टहैं।
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{ १३ जनवरी को रज़ा फ़ौंडेशन द्वारा आयोजित 'शमशेर-शती' के अवसर पर पढ़े गए आलेख का संशोधित रूप. }

Thursday, January 27, 2011

कुछ कविताएं




डिठौना

एक तिल है बाईं आंख की सरहद पर तुम्हारी
जो मेरी निगाह से रार ठाने रहता है.
उसे समझाओ !... या थोड़ा काजल बढ़ा कर छिपा ही दो.
डिठौना करीब २८ में ठीक नहीं.
इसे हमारे बच्चों के लिए रख छोड़ो.
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गुदगुदी

तुम्हारी हंसी की अलगनी पर मेरी नींद सूख रही है.
तुम उसे दिन ढले ले आओगी कमरे में, तहा कर रखोगी सपने में.
मैं उसे पहन कर कल काम पर जाऊंगा और मुझे दिन भर होगी गुदगुदी.
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कोई भाषा नहीं

तुम्हारे होठों पर सर्जरी के बाद छूट गई खंरोच का तर्ज़ुमा मैं 'दाग़ अच्छे हैं'
करता था जैसे बहुत खुश को तुम 'कुछ मीठा हो जाए' कहा करती थी.
विज्ञापनी भाषा की सारी चातुरी की ऐसी-तैसी कर हम वस्तुओं की जगह
ख़ुद को कितनी आसानी से नत्थी कर लेते थे और हमारी ख़ुशी ने उस बेहोश वक़्त में
'प्रेम न हाट बिकाय' कभी हम पर ज़ाहिर नहीं होने दिया.
जबकि तुम जिन वजहों से सुन्दर और करीबतर थी उन वजहों की कोई भाषा नहीं.
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एक यह भी सही

देख कर तुम्हें कभी यह नहीं लगा कि तुम्हारी उजली हंसी पर प्रेम की वह छाया भी पड़ती है जो तुम्हें चुप और उदास बनाती है और मुझे उन सब अभिनेय भूमिकाओं के लिए धीरे से तैयार जो अक्सर त्रिकोण उभरने पर कुछ कम हीरो के हिस्से बदी होती है. एक तो अभिनय के इस अच्छेपन में मेरा यकीन नहीं दूसरे मैं इस नियति को बहुत शक्की निगाह से देखता हूँ. देखने के इस सयाने, बचकाने या बेढंग ने 'जो पसंद है सो पसंद है' की दलील पर मेरा ऐतबार ही बढ़ाया और इससे कुछ हो न हो कहानी के दो एकांत नहीं रह गए. तीसरा एकांत मेरे मन का अहाता है जिसकी चौहद्दी पर तुम्हारा यह अफ़सोस फ़िलहाल ठिठक गया है कि 'हम अक्सर उसे क्यों चाहने लगते हैं जो पहले से किसी और के प्यार में मुब्तिला रहता है'. मैं इसमें प्रेजेंट इम्परफेक्ट टेंस का एक वाक्य घटित होने से ज़्यादा कुछ देख नहीं पाता और इसी कमनज़री से अपने कोने में आबाद हूँ. जैसे त्रिकोण में कहीं तुम हो. जैसे दुनिया में हर शै है. वह भैया होगा जिसके साथ तुम भाग जाना चाहती हो. अब इतना कुछ अजीबोगरीब ढंग से पैबस्त है जीवन में तो एक यह भी सही.
****

[ ऊपर इधर लिखी गई कुछ कविताएं दी गई हैं. कवितानुमा कुछ और चीजें इससे पहले यहां : , ,
साथ में दी गई तस्वीर 'वर्टिकल रे ऑफ़ सन ' नाम की फिल्म का एक दृश्य है. ]

Tuesday, January 25, 2011

स्मरण : भीमसेन जोशी



नश्वर देह का अमर राग


उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी वर्षों में उस्ताद अब्दुल करीम खां की जादुई आवाज ने जिस किराना घराने को जन्म दिया था, उसे बीसवीं शताब्दी में सात दशकों तक नयी ऊंचाई और लोकप्रियता तक ले जाने वालों में भीमसेन जोशी सबसे अग्रणी थे। किराना घराने की गायकी एक साथ मधुर और दमदार मानी जाती है और इसमें कोई संदेह नहीं कि जोशी इस गायकी के शीर्षस्थ कलाकार थे। अर्से से बीमार चल रहे जोशी का निधन अप्रत्याशित नहीं था, हालांकि उनके न रहने से संगीत के शिखर पर एक बड़ा शून्य नजर आता है। लेकिन सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि भीमसेन जोशी किराना घराने के सबसे बड़े संगीतकार थे। दरअसल उनकी संगीत-दृष्टि अपने घराने से होती हुई बहुत दूर, दूसरे घरानों, संगीत के लोकप्रिय रूपों, मराठी नाट्य और भाव संगीत, कन्नड़ भक्ति-गायन और कर्नाटक संगीत तक जाती थी। 

यह एक ऐसी दृष्टि थी जिसमें समूचा भारतीय संगीत एकीकृत रूप में गूंजता था। कर्नाटक संगीत के महान गायक बालमुरलीकृष्ण के साथ उनकी विलक्षण जुगलबंदी से लेकर लता मंगेशकर के साथ उपशास्त्रीय गायन इसके उदाहरण हैं। दरअसल भीमसेन जोशी इस रूप में भी याद किये जायेंगे कि उन्होंने रागदारी की शुद्धता से समझौता किये बगैर, संगीत को लोकप्रियतावादी बनाये बगैर उसका एक नया श्रोता समुदाय पैदा किया। इसका एक कारण यह भी था कि उनकी राग-संरचना इतनी सुंदर, दमखम वाली और अप्रत्याशित होती थी कि अनाड़ी श्रोता भी उसके सम्मोहन में पड़े बिना नहीं रह सकता था।

धारवाड़ के गदग जिले में १९२२  में जन्मे भीमसेन जोशी की जीवन कथा भी आकस्मिकताओं से भरी हुई है। वे ११ वर्ष की उम्र में अब्दुल करीम खां के दो ७८ आरपीएस रिकॉर्ड सुन कर वैसा ही संगीत सीखने घर से भाग निकले थे और बंगाल से लेकर पंजाब तक भटकते, विष्णुपुर से लेकर पटियाला घरानों तक के सुरों को आत्मसात करते रहे। अंततः घर लौटकर उन्हें पास में ही सवाई गंधर्व गुरू के रूप में मिले जो अब्दुल करीम खां साहब के सर्वश्रेष्ठ शिष्य थे। उन्नीस वर्ष की उम्र में पहला सार्वजनिक गायन करने वाले भीमसेन जोशी पर जयपुर घराने की गायिका केसरबाई केरकर और इंदौर घराने के उस्ताद अमीर खां की मेरुखंड शैली का प्रभाव भी पड़ा। 

