Monday, November 29, 2010

अलक्षित : 1


मदन की उत्‍प्रेक्षा

आलोचना में ऐसा उद्यम विरल होता जा रहा है जब वह अपनी अंतरंगता में प्रखर और प्रखरता में ललित (निबंध नहीं !) हो जाए. जब वह कृति और कृतिवाह्य अर्थ सन्दर्भों में प्रवेश कर उसकी व्याख्या और पुनर्रचना का प्रयत्न साथ-साथ करे. जिसमें पारंपरिक प्रत्यय पुनराविष्कृत होकर नई अर्थाभा से चमक उठें और नए प्रत्ययों की प्रतिध्वनि सुनाई पड़े. जो अपने सामने महज ''एक कृति का आकलन करने से बढ़कर'' चुनौतियाँ स्वीकार करे और साहस किसी फैशन में नहीं जोखिम उठाने की गरज से करे. आलोचना का ऐसा विरल, गंभीर और दायित्वपूर्ण उद्यम मदन सोनी एक लम्बे अरसे से कर रहे हैं और इसका साक्ष्य उनकी चौथी आलोचना पुस्तक 'उत्प्रेक्षा' भी है. हालांकि इस पुस्तक की ओर भी हिंदी साहित्य के पुराने रस्मोरिवाज़ के तहत न बहुत ध्यान है न ध्यान दिलाने की चेष्टा. उसकी एक वजह संभवतः उसमें हिंदी के अन्यथा आदरणीय प्रेमचंद, अज्ञेय, विनोद कुमार शुक्ल के अलावा फ़क़त 'भोपाल स्कूल' के अशोक वाजपेयी, कृष्ण बलदेव वैद, रमेशचंद्र शाह, वागीश शुक्ल, गगन गिल की कृतियों के पाठ का शामिल होना भी हो. प्रेम कविता, स्त्री, कबीर वगैरह तो हैं ही, हिंदी बाहर रविन्द्रनाथ और हिंदी साहित्यिक हलकों के लिए अस्पृश्य 'एड्स' पर भी एक निबंध है. कहना कठिन नहीं कि मदन ने पुस्तक का नाम उत्प्रेक्षा क्यों रखा है. 'उत्प्रेक्षा' एक अलंकारिक पदावली है, जिसका अर्थ है किन्हीं दो भिन्न वस्तुओं में एकत्व की सम्भावना का निदर्शन. मदन इस परम्परित अर्थ को कुछ वसी करते हैं. वे इसमें ''उस समस्त कृतित्व को शामिल मानकर इस शब्द का उपयोग कर रहे हैं जिसे भाषा में रचा गया है और जहां से आत्यंतिक रूप से भिन्न वस्तुओं को उनकी भिन्नता के प्रति बेखबर न रहकर इस तरह बरता जाता है मानो वे एक हों''. मेरे ख़याल से यह बर्ताव अनूठा है. यह दरअसल हिंदी में मौजूद सोच की उस फांक पर एक करारी चोट भी है जिसके तहत प्रेमचंद के बारे में ही क्यों अज्ञेय/ मुक्तिबोध / शमशेर / नागार्जुन के बारे में एक खास काट (डिजाइन) में या तबका ही बात कर सकता है. मदन अपनी पहली पुस्तक 'कविता का व्योम और व्योम की कविता' में आलोचना के इस जागरूक विवेक से हमें परिचित करा चुके हैं. बाद की पुस्तकों में उसमें और प्रौढ़ता आई है. इस अवधि में उनसे असहमति भी बढ़ी है. किंतु उनकी आलोच-क्रिया में रचना (कार से भी ) एकत्व स्थापित करने का सयाना विवेक हमेशा असहमति को साथ रखकर उन्हें पढ़ने के लिए न्योतता रहा है. इसी एक बिंदु पर मुझे लगता है कि गुंजाइश, लोच, सहिष्णुता की दरकार अब दुतरफा है.जैसे यहां तक आते आते मुझे अपनी यह असहमति ज़ाहिर करनी चाहिए कि मदन के विवेचन में 'स्फीति' बहुत है. जिसे कुंवर नारायण बेहतर शब्दों में 'कवि-दृष्टि का अभाव' कहते हैं, वह है और उनको नजदीक से फ़ॉलो करने वाले शायद इस बात की भी ताईद करें कि यह अब उनका लाइलाज आलोचकीय आचरण बन चुका है.दूसरी बात यह कि बाहर के जिन विद्वानों के सन्दर्भ अब दिए जाते हैं, आलोचना में रूचि रखनेवाले विज्ञ पाठक को उनके बारे में अब इंटरनेट या पुस्तकों की आसन पावती की वजह से कुछ पहले से भी पता रहता है. इसलिए वे सन्दर्भ क्षिप्रतर हों तो क्या ही अच्छा.

