सबद
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जुगलबंदी : व्योमेश शुक्ल और बिस्मिल्लाह खाँ

10:16 pm

{ हमें आपको यह बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी के प्रखर युवा कवि-आलोचक व्योमेश शुक्ल को उनकी कविता ''बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं'' के लिए वर्ष २००९ का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार दिया गया है. यह कविता सबसे पहले सबद पर १५ अप्रैल, २००९ को प्रकाशित हुई थी. व्योमेश की कविता पर वह बहसों की शुरुआत का दौर था, जो अब भी उनकी लगभग हर कविता के प्रकाशन के साथ जारी है. याद नहीं आता कि किसी एक कवि के आरंभिक सृजन को इतनी सराहना और स्वकृति पहले कभी मिली हो. व्योमेश अपने कवि-कर्म में लगातार निखर रहे हैं और उन्हें बधाई देने के इस दूसरे अवसर पर यह कहना अत्युक्ति नहीं कि उन्हें पढ़ना अब ज़्यादा पढ़ना होगा. किसी रियायत या लापरवाही से काम नहीं चलेगा.

हम कवि की इस उपलब्धि में उनके ही नव्यतम सृजन के रास्ते शिरकत कर रहे हैं. उन्होंने शहनाई के सरताज बिस्मिल्लाह खाँ को अपने गद्य में उनकी मृत्यु के चार बरस बाद उनके शहर और गलियों में खोजा है. व्योमेश का गद्य  प्रौढ़, प्रांजल, स्मृतिजन्य और जातीय है. वे शब्द नहीं उसके अनेक आकार-प्रकार को गद्य में याद करते हैं और ऐसी यादाश्त हालांकि कुछ जगहों पर और भी आपको मिल जाएगी, लेकिन तत्सम जितनी बारीकी से तद्भव को अपने रंग में रंगता है और देशज जितनी होशियारी से विदेशज की चूल हिलाता है, वह विरल है. यह इस गद्य की शक्ति है, सौंदर्य भी. }




बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं

( प्रणय कृष्ण के लिए )

जगह का बयान उसी जगह तक पहुँचता है। वहीं रहने वाले समझ पाते हैं बयान उस जगह का जो उनकी अपनी जगह है।

अपनी जगह का बयान अपनी जगह तक पहुँचता है।

एक आदमी सुंदर आधुनिक विन्यास में एक खाली जगह में चकवड़ के पौधे उगा देता है तो रंगबिरंगी तितलियाँ उस जगह आने लगती हैं और उस आदमी को पहचान कर उसके कन्धों और सर पर इस तरह छा जाती हैं जैसे ऐसा हो ही न सकता हो। ऐसा नहीं हो सकता यह जगह के बाहर के लिए है और ऐसा हो सकता है यह जगह के लिए।

तितलियों के लिए तो ऐसा हो ही रहा है।

किस्सों-कहानियों में ख़तरनाक जानवर की तरह आने वाले एक जानवर के बारे में जगह के लोगों की राय है कि वह उतना ख़तरनाक नहीं है जितना बताया जाता है। जबकि जगह के बाहर वह उतना ही ख़तरनाक है जितना बताया जाता है।

जगह के भीतर का यह अतिपरिचित दृश्य है कि गर्मियों की शाम एक बंधी पर सौ साँप पानी पीने आते हैं। जगह में जब साँप पानी पी रहे होते हैं तो जगह के बाहर से देखने पर लगता है कि बंधी से सटाकर सौ डंडे रखे हुए हैं। जगह एक ऐसी जगह है जहाँ साँप को प्यास लगती है। जगह के बाहर न जाने क्या है कि साँप को प्यास नहीं लगती और वह डंडा हो जाता है। जगह के बाहर लोग डंडे जैसी दूसरी-तीसरी चीज़ों को सांप समझ कर डरते रहते हैं।

जगह के बाहर एक आदमी के कई हिजड़े दोस्त हैं। वे उससे पैसा नहीं मांगते, उसे तंग नहीं करते, उसे हिजड़ा भी नहीं मानते, फिर भी उसके दोस्त हैं। वे उससे कभी-कभी मिलते हैं लेकिन जब मिलते हैं दोस्त की तरह। जगह में लोग एक-दूसरे से बात करते हैं, मुलाकात न हो पाने पर एक-दूसरे को याद करते हैं और एक-दूसरे के दोस्त होते हैं। जगह के बाहर मुलाकातें नहीं हो सकतीं। न दोस्त होते हैं, न लोग होते हैं, न होना होता है, न न होना होता है।
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निर्णायक का वक्तव्य


यह एक गद्य कविता है पर उसमें सघन बिम्‍ब, शब्‍दों से खिलवाड़, कई अविवक्षित अर्थों के संकेत, अप्रत्‍याशित मोड़ आदि सब हैं जो गद्य के नहीं, कविता के गुण होते हैं। कविता का शीर्षक जो संकेत देता है, उन्‍हें कविता की काया में ऐंद्रिय रूप से चरितार्थ होते महसूस किया जा सकता है। जिस जगह से कविता शुरू होती है, कविता के अंत तक आते-आते उसकी सचाई, आशय और परिणतियां अप्रत्‍याशित रूप से बहुल-उत्‍कट और अर्थगर्भी हो जाती हैं। साधारण जीवन की छवियां- जगह, चकवड़ के पौधे, जानवर, गर्मियों की शाम, बंधी पर सौ सांप, डंडे, प्‍यास, हिजड़े दोस्‍त कविता का शिल्‍प रूपायित कर इस आत्‍मीय सचाई जगह के बाहर मुलाक़ातें नहीं हो सकतीं और इस दार्शनिक सत्‍य तक पहुंचाता है कि जगह के बाहर न दोस्‍त होते हैं, न लोग होते हैं, न होना होता है, न न होना होता है। एक युवा कवि द्वारा एक अपेक्षाकृत अस्‍पष्‍ट विषय को इस कौशल और संयम से बरतना विरल है।