इस तरह उन्होंने अपने संगीत का समावेशी स्थापत्य निर्मित किया जिसकी बुनियाद में किराना था, लेकिन उसके विभिन्न आयामों में दूसरी गायन शैलियां भी समाई हुई थीं। भीमसेन जोशी अपने गले पर उस्ताद अमीर खां के प्रभाव और उनसे अपनी मित्रता का जिक्र अक्सर करते थे। कहते हैं कि एक संगीत-प्रेमी ने उनसे कहा कि आपका गायन तो महान है लेकिन अमीर खां समझ में नहीं आते। भीमसेन जोशी ने अपनी सहज विनोदप्रियता के साथ कहा : ‘ठीक है, तो आप मुझे सुनिए और मैं अमीर खां साहब को सुनता रहूंगा।

भीमसेन जोशी के व्यक्तित्व में एक दुर्लभ विनम्रता थी।  किराना में सबसे मशहूर होने के बावजूद वे यही मानते रहे कि उनके घराने की सबसे बड़ी गायिका उनकी गुरू-बहन गंगूबाई हंगल हैं। एक बार उन्होंने गंगूबाई से कहा, ‘बाई, असली किराना घराना तो तुम्हारा है। मेरी तो किराने की दुकान है। अपने संगीत के बारे में बात करते हुए वे कहते थे : ‘मैंने जगह-जगह से, कई उस्तादों से संगीत लिया है और मैं शास्त्रीय संगीत का बहुत बड़ा चोर हूं। यह जरूर है कि कोई यह नहीं बता सकता कि मैंने कहां से चुराया है।' दरअसल विभिन्न घरानों के अंदाज भीमसेन जोशी की गायकी में घुल-मिलकर इतना संश्लिष्ट रूप ले लेते थे कि मंद्र से तार सप्तक तक सहज आवाजाही करने वाली उनकी हर प्रस्तुति अप्रत्याशित रंगों और आभा से भर उठती थी।

किराना का भंडार ग्वालियर या जयपुर घराने की तरह बहुत अधिक या दुर्लभ रागों से भरा हुआ नहीं है, लेकिन किसी राग को हर बार एक नये अनुभव की तरह, स्वरों के लगाव, बढ़त और लयकारी की नयी रचनात्मकता के साथ प्रस्तुत करने का जो कौशल भीमसेन जोशी के पास था वह शायद ही किसी दूसरे संगीतकार के पास रहा हो। मालकौंस, पूरिया धनाश्री, मारू विहाग, वृंदावनी सारंग, मुल्तानी, गौड़ मल्हार, मियां की मल्हार, तोड़ी, शंकरा, आसावरी, यमन, भैरवी और कल्याण के कई प्रकार उनके प्रिय रागों में से थे और इनमें शुद्ध कल्याण और मियां की मल्हार को वे जिस ढंग से गाते थे, वह अतुलनीय था। 

उनके संगीत में एक साथ किराना की मिठास और ध्रुपद की गंभीरता थी, जिसे लंबी, दमदार और रहस्यमय तानें, जटिल सरगम और मुरकियां अलंकृत करती रहती थीं। एक बातचीत में उन्होंने कहा था : ‘गाते हुए आपकी साधना आपको ऐसी सामर्थ्य देती है कि यमन या भैरवी के स्वरों से आप किसी एक प्रतिमा को नहीं, बल्कि समूचे ब्रह्मांड को बार-बार सजा सकते हैं।

भीमसेन जोशी करीब सत्तर वर्षों तक अपने स्वरों से किसी एक वस्तु या मूर्ति को नहीं, समूची सृष्टि को अलंकृत करते रहे। यही साधना थी जो उन्हें बीसवीं सदी में उस्ताद अमीर खां साहब के बाद इस देश के समूचे शास्त्रीय संगीत का सबसे बड़ा कलाकार बनाती है और उन्हीं की तरह वे अपनी देह के अवसान के बावजूद अपने स्वरों की अमरता में गूंजते रहेंगे।
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Saturday, January 22, 2011

पीतालोक प्रसार में काल गल रहा है




हमें उन लड़कियों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जिन्हें देखकर, मिलकर, बातें करते हुए या रेस्तरां में साथ चाय/कॉफ़ी पीते हुए हमारे मन में एक हूक उठी थी : एक हिचकी जो अब शांत है, पर जिससे पहली दफ़ा अंदाज़ा हुआ था कि हम प्यासे हैं, हमें पानी की ज़रूरत है ...

पुराने कमरे उन प्रेमिकाओं की तरह होते हैं जिनसे यों तो हमारा संबंध टूट गया है, पर जिनकी याद है, लगाव है, कभी-कभार का लौटना भी. आखिर उनके साथ इतना वक़्त जो गुजारा हुआ होता है हमने : निजी और आत्मीय.

हम प्रेम करते हुए अक्सर अकेले पड़ जाते हैं. दुःख इस बात का नहीं कि यह अकेलापन असह्य है. दुःख इस बात का है कि इसे सहने का हमारा ढंग इतना बोदा है कि हमसे वह आलोक तक छिन जाता है, जो प्रेम के इस सुनसान में हमारे साथ चलता.

कोशिश करके भूलना बेतरह याद की निशानी है. इसलिए हम कुछ भी भूलना अफोर्ड नहीं करते : न चीजें, न चेहरे, न हमारे साथ हुआ/अनहुआ. असल में विस्मृति स्वयं उन घटनाओं, चीज़ों, चेहरों और ब्योरों को हमसे अलग करती जाती है जिनका बेतुका संग-साथ हमसे बना रहता है.

इधर रात का रवैया कुछ ठीक नहीं. यों उससे अपनी पुरानी यारी है. कभी ऐसा भी रहा कि वह मुझ पर खूबसूरत-खामोश बीत जाती थी और मैं दिन भर उसी की खुमारी में बौराता रहता था. लेकिन दिल्ली में वह मेरे कहने में ही नहीं आती. एक तो उसमें इतना शोर भरा है कि मुझे आंख बंद करके भी दिन होना लगता है. दूसरे वह बीतती अपनी चाल से है. मैं सोचता था इतना स्त्रियोचित ममत्व तो होगा उसमें कि छटांक भर नींद ही डाल दे मेरी आंखों में! पर कहां? हालांकि आज का मेरा सच तो यही है कि मुझे रात की नींद और सुबह के आश्वासन के अलावा भी कुछ चाहिए. न सही बहुत मगर इतने से भी मेरा काम नहीं चलता.

दुपहर बारिश हुई. बारिश इतना और यह करती है कि सब एक छत के नीचे खड़े हो जाएँ.
वह मेरे बगल में आकर खड़ी रही. मुझे पहली बार ऐसा लगा कि उसे यहीं ऐसे ही बहुत पहले से होना चाहिए था और अभी इसे दर्ज करते हुए यह इच्छा मेरे भीतर बच रहती है कि हर बारिश में वह मेरे साथ हो.

आज दिन बहुत सुहाया. ठंडी बयार थी. धूप छुपम-छुपाई खेल रही थी. लगा नहीं कि ये गर्मियों के दिन हैं. मैं पेड़ की बदलती छायाओं में उठ-बैठ कर पढ़ता रहा. काफ्का कहते हैं एक जगह : ''एक बिंदु हो, प्यार हो, आदमी जान लड़ा देगा.'' मैं उस बिंदु पर एकाग्र होने की बजाय छिटक जाता रहा हूँ. मुझे उसे देखना चाहिए. वहां रहना चाहिए.