(यह टिप्पणी कॉलेज के दिनों में अशोक वाजपेयी से संयोगवश हुई मुलाकात के बाद 'उत्प्रेक्षा 'की उनकी प्रति मांग लेने के अपने युवकोचित उत्साह और अशोक जी द्वारा बिना किसी संकोच के इसे मेरे हाथ में रख देने की अच्छी याद के नाम।)

चित्राक्रिती : सल्‍वादोर दाली

Friday, November 19, 2010

कथा : २ : हिमांशु पंड्या की कहानी



Image : Rajesh R. Nair
पञ्च परमेश्वर : भाग दो

एक समय की बात है .एक गाँव था ,गाँव का नाम था खारिया खंगार .गाँव में एक मनुष्य रहता था जिसका नाम था हू. हू के पास एक बकरी थी .बकरी क्या थी ,पूरे गाँव की शान थी .सालाना बकरी मेले में उसे पुरस्कार भी मिला था .हू को वह बकरी बहुत अजीज़ थी .सुनहरा पीला रंग,पुष्ट शरीर,उसके कान के रोयें सुनहरी आभा बिखेरते थे और जब वह इठलाकर बोलती ,"म्है है है... "तो लगता मानो किसी प्रेमिका ने आवाज़ लगाई हो .

....पर एक बात थी .उस बकरी के खुर टेढ़े थे .सामान्य बकरियों से थोड़े अलग (गो कि इससे उसकी चाल बाधित नहीं हुई थी बल्कि उसमें चार चाँद लग गए थे). गाँव के कुछ लोगों को वह बकरी अपशकुन लगती थी .उन्हें लगता था कि इसका मूल कारण यह था कि उस बकरी की नस्ल में कुछ संकरता थी.वे उसे गाँव के लिए श्राप मानते थे और गाँव पर यदा कदा आयी आपदाओं के लिए उसे जिम्मेदार मानते थे .

धीरे धीरे इन लोगों का विरोध बढ़ता गया और यहाँ तक पहुचा कि उस बकरी की मौत ही गाँव की भलाई का एकमात्र हल थी .इन्हीं लोगों द्वारा दावा किया गया कि दरअसल उस बकरी पर असली हक क्वै का था क्योंकि बकरी के परदादा दरअसल क्वै के परदादा के बकरे थे .इसे जांचने का कोई ठोस आधार नहीं था क्योंकि हू की बकरी की परदादी के जमाने में गाँव में कई बकरे थे और अब पितृत्व की पहचान करना असंभव था .

क्वै और उसके साथियों ने आसपास के चालीस गावों में मुनादी करवाई कि यदि हू अपनी बकरी उसे नहीं सौपंता तो वे इकठ्ठे होकर उसकी बलि का अनुष्ठान करेंगे .गाँव नए सिरे से बसा ,उसके बाद से बलि प्रथा गैरकानूनी थी और वैसे भी बकरी हू की थी सो वो निश्चिन्त था कि गाँव मिलकर इस बलि को नहीं होने देगा .

...बलि हुई .खूब तंत्र मंत्र अनुष्ठान हुए .बड़े बड़े तांत्रिक ओझा आये जिन्होंने बकरी के वध के ऐतिहासिक महत्त्व को बताया और बताया कि आज एक ऐतिहासिक गलती सुधार ली गयी है .खुद बकरी को भी पता नहीं था कि वह पूरे गाँव की शान्ति और सद्भाव के लिए इतना बड़ा खतरा थी .जब उसे वधस्थल पर खडा कर उसके साथ जुड़े श्राप की महागाथा सुनाई गयी तो जवाब में बकरी ने एक ही बात कही -"म्है है है... "