अशोक वाजपेयी

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उस्ताद : :









व्योमेश शुक्ल



उस्ताद ने अपना बाजा शहर में खो दिया था। किसी शहर में खो जाने की पर्याप्त वजहें होती हैं। अनेक तरीक़ों से गुम होकर उतने ही नवीन नतीजों में पाया जाना होता है। यह सिर्फ़ खेल नहीं है, संस्थापन की विपदाएँ हैं। एक ही जगह रहने का मूल्य। बड़ी बहसों और साहित्य वग़ैरह में विस्थापन के विभिन्न आयामों पर ख़ूब बात हुई और संस्थापन को, आदिवास को कम मान लिया गया। संस्थापन जबकि विस्थापन का आधार है या उसका प्रास्ताविक। विस्थापन नामक इति का अथ है संस्थापन। वह पहला अध्याय है, हालाँकि अनेक पटाक्षेप उसमें निहित हैं। इसे नज़रंदाज़ करना ख़ुद विस्थापन को अधूरा बना देना है और ऐसा होता रहा है।





जैसे पेड़ की तरह रहना कुछ कम रहना हो। जैसे खड़े-खड़े या बैठे-बैठे या लेटे-लेटे मर जाना कुछ कम जीवन हो। जैसे रोज़मर्रा के मरण में कुछ कम अमरत्व हो। इस उपेक्षा के कारण स्थान के साथ कलाकार के संबंधों की अभिनव पद्धतियों का आविष्कार और प्रचार-प्रसार नहीं हो सका, बल्कि दोनों को अलग-अलग कर दिया गया। कुछ लोग सनक में या फ़ैशन में मातृभूमियों को गाली देने लगे। ज़्यादा चालाक लोगों ने बहिर्गमन कर लिया और दूर जाकर अपनी-अपनी ज़मीन के लिए हाहाकार करने लगे। ये सब ओढ़े हुए विस्थापन थे और नकली अफ़सोस। भीतर से प्रसन्न आत्माएँ शोक का मुकुट लगाकर घूम रही थीं। यशस्वी लोग परदेस में रहकर नियमन करना चाहते लोग थे।





लेकिन उस्ताद ने इबारत को उल्टी तरफ़ से पढ़ा। उन्होंने जगह में रहते हुए भूमण्डल तक का सफ़र किया। वे ख़ूब-ख़ूब घूमे किन्तु भटके नहीं और भटके तो घर आकर। वे अपनी आत्मा से निकली गलियों में भटके और दूसरों में प्रवेश कर गये। वे जीवन से निकली नदी के तट पर भटके और मंदिरों के नौबतख़ानों में बैठे मिले। भटकते हुए उनका बाजा शहर में खो गया जिसे हम आज तक ढूँढते हैं। और अब यह जाने बग़ैर काम नहीं चलता कि बनारस में उनसे जुड़ी हरेक जगह उनकी शहनाई के निर्माण की तरह नज़र आती है।


हम शहर में क्या खोजते? हमने हमेशा उसे छिपने के लिए इस्तेमाल किया। वह एक गाढ़ा पर्दा था हमारे लिए। लोगों की आदतों, लिप्तताओं, विकलताओं, ज़िदों, सुलहों और कलहों, निराशाओं, नींदों और स्वप्नों के तत्वों से बना हुआ। उस्ताद ने इन्हीं तत्वों में से तत्व चुने और कला के शरीर का निर्माण कर लिया। उनकी शहनाई हमेशा लोगों के तत्वों से बनी और बढ़ी है। वह, मसलन, हिन्दुओं की प्रसन्नता और मुसलमानों के शोक से बनी है। आख़िरी बरस को छोड़कर वह आजीवन बनारस में मुहर्रम की पांचवीं और आठवीं तारीख को कर्बला के वीरों की शहादत की याद में आँसुओं का नज़राना पेश करते रहे। हुसैन का ग़म बजाते रहे। यह मातम के जुलूस में आगे-आगे बजती हुई शहनाई और शोक का नेतृत्व करती हुई धुन थी।












उस्ताद ने अपनी जीवन-साधारणता को कला के नक्शों में ढाल लिया था। उनकी ज़िन्दगी के सादा, ग़रीब और निरलंकृत शिल्प को उनकी शहनाई के अप्रत्याशित से जोड़े बग़ैर मूल्यांकन के काम अपर्याप्त और हवाई बने रहेंगे। एक दुनिया थी जो उस्ताद को दे दी गयी थी। वह उसके साथ सपनों की दुनिया की तरह पेश आते थे और कला के स्वप्नमय संसार को अपनी अभिव्यक्ति से आमफ़हम बना देते थे। उनकी कला का गन्तव्य दी हुई दुनिया को सपनों की दुनिया से जोड़ने में है। हिन्दुओं के यहाँ ख़ुशी के अवसरों पर बजने वाली धुनों को उन्होंने एक असंभव प्राकृत सरलता के साथ बजाया है। उनके जटिल कलात्मक अंतःकरण में दाख़िल होकर उन पारम्परिक धुनों का ‘मूल’ तनिक भी बदला नहीं है। प्रायः यह होता है कि लोक रूप किसी कलाकार की अभ्यास और अनुभवसिद्ध चेतना के हवाले होकर परिपक्व और स्वीकार्य होते जाते हैं। वन्य परिवेश एक साफ़ सुथरा बागीचा बनता जाता है। उस्ताद का रास्ता उल्टा था। और अब हालत यह है कि उनकी शहनाई से निकले रूप ही असल और अविकल हैं।