एक-एक दिन सरक रहा है : ''पीतालोक प्रसार में काल गल रहा है'' (मुक्तिबोध ).
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[ पुरानी डायरी से कुछ सतरें. २००७-०८. कॉलेज के दिन.
साथ में दी गई तस्वीर ह्यूगो कसात की.]

Wednesday, January 19, 2011

सिद्धान्त मोहन तिवारी की कविताएं




[ सिद्धान्त अपनी ताज़ा कविताओं के साथ आपके सम्मुख हैं. कविताओं के साथ दी गई चित्र-कृति प्रीती मान की बनाई हुई है.]


फ़िर से...


आज मैं फ़िर से लिखूंगा
पहले से ज़्यादा लिखूंगा
और ज़्यादा
इतना ज़्यादा
कि मुझे फ़िर से प्यार हो जाए
जैसे पहले हुआ था
जब मैनें पहले लिखा था
उसके पहले से ज़्यादा
उसे होना होगा
बार-बार
कई बार
हमेशा
मुझे लिखता हुआ बनाए रखने के लिए
****

मोनालीशा ब्यूटी पार्लर

हाँ, उसका नाम मोनालीशा ही होगा
जो शहर और आस-पास के इलाक़ों में
ब्यूटी पार्लरों के नामकरण का सामान बनी

उन जगहों पर
जहाँ एक मोटे परदे से
हमसे दूरी बनाई जाती है
और यूँ ही व्याप्त हो जाता है
रहस्य

उस परदे के पीछे क्या है
मैंने और कईयों ने हमेशा जानने की कोशिश की है
परदे के पार की दुनिया
ज़्यादा रोचक होती है
बजाय इधर की दुनिया के

मोनालीशा भी नहीं जान पाई होगी
परदे का खेल

मैनें देखा है
कुछ लोग मान लेते हैं
अन्दर एक वेश्यालय है
और संचालिका
निम्न दर्जे की एक वेश्या

शक़ होता है
अन्दर जाने वाली महिलाओं पर
और दी जाती है उनके पतियों को
नसीहतें और उलाहना

मोनालीशा की कर्मभूमि के सामने से जाने वाला पुरुष
कभी परदे के किनारों से अन्दर देखे बिना
आगे नहीं बढ़ता

क्यों होती है संचालिका वेश्या
क्यों नहीं हमें दबोचकर खींच लेती परदे के उस पार
और क्यों नहीं टूट पड़ती मुझ पर अपनी साथ वालियों के साथ
क्यों वे पसंद करती हैं हर पुरुष को
उनका भौंहों को नुकीला बनाना
क्यों लड़की को एक अलग वर्ग में स्थापित करता है
आने-जाने वाली महिलाओं के उभार
इतने उद्वेलित करने वाले क्यों होते हैं
क्या उन्होंने संचालिका को मार्गदर्शक मान लिया है

इसका प्रमाण क्या है
कि वे नहीं करती होंगी बातें
बिस्तर-तोड़ संबंधों के बारे में

क्या वे अपने पतियों की अदला-बदली की बातें करती होंगी
या तैयार होंगी किसी से भी प्रेम करने के लिए

दुःख तो इस बात का है
अब कुछ जवान होती लड़कियों ने
चेहरे पर दुपट्टा बाँध
पार्लर आना-जाना शुरू कर दिया है
****

माँ


हमेशा से तुम भरसक लिखी गई
किसी भी काम की तरह
जो शायद अनमने ढंग से किया जाता हो.

तुम कविता में हमेशा आती हो
अपनी मौत के बाद,
लेकिन मेरे लिए
तुम अभी भी मौज़ूद हो,
ज़िंदा हो और ताज़ा हो.

तुम पर लिखे गए को पढ़ना
हमेशा थोड़ा भारीपन लिए होता है
क्योंकि
वहाँ दख़ल होती है,
ख़राब साहित्य की
जो अच्छा दिखने का भ्रम पैदा करता है.
दरअसल,
तुम यहाँ एक ज़रिया बन जाती हो
उस अंतर को ख़त्म करने के लिए
जो एक "अच्छे" और "ख़राब" साहित्य के बीच होता है.
ठीक-ठीक उस आत्मकथा की तरह
जिसके साथ एक छोटा कलाकार भी
सुर्ख़ियों में आ जाता है.

एक साम्य हो तुम.

अभी कल की ही बात है
मैनें तुम्हे नाले में बहता हुआ देखा,
जैसे कोई लाई-चना खा रहा हो
तुम पर रखकर,
क्यों सहती हो इतना,
मना क्यों नहीं कर देती हो,
हमेशा की तरह चुप रहना
तुम्हारी आदत-सी बन गयी है.
अब बस करो,
मत बनो अपने बेटे की ताक़त
या आदर्श
या पैरवीकार
या सबसे अच्छी दोस्त
अपनी लड़की की.
यदि तुम चाहो,
तो जी सकती हो मन मुताबिक़.
बशर्ते, मैं ख़ुश रहूँ,
क्योंकि मेरा ख़ुश होना तुम्हारी मजबूरी होती है.

एक बार सिनेमा वाला रूप भी
अख्तियार करने की कोशिश क्यों नहीं करती,
या किसी अनंतकाल तक चलने वाले धारावाहिक की तरह.
क्यों नहीं मुझे उद्वेलित करती हो
सड़क के गुंडों से भिड़ने के लिये,
रोकने में भला तुम्हें क्या मज़ा मिलता है.
क्यों नहीं मेरे हाथों में पिस्तौल सौंप
छोड़ देती हो बाज़ार में
सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए.
क्यों नहीं देती हो पैसे,
अपनी देवरानी या भाई को
या प्रेमी को
पति का क़त्ल करने के लिए.
माफ़ करना, यहाँ तुम जुड़ जा रही हो,
एक पत्नी के किरदार से भी.
कभी मुझे प्यार नहीं करके भी देखो,
मत रखो जूतिया या गणेश-चौथ का व्रत.
मरने दो मुझे,
यदि मेरा बाप शराबी है
तो छोड़ो करवा-चौथ भी,
मरने दो उसे,
वैसे भी तुम प्रेम कर रही हो
मेरे सौतेले बाप से.

दरअसल, तुम ख़राब नहीं हो,
लेकिन एक बार ख़राब भी बन कर देखो.
तुम "प्रकृति" या  "प्रेम" होती जा रही हो
बेकार ढंग से लिखी गई.

एक बार दिन के बीच में
सोकर भी देखो,
या बहिष्कार कर दो
खाना बनाने का,
और कम कर दो
रोना या
घर छोड़ देने या आत्महत्या कर लेने की धमकी.
कम कर दो, सत्संग में जाना और
पड़ोसी सहेलियों से बतियाना,
या उनकी बुराई मुझसे बतियाना.

