सबद
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सबद पुस्तिका : ५ : प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

12:56 am



{ I }

साधो, अशब्द साधना कीजै


इस अमावस्या की रात
सफर की तैयारी से पहले क्या तुमने
मानचित्रों को अच्छी तरह देख लिया है ?
मेरा कहा मानो तो उन्हे फिर देख लो .................कहाँ कहाँ जाना है
नोट कर लो

अच्छा पहले बताओ कौन हो तुम ?
दीदारगंज की यक्षी ? किसी गंधर्वलोक की उर्वशी ? कामायनी ?
या अजिंठा की गुफा में कैद
सजा के लिए नतशिर वह नर्तकी ?
जो भी हो, मेरे लिए सिर्फ एक स्त्री हो
सृष्टि की सुन्दरतम कृति ......................... रचना का सुन्दर होना
.......................................................(पुरुष के लिए) स्त्री होना है़

कूच के पहले थोड़ी देर आइने में झांक लेना
खुद को देखना
अपनी आँखों से आँखें मिलाना साहसी होना है
.............................................. कम-स-कम आज की दुनिया में
और साहसी होना ही कूच करना है

बालों को संवार लो और जूडे़ में ये फूल गूंथ लो
फिर इन्द्रधनुषी रंग में
झिलझिलाती यह साड़ी ओढ़ लेना
सृष्टि के जितने रंग हैं
उन सभी रंगों का सत्व है यह............................... रंग - ब्रह्म
सभी आँखें तृप्त होंगी तुम्हे देखकर
फिर भी तुम किसी की न होगी

मुक्त होना है सफर पर चलना है
अपनी-अपनी नीहारिकाओं से/उनकी कैद से
आजाद होना है............................................खुद अपने बनाये घोंसलों को
..........................................................................दूर से देखना
लेकिन क्या सफर में भी हम नहीं ढोते अपने-अपने घोंसले ?
अन्तरिक्ष की ऊँचाइयों में जाकर भी हम नहीं गाते सारे जहाँ से अच्छा.....

या फिर
यह सफर सिर्फ भ्रम है
किसी अज्ञात कृष्ण विवर की ओर खिंचे चले जा रहे हैं हम
और
मान बैठे हैं कि सफर है

चलो देखो कैसे चलती हैं
इव्स लारां और गार्डेन वरेली की रूपसियां
तुम्हारा सुन्दर होना ही काफी नहीं
दिखना भी होगा तुम्हें सुन्दर.............................एक शासक की तरह
असुन्दर का सुन्दर दिखना/फिलहाल हमारे यहाँ सभ्यता की यही परिभाषा है

कापालिक हो, लेकिन दिखो वैष्णव
खूनी हो, लेकिन दिखो मुनि
दिखना यहाँ होने से कहीं ज्यादा अर्थ रखता है
तुम्हें भी होना नहीं, दिखना है........................ मंजूर है ?

लेकिन बताओ तो
कैसे दिखता है सुन्दर असुन्दर
......................जीवन मृत्यु
.....................न्याय अन्याय
क्यों सुन्दर होना हार जाता है सुन्दर दिखने से
जीवन होना हार जाता है जीवन दिखने से
न्याय होना हार जाता है न्याय दिखने से
प्यार होना हार जाता है प्यार दिखने से
फिर क्या है हमारा होना ? बस एक मिथ ?

सफर की खुमारी में कहाँ खो गयी हो तुम
अच्छे नहीं न लगते मेरे ये सवाल
प्रकाश की गति से भागती तुम
कहाँ छोड़ आयी हो अपना पिण्ड
मेरी ऊर्जा ! ....................................धियो यो नः प्रचोदयात। (1)
आइन्सटाइन नहीं हूँ मैं
और क्या एक अदद आइन्सटाइन भी समझ पाया था तुम्हें ?