उस्ताद को एक लम्बा जीवन और विचित्र संक्रमणशील ऐतिहासिक समय सीखने के लिए मिला। इस तथ्य में उनकी कला के ज़रूरी रहस्य निहित हैं। 18 मार्च, 1916 को डुमराव (बिहार) में जन्म के कुछ समय बाद वह मामू के पास 22 में बनारस आ गये। मामू ही उनके गुरु हुए। बाद में उस्ताद उनकी सम्पत्ति के भी वारिस हो गये। 40 में मामू और 57 में बड़े पिताजी के इन्तकाल के बाद एक बड़े कुटुम्ब की सारी ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर थी। यह आन्दोलनकारी अग्रगामिता का युग था; हालाँकि राजाओं, महाराजाओं के यहाँ झूले भी पड़ रहे थे। दोनों जगहों का संगीत था। उस्ताद ने दोनों में अकुंठ हिस्सेदारी की। उन्होंने दम तोड़ती सामंती महफ़िलों में प्राण फूँके और लोकतंत्र के नये दरबार में भी रोशनी बिखेरी।

यह बात आज कुछ शर्मिन्दा करती है कि बनारस और इर्दगिर्द के छोटे-बड़े कई कथित राजाओं और लोकतंत्र के नये दिग्गजों के वह लगभग अन्त तक, समय-समय पर दरबारी रहे। कमलापति त्रिपाठी, सम्पूर्णानन्द और सुधाकर पाण्डेय जैसे प्रभावशाली कांग्रेसी नेताओं के सम्मुख उनके क्षुद्र घरेलू आयोजनों में उस्ताद ने एक दर्जा नीचे रहकर, ज़मीन पर बैठकर लेकिन उतनी ही निष्ठा के साथ बार-बार अपना बाजा बजाया। लेकिन वक़्त का इंसाफ़ देखिये - आज वे आयोजन और उनके प्रचंड आयोजक ज़्यादा से ज़्यादा इसलिए याद किये जाते हैं कि उनमें उस्ताद की शहनाई भी थी। इन विविध आयोजनों से उस्ताद ने बहुत कुछ सीखा। राजाओं की महफ़िल में उन्हें अपने शाश्वत संगीत-सहचर मिले। सिद्धेश्वरी और गिरिजा, बैजनाथ प्रसाद सारंगिये मिले, विलायत खाँ और अनोखेलाल से मुलाक़ात हुई। ये सभी जुगलबंदियाँ जीवनपर्यन्त और मृत्योपरान्त चलीं। वे अब भी जारी हैं और उनकी गूँज कभी भी सुनी जा सकती है।




वे सरकारी टेलीविजन के सामने निर्वस्त्र होने से बचने के दिन थे। हम धीरे-धीरे शर्माना सीख रहे थे और डरते थे कि कहीं सलमा सुल्तान, शम्मी नारंग, मंजरी जोशी, वेद प्रकाश, जे.वी. रमण या निथि रविन्द्रन नंगा न देख लें। ‘द वर्ल्ड दिस वीक’ में डिजीटल तरीक़े से रिकॉर्ड किये गये तबले ने बस अभी ही तड़तडाना शुरू किया था। उसी समय वहीं पहली बार उस्ताद से सामना हुआ। वे अपने विनोद से विनोद दुआ को निरुत्तर कर रहे थे। बातचीत के विवरणों की बजाय स्थानीय बनारसी भोजपुरी में बोले गये उनके कुछ वाक्य बाक़ी रह गये, जिनमें से एक था - '' का रजा................. ? ''

उस्ताद को तकलीफ़ और उम्मीद की शर्तों पर ही ढूँढा जा सकता है, अन्यथा तो उन्हें गुज़रे चार बरस हो चुके हैं। अरसा बाद उनके मोहल्ले की एक ऐसी पीढ़ी सड़क पार करना और स्कूल ड्रेस पहनना सीख रही है जो उस्ताद का नाम और पता पूछने पर बस मुस्करा देती है। यह पीढ़ी बड़ी होकर पाठ्यक्रमों के ज़रिये उन्हें जानेगी, उनके घर की दीवार छूकर नहीं। उस्ताद के घर से कुछ दूर पर बेनियाबाग मैदान है जहाँ उनके शरीर को लाखों लोगों के दर्शन के लिए रखा गया था - उनकी प्रिय जगह - यहाँ बैठकर उन्होंने स्थानीय फुटबाल टीमों के अनगिनत मैच देखे और फुटबालरों का संरक्षण किया।

बरसात की एक सुबह इस कीचड़ भरे मैदान में निरुद्देश्य अतर्कित बैठे रहना उन्हें खोजना है, लेकिन मैदान की दूसरी विडम्बनाओं पर निगाह चली जाती है। कभी यही अपने युवजन लड़ाकों के साथ मिलकर राजनारायण ने विक्टोरिया की प्रस्तर-प्रतिमा का ध्वंस किया था। दशकों तक वह जगह खाली थी - उस्ताद की ग़ैरमौजूदगी की तरह। बाद में जब मुलायम सिंह यादव जैसे समाजवाद के स्वयंभू वारिस दृश्य में आये तो उन्होंने बिल्कुल विक्टोरिया वाली जगह पर राजनारायण की मूर्ति लगवा दी। प्रतिमा का विकल्प प्रतिमा। यह बरसात का ही असर होगा कि उस मूर्ति में राजनारायण मुलायम जैसे दिखते हैं।