ख़राब कुछ भी नहीं है,
बस रफ है सबकुछ - रूखा-सूखा
अपने भीतर की जल्दबाज़ी को छिपा पाने में असमर्थ.
बस एक विनती है तुमसे कि
यहीं रहो
और समय-समय पर पानी-चाय
का इंतजाम कर देना.
****

भगवान अमरीका

मुझे माफ़ करने की कोशिश करना
मेरे भगवान
अगर तुम्हारा मन करे तो
ना मन करे तो
नहीं भी करने की ख़्वाहिश
तुम ज़ाहिर कर सकते हो

मैंने जो भी लिखा
तुम्हारे ख़िलाफ़
उसे मज़ाक़ ही समझना
हाँ,
वो मज़ाक़ ही था
मुझे माफ़ करना
अगर तुम्हे मज़ाक़ भी बुरा लगा

तुम चाहो तो मेरी गर्दन भी काट सकते हो
क्योंकि यहाँ से होती हुई आवाज़ें निकली हैं
तुम्हारे ख़िलाफ़
तुम चाहो तो मस्तक भी फोड़ सकते हो मेरा
तरबूज की तरह
क्योंकि इसने कसम खाई थी
तुम्हारे सामने न झुकने की
मुझे कोई गुरेज़ नहीं
तुम्हारी आदतों से

मेरा एक दोस्त है
उसका नाम मुसलमान है 
अगर तुम्हारा
ख़ून इतने पर ही खौलता है
- मतलब कि मैंने सोचा
तो तुम उसे भी मार देना

उसे माफ़ करना
क्योंकि उसे एक दिन लगा
शौच करते वक़्त
कहीं तुम उसे
गोली तो नहीं मार दोगे
- मतलब कि तुम्हारी मस्ती के तरीक़े
अगर माफ़ न कर सको
तो जो ज़रूरी समझो वो करना
कोई नहीं रोकेगा तुम्हे

उसे काफ़ी डर लगता है
उसे एक दिन लगा
उसकी पत्नी के साथ वो नहीं
तुम हमबिस्तर हुए थे
या चढ़े थे उसकी फूल-सी पत्नी पर जबरन
उसके डर को ही समझ लो
उसे डरा हुआ कुत्ता मान
छोड़ दो
जैसे तुम हमेशा करते हो
एक अच्छी आदत

उसने एक दिन हम सभी से कहा
कि मेरे पास कुछ तेल पड़ा है
कच्चा तेल
कुछ सुन्दर औरतें भी है
कटा-फटा लोकतंत्र भी है
लेकिन शायद तुमने ये सब सुन लिया था
और भड़क गए थे
अपनी भड़कन कम करो
तुम्हे अभी काफ़ी प्रार्थनाएं सुननी हैं

भागो! भागो! जल्दी भागो!
अमरीका गुस्सा रहा है

उस मुसलमान ने मुझसे कहा था
नहीं-नहीं इस बार उसने कुछ कहा नहीं था
क्योंकि कुछ बार से वो कहने के नतीज़े भोग रहा था
इस बार वो सोच रहा था
सोचना भी इस तरीक़े से था
कि उसे ख़ुद को भी ख़बर न हो
कि वह क्या और क्यों सोच रहा है
उसने इस बार बड़े शान्त तरीक़े से सोचा
कि अपनी आज़ादी के लिए आवाज़ उठाए
वह उठा भी नहीं पाया था
कि तुम तोरा-बोरा में घुस गए
और सारे अफगानिस्तान और ईराक़ को
तुम्हें नाखुश करने की सज़ा मिली
तुम्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है
तुमने जो किया, सही किया
तुम स्वतंत्र हो
जैसे हमेशा से थे

मैं तो नहीं
लेकिन कुछ लोग बोल रहे थे
कि तुमने हमारे देश को अपने हिसाब से चलाना शुरू कर दिया है
उन लोगों को सज़ा की ज़रूरत है
तुम देना सज़ा
अगर दिल बड़ा हो तुम्हारा तो
उन्हें माफ़ भी कर देना
तुम्हारे आगे तो सब बच्चे हैं

मुझे लग रहा है कि
मेरा लिखा तुम्हें बुरा लगा
ये तुम्हारे पैमानों पर खरा नहीं उतरा
तुम नहीं लिखवा पाए अपने मन-मुताबिक़
जैसे लेखकों और कवियों के साथ सज़ा के तौर पर करते हो
होना भी चाहिए
शायद, मैं इस्तेमाल में ला रहा हूँ
तुम्हारे हथियार तुम्हारे ख़िलाफ़
जैसे इन्टरनेट या कम्प्यूटर
लेकिन मैनें कहा 'शायद'
इसलिए क्षमाप्रार्थी हो सकता हूँ

क्या तुम अभी गुस्साए थे
क्योंकि अभी-अभी मेरा इन्टरनेट कट गया
लिखते-लिखते

कोशिश करना कि मुझे माफ़ करने की नौबत ही न आए
मुझे इस तरह से पालना
मेरी आगे की नस्ल के तुम ही सबकुछ हो
बाप भी हो
बाप ही हो
मेरे दिमाग़ को तैयार करना ऐसे
कि मैं सोच ही न पाऊँ कुछ अलग
या तुम्हारे ख़िलाफ़
या किसी नए आविष्कार के लिए
या बदलाव की धारा में

तुम स्वतंत्र हो मेरा सर तरबूज के माफिक उड़ाने के लिए
अगर बुरी लगी हो कई बात
कोशिश करना
मुझे माफ़ न करने की.
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Thursday, January 13, 2011

अशोक वाजपेयी पर उदयन





[ हिंदी के वरिष्ठ कवि-लेखक और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी १६ जनवरी २०११ को सत्तर के हो रहे हैं. उनकी उपस्थिति, कविता और बहुस्तरीय सक्रियता पर हालाँकि पहले भी लिखा गया है, लेकिन इतना सहोदर, आत्मीय और वस्तुनिष्ठ होकर उन पर उदयन ही लिख सकते थे. ]  



मैं विलाप करता हूँ
पर क्यों ?

उदयन वाजपेयी

(मैं इस पूरे लेख में उन्हें अशोक कहूँगा। यह मैंने पहले कभी नहीं किया है। हम सभी भाई-बहन उन्हें गुड्डन भैया कहकर बुलाते हैं लेकिन मैं इस निबन्ध में उन्हें ‘अशोक‘ नाम की दूरी से देखने की कोशश करना चाहता हूँ। इससे इस निबन्ध में वस्तुनिष्ठता भले न आ पाये पर कम से कम मेरी कल्पना को भटकने का अधिक अवकाश मिल जाएगा।) 