मैं
मुफस्सिल का एक अदना लड़का
‘देवी की सन्तान जिसका कोई दावेदार नहीं’
मृत्यु की सीमा पार कर आया हूँ
चलने


यह है मेरी धरती
जब पुरूषरूपी हवि से देवों ने यज्ञ को पसारा
(तो) उसके दो पैरों से जन्मी थी यह धरती................. और शूद्र भी
दोनो सगे

अछूत हुए शूद्र, पूजी गयी धरती
................................माता की तरह

छुए गए शूद्र, नोची गई धरती
....................................जैसे हमारी गली का कसाई नोचता है मेमने की खाल
आज तलक घिसटते आये हम बिना पैरों के
देखो क्या गत हो गयी हमारी

पैरों से जन्मने की पीड़ा
और पैरों से चलने का सुख
समझना......................शायद सभ्य होना है

ठुमकना.............गिरना..............फिर ठुमकना नन्हें ....... कृष्ण की तरह
फिर चलना.........दौड़ना और तेज दौड़ना.....
तेज और तेज
चाँद पर अपना पगचिह्न छोड़
अन्तरिक्ष की किसी अज्ञात गली में
खो जाता है एक आर्मस्ट्रांग ..........पायोनिअर की तरह....
काल की सूई उलट घूमने लगती है

फिर
इस सिलिकॉन घाटी में
हम तलाशते हैं एक पीपल का पेड़/एक सुजाता
एक थाली खीर से भरी
एक बुद्ध
लीलाजन (2) के तट पर छोड जाता है
सल्वाडोर डाली............ खाली मेज/खाली कुर्सियां/कॉफी का खाली प्याला

आओ क्षण भर यहाँ सुस्ता लें
कोई जुगलबंदी रचें
तुम वीणा की झंकार बनो/मैं खाली कैनवास पर दौड़ती कूची
तुम पैरों से जन्मने की पीड़ा/मैं पैरों से चलने का सुख

किसी स्टीरॉयड के सहारे कब तक दौड़ेगी कोई सभ्यता
दौड़ता तो पैर है
इसलिए किसी को सम्मान देना
उसका चरण छूना है


चेक-अप के लिए अस्पताल में आने लगी है धरती
फूलमती की तरह कोठे से नारी निकेतन
और नारी निकेतन से कोठे पर आती जाती रहती है
एलियट की औरतों की तरह नहीं बतियाती वह माइकलएंजेलो

हवि होना तो हम सबकी नियति है
निरंतर मरना है निरंतर जीना/निरंतर आहुति है सृष्टि
यत् पुरूषेण हविसा देवा यज्ञमतन्वत।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ।।(3)
कैसे बचेगी धरती हवि होने से ?

आहुति और कत्ल का फर्क समझती है धरती
लेजर किरणों से बिंध
मिसाइलों की तरह छटपटाकर टुकड़े-टुकड़े होना नहीं चाहती वह
गैस चैम्बर में घुटकर
वह नहीं बनना चाहती भोपाल
सूर्य की तेज से जन्मी सूर्य की यह बेटी
नहीं होना चाहती भष्म उसी तेज से

आहुति माँ देती है
हवि होना माँ होना है धरती की तरह
यो व: शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः।।(4)


कहाँ भटक गया मैं !
यक्षी, सुना तुमने.......... दुनिया बदल रही है
जो सपना था साकार हो रहा
जो साकार था सपना हो रहा

हवा के थपेड़ों से खुल गयी हैं.....................क्रेमलिन की बन्द खिड़कियाँ
और हमारा एक दोस्त
जो शांघाई की सड़कों पर बेचता था लाल किताब,
धीरूभाई अम्बानी की जीवनी बेच रहा है
मुनाफा अबकी ज्यादा है

आस्था की कोख से जन्म लेता है चमत्कार(5)
जब आस्था की दीवार में पड़ जाती है दरार
निकल आता है उससे संशय का महाद्वार
जिज्ञासया संदेह प्रयोजने सूचयति(6)

लेकिन संशय तो भटकना है
उसे मंजिल से ब्याह दो तो उदात्त सफर बन जाता है
भटकता यथार्थ मन की कामना में विश्राम पाता है