एक और बनारसी दिग्गज उपन्यास-सम्राट प्रेमचन्द की तरह उस्ताद भी सिनेमा और मुंबई से भागते रहे। वह प्रेमचन्द की तरह असफल नहीं हुए फिर भी भागे। उन्हें यहाँ के अलावा कहीं नहीं टिकना था। 41 के आसपास उनका मुंबई आना-जाना शुरू हुआ। वहाँ नौशाद और वसंत देसाई उनके दोस्त हुए। ‘किनारा’ नामक फ़िल्म में वह साइड हीरो की भूमिका में उतरे। फ़िल्म की नायिका गीता बाली थीं। पुराने लोग बताते हैं कि फ़िल्म बनारस में खेली (चली) भी थी। इस बीच कपूर परिवार से उनकी दोस्ती हो गई और बदले में हमारी सभ्यता को एक विलक्षण म्यूज़िक पीस उपहार की तरह मिला जो 'आवारा' के प्रसिद्ध गीत ‘घर आया मेरा परदेसी’ में मुखड़े और अन्तरे के दरम्यान और दो अन्तरों के बीच बजता है।

वह धुन कालजयी उम्मीद और प्रेम की सिग्नेचर ट्यून के तौर पर जीवित रहेगी। ‘बाबुल’ में शमशाद बेगम के एक गाने के साथ भी उनकी शहनाई ने संगत की। यह सारा काम खेल-खेल में, लीलाभाव से किया गया है। ज़ाहिर है कि उस दौर में पैसा मुद्दा नहीं था। कुछ समय बाद, 56 से कुछ पहले, निर्माता-निर्देशक-फाइनेंसर विजय भट्ट का भट्ठा बैठा हुआ था और वह संगीत को केन्द्र में रखकर फ़िल्म बनाना चाहते थे। वसंत देसाई के ज़रिये उन्होंने उस्ताद को पुकारा। उस्ताद को फिर लगभग मुफ़्त में बजाना था। उन्होंने वसंत को भरोसा दिया कि खरमास (वह महीना जिसमें शादी-ब्याह आदि मंगल कार्य नहीं होते) और इसलिए उस्ताद और उन जैसे दूसरे शहनाई वादक इस समय खाली रहते हैं।) बाद वह मुंबई पहुँच जाएंगे।

इस फ़िल्म में उस्ताद ने बहुत कुछ बजाया। वह सब जो शादी में बजता है, जो दृश्य के कुछ और हरे हो जाने पर बजता है, जो दिल के टूट जाने पर बजता है। जब एक स्थानीय धुन उस्ताद की साँस में अनूदित होकर ‘गूँज उठी शहनाई’ का प्रसिद्ध गीत बनी तो उसके शब्द ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया’ और उन्हें स्वर देने वाली लता मंगेशकर की आवाज़ इतिहास बन गयी। यह इस फ़िल्म की एक क्षुद्र ख़ासियत थी कि इसने उस्ताद के मित्र हो गये विजय भट्ट को फिर से समृद्ध और स्थापित कर दिया।

बाद में बजती शहनाईयों में उस्ताद को ढूँढ़ने के प्रयत्न में गुम हो जाने का जोख़िम है। उनके स्वाभाविक वारिस और बेटे नैयर हुसैन भी अब दुनिया में नहीं हैं। नैयर के अलावा बेटे ज़ामिन और भांजे मुमताज हुसैन बेहतरीन शहनाई बजाते हैं। शिष्यों - शैलेष भागवत और कादिर दरवेश का देश-विदेश में बड़ा जलवा है। लेकिन जिस चीज़ को ये सभी शिष्य गुरु का आशीर्वाद और अपनी सबसे बड़ी ताक़त मानते हैं, दुर्भाग्य से वही उनकी सीमा है। इनमें से किसी को बजाते हुए अलग-अलग पहचाना नहीं जा सकता। अगर सुनने वाला आँख बन्द कर ले और चेले अपना सर्वोत्तम बजा रहे हों तो ये बिस्मिल्लाह खाँ से भिन्न कुछ भी नहीं है। उस्ताद की परछाई भीतर तक घुस गई है और कोई निदान नहीं है।

दरअसल शहनाई साँस का बाजा है और मंच पर एक शहनाई एक साँस कम पड़ जाती है। उस्ताद अपने लगभग दर्जन पर शागिर्दों के साथ प्रस्तुति करते थे। इन सभी लोगों ने लम्बे दौर तक उनके साथ संगत की है। उनकी अधूरी और स्थगित साँस को पूरा किया है। इसका फ़ायदा बहुत हुआ होगा लेकिन नुक़सान यह हुआ कि इनकी छोटी-छोटी साँसें उस्ताद की बड़ी केन्द्रीय साँस में विलीन हो गयी। ये सभी लोग उस्ताद की खण्ड-खण्ड अभिव्यक्ति या उपस्थिति हैं। इनकी कला उस्ताद के न होने का प्रमाण है।






तकरीबन दो सौ लोगों का उस्ताद का कुनबा अपनी भौतिक स्थिति से संतुष्ट है लेकिन भीतर कहीं न कहीं दूसरे बिस्मिल्लाह का बेसब्र इन्तज़ार भी चल रहा है। घर के कई पुरूष सदस्य शहनाई के साथ मेहनत कर रहे हैं तो ज़ाहिर है कि उनके लिए वह जीविकोपार्जन-मात्र

नहीं















है। इस संतोष और इस बेसब्र इंतज़ार में बिस्मिल्लाह खाँ जीवित हैं। जब तक शहनाई बज रही है और ख़ुद को इस मुल्क की जनता के सुख और दुःख के साथ जोड़ रही है, उस्ताद जीवित हैं। हड़हा सराय के अपने छोटे से पुश्तैनी मकान में वह बकरी को सानी-पानी दे रहे हैं या चारपाई पर