1
विलाप

मैं विलाप करता हूँ:
बना नहीं पाया ऐसा घर
जिसमें रहते दिदिया-काका, अम्मा-दादा, बाबा
ऋभु के साथ,
जिसमें कई सदियाँ न सही, कम से कम एक सदी होती
आँगन की तरह चौड़ी-खुली;
जिस पर लगे कठचन्दन या बकौली के नीचे
सब जमा होते भोजन के लिए;
जिसमें मलाई की बरफ़ और लँगड़े आमों के साथ
कटहल का अचार, दलभजिया, भरे करेले होते
मटर-पनीर, छोले, नान के साथ;
जिसमें परछी में कभी मिरज़ापुर के पण्डितजी
रामचरितमानस पर प्रवचन करते
और कोई लैम्प के नीचे बैठा करता रहता
ज़्बीग्न्येव हर्बेर्त की कविताओं का हिन्दी अनुवाद;
जिसके भारी लकड़ी के दरवाजे़ सुबह पाँच बजे से
रात ग्यारह बजे तक लगातार खुले रहते
और जिसका होता न कोई चौकीदार;
जहाँ एक किनारे बैठकर
मैं आनन्दमोहन दादा से सुनता रह सकता
निराला और रामचन्द्र शुक्ल के संस्मरण।

मैं विलाप करता हूँ ;
रह नहीं पाया ऐसे मोहल्ले में
जिसमें सुबह-सुबह पार्क में टहलते मिल जाते
कई पिछली-अगली सदियों के लोग, स्त्रियाँ और बच्चे;
जिसमें परचूनी की दूकान, महादेव मिठया की मिठाइयाँ,
कहवाघर, मिल्कबार, आइस्क्रीम की दुकानें होतीं,
और दरज़ी बारहवीं सदी की पोशाकें रफ़ू करते हुए;
कुंजड़ा तेइसवीं सदी की ताज़ी सब्जियाँ पानी से धोकर सजाते हुए,
जिसमें शमशेर मिलते एक मौजूँ शब्द की खोज में भटकते हुए
और व्याकरण की परवाह किये बिना
असम्बद्ध कविता-पंक्तियों से उपन्यास लिखता हुआ एक स्कूली बच्चा;
जिसमें दौआ बाबा की बैलगाड़ी खेतों की तरफ जाती हो
तो उसकी बगल से जाती जूनू की ज़ेन आगे न जाना चाहती।

मैं विलाप करता हूँ;
ऐसा शहर नहीं खोज पाया
जिसके चारों ओर परकोटा हो बर्बरों को रोकने के लिए,
जिस पर उपहारस्वरूप खिली हों
फूलों की रंगारंग क्यारियाँ,
जिसके बाज़ार में बगदाद की कीमख़ाब बेचते हो सौदागर
अमरीकी सैनिकों को;
जहाँ लाहौर के कबाबों और गोश्त  दो प्याज़ा के कार्नर के बगल में हो
थाई फ़ास्टफूड और ग्रीक खाने की दुकानें
जड़ी-बूटियाँ तुर्की से;
बीच चौक में पुस्तकालय हो किसी राजप्रासाद से अधिक भव्य
जिसमें बटन दबाते ही
कबीर और शेक्सपीयर की पंक्तियाँ आ जाएँ
कम्प्यूटर के परदों पर असंख्य भाषाओं में।

मैं विलाप करता हूँ ;
सिर्फ़ कविता में
क्योंकि उससे बाहर विलाप और स्वप्न दोनों के लिए
अब कोई जगह नहीं बची।

2
हम अपनी माँ को दिदिया कहते थे जो उद्धृत कविता की तीसरी पंक्ति में हैं। जितनी सहजता से अशोक उन्हें उसी नाम से अपनी कविताओं में ले आते हैं, मैं कभी नहीं ला पाया। यह इसलिए कि वे उनके बेहद करीब थे। बड़ा बेटा, बेटा होने के साथ माँ का मित्र भी होता है जबकि छोटा बेटा हमेशा ही उसे बहुत पास पर साथ ही बहुत दूरी से देखता है खासकर तब जबकि उसके और माँ के बीच सात अन्य भाई-बहन हों। यह इसलिए भी है कि अशोक के मानस और काव्य में ‘मम‘ और ‘ममेतर‘ के बीच वैसी दूरी नहीं है जैसी हिन्दी के कई समकालीन कवियों के यहाँ है जिसके कारण उनकी कविताओं में वस्तुनिष्ठता भले ही आ जाती हो पर अक्सर रस का वैसा सोता नहीं फूट पाता जैसा अशोक की कविताओं में अक्सर हुआ करता है।

यहाँ अद्वितीय हिन्दी कवि कमलेश की कविताओं को याद करना समीचीन होगा क्योंकि उनकी कविता में उनका ‘मम‘ सूक्ष्म रूप से विस्तृत होकर समूचे ‘ममेतर‘ को अपने में सोख लेता है और इसीलिए वह ‘ममेतर‘ की तरह दिखता हुआ भी होता ‘मम‘ के विस्तार की तरह ही है। और इसीलिए उनकी कविताओं में उपस्थित हुआ संसार महज संसार की तरह अनुभव होने की जगह 'कमलेश-उत्तीर्ण' संसार की तरह अनुभव होता है। अगर महाराज भोज की बात को थोड़ा सा बदलकर कहा जाये तो कविता में ‘मम‘ ही रूपांतरित होकर रस में परिणीत होता है। जिस कविता में ‘ममेतर‘ की ख़ातिर ‘मम‘ को तिरस्कृत किया जाता है, वहाँ रस को सोता सूख जाता है।

संयुक्त परिवार में जीवन बिताने वाले अधिसंख्य लोगों के जीवन में ‘मम‘ और ‘ममेतर‘ का यह विभेद वैसे भी मुश्किल है। ऐसे परिवार में आप कहाँ शुरू होते हैं और कहाँ खत्म, यह अनुभव करना लगभग असम्भव है। हमारा घर न सिर्फ़ ऊर्जस्वित मोहल्ले के बीच बसा था, वह अपने आप में एक भरा-पूरा मोहल्ला ही था। तरह-तरह के लोगों की आवाज़ो से गूँजता हुआ। उसमें अक्सर आन गाँव के लोग, नाते रिश्तेदार रहा करते थे। अगर उसके बाहरी हिस्सों में सार्वजनिक जीवन की हलचलें रहती तो भीतरी अवकाशों में माँ की आत्मीयता ने एक अलग ही संसार रचा हुआ था जिसमें मोहल्ले के गरीब लोग और औरतें अक्सर दिखायी दे जाते। हमारी माँ न सिर्फ अपने नाते रिश्तेदारों की सुख-समृद्धि और आरोग्य के लिए उपवास करती, पास-पड़ोस के लोगों के घर आयी विपत्ति को टालने के लिए भी उतनी ही गम्भीरता से उपवास रखा करती थीं।

घर के सामने नाना-नानी का घर था जो गर्मियों के दिनों में मौसियों, मामाओं और उनके बच्चों से भर जाता था। चूँकि हमारे घर और नाना के घर के बीच सिर्फ़ एक सड़क थी सो गर्मियों के उन दिनों में हमारे घर का मोहल्ला मौसियों, मामाओं और उनके बच्चो के आने से और बड़े मोहल्ले में तब्दील हो जाता। ऐसे संयुक्त पारिवारिक मोहल्लों की विशेषता यह होती है कि उनमें अनेक विचारों के लोग साथ-साथ रहते हैं और वे एक दूसरे से पूरी आत्मीयता से प्रतिकृत भी होते रहते हैं।