मैं भटकता यथार्थ
तू मन की कामना
भटकते/यूं ही मंडराते शब्दों का गुच्छ है मेरा अस्तित्व
बोलते जाना मेरा धर्म है
तुम समझो या न समझो
एक अन्तहीन अंतरिक्ष/एक नदी
एक विद्युत-चुम्बकीय तरंग
गुलदाउदी, गुलमोहर, गुलाब/रजनीगंधा, रातरानी.....
भटकता यथार्थ बचपन के साथ
कहीं खो जाता है
टमाटर और चने के खेत में
नमक और हरी मिर्च की पोटली दबाए............ फिर भी तुम
वहीं कहीं आसपास होती हो
फ्रॉक फैलाये -- टमाटर, साग, फूल और कैरम की गोटियां समेटे

विश्राम की जमीन सख्त नहीं होती
किसी रूढ़ विचारधारा की तरह
कोमल हैं कामना कमल की तरह
.............................................जिस पर विश्राम करता है एक ब्रह्मा
.............................................हंस की तरह
.............................................जिस पर विराजती है एक सरस्वती
.............................................गोद की तरह
.............................................जिस पर चुपचाप सो जाता है
.............................................अभी-अभी उछलता-कूदता एक नन्हा शिशु


दुनिया बदल रही है
और मेरे बच्चे की टिफिन में डाल देता है
चुपके से कोई हेरोइन के पैकेट
या फिर निगल जाता उसे स्कूल पहुँचने से पहले
एक शक्तिसंपन्न किन्तु अभिशप्त सभ्यता की
एक-एक कर सारी रक्षापंक्तियां
ढ़हती जा रही हैं/डस गया है उसे एड्स का साँप
..........................और हम रामचन्दर पानवाले की दूकान पर
..........................बालों में कंघी फिराते
..........................कोने में बैठी अधनंगी लड़की को कनखियों से देखते
..........................जोर से उछाल देते हैं
..........................पीक - सड़क पर, जहाँ गणेशी का बेटा सीता है जूता

इस चौक पर हमेशा भगमभाग मची रहती है
हर आदमी भागता होता है अपनी मंजिल की ओर
लेकिन मंजिल क्या है इस पूरी भीड़ की ?
है कोई यहाँ मुकम्मिल आदमी ?
.................................वह या तो क्षिति है जल है पावक है गगन है या समीर
.................................कलम है कुदाल है या कीबोर्ड
.................................लेथ है स्टेथेस्कोप है या कैरमबोर्ड
.................................विकेट है डंडा है तमंचा या साइनबोर्ड
.................................ऐसा ही कुछ.....
अप्सरा, बताओगी
..........................पंचतत्वों का वह सम्मिश्रण कहाँ है
..........................जिसे देखकर शेक्सपीयर सोचता था
..........................प्रकृति खुद गा उठेगी, ‘यह मानव है !’
वह आत्मा कहाँ है
जहाँ चेतना की समस्त धाराएं आकर विलीन हो जाती है ? (७)
एक हजार गाय और स्वर्णमुद्राएं लेकर
जाओ याज्ञवल्क्य के पास पूछकर आओ यह अतिप्रश्न नहीं है/ सिर तुम्हारा सलामत रहेगा


लो आ गया तुम्हारे सफर का आखिरी पड़ाव
यह शब्दों का प्रदेश है.....
इस शब्द का अभी-अभी कत्ल हुआ है
................................गाढ़ा रक्त बह रहा है
इधर द्वन्द्व में औंधे मुँह गिर पड़ा है यह शब्द
यहाँ किसी ने शब्दों की कै की है
उफ् कितनी दुर्गन्ध है !
बासी शब्दों में रेंगते हैं कीड़े
और आसपास शब्दों का बलगम है
संभल कर चलना !

उधर उस शब्द को देखो
घिसकर कितना बौना हो गया है
मेरे गाँव के शिवलिंग की तरह
इसका बौनापन बताता है
कभी कितना पूज्य था यह

और यह है शब्दों का श्मशान
शून्य में शब्द की बात सुनी होगी तुमने
यहाँ देखों शब्दों का शून्य
क्या इस शून्य में नये शब्दों के पौधे लगाओगी ?
इन बासी और मुर्दा शब्दों की प्रदान करोगी
खाद की सार्थकता ?