अधलेटे होकर सिगरेट पी रहे हैं।













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मंगल-गान
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सूरज की तीन नई कविताएं

7:51 pm

( किस्से के मुताबिक एंगल्स के पास एक कवियश: प्रार्थी युवक पहुंचा और उसने वर्ग-संघर्ष का अपनी कविता में जिस सरलमति से अनुवाद कर डाला था उससे लगभग आश्वस्त था कि उस्ताद की तो दाद मिलेगी ही। एंगल्स ने अपनी बूढी आँखों से युवक की कविता लगाये रखने के कुछ लम्हे बाद बहुत चिंतित लहजे में कहना शुरू किया कि भई, तुम्हारी उम्र में तो युवक प्रेम करते हैं, और उनकी कविता को जीवन और विषय वही देता है, तुम यह क्या कर लाये! सूरज की कविताओं को पढ़कर यह लगता है कि उन्होंने यह किस्सा और इसमें निहित गूढ़ निर्देश को बहुत कायदे से गुना है। उनकी तीन नई कविताएं। )


परिमेय संख्याओं के जलसे में योगरूढ़ संख्या का अरण्यरोदन

यौगिक, सम, विषम
अपने लिये सब खतम

अपने गुणत्व से हरी, भाजक गुणों से लदी फदी
तमाम यौगिक, सम, विषम संख्यायें कर रही होती
दूसरी संख्याओं से प्रेम, उनकी चुहलबाजिया
मशहूर किस्से की तरह दुहराती हैं खुद को जैसे
बत्तीस लहरा रहा होता है दो, चार, आठ, सोलह
से चले अपने प्रेमिल किस्से
जैसे छत्तीस में शामिल तीन और छ: के सारे झगड़े
नहीं कर पाते उन्हें अलग, छत्तीस के आंकड़े का मुश्किल
मुहावरा भी।
तीन और छ: के मशहूर चुम्बन से उपजता तिरेसठ
जहाँ सात किसी डरे जानवर की तरह आता है,
वहीं,

ठीक वहीं
हम योगरूढ़ संख्यायें अपने ही असीम एकांत में सिमटी हैं
परिभाषा ने हमें किया पद-दलित तुम्हें दिया ठौर
हमें नवाजा खुद के ही भाज्य और खुद के ही भाजक
बन जाने के शाप से
संख्याओ की इतनी विशाल जनसंख्या में
कोई दूसरी संख्या नहीं कर सकती सम्पूर्ण हमें
चुभता है दसमलव प्रेम की हर अतृप्त और
दंडनीय आकांक्षा के सिरहाने
हंसता है क्रूर वह
मुझे टुकड़ों में बाँट
हम अभिशप्त हुए कुछ इस तरह
खुद में जीते खुद ही में शेष होते
खुद से ही विभाजित होंगे का यह
अभिशाप अकथनीय दु:ख है।
रहा एक-

एक ‘ईश्वर की तरह’ सबका है
और किसी का भी नहीं
‘दो’
छ: और आठ से मिल आती है
होली दीवाली की तरह पहाड़े में

मैं अकेला सात खुद का ही भाजक खुद से ही भाज्य
यह क्या जरूरी नहीं अधिकार मुझे
किसी संख्या से विभाजित होती जाऊँ
तब तक जब तक ना बचे कोई शेषफल

बचे सिर्फ शून्य,

पूर्ण विभाजित मैं उस स्त्री के असीम आनन्द को पाऊँ
जिसने जन्मा हो अभी अभी स्वस्थ बच्चा भागफल की तरह,
जिसे वो माँ चाहती हो निहारना अपलक; होते हुए अशेष
यह अपलक की निहार किसी शेषफल के होते सम्भव नहीं
किसी दशमलव की जरूरत नहीं

बार बार
हर बार
क्यों चला आता है दशमलव हमारे एकाग्र उत्सव को क्षत-विक्षत
करने; मजबूर किया हमें अपना ही अंश दशमलव के पार रखने पर
हर बार
बार बार

क्या तुम्हारी इंसानी आंखों में ऐसी
बूँद भी नहीं जो धुले मेरे खंडित जीवन
से दशमलव – जिसके पार पड़ा
मेरा लगभग आकाश
असीम इच्छाओं की खोह
****
जी मेल

ओ पृथ्वी,
तुम्हारे चैट लिस्ट में था मैं
सुनाम उपग्रह की तरह
तुम्हारी गति से अंजान

चलते हुये एक ही राह
आर पार गुजरते स्वप्न
जगे अधजगे सांसो के
बजते ढोल, नींद से बहुत
बाहर चलते हुए साथ टूटे पुल

पर
तब तक साथ जब तक दबा नहीं ‘डिलीट’ का मतलबी बटन।
****
सब दिन नया दिन

रौशनी अपने गुच्छे में लपेटती है
फूल की पंखुरियों सा ताजादम दिन
हो नमक धुली सुबह और बीती रात
तकरार हो/ वार हो पर बची रहे इतनी
समझदारी जितना बीज-पराग रह जाता है
जाते हुए एक फूल से दूसरे फूल तक

मन तृप्त हो भूख सिमट आये अंजुरियों में
रोटी का सच्चा रंग रहे मेरी आंखो में
गवाह की तरह, करते हुए कोई भी करार

एक दिन बस एक दिन नहीं होता
वर्षों के मकड़जाल का सुनहला धागा
किसी एक दिन ही मिलता है इंतजार का खोया
पाया रास्ता एक दिन ही अलविदा की डगर

वर्तमान के कोई एक दिन पड़ता है
नशे में चूर वर्षों वर्ष के निचाट पर
हथौड़े की तरह
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सगरो अंजोर