ऐसी जगहों में कोई भी किसी का मत परिवर्तन कराने की चेष्टा नहीं करता। हमारे परिवार का कोई सदस्य गाँधी को मानने वाला था, कोई लोहिया को। किसी सदस्य को जयप्रकाश नारायण पर भरोसा था। कोई आस्तिकता में डूबा था, कोई नास्तिक था, कोई आधुनिक विज्ञान में गहरा विश्वास रखता। किसी को भूतों की कहानियां प्रिय थीं (कई बरस पहले तुम्हारे नाना किसी दफ्तरी काम से एक दूसरे शहर गये हुए थे। वहाँ वे एक सराय में ठहरे। सराय की मालकिन पिशाचिन थी। जब तुम्हारे नाना सो गये उसने उनके अंगूठे पर एक धागा बांधा और ...) लेकिन इस सब वैविध्य के बाद भी आमतौर पर कोई किसी की वैचारिक आधार पर अवमानना नहीं करता था। सभी जाति और धर्मों के लोगों को घर के भीतर तेक जाने की अनुमति थी पर इतना ज़रूर था कि परिवार के मुसलमान मित्रों को चीनी मिट्टी के बर्तनों में खाना परोसा जाता था। शायद कोई पुराना ऐतिहासिक घाव था जिसका दर्द मिट चुका था। पर मन पर निशान बाक़ी था।

3
मुझे अब याद नहीं कि यह किसने कहा था पर जिस किसी ने कहा हो, कहा बड़ा उम्दा था: कविताएँ मिलनस्थलियां होती हैं। यह बात समूचे कविता संसार के लिए शायद सही न भी हो पर अशोक की कविताओं के लिए बिल्कुल सही हैं। इनकी कविताएं कई तरह से मिलन स्थलियाँ हैं और कविताओं को बहुस्तरीय पर परिष्कृत मिलन स्थली बनाने में अशोक को महारथ हासिल है। यह उनके काव्य-कौशल का अन्यतम तत्व है। वे अपनी कविताओं के लिए अलग-अलग अन्तःसंगीत (जिसे सूक्ष्म छन्द कहा जा सकता है) इसलिए ढूंढते और आविष्कृत करते हैं क्योंकि इन्हीं के सहारे वे अपनी कविताओं को अलग-अलग तरह से मिलनस्थली बनाने का उपक्रम कर पाते हैं।

इन कविताओं में तमाम तरह की प्रजातियों के जीव-जन्तु निकट आते हैं, तमाम जगहें, तमाम रिश्ते, तमाम कीट-पतंगे, तमाम समय, तमाम कलाएँ, तमाम दृष्टियाँ, तमाम आहार, तमाम व्यवहार, तमाम वृक्ष, तमाम फूल, तमाम देवता, तमाम अवसाद, तमाम विषाद, तमाम अनुपस्थितयां साथ आकर एक दूसरे को आलोकित करने का प्रयास करती हैं और अगर वे एक दूसरे को आलोकित न भी कर पायें तो वे एक दूसरे का स्थान लेने की चेष्टा नहीं करती। कविता को मिलनस्थली बनाकर ही यहां कवि को प्रजापति का ओहदा हासिल होता है। वह अलग-अलग घटनाओं या चीजों या जीवों या भावों को निकट लाकर ही अपना एक अलग ही स्वतन्त्र संसार बुनता है।

4
औबेदुल्लागंज के करीब होशंगाबाद जिले में कुछ दशक पहले प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता श्रीधर वाकणकर ने भीमबेठिका नाम की जगह में ऐसी गुफाएं खोजी थी जिनकी भित्तियों पर  हज़ारों वर्ष पहले आरम्भिक मनुष्य ने शैलचित्र बनाये थे। ये शैलचित्र मानुषी सृजन के आरंभिक दस्तावेज हैं। इनका अध्ययन करने पर कुछ ऐसे तत्वों की ओर ध्यान जाता है जो तब के मनुष्य से लेकर आज के मनुष्य तक की सृजनात्मकता में निरन्तर बने रहे हैं। बल्कि उनके होने से ही किसी कर्म को सृजनात्मक कहने का चलन रहा है। भीमबेठिका की गुफाओं में आखेट के अनेक दृश्य चित्रित हैं, कई जानवरों के, कई ऐसे चित्र भी हैं जिनमें कुछ मनुष्य मिलकर हाथ में हाथ डालकर नृत्य कर रहे हैं। यानी वहां नृत्य संयोजन के भी चित्र हैं। इन सभी चित्रों के बीच वहाँ की भीतरी गुफा में एक अनोखा चित्र है। इसमें सूर्य और मुर्गे की आकृतियों को साथ-साथ बनाया गया है। ये दोनों ही आकृतियाँ एक दूसरे के ठीक बगल में बनी हैं और एक ही चित्रकृति का भाग लगती हैं।

मेरा ख्याल है, यह शैलचित्र आरम्भिक मनुष्य का आरम्भिक संयोजन है। ‘संयोजन‘ शब्द का मैं चित्रकला-शास्त्र के विशेष अर्थ में प्रयोग कर रहा हूँ। यहाँ संयोजन से मेरा आशय ऐसी क्रिया से है जहां दो ऐसी चीजों को, जिनके अलग देशकाल हैं, साथ रखकर एक तीसरा देशकाल उत्पन्न किया जाता है। इस अर्थ में संयोजन सृजन का मूल तत्व है। बिना संयोजन के सृजन सम्भव नहीं है। यह नहीं कि संयोजन मात्र से सृजन की इतिश्री हो जाती हो पर बिना किसी संयोजन के कोई भी सृजन नहीं हो पाता। आरम्भिक मनुष्य अपने चित्रों में ऐसा संयोजन करता था, इससे यह किसी हद तक प्रमाणित हो सकता है कि मनुष्य में हमेशा से ही नया देशकाल रचने की आकाँक्षा रही है। वह जिस देशकाल में रहता है, उससे अलग और स्वतन्त्र देशकाल यानी एक नया संसार रचना चाहता रहता है। उसे प्रदत्त देशकाल से संतोष नहीं होता। वह प्रदत्त देशकाल से इतर, प्रदत्त संसार से इतर संसार रचना चाहता है। यह आकाँक्षा ही साहित्य का मूल है। दुर्भाग्य से यह आकांक्षा ही तमाम यूटोपियाओं की भी जड़ में है जिनके वशीभूत न जाने कितने लोग सदियों से छले जाते रहे हैं।

अशोक की कविताएं न सिर्फ संयोजन करती हैं (जिनके बिना वैसे भी कविता सम्भव नहीं) बल्कि संयोजन की प्रक्रिया को पूरी नाटकीयता के साथ रेखांकित भी करती हैं। वहां सिर्फ़ सृजन ही नहीं, सृजन की प्रक्रिया को भी पूरी पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत किया जाता है। दूसरे शब्दों में वे सृजन को सम्भव करते समय सृजन-प्रक्रिया की गाथा भी गाती चलती हैं।