उस दिन राह चलते मिले थे डॉ. खुराना
पूछ बैठे, ‘ सुना है, आजकल शब्दों की खेती में पिले हो ?
..........................फुर्सत निकालकर आना मेरी प्रयोगशाला में
..........................विकसित की है मैंने शब्दों की एक नयी प्रजाति
...........................भई, जिनियागिरी का जमाना है
...........................आनुवंशिक रोगों से मुक्त
............................एचवाईवी 2001 शब्दबीज ले जाना -
............................शब्दक्रान्ति लाना इससे ’

और सच !
चौक की बायीं और वाली बड़ी होर्डिंग
(जहाँ पहले ‘ नर्म, मुलायम त्वचा,’ वाला विज्ञापन होता था)
इसी नये शब्दबीज के आगमन का ऐलान कर रही थी
एचवाईवी 2001 के एक किलो पोलिपेक को आकर्षक अंदाज में हिलाती हुई
एक लड़की फरमा रही थी -
इस शब्दबीज की खरीदारी में ही समझदारी है !
क्योंकि इसमें है
........................साम्यवाद/ गोल कर दी गई स्तालिन की जीन
.......................................मिक्स की गयी है थोड़ी रोजावाली
........................................कम -स-कम चालीस फीसदी फेरबदल के साथ
.........................................डाली गयी है माओजीन .....
........................उदारवाद/ काफी घटा दी गयी है नपुंसकता इसकी
......................................जिनियागिरी की बदौलत
........................अनुदारवाद/सहिष्णु और संयत बना दिया गया है
.........................................कल का यह ऐंठा हुआ धनी छोकरा
........................फतवों के धतूरे नहीं फलेंगे इन शब्द-पौधों में
.........................मुकम्मिल गांरटी, देश भर में 2001 सर्विसिंग सेंटर्स ......
कामिनी ! लोगी यह शब्दबीज



[ कविता के बाकी हिस्से पढ़ने के लिए यहां दी गई ई-बुक को डाउनलोड करें. ]....

{प्रसन्न कुमार चौधरी की इस लम्बी कविता के अलग-अलग हिस्से १९९३ तथा १९९५ में पहले समकालीन भारतीय साहित्य और बाद में वागर्थ में छपे थे. इसे पुस्तकाकार सम्पूर्ण पहली दफ़ा प्रकाशित किया जा रहा है.}
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बही-खाता : १२ : वंदना राग

8:20 pm


मेरी कोशिश अपने आप को व्यापक समाज से जोड़ने की रहती है

कहते हैं, हम जितना अपने स्मृति कोश को माँजते हैं, उतने ही साफ सुथरे और चमकदार ढंग से स्मृतियाँ हमारे भीतर उगती जाती हैं और हमारे जीवन जीने का अविभाज्य हिस्सा बनती जाती हैं। एक ऐसे चक्र के भीतर जहाँ पहल स्मृति के मार्फत होती है और सपने आगामी जीवन के दिखाई पड़ते हैं। पुनः आगामी जीवन स्मृति होता जाता है और चक्र अपनी परिधि को पूरा करने में लगा रहता है। ऐसे ही चक्र के तहत मैं अपने आप को पाती हूँ और स्मृतियों के उन महाआख्यानों को दुहराती रहती हूँ। विचलित होती रहती हूँ, कभी दुख से तो कभी खुशी से। जब अपनी स्मृतियों में मैं महाआख्यानों के स्वर परिभाषित करती हूँ तो जाहिर है वे मेरे निजी स्पेस से बाहर आकर उस सार्वजनिक स्पेस के अतिक्रमण की बात करते हैं, जिसके शोर को मैं बचपन से ही, कभी अनदेखा नहीं कर पाई।