12:49 pm


( ख़ुशी, धैर्य-ध्रुव, और रूद्र के लिए बड़े भाई-बहनों की तरफ से)

हमारे यहाँ छट्ठी होती है. छः दिन का जब मैं रहा होऊंगा तो क्या गाया गया था, मेरी याद के बाहर है वह. बाद में जब दिमाग़ यादों का घर बनने लगा तो भी छोटे भाई-बहनों के जन्म पर जो मंगल-गीत गाए गए, उसकी उसमें मुकम्मल जगह नहीं बन पाई. मेरा ध्यान गीतों में कम, उन आयोजनों के दौरान अपने हम उम्र के संग छुपम-छुपाई के खेल में ज़्यादा रहा. मैं यह नहीं कह सकता कि सोहर और बधाई सुनते हुए बड़ा हुआ हूँ क्योंकि सुना तो खूब पर तब गुनने का विवेक नहीं था. फिर यह भी था कि मैं एक ऐसे बदलते वक़्त में बड़ा हुआ जब हर अवसर पर गाए जानेवाले मंगल-गीत-- जिसे माएं, मौसियां और उनकी माएं गाती थीं-- को गाने वालों की तादाद घर में कम होती गई और सारे आयोजन अततः टेलीविजन के अनुवाद हो कर रह गए.

संजय उपाध्याय की नाटक-मंडली में सीताराम सिंह ''नांदीपाठ'' का संगीत देने आते थे, उनकी सोहबत में स्क्रिप्ट पर काम करने के बाद मैं भी साथी कलाकारों के साथ बैठ कर गाता-गुनता था. तब चाव बढ़ा. ''नांदीपाठ'' में अनेक भोजपुरी गीतों की जगह थी. भोजपुरी की मेरे मगह आदमी को वही राग-स्मृति है. हालाँकि मां के पास शारदा सिन्हा के कुछ कसेस्ट्स पड़े थे, जिसे उसके घिस जाने तक सबने सुना था. छन्नूलाल मिश्र को तो बहुत बाद में सुनना हुआ.

इधर कुछ दिन पहले दफ़्तर देर से पहुंचने की आशंका में ऑटो में सवार हुआ तो ऑटोवाले की मोबाइल से उठता संगीत और स्त्री-कंठ ने मेरा मन बांध लिया. मैंने आग्रह कर सफ़र पूरा होने तक उसे अपने साथ रखा. बोल थे :

''जुग जुग जिय सु ललनवा भवनवा के भाग जागल हो...
ललना लाल होइयें कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो...

आजु के दिनवा सुहावन रतिया लुभावन हो...
ललना दिदिया के होरिला जनमले....होरिलवा बड़ा सुन्दर हो...

नकिया त हवे जैसे बाबूजी के अंखिया ह माई के हो...
ललना मुहवा ह चनवा-सुरुजवा त सगरो अंजोर भैले हो...

सासु सोहागिन बड़भागिन अन्न-धन लुटावेली हो...
ललना दुअरा पे बाजे ला बधैया अंगनवा उठे सोहर हो...

नाचि-नाचि गावेली बहिनिया ललन के खेलावेली हो...
ललना हंसी हंसी टिहुकी चलावेली रस बरसावेली हो...

जुग जुग जिय सु ललनवा भवनवा के भाग जागल हो...
ललना लाल होइयें कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो...''



इसकी पूरी काया में कितनी इकॉनमी है, और इसके वावजूद यह कितनी ज़्यादा कामनाओं और शुभेच्छा से भरी हुई है- एक बड़े पाए की कविता और क्या होती है ? यहाँ ललनवा के लिए की जाने वाली मंगलकामना क्या शुक्लजी का वृहत्तर लोक-मंगल नहीं है? आठवें दशक के कवि जब यह कहते हैं कि हिंदी कविता का इतिहास बमुश्किल सौ साल का है तो उनसे विनम्र असहमति क्या कबीर-तुलसी की ही साखी देकर व्यक्त की जाएगी? यह सोहर और इसके अनेक ठेठ भाई-बहिन की याद दिलाना क्या काफी न होगा?

मैं तो इन्हें घुट्टी कविता कहना चाहता हूँ. इसे गोबर, रोटी और बच्चों को थापनेवाली उन औरतों ने गढ़ा था जो, जैसा मैंने कहा, कम रही हैं, और अब यह अच्छा ही है कि औरतें गोबर थापने की बजाय विद्यालय जा रही हैं और यह भी कि यह गीत अब कंठ को अगर कम याद है तो, तो 'गूगल की गुल्लक' में जा घुसा है और इस रोशन ज़माने में कहीं-कहीं तो ललना-लालनी का लिंग-भेद किये बिना गाया-सुना जा सकता है. मेरी यादाश्त में शारदा सिन्हा या छन्नूलाल मिश्र के यहाँ जो यह भदेस कंठ निथर गया है (एक फिल्म में इस्तेमाल होने की वजह से इस सोहर में भी), तो इससे न तो उन औरतों का घरु-गायन ही महान रह जाता है और न ही फिल्म या सीडी आदि में उपलब्ध होने कि वजह से यह बाज़ार की चीज़ और लोक-बाहर हो गाया है. अपनी सब्लिमिटी और एसेंस में वह लगातार घटित हो रहा है.