5
भारत में विभिन्न कलाओं को साथ लाने और उनके बीच जीवन्त संवाद स्थापित करने का जितना सृजनात्मक, बौद्धिक और सांस्थानिक उद्यम अशोक ने किया है, किसी और ने नहीं किया। उन्होंने इसके सैद्धान्तिक आधार को रेखांकित करने तमाम निबन्ध लिखे, इसके प्रति संवेदन जगाने की दृष्टि से (भले ही सचेत रूप से नहीं) कई कविताएँ लिखीं और इसे ठोस भौतिक आधार देने कई संस्थाओं का निर्माण किया। वे बीसवीं सदी के उन बिरले कवि-बौद्धिकों में हैं जिन्होंने आधुनिकता के सन्दर्भ में हमारी सभ्यता में हुए कुछ मूलभूत बिखरावों पर ध्यान एकाग्र कर उन्हें दूर करने का पूरे मन से यत्न किया है। उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया है कि आधुनिक भारत में शिक्षा व्यवस्था और विशेष ढंग की सांस्कृतिक संस्थाओं के कारण विभिन्न कलाओं के बीच का पारम्परिक संवाद टूट गया है।

इसे दूसरे शब्दों में इस तरह कह सकते हैं कि उन्होंने देखा कि उपनिवेशवाद के कारण जो आधुनिक संस्थाएं देश में स्थापित की गयी और जिनके कारण, कम से कम शहरी समाज को पुनर्विन्यस्त किया गया, उससे विभिन्न कलाओं का संयुक्त परिवार बिखर गया है। कलाओं के इस बिखरे हुए संयुक्त परिवार को नयी शर्तों के साथ (जिनमें आधुनिक विश्व की कुछ मान्यताओं का स्वीकार था और कुछ का तिरस्कार) दोबारा संयोजित करने में जिस स्तर का उपक्रम उन्होंने किया है, वह अपने में अनूठा है और इसीलिए उसके सामने उनपर उठने वाले तमाम वाममार्गी आरोप छिछले जान पड़ते हैं।

उन्होंने कोशिश की कि विविध कला विधाओं के व्यवहर्ता साथ आयें, विविध विचार परम्पराओं के लोग साथ आयें और उनके बीच गहन सम्वाद हो। यह करने में वे बहुत हद तक सफल भी हुए पर जैसा कि बिल्कुल ही स्वभाविक था कि उन पर एक विचारधारा को ही मानों मुक्ति की एकमात्र राह मानने वाले लेखकों आदि ने तरह-तरह के आरोप लगाये और फिर राजनीतिक रूप से सशक्त कुछ ऐसे लोगों के साथ मिलकर जो स्वयं भी एक ही विचारधारा को भारत मुक्ति की एकमात्र राह मानते थे, अशोक के कम से कम सांस्थानिक कार्य को जितनी हो सके, क्षति पहुंचायी। विचारों के संयुक्त परिवारों को सहने की इन दोनों ही तरह के लोगों में सामर्थ्य नहीं थी और इसीलिए ये दोनों ही तरह के लोग, मेरी दृष्टि में, भारतीय समाज के स्वभाव के विपरीत हैं। और उसके लिए बड़ा तो नहीं पर छोटा-मोटा ख़तरा ज़रूर हैं।

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'मैं विलाप करता हूँ'
वे अपनी इस कविता में इसलिए विलाप करते हैं कि वे उत्तर औपनिवेशिक आधुनिक भारत में वह करने का प्रयत्न करते रहे जो उत्तर औपनिवेशिक आधुनिक भारत में उसकी अपनी राजनीति, सामाजिक प्रक्रियाओं और ज्ञान परियोजनाओं के कारण सम्भव ही नहीं है; वे विचारों का संयुक्त परिवार परिसर बनाने की कोशिश करते रहे, वे कलाओं का संयुक्त परिवार परिसर बनाने की कोशिश करते रहे और वे एक ऐसा संयुक्त घर बनाने की कोशिश करते रहे जिसमें रहते दिदिया-काका, अम्मा-दादा, बाबा/ऋभु के साथ...

यह सब बनाने के लिए एक नहीं कई अशोकों की आवश्यकता होगी जो कलाओं के क्षेत्र में ही नहीं, वैचारिकता के क्षेत्र में ही नहीं, राजनीति, समाज विज्ञान, आधुनिक विज्ञान, धर्म आदि अनेक क्षेत्रों में एक साथ काम कर सकें। लेकिन जो समाज अपनी राह पर चलने की जगह कभी सोवियत रूस की राह पर चलाया जाता रहा हो, कभी अमरीका की उसमें ऐसे लोग सक्रिय होंगे भी कैसे ? तो क्या अशोक के प्रयासों को पूरी तरह निष्फल मानना होगा ? क्या उनका यह विलाप उनकी विफलता की सम्पूर्णता को रेखांकित करता है ? क्या वे पूरी तरह विफल रहे हैं ?

बिल्कुल नहीं। वे जो कुछ जमीन पर बनाने में पूरी तरह सफल न हो सके (हालाँकि यह कहना होगा कि यहाँ भी वह अंशतः सफल रहे हैं), उसे उन्होंने शब्दों में, अपनी कविताओं में पूरी तन्मयता से, पूरे सौन्दर्य के साथ निर्मित किया है। उन्होंने अपनी कविताओं में कलाओं के, विचारों के, विभिन्न नाते-रिश्तेदारों और मित्रों, विभिन्न उपस्थितियों और अनुपस्थितियों के संयुक्त परिवारों को पूरी बारीकी के साथ, पूरी संगीतमयता के साथ बनाया है और अपने बनाये इस भव्य और बहुस्तरीय संयुक्त परिवार परिसर में वे स्वयं और उनके सम्वेदनशील पाठक पूरे ठाठ से विचरते हैं।

7
यह शुभकामना निबन्ध है, अशोक के सत्तरवें जन्मदिन के लिए लिखा गया। मुझे अपने भाईयों के पाँव छूने की आदत नहीं है (पता नहीं क्यों मैं सिर्फ़ बहनों और भाभियों के पांव छूता हूँ) पर मैं इस निबन्ध के अन्त में अशोक के पांव छूते हुए उनके दीर्घजीवी होने की शुभकामना करता हूँ।
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Saturday, January 08, 2011

नए कवि : अम्बर रंजना पाण्डेय की कविताएं


[कविता अगर भाषा के साथ-साथ कवि-कर्म की भी स्मृति है, तो अम्बर रंजना पाण्डेय की कविताएं अपने पीठ पीछे कविता की श्रेष्ठ परंपरा की सहचर है. एक उपलब्ध काव्य-भाषा और भंगिमा से दूर जाने के इस कवि-प्रयत्न की भिन्नता और सार्थकता असंदिग्ध है. अनेक शब्दों और छंदों का पुनर्वास इस युवा कवि की कविताओं में सुहानेवाली ताजगी पैदा करता है. आगे अम्बर की कविताएं हैं. वे किसी पत्रिका में इस तरह पहली ही बार छप रहे हैं. वक़्त -वक़्त पर उनका और काम भी सामने आएगा. साथ में दी गई चित्र-कृति रवि वर्मा की है. ]





केश धोना
(परिचय)

शिशिर दिवस केश धो रही थी वह, जब मैंने
उसे पहली बार देखा था भरे कूप पर.
आम पर बैठे शुक-सारिकाएँ मेघदूत
के छंद रटते रटते सूर के संयोगों
भरे पद गाने लगे अचानक. केश निचोड़
और बाएं हाथ से थोड़े से ऊँचे कर
उसने देखा और फटी धोती के टुकड़े
से पोंछ जलफूल उठी नील लता सी. चली.
दो चरण धीमे धरे ऐसे जैसे कोई
उलटता पलटता हो कमल के ढेर में दो
कमल. कमल, कमल, कमल थे खिल
रहें दसों दिसियों. कमल के भीतर भी कमल.