असली लड़ाई बकरी की मौत के बाद शुरू हुई .अनुष्ठान समिति अपने यज्ञस्थल पर इस यज्ञ और पौरोहित्य की गाथा वाला एक स्मारक चाहती थी जबकि हू की चाह थी कि यहाँ उसकी प्यारी बकरी की याद में एक स्मारक बने .
इसके बाद की कहानी दंतकथाओं के इतिहास में बदल जाने की कहानी है .पंचायत ने फैसला दिया कि यह बकरी क्वै की ही थी क्योंकि गाँव के सब लोग मानते थे कि हू की बकरी के परदादा क्वै के बकरे थे .पंचायत के फैसले में बलि का कोई ज़िक्र नहीं था और पंचायत का यह दावा कि -सारा गाँव यह मानता है -भी खासा संदेहास्पद था .एक और समय पर, एक और मसले में जब यह कहा गया था कि पूरा गाँव ऐसा मानता है तो उस गाँव के एक पुराने शायर पाश ने कहा था कि मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो .

हू का बेटा ध्री इससे खासा बेचैन था .उसे बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा था कि सारे गाँव के कहने से उसकी बकरी की बलि जायज़ कैसे हो गयी जबकि गाँव में बलि गैरकानूनी थी ! गाँव खामोश था .एक आम राय थी कि जो हुआ सो हुआ ,कम से कम अब तो शान्ति है ,आखिर वधस्थल के कोने में हू को भी छोटी सी जगह दे ही दी गयी थी .सबसे बड़ी बात जो हर हलके से कही जा रही थी -आखिर वो एक बकरी ही तो थी !

ध्री के लिए वह सिर्फ बकरी नहीं थी .उस बकरी की उम्र ध्री के बराबर ही थी , वह उस बकरी के साथ खेलकर ही बड़ा हुआ था .उसे बकरी के साथ की सारी किलकारियां ,अठखेलियाँ याद थीं और उससे भी ज्यादा उसे उसका क़त्ल याद था .वह पंचायत से चीखचीख कर कहना चाहता था कि अब जब जब उसे अपनी बकरी याद आयेगी उसका क़त्ल भी याद आयेगा और आज शायद पंचायत उसके हत्यारों को सजा देकर उस क़त्ल की कड़वी यादों से उबरने का उसे मौका दे सकती थी लेकिन उसके क़त्ल पर चुप्पी साध लेने से अब वह क़त्ल उसके जेहन में अमिट रूप से अंकित हो गया था . ध्री चीख चीख कर कहना चाहता था कि बकरी का क़त्ल तब नहीं हुआ था बल्कि अब पंचायत ने उसका क़त्ल कर दिया था पर उसकी बात समझने वाला कोई नहीं था .आखिर वह एक बकरी ही तो थी ,पूरे गाँव की शान्ति और सद्भाव से बढ़कर तो न थी .

ध्री लगातार इधर उधर भटकता रहता .उसे लगता कि आज तक जिन बातों पर उसका ध्यान नहीं गया था वहां भी बहुमत सच और झूठ का फैसला कर रहा था .गाँव के बाहर ३७० गज दूर लो के ऊपर पूरे गाँव के कपडे धोने की जिम्मेदारी डाल दी गयी थी क्योंकि नदी का वो कोना सबसे साफ़ था .कुछ ताकतवर लोग नदी को रोक कर गाँव के गरीबों को पानी से महरूम कर रहे थे और गाँव की पंचायत ने उनकी गुहार अनसुनी कर दी थी . गाँव के बाएं कोने में सात बहनें जमींदार और उसके गुंडों के बलात्कार का शिकार हो रही थीं .गाँव कुछ तो जानकारी के अभाव में और कुछ सहमकर चुप था पर अब तो गाँव की पंचायत ने भी मुहर लगा दी थी कि कि लोगों के मानने से ही तय होगा कि क्या सही है और क्या गलत .कौन थे ये लोग और किसकी थी ये पंचायत ? ध्री को लगता कि गाँव की खाप पंचायत की यह बात भी अब मान लेनी होगी कि कोई अपनी मर्जी से न प्रेम कर सकता है न शादी . तांत्रिक और ओझा गाँव के भाग्य निर्धारक हो गए थे .