लोक क्या है? एक शिनाख्त भर और क्या? वर्ना जितना बड़ा इसका भूगोल है उसकी थाह क्या तो वामन के डग लेंगे? हम क्या खाकर इसकी संभाल करने का दम भरेंगे? इसके उलट, भला कुछ मनोज तिवारी और गुड्डू रंगीला ही मिलकर इस थाती का क्या बिगाड़ लेंगे? असल बिगाड़ तो तब होगी जब हम, जो लोक की क्षति का एक तरफ अभी और आनेवाले वक्तों में मर्सिया गायेंगे और दूसरी तरफ उसकी शिनाख्त की गुंजाइश तक को नज़रंदाज़ करेंगे. ऐसे तो कुछ नहीं होगा. लोक जहां कहीं भी स्पंदित है, उसे निहुर कर लेना होगा. बार-बार गाँव जाने या ड्राइंग-रूम में कुदाल रख देने से लोक किन्हीं हाथों प्रतिष्ठित नहीं हो जाएगा.

होगा तो वह एक सोहर याद रख लेने से भी नहीं. लेकिन अपने तईं कम से कम मैं सोहर और उसकी सगी कविताओं को अब एक ज़रूरी रेफरेंस की तरह हिंदी कविता पढ़ते हुए याद रखना चाहूँगा. और यह तो तय रहा कि मेरे बच्चू/बच्ची जब दुनिया में आयेंगे और पत्नी सोहर आदि के बारे में अनिभिज्ञता प्रकट करेंगीं तो मैं छः दिन के नए सलोने को गोद में लेकर मां के बगल लग ख़ुद भी दो-चार सोहर गाने लगूंगा...आखिर संपन्न मर्दाना कीर्तन के बनिस्बत  गायन में भी कितने कम साज़ चाहिए-- महज एक चम्मच, जो नाल पर पड़े, नाल न हो तो परात या थाली की पीठ ही सही!
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कथा : १ : उदयन वाजपेयी

2:05 am

(छिटपुट कहानियों के छपने के बाद 'कथा' शीर्षक यह स्तंभ अंततः सबद पर कुछ विलंब से ही सही, शुरू हो रहा है. इसमें कहानियों व उपन्‍यासों का प्रकाशन होगा. स्तंभ की शुरुआत हम उदयन वाजपेयी की कथा-कृति से कर रहे हैं. यह कथा-कृति यह भी बतलाती है कि एक आधुनिक मन कैसे परंपरा की खोज-संभाल करता है. खासकर ऐसे समय में जब हमारे यहाँ यह वृत्ति बिसरा दी गई है, उदयन वाजपेयी का काम एक अनुपम मिसाल की तरह हमारे सामने है. कथा के साथ दी गई चित्र-कृति शिवकुमार गाँधी की है.)



समकालीन
चित्रकला के संसार में कुछ दशक पहले एक अद्भुत घटना घटी. गौड़ संप्रदाय के वंशावलीकार और गायक परधान समुदाय के एक सदस्य जनगढ़ सिंह श्याम ने चित्रकला शुरू की. जैसे ही जनगढ़ ने चित्रकला की यह अनूठी शैली ईजाद की, तमाम परधान चित्रकला की ओर मुड़ गए. परंपरागत संगीतकारों का चित्रकला की ओर मुड़ने का यह अद्वितीय अवसर था. इस प्रक्रिया ने चित्रकला की ऐसी विशिष्ट शैली को जन्म दिया, जो आज पूरी दुनिया में जानी जा रही है. संगीत के चित्रकला में रूपांतरण के इस प्रयोग को समझने के लिए मैंनेजनगढ़ कलमनामक किताब लिखी थी. उसी दौरान परधानों के चित्रों को गहराई से समझने के लिए मैंने कई परधान स्त्री -पुरुषों से उनकी कहानियां सुनी थीं. ये वे कहानियां थीं, जो परधान परंपरया गौड़ों के घरों पर संगीतबद्ध रूप में सुनाया करते थे. इनमें परधानों की विलक्षण कल्पनाशीलता और ज्ञानरूपों के दर्शन होते हैं. सभी कहानियां छत्तीसगढ़ी में थीं और बिखरी हुई अवस्था में. मैंने उन्हें खड़ी बोली में दोबारा संयोजित किया, दोबारा कहा. ‘सात बहनेंऐसी ही एक कहानी है. लेखक के रूप में इसके साथ प्रकाशित मेरा नाम इस कहानी का पता-भर है, जहां से यह कहानी पाठकों को मिली है. - उदयन वाजपेयी

सात बहनें




एक बुड्ढा बुड्ढी की सात बेटियाँ थीं। वे बेहद ग़रीब थे। खाने पीने का ठीक से ठिकाना नहीं था। एक दिन बुड्ढी को मुर्गा खाने की बहुत इच्छा हुई। उसने बुढ्ढे के साथ बेटियों के सो जाने के बाद मुर्गा पकाकर खाने की योजना बनायी। बेटियों ने उन्हें बात करते सुन लिया। वे सब खाना बनाने का एक-एक बर्तन लेकर सो गयीं। बेटियों के सो जाने पर बुड्ढी चूल्हे में आग सुलगाने लगी। उसने बुड्ढे से माचिस माँगी, "माचिस नहीं है, मैं आग कैसे सुलगाऊँ।'