कौन था बचपन में, जो चुपके से दबे पाँव आकर कान में उस शोर को पैदा कर देता था? एक अति भावात्मक मन, उतना ही कल्पनाशील दिमाग अथवा एक असंतुष्ट और हमेशा प्रश्न करने वाली प्रवृत्ति? शायद बहुत सारे लक्षणों ने मिलजुल कर एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण किया जो सुरूचि, सुन्दरता, कलात्मकता और एसथेटिक्स का प्रेमी है, लेकिन जब वह अपने इर्द गिर्द की चीजों पर नज़र डालता है, तो उसे हमेशा गलत असुंदर और वंचना ही दिखलाई पड़ती है। बड़े होने के क्रम में एक ऐसी दृष्टि विकसित होती चली गई। मेरे अपनों के न चाहने के बावजूद।

जब सिर्फ और सिर्फ पढ़ती थी तो कभी नहीं सोचती थी कभी लिखूँगी भी। कभी नहीं लगा लेखन में प्रवेश की तैयारी कर रही हूँ। पढ़ना स्फूर्त और आत्मा को स्पर्श करने वाली प्रक्रिया थी। उससे निस्संदेह पढ़ने और लिखने का परिष्कार हुआ, मगर लिखने की वजह वह परिष्कार नहीं। किसी भी लेखक के मूल में संवेदना की गहराई का होना, लिखने की पहली शर्त होती है, जिसके साथ परिष्कार जुड़ कर आपको आगे बढ़ाता है। लेखक का आकलन उसके लिखे हुए से होना चाहिए न की उसके व्यक्तित्व की वजह से। लेखक का जेंडर, उसका वर्ग उसकी जाति और उसके धर्म से जोड़ रचना का मूल्यांकन करना, मेरे हिसाब से उस ह्वासवादी स्टीरीयोटाईप प्रवृत्ति को बढ़ावा देना है, जिससे पनपे पूर्वाग्रहों की वजहों से कई अच्छी रचनाएँ अलक्षित और उपेक्षित रह जाती हैं।

अपने बारे में मुझे किसी भी प्रकार का मुगालता पालने का मन नहीं। जिस समय में मैं आज जीती हूँ, उसके स्वर एवं पात्र आख्यानों के स्वरों एवं पात्रों से कम नहीं। मैं अन्य के साथ खुद भी गवाह हूँ, आज के इस भारतीय समाज के उत्थान एवं पतन की। उसमें व्याप्त प्रगतिमूलकविचारधाराओं के उत्कर्ष ओर अपकर्ष की। उसके जड़-मूल के विघटन और विस्थापन की। उस पर आयातीत विचारों के महिमामंडन की। अर्थशास्त्रीय मूल्यों के बदलने और बदले जाने की। एक अधकचरी संस्कृति के विकास की और समृध्द भाषा हिंदी के लगातार गिरते सामाजिक स्तर की। मगर इन सभी को कभो पूरा दर्ज कर पाऊँगी? उसका अवसर मुझे मिलेगा? क्या इतनी सक्षम हूं? - मैं सचमुच नहीं जानती।

इससे कैसे इंकार करूँ, कि जो भी थोडा बहुत लिखना आया वो इसी भाषा में बेहतर आया। मैं भाषा को ढंग से बरतने की बड़ी कायल हूँ, मगर खुद कितना उसे करने में सफल हो पाती हूँ, यह नहीं जानती। हाँ, मैं इस तरह रो नहीं सकती, जिस तरह आजकल बहुत सारे लोग बिना प्रयत्नों के मर्सिया पढ़ते जाते हैं। ‘ऊफ हिंदी मर रही है और साथ ही सारी क्षेत्रीय भाषाएँ और डायलेक्टस अवसान पर हैं'। मेरा मानना है कि हिंदी को उसका वाजिब मूल्य प्राप्त नहीं हुआ। इसके पीछे इन मर्सिया पढने वालों और हिंदी के छद्म पैराकारों के साथ हमारी वह मनोग्रंथी भी है जिसके अनुसार जब तक पश्चिम हमारी भाषा और लेखन को स्वीकृति और इज्ज़त नहीं बख्शेगा तब तक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हमारी वह हस्ती कभी न होगी जो, अंग्रेजी फ्राँसिसी और पूर्वी यूरोपीय भाषा के अलावा स्पेनी , लातिन अमरीकी और अफ्रीकी लेखन को पिछले सौ वर्षों में हासिल हुई।