एक अंधेरी शाम ध्री ने गाँव को छोड़ देने का फैसला किया .हू के रोकने का उसपर कोई असर नहीं पडा .असल में हू के अलावा उसे रोकने वाला कोई था भी नहीं .जो कुछ लोग उसे रोकना चाहते थे उनके पास उसे रोकने की कोई ठोस वजह नहीं बची थी .उनके पास ध्री के सवालों के जवाब नहीं थे .

दरअसल खारिया खंगार अब वह खारिया खंगार बचा भी नहीं था .जब पञ्च अलगू चौधरी और जुम्मन शेख होते थे तब उस गाँव की फिजा और ही थी , आज की पंचायत में वैसे पञ्च नहीं थे .वे लोग जो ध्री के सवालों के जवाब नहीं दे पाए उन्होंने जवाब अब कहीं और तलाशने शुरू कर दिए थे .गाँव में इसके निशाँ दिखने लगे थे .गाँव के बाहरी कोने पर लगा एक पोस्टर इसकी गवाही देता था .पोस्टर पर लिखा था ," pity the nation that needs to jail those who ask for justice ,while communal killers, mass murderers, corporate scamsters, looters,rapists, and those who prey on the poorest of the poor , roam free ."

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(१२-१३ नवम्बर,२०१० को उदयपुर में मीरा कन्या महाविद्यालय और सुखाडिया विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में एक सेमीनार हुआ था -'विज्ञान,समाज और स्वतंत्रता '। इसमें पर्चे के रूप में यह कहानी पढी गई थी । पर्चा प्रज्ञा जोशी और हिमांशु द्वारा संयुक्त रूप से पढ़ा गया था । अलबत्ता , इसे हिमांशु की पहली प्रकाशित कहानी मानने में कोई हर्ज़ नहीं। इस स्तंभ में पहले आप उदयन वाजपेयी की कथा-कृति पढ़ चुके हैं। ऊपर का चित्र यहां से। )

Monday, November 01, 2010

निगाह से जन्म लेते हैं दृश्य



{ आगे व्योमेश शुक्ल की नई कविताएं दी जा रही हैं. इनमें से अंतिम चार को कवि के शब्दों में उनकी असमाप्य कविता 'मैं रहा तो था' के हिस्से की तरह पढ़ा जाना चाहिए. सूचनार्थ यह भी निवेदित है कि इस कविता का प्रथम प्रकाशन सबद पर हुआ था और दूसरी बार जब यह आशुतोष भारद्वाज द्वारा संपादित 'कथादेश' के 'कल्प कल्प का गल्प' शीर्षक विशेषांक में छपी तो उसमें तीन नए हिस्से जोड़े गए. आखिरी तीन हिस्से वही हैं. 'अलावा' शीर्षक से छपा हिस्सा पहली दफ़ा छप रहा है.

निजी बनाम पोलिटिकल / कला बनाम कमिटमेंट / क्राफ्ट बनाम कंटेंट का आनुपातिक अनुमान लगा कर कविता लिखने और जांचने वाली बुद्धि के लिए हिंदी के नए कवि ऐसी ही कविताओं से दिक्कत पेश कर सकते थे. व्योमेश उस बहुत छोटी सी जमात से हैं, जिन्होंने ऐसा सफलतापूर्वक किया है. व्योमेश के यहां यह करना कुछ अधिक दीप्त इसलिए है, क्योंकि उन्होंने लगभग असंभव, बेसंभाल और किसी सुविधा / शब्दाभाव / जल्दबाजी में जिसे हम 'आवां-गर्द' कहते हैं, उसे अप
नी कविता में एक सतत, सजग और संयंत जैविक और बौद्धिक अन्तर्क्रिया से पाया है. उनकी कविता इसलिए प्रथम दृष्टया अभिव्यक्ति के खतरे उठाने से ज़्यादा बड़ी आकांक्षा से लिखी हुई कविता जान पड़ती है.