बुड्ढा कुछ कहता इसके पहले ही एक बेटी उठकर बोली, "दाई, ये रही माचिस।' बुड्ढा-बुड्ढी उसे जागता देखकर सोचने लगे, "अरे ये उठ गयी। कोई बात नहीं, एक के होने से फ़र्क नहीं पड़ेगा।' बुड्ढी ने चूल्हे में आग सुलगा ली। वह बोली, "तबेला कहाँ है?' बुड्ढा कुछ कहता इसके पहले ही दूसरी बेटी उठकर बोली, "दाई, ये रहा तबेला।' बुड्ढी ने तबेले में पानी भरकर चूल्हे के ऊपर रख दिया। अब चावल धोने के लिये दौरी की ज़रूरत थी। वह बोली, "दौरी कहाँ है।' बुड्ढा कुछ कहता इसके पहले ही तीसरी बेटी उठकर बोली, "दाई, ये रही दौरी।' बुड्ढी ने सोचा "अरे ये तीन उठ गयीं, कोई बात नहीं, तीन के होने से ख़ास फर्क नहीं पड़ेगा।' बुड्ढी ने दौरी में चावल धोये और बोली, "पैना कहाँ हैं?' बुड्ढा कुछ कहता इसके पहले ही चौथी बेटी उठकर बोली, "दाई, ये रहा पैना।' बुड्ढी ने पैना में धुले चावल डाले और उसे तबेले के ऊपर रख दिया। अब बुड्ढी को धज्जी की ज़रूरत थी। बुड्ढा धज्जी ढूँढने लगा। वह बोली "धज्जी कहाँ है?' पाँचवी बेटी उठकर बोली, "दाई, ये रही धज्जी।' बुड्ढी को तबेले में चावल गिराने के लिये चटवा-करछी की ज़रूरत थी। वह बोली, "चटवा-करछी कहाँ है?' बुड्ढा कुछ कहता इसके पहले ही छठवी बेटी उठकर बोली, "दाई, ये रहा चटवा-करछी।' बुड्ढी को अब छींटी की ज़रूरत थी। "छींटी कहाँ है?' "दाई, ये रही छींटी।' सातवीं बेटी भी जाग गयी थी।

बुड्ढा-बुड्ढी समझ गये कि वे अब ठीक से नहीं खा पायेंगे।

एक दिन बुड्ढा जंगल गया। एक पेड़ में बढ़िया चार पका था। उसने उसकी एक डाल अपनी पगड़ी में बाँधी और घर गया। सातों बेटियाँ घर पर थीं। बुड्ढा बोला, "बेटा, मेरा सिर देख दो।' छह बेटियों ने मना कर दिया हैं। सातवीं बेटी बोली, "दादा, मैं देख दूँगी।' वह बुड्ढे का सिर देखने लगी। बुढ्ढे की पगड़ी के आसपास पके हुए चार टँगे थे। वह पके हुए चारों को देखकर खुशी से चिल्लायी, "मेरे बाप के मूढ़ में चार मिले, चार मिले।' वह चार खाने लगी। सभी बहनें बोलीं, "दादा, हमें चार खिलाने जंगल ले चलो।' बुड्ढा बोला, "ज़रूर ले चलूँगा।'

एक दिन बुढ्ढे ने तूम्बे में पानी भरा, कन्धे पर कुल्हाड़ी रखी, सातों बेटियों को साथ लिया और जंगल की ओर चला गया। जंगल में चार का एक बहुत बड़ा पेड़ था जिसमें ढेरों पके चार लटक रहे थे। बुड्ढा अपनी बेटियों से बोला, "तुम लोग इस पेड़ पर चढ़कर आराम से पके चार तोड़ो-खाओ। मैं आसपास ही लकड़ियाँ काटने जा रहा हूँ। थोड़ी देर में, मैं तुम्हें आवाज़ देकर बुला लूँगा', यह बोलकर वह चला गया।

सातों बेटियाँ पके-पके चार खाने में व्यस्त हो गयीं। बुड्ढा तूम्बा और कुल्हाड़ी लेकर वहाँ से थोड़ी दूर चला गया। उसने वहाँ साजा के एक पेड़ पर तूम्बा और कुल्हाड़ी टाँग दी। तूम्बे में छेद करके सारा पानी बहा दिया और अपनी बेटियों को घने जंगल में अकेला छोड़कर चुपचाप वहाँ से चला गया। हवा के बहने से कुल्हाड़ी बार-बार पेड़ से कराती थी और खट-खट की आवाज़ होती थी। चार खाती बेटियाँ समझतीं कि दादा पास ही में लकड़ी काट रहा है। जब उन्होंने बहुत-सा चार खा लिया, उन्हें बहुत प्यास लगी। वे बोलीं, "चलो पास में ही दादा लकड़ियाँ काट रहा है, उसके पास तूम्बे में पानी है, वहाँ जाकर पानी पी आते हैं।' "दादा रे दादा,' कहती-कहती वे उस ओर चलीं जहाँ से लकड़ी काटने की आवाज़ रही थी। उस ओर से भौं, भौं की आवाज़ भी रही थी। खाली तूम्बे में से हवा गुज़र रही थी, यह उसी की आवाज़ थी, भौं-भौं। बेटियों को लग रहा था कि ये उनके पिता के हाँफ़ने की आवाज़ है जो लकड़ी काट रहा है। खट-खट, कुल्हाड़ी हवा के बहने से साजा के पेड़ पर टकरा रही थी, खट-खट, खट-खट। बेटियाँ जब साजा के पेड़ के पास पहुँची, उन्होंने देखा वहाँ एक डाल पर कुल्हाड़ी लटकी है और एक पर पैंदी में छेद वाला तूम्बा। वहाँ पानी था पिता। वे कहने लगीं, " हो, दादा हमें जंगल में अकेली छोड़कर चले गये। अब हम कहाँ जायें।' वे सातों बहुत दुखी हो गयीं। वे जंगल में यहाँ वहाँ भटकने लगीं। जंगल में एक सुल्ली सेमल का पेड़ था जिसमें कहीं भी गठान नहीं थीं अलावा उसकी चोटी के : सुल्ली सेमल फुलई में गठान! उस पर चढ़ना नाममुकिन था। यह देखकर बड़ी बहन बोली, "सुल्ली सेमल फुलई में गठान, सचके होवे तो तै लिफ़ लै नौ जावे। सुल्ली सेमल अगर तू सच्चा हुआ तो तू झुककर नीचे जायेगा।