कुछ लोगों का यह सोचना कि यह नहीं हुआ क्योंकि हमारी भाषा प्रगतिमूलक नहीं थी, सबसे बड़ा परिहास है। दरअसल, हम यदि पिछले तीस वर्षों के लेखन पर नज़र डालें तो यह पाएंगे कि हमारी जो मौलिक, मिश्रित जुबां थी, जिसे हिन्दुस्तानी कहते थे, वह जो भारतीयता की प्रतीक थी, उसे हमने सामप्रदायिक हिस्सों में धीरे-धीरे तकसीम कर दिया। फिर हमने अपनी भाषा पर शर्मींदगी पाल ली, और उसे बरतने संबंधी शिक्षा की पूरी तरह अवहेलना भी करते गए। जब हम अपनी ही भाषा के प्रति निरादर के भाव से भर गए, तो कैसे उम्मीद करें कि उसे दूसरा कोई आदर देगा?


इस सिलसिले से जुड़ा एक वाकया याद आ रहा है। दो-एक वर्ष पहले, पढ़े- लिखे प्राध्यापकों और वैज्ञानिकों के घर पर, भोज के एक अवसर पर हिंदी भाषी एक सज्जन ने मुझसे अंग्रेजी में पूछा था ‘सुना है, लिखती हैं आप। क्या लिखती हैं ?' मैंने कहा था, ‘हिंदी में कहानियाँ लिखती हूँ'। इस पर हैरत से भरकर उन्होंने कहा था ‘हिंदी में ? गुड, वेरी गुड।' उनके लहजे से ऐसा लगा मानो हिंदी में लिखकर मैं अपनी प्रकृति से हटकर कोई नायाब काम कर रही हूं।

उसी दिन लगा था, जितने दुनिया के बड़े लेखक हुए हैं, प्रशंसित सम्मानित, पुरस्कृत अथवा सिर्फ चिन्हित ही, सभी ने अपने मूल लोकाचार और प्रकृति से गहरा सामंजस्य स्थापित किया था, किया है और निरंतर करते रहते है। उन्होंने अपनी ताकत को खूब ठीक ठीक पहचान, अपने लेखन को विश्व पटल पर रखा है। उसी फेहरिस्त में मेरे सारे प्रिय कथाकार बसते हैं, और फेहरिस्त खासी लम्बी है। उन सारे लोगों को अपने देसी होने में शर्म नहीं थी और न ही वे राष्ट्रीयता के संकुचित दायरों में कैद रहे। उन्होंने व्यक्तिगत से आगे बढ़ कर लोक की बात की और वे राष्ट्रीय से अन्तर्राष्ट्रीय हुए।

इसी के साथ, एक गौर करने वाली बात है। वह यह कि जिस चौक्कनेपन और मुस्तैदी से ओरहान पामुक (मेरे एक और अति प्रिय लेखक) लिखते हैं और उसका अंग्रेजी अनुवाद बाजार में आता है, और छा जाता है, ऐसी सुविधा हिंदी को कत्तई प्राप्त नहीं होती है ? हमारे यहाँ भी स्तरीय लेखन की कमी नहीं, मगर उसका विश्वपटल पर यथोचित प्रचार और प्रसार नहीं होता। स्थानीय और ग्लोबल बाज़ार की हिंदी के प्रति यह बेरूखी भी मेरे अंदर तंज पैदा करती है।