चित्र-कृति मधुमिता दास के कैमरे से.}



कुछ का कुछ

ग्लेशियर बाद में गलते हैं
और हिमालय प्रेस नाम का हिंदी छापाख़ाना पहले बंद हो जाता है
पंचम राम समेत बारह कम्पोज़ीटर और प्रूफ रीडर अकालनिवृत्त हो जाते हैं
यों, बग़ैर कलफ़ के साफ़ धोती-कुरता पहनने वाली एक दर्जन साइकिल नागारिकताएं किसान बना दी जाती हैं मज़दूर बना दी जाती हैं और कुछ के बारे में पता नहीं है कि वे क्या बना दी जाती हैं

नागरिकता जैसियों को ज़रूर कुछ का कुछ बना दिया जाता है

आइन्दा वे कुछ और बना दी जायेंगी
सत्तर के शहर को तेल लेने भेज दिया जाएगा

मेले में मूँगफली बेचने लगता है लेटरप्रेस में सही वाक्य संभव करने वाला आविष्कारक वैज्ञानिक कम्प्यूटर नहीं सीख पाता
अश्लील भोजपुरी में गर्क़ होने को है भाषा की शख्सियत
यहीं टूटने थे खड़ी बोली के गुम्बद
यहीं बक सकता था गाली दारोग़ा - माँ की, बहन की, दुनिया के सभी भाइयों और बेटों और प्रेमियों को
यहीं बनना था आस्था को सबसे बड़ा तर्क
यहीं तय होने थे हिन्दू-मुसलमान, आदमी-औरत, ज़्यादा आदमी और कम औरत, काव्यात्मक-अकाव्यात्मक के फ़र्क़

और जब सब तय हो ही गया है तो दारोग़ा का नाम भी बता दिया जाना चाहिए क्योंकि इतने नुक़सान के बाद एक नाम आख़िर किसी चीज़ का और कितना नुक़सान कर सकता है

तो दोस्तो,
दारोग़ा का नाम है
विभूति नारायण राय

****
कार्य-कारण


शायद किसू के दिल को लगी उस गली में चोट
मेरी बग़ल में शीशा ए दिल चूर हो गया

पन्त जी की कविता चींटी पढ़ाने के कुछ मिनट बाद

दिखती है चीटियों की कतार एक लड़की की आँख में - पहली चमक-सी चमक पैदा करती हुई
यह कविता का समझा जाना हो सकता है
या एक अन्य कविता की शुरूआत
यह ख़ात्मा हो सकता है कविता का
या ख़ात्मे का ख़ात्मा

लोग कहते कुछ

और करते कुछ हैं
और जब यह बात कार्य-कारण-संबंध की तरह नियम बन गई है,
कुछ लोग जो कहते हैं
वही कर देते हैं

मैं उसकी ओर देखता हूँ तो वह भी देखती है मेरी ओर

मैं इस संसार की सर्वाधिक निर्जीव और जड़ चीज़ों की ओर देखता हूँ - लोहे की पाइप, कटे हुए बाल, गाड़ी की स्टीयरिंग, धम्मेख स्तूप और आनंद के तलवे की तरफ़, तो न सिर्फ़ ये चीज़ें भी मुझे देखती हैं,
वह भी घूरने लगती है मुझे

लिखता है कवि अपने छन्द में

और मुझ तक पहुँचता है वह गद्य के सबसे रुक्ष उदाहरण की तरह

जो बातचीत बहुत बहक कर की जानी थी

वह कमबख्त वस्तुनिष्ठ हो जाती है फ़ोन पर
और यह नीच ट्रैजिडी भी जुड जाती है दोस्ती के गड़बड़-सड़बड़ हिसाब-किताब में

बिल्ली रास्ता काट जाया करती है
प्यारी-प्यारी औरतें हरदम बकबक करती रहती हैं
चांदनी रात को मैदान में खुले मवेशी
आकर चरते रहते हैं

और प्रभु यह तुम्हारी दया नहीं तो और क्या है
कि इनमें आपस में कोई संबंध नहीं


( अंतिम 6 वाक्य रघुवीर सहाय की एक मशहूर कविता से ले लिये गये हैं. कवि हमेशा की तरह उनका कृतज्ञ )
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जैसे वैसे

जैसे फ़ोन पर किसी को पता नोट करा रहे हों और अंग्रेज़ी के 'V' से कोई शब्द शुरू करना हो
जैसे 'Varanasi' से शुरू करना हो
जैसे बहुत बोल-बोल कर नोट कराना हो अपना पक्ष, कि घटना ऐसे नहीं वैसे हुई थी
और जो नहीं हुआ वह होकर रहेगा

वैसा

धूल से साँवला घुटना
हवा के निर्भार में एक अप्रतिम 'V' बनाता हुआ
किसी बेहद क़िस्म के मूल की परछाई
और मूल भी इसी परछाई से पैदा हुए होंगे

मूल परछाइयों से ही जन्म लेते हैं
निगाह से जन्म लेते हैं दृश्य
सपने में पानी बरसता है तो लगता है नींद में बरस रहा है
और सुबह कोई किसी से पूछता है...