केश काढना
(झगड़ा)

श्यामा भूतनाथ की ; केश काढती रहती
हैं. नील नदियों से लम्बे लम्बे केश
उलझ गए थे गई रात्रि जब भूतनाथ ने
खोल उन्हें; खोसीं थी आम्र-मंजरियाँ
काढतें काढतें कहती हैं 'ठीक नहीं यों
पीठ पर बाल बिथोल बिथोल फंसा फंसा अपनी
कठोर अंगुलियाँ उलझा देना एक एक
बाल में एक एक बाल. मारूंगी मैं
तुम्हें, फिर ऐसा किया तुमने कभी.
देखो कंघा भी धंसता नहीं
गाठों में'. 'सुलझा देता हूँ मैं', कह
कर उसने नाक शीश में घुसा
सूंघी शिकाकाई फलियों की गंध.
'हटो, उलझाने वाले बालों,
जाओ मुझे न बतियाना.' भूतनाथ ने
अंगुली में लपेट ली फिर एक लट.

सिन्दूर लगाना
(डपटना)

छोटे छोटे आगे को गिरे आते चपल
घूँघरों में डाली तेल की आधी शीशी ,
भर लिया उसके मध्य सिन्दूर और ललाट
पर फिर अंगुली घुमा घुमा कर बनाया उसने
गोल तिलक. पोर लगा रह गया सिन्दूर
शीश पर थोड़ा पीछे; जहाँ से चोटी का
कसा गुंथन आरम्भ होता हैं, वहां पोंछ
दिया. उसे कहा था मैंने 'इससे तो बाल
जल्दी सफ़ेद हो जाते हैं.' हंसी वह. मानी
न उसने मेरी बात. 'हो जाए बाल जल्दी
सफ़ेद. चिंता नहीं कल के होते आज हो
जाए. मैं तो भरूंगी खूब सिन्दूर मांग
में. तुम सदा मुझ भोली से झूठ कहते हो.
कैसे पति हो पत्नी को छलते रहते हो
हमेशा. बाल हो जायेंगे मेरे सफ़ेद
तो क्या? मेरा तो ब्याह हो गया हैं तुमसे.
तुम कैसे छोड़ोगे मुझे मेरे बाल जब
सफ़ेद हो जांयेंगे. तब देखूंगी बालम.'
****
स्पर्श
१.
दोपहर का खजूर सूर्य केएकदम निकट
पानी बस मटके में
छांह बस जाती अरथी के नीचे

आँखों के फूल खुलने खुलने को
थे जब
तुमने देखा
शंख में भर गंगाजल भिंगोया शीश

कंधे भींग गए और निकल गया
गुलाबी रंग
सांवले कंधे और चौड़े हो गए
भरने को दो स्तनों को ऊष्ण
स्वेद से खिंचे हुए
खिंचे हुए भार से

पत्थर पर टूटने को और जेल में
कास लेने को
जब निदाघ में
और और श्यामा तू मुझमें एक हुई
पका, इतना पीला
कि केसरिया लाल होता हुआ
रस से
फटता, फूटा सर पर खरबूज
कंठ पर बही लम्बी लम्बी धारें

मैं एकदम गिरने को दुनिया की
सबसे ऊंची ईमारत की छत से

कि अब गिरा अब गिरा अब मैं

अब गिरा
रेत की देह.

२.
तुमने मुझे छुआ पहली बार
और फल पकने लगा भीतर ही भीतर
सूर्य पर टपकने लगी
नीम्बू की सुगंध
जिसमें वह कसमसा रहा हैं अब तक

छटपटा रहीं हैं मछली की पूँछ
जैसे दुनिया
धूज रहा हूँ मैं बज रहीं हैं हड्डियाँ
यह वहीँ हड्डियाँ हैं
जो तुमसे मिलने के बाद
पतवार सी छाप छाप करती हैं
शरीर नौका हो गया हैं

''छूना जादू हैं'' हज़ारों हज़ारों बार
इस बात को दोहराता हूँ मैं
मुझे दोहराने दो यह, तुम
यदि डिस्टर्ब होते हो

तो मुझे गाड़ दो ज़मीन में
या धक्का दे दो किसी खाई में

मेरी आँखें खराब हो चुकी हैं. कानों
को कुछ सुनायी नहीं देता.
मैं कुछ सूंघ नहीं पाता मोगरे के
अलावा. नमक और गुड का अंतर
ख़तम हो गया हैं मेरे लिए

मैं बस छू पाता हूँ. तुम मुझे छुओं
इस छूने के लिए मैं जल चुका हूँ
पूरा का पूरा.
****
लखुंदर

नदी में दोलते है सहस्रों सूर्य,

स्वच्छ दर्पण झिलमिला रहा हैं.

मुख न देख
पाओगी तुम स्नान के पश्चात्,
छांह ज्यों ही पड़ेगी
सूर्य का चपल बिम्ब घंघोल
देगा आकृति,
पुतलियाँ ही दिखेंगी तैरती मछलियों सी,

इस वर्ष वर्षा बहुत हुई है इसलिए
अब तक ऊपर ऊपर तक भरी है नदी.

पूछता हूँ
'नदी का नाम लखुंदर कैसे
पड़ गया?'
युवा नाविक बता नहीं पाता
'लखुंदर' का तत्सम रूप
क्या होगा...

नांव हो जाती है
तब तक पार
दिखती हैं मंदिर की ध्वजा

अगली बार
'नहाऊंगा नदी में' करते हुए संकल्प
चढ़ता हूँ सीढियां.

पीछे जल बुलाता हैं.
****
महानदी

मध्यदेश का सीना
ताम्बई, स्थूल व रोमिल. पड़ी
है महानदी उस पर,
पहनकर वनों की मेखला
घिसे रजत की श्याम

द्रोण के सूती नीलाम्बर से
ढंके देह मेदस्वी,
बाट जोह रही सूर्ज की.

मछलियाँ पेट में कर
रही है निरंतर उत्पात. दिनों
से मछुआरों का दल
नहीं आया. उदबिलावों
का झुण्ड ही उदरस्थ
करता हैं शैतान मछलियाँ पर
यह तो सहस्र हैं. अब
सहन न होती यह चपलता.

कब आएँगी यहाँ
घनचुम्बी पालों वाली नांवें,
डालेंगी जाल, तब
आराम से सोऊँगी मैं.

कीच में गिरी गेंद
सी मैली और बैचैन महानदी
पार की छत्तीसगढ़
में, जाता था जब बंगाल.
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