कहते हैं, कविता कहानी से समाज नहीं बदलता , और अपनी कथा कहानी के उद्देश्य को लेकर भावुक नहीं होना चाहिए। मुझे इसी पर राही मासूम राजा का कथन याद आता है : मैं समाज बदलने के लिए लिखता हूँ।' आज लोग इस कथन पर हँसेगें अथवा अधिक से अधिक राही को सम्मान प्रदान करने वाले अंदाज में एक काबिल फतवा जारी कर देंगे, ‘भई यह रोमानी आदर्श है, लिखने-विखने से समाज नहीं बदलता'। मगर मैं ऐसा नहीं सोच पाती। मैं उनके इस कथन से प्रेरणा ग्रहण करती हूँ और इतनी सजगता ज़रूर बरतती हूँ कि मेरा लेखन समाज से कटा हुआ न हो

मेरे लिखे शब्द मेरे लिए या उन चंद साहित्य पढ़ने वाले बुद्धिजीवियों के लिए नहीं हैं। ज़ाहिर सी बात है जब मैं लिखकर छपती हूँ तो मैं मेरी कोशिश अपने आप को व्यापक समाज से जोड़ने की रहती है। लिहाजा मैं चाहती हूँ कि मेरा लेखन समाज में एक बड़े तबके तक पहुंचे। और यदि मैं अपनी बात सक्षम और शसक्त ढंग से कह पाई, तो मेरी बात हर उस व्यक्ति को प्रभावित भी करे, जिनकी या जिनके लिए कहानी कही गई है।

मेरी कहानियों के पात्र आम जीवन के लोग हैं। मेरी कहानी ज्यादातर किसी दृश्य या व्यक्ति को देख या डायलाग को सुन शुरू होती है। इसके बाद मन ही मन वह कहानी अपना आकार लेती है। लगभग सारी बातें विज्युली जब दिमाग में दिखलाई पड़ जाती हैं, तभी मैं कहानी लिखने बैठती हूँ। चूँकि मैं बहुत आलसी हूँ इसलीए सारी सोची, देखी अद्भुत और उद्दाम बातों को पन्ने पर उतार नहीं पाती हूँ। लगभग हर बार चीजें छूट जाती हैं। जब कहानी भीतर लिख ली जाती है और पन्ने पर उकेरे जाने को बाध्य करती है, तो लगता है, बेताल की तरह पीठ पर चढ़ गई है। फिर 'हाल' सा आता है और एक उद्घाटन की तरह चीजें कागज़ पर पसर जाती हैं। हमेशा ही कहानी लिखने के बाद बहुत थका हुआ सा लगता है। कभी दुख होता है कभी अच्छा भी लगता है, लेकिन संतोष कभी नहीं होता है। फिर जल्द अगली कहानी, मन में तैयार होने लगती है इस उम्मीद के साथ कि अबकी गलतियाँ नहीं करूँगी।

असंतुष्ट मन को अच्छा करने के लिए बहुत सारी अच्छी चीजें पढ़ती हूँ। खासतौर से कविता जो मुझे अभिव्यक्ति की सबसे खूबसूरत और मुश्किल विधा लगती है। मैं कभी कविता नहीं कह सकती। मुझे लगता है, जिस संस्कार की कविता को ज़रूरत होती है उसे विकसित करने का कौशल मुझमें नहीं। इसी तरह मुझे सिनेमा देखना, उस पर बातें करना बहुत अच्छा लगता है। कई बार लगता है, साहित्य और सिनेमा का युग्म वह पूर्ण और आदर्श युग्म हो सकता है, जिसके द्वारा सारी बातें सफलता पूर्वक बृहदतर समाज से बाँटी जा सकती हैं। यह समाज को जानने और उससे जुड़ने का सबसे कारगर माध्यम हो सकता है। लेकिन बाज़ार को सिनेमा की कद्र है और साहित्य की नहीं (हिंदी सिनेमा और साहित्य के संदर्भ में )

सबसे ढंग से यदि मै कुछ कह सकती हूँ तो वह कहानी ही है, क्योंकि मैं फितरतन गल्प की दुनिया में विचरने वाली प्राणी हूँ। देखी, सुनी पढ़ी और अवांतर भविष्य में लिखी जानेवाली कहानियाँ मेरे अंदर एक समांतर जीवन जीती रहती हैं। कहानी मेरे लिए सबसे पहले जीवन है। उसमें शिल्प और भाषा का अपना महत्व है। लेकिन नवउदारवाद के तहत उपजी संस्कृति के तहत मैं अपने आप को उस भीड़ में शामिल नहीं पाती जो कहानी को शिल्प और भाषा के बदौलत खड़ा कर देने का दावा कर देते हैं और जिनके भीतरी अर्थों में खोखला निजपन और आत्ममुग्धता रहती है।