'कल पानी बरसा था ?'
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दृष्टान्त

1. मरने से काफ़ी पहले किसी ने देख लिया होगा वह पेड़ जिसकी लकड़ियों से बनेगी उसकी चिता 2. आगे की सड़कों पर लगने वाले ट्रैफ़िक जाम कुछ लोगों को पहले ही मालूम हो जाते हैं 3. नितांत चालू हिंदी फ़िल्मों में आए दुख में कई बार बिल्कुल अपने-अपने आँसू देखे हैं ज़िन्दगी की हेरोइनों ने.

इन लचर दृष्टान्तों के आधार पर कम से कम कविता में कहा जा सकता है कि उसने तुम्हें देख लिया होगा तुम्हें देखने से पहले,
जैसे एक बार तुम्हें देख लिया था तुम्हें देखने के बाद

दरअसल इस सारे फ़साने में पहले और बाद का कोई चक्कर ही नहीं है, कहाँ से पहले और कहाँ के बाद ?
कभी लगता है कि सारी गाड़ियां पहले ही छूट चुकी हैं
और कभी यह कि अपना वक़्त अभी आया ही नहीं

इसलिए अगर कोई ऐसी किसी भाषा में कुछ सोचने या लिखने लगे जिसमें 'अतीत' और 'आगामी' जैसे शब्द एक ही अर्थ देते हों तो ज़्यादा दिक़्क़त में पड़ने की ज़रूरत नहीं है, ज़्यादा से ज़्यादा यही न होगा कि 'आगामी' का झंझट करते हुए वह 'व्यतीत' को भी साँसत में डाल देगा, तो डाल दे, हमें इससे क्या लेना-लादना? वह अपने रास्ते हम अपने रास्ते. उसके वाक्यों में तो क़दम-क़दम पर इतने संशय कि वह अगर लिख रहा हो तो उसके ही मुहावरे में 'वह कुछ और कर रहा है.'
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अलावा

उसमें देखने के अलावा भी था. उसमें मुस्कराहट के अलावा भी था. उसमें न देखने और न मुस्कराने के अलावा भी था. उसमें उसके अलावा भी था. उसमें है के अलावा भी था.
उसमें एक घड़ा था, साफ़ पानी से नहीं पेयजल से भरा हुआ.
तत्सम की बाधाएं थी और बाधाओं के अलावा भी था. हम तद्भव की तरह छलक जाते थे.
उसमें मरण था और मरण के अलावा. अथ और इति के अलावा. उसमें मेरी बेटी रहती थी. मैं रहता था उसमें, एक बेटी का बाप. एक बेटी का बाप होने अलावा भी मैं उसमें था. मेरा बाप था उसमें सनातन सेकुलर कांग्रेसी. उसमें एक खूंटा था नरेंद्र मोदी की गांड में डालने के लिये.


खूंटे पर, घड़े पर, किताब पर, आँखों पर मेरी, मेरे काले हाथों पर, लकड़ी पर, नींद पर, रुमाल पर, गणेश जी की तोंद पर तुम्हारा स्पर्श.

उस स्पर्श में स्पर्श के अलावा भी था.
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कि पानी से आग ?

भींगती हुई बरसात
भींगता हुआ शिशिर
इसके पहले ग्रीष्म भी भींगा था

भींगती हुई सड़क - जो उसकी भी मातृभूमि है

रात भींगी सुबह भींगी
पप्पा की गोदी में
बच्ची कुछ कम भींगी
भींगता हुआ शव चिता भींगती हुई
इस ख़याल का भींगना कि पानी से आग बुझ जाती है
भींगने का इंतज़ार करते हुए गुप्ता जी

चराचर

ये सब तुम्हें भींगता न देख पाने के दृश्य हो सकते थे
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होना था

गर्मी में पिता होना था कि तुम्हें लू न लग जाये. ( उफ़.... तुम्हारे बाप का पीसीओ....)
बहुत ज़्यादा गर्मी में पानी के बरसने का पर्व होना था कि तुम भींग सको देवी-देवता के विग्रहों की तरह और जब भींगते-भींगते बुखार हो जाये या नाक बहने लगे तो एक धवल रुमाल या एक झोलाछाप डॉक्टर होना था.
रक्षाबंधन के दिन भाई होना था तुम्हारा, लाख भाइयों के बराबर.
भले ही माफिया डान को देना पड़े, अट्ठारह की उम्र में बीजेपी के ख़िलाफ़ तुम्हारा पहला वोट होना था.
अपना वोट बीजेपी को नहीं देंगे की वरीयता होना था. कुछ-कुछ विनोद कुमार शुक्ल होना था. कुछ तुम्हारा कुछ अपना कुछ विनोद जी का आदिवास होना था.

जो होना था वह होना था.
जो नहीं होना था वह होना था.
था होना था, है होना था.

'सब कुछ' होना था.
'होना' होना था.
'बचा रहेगा' होना था.

तुम्हारी और अपनी, यानी विनोद जी की कविता किताब होना था.
उनकी आगामी कविताओं में निहित दंडकारण्य का कोलाहल होना था. उस कोलाहल का मौन होना था. उस मौन को तुम्हारी आवाज़ होना था.
कभी-कभी मुझे बोलना था तुम्हारे मुँह से. तुम्हारा वाक्यविन्यास होना था. ऐन इसी सोहराबुद्दीनी मुहूर्त में गुजरात का कांग्रेसी राज्यपाल होना था. रोज़-रोज़ मोदी के ख़िलाफ़ कानूनी तरीक़े से लिखा गया बहुत सुंदर राजकीय निबंध होना था. एक अभिनव केंद्र-राज्य संबंध होना था.

तुम्हें नीरू होना था मुझे नीमा होना था.
एक कबीर होना था एक मीर होना था.
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मौसम के ख़िलाफ़ अच्छी सेहत भी चाहिए

जब बिजली का खंबा या गिर रहे पेड़ों में से कोई एक गिरेगा सर पर और बेहोश होने से कुछ पहले मैं साँसों में कहूँगा की विवेकानंद या दयानंद मेडिकल स्टोर ले चलो तो वह ऐसा पहला अंतिम आदमी होगा जो यक़ीन करेगा कि ये मुहावरे नहीं दवा की दुकानों के नाम हैं.

मरने से बचने के लिये अस्पताल की बजाय दवा की दुकान जाने का क्या मतलब हो सकता है तो इसका मतलब हो सकता है की दुकान अस्पताल की बग़ल में भी तो हो सकती है. मैं दवा का दुकानदार हो सकता हूँ मेरा बेटा नाजायज़ कंपाउंडर हो सकता है.

और एक बच्ची दिखी थी मोटरसाइकिल पर बैठी माँ की गोद में. देर तक देखती थी मुड़ने के बाद भी देखती थी.

जूते की दुकान पर एक जोड़ी जूता दिखा था, अपने होने में मेरी प्रेमिका के मामा के जूते जैसा, देर तक देखता था मुड़ने के बाद भी देखता था.

और वह दिखी थी. बिल्कुल उस जैसी दिखती थी. बस थोड़ा ज़्यादा हँसती थी. वह हँसी बहुत कुछ कहती थी. देर तक देखती थी मुड़ने के बाद भी.

और देवेन्द्र द्विवेदी दिखे थे अपनी अकाल मौत के बाद. और यह ख़याल कि गुजरात का राज्यपाल बनने के बाद शपथग्रहण से पहले ही उन्हें नहीं रहना था.

और यह ख़याल कि उन्हें मरना था तो गुजरात का राज्यपाल बनते ही क्यों मरना था. और यह ख़याल कि गुजरात का राज्यपाल बनाने के लिए सबकुछ के साथ अच्छी सेहत भी चाहिए. यह ख़याल देर तक देखता था मुड़ने के बाद भी देखता था.
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