आज दुबारा प्रचलन में आए अस्तित्ववाद के फैशन के मैं खिलाफ हूँ। मेरा मानना है, कि हमारे आसपास कितनी ही ऐसी समस्यायें और पात्र हैं, जिन्हें अभी भी माकूल स्वर नहीं मिले हैं। अभी भी, दलितों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों को तथाकथित बहुसंख्यकों ने स्वर नहीं दिया है। सारे वर्ग अपनी व्यक्तिगत लड़ाईयाँ अपने-अपने मोर्चे से लड़ रहे हैं। ऐसे में सभी को सभी की बात कहने का साहस और माद्दा विकसित करना होगा, क्योंकि मेरे लिए कहानी, लोकेल या पात्र किसी एक समूह की जागीर नहीं।

मेरे विचार से अच्छा लेखक अपने समय और स्पेस का अतिक्रमण कर हमेशा आगे की आनेवाली पीढ़ियों को भी जो सार्थक लगे, वैसी कहानी लिखता है। कुछ लोग मेरे कहानी कहने के इन झुकावों को फार्मुले के प्रति झुकाव कह सकते हैं। मुझे ऐसे लोगों से गिला नहीं। सारे रचनाकारों के झुकाव अलग किस्म के होते है, और उनका लिखा हुआ ही उसकी वास्तविक निष्ठा को तय करता है। यह कुछ वैसा ही है, जैसा दक्षिणपंथियों ने ‘सेक्युलर' शब्द के साथ कर दिया। उसे बार-बार छदम् के साथ जोड़ कर उसके साथ वास्तविक निष्ठा बरतने वालों को भी संदिग्ध बना दिया।

कहानी में भाषा और कटेंट का संतुलन, मुझे सबसे अधिक प्रभावित करता है, और मैं चाहती रहती हूँ कि मैं भी किसी तरह उसे प्राप्त कर सकूँ। कहानी जब पक जाती है, तो उसे कहीं भी लिख सकती हूँ, किसी भी माहौल में। जैसे एक बार बिना रिर्जवेशन के आधी बर्थ पर मैंने एक कहानी लिखी थी।


मेरे कुछ अतिप्रिय जन मुझे सलाह देते हैं कि, ‘कितना सुंदर तो है जीवन, तुम भी उसी तरह का कुछ सुंदर लिखो'। अब मैं क्या कहूँ ? ‘मैं अलग हूँ', ऐसा किसी गर्व की भावना के साथ नहीं कह सकती। चूँकि एक तरह का सिरफिरापन भीतर सुलगता रहता है, इसीलिए उबड़खाबड़ राहें मुझे ज्यादा बुलाती हैं। उस सुंदर से परिचय प्राप्त करने की इच्छा भी, उसी खुदुरेपन से होकर गु़ज़रती है। मेरे भीतर कौतूहल है, उसे जानने का, और मैं चाहती हूँ मेरे भीतर का यह कौतूहल कभी मरे नहीं। मैं कभी सब जान न पाऊँ। बल्कि सच तो यह है कि मुझे अभी कितना पढ़ना बाकी है, कितना सिनेमा देखना बाकी है, और लिखना ..... वह तो बहुत - बहुत बाकी है।
****

{ नई पीढ़ी की चर्चित कहानीकार। 'यूटोपिया' नाम से एक कहानी-संग्रह प्रकाशित। इतिहासकार एरिक हॉब्सबाम की किताब 'एज ऑफ़ कैपिटल' का अनुवाद भी प्रकाशित। बही-खाता' स्तंभ की अन्य प्रविष्टियाँ यहां तस्वीरें निजी संकलन से। }
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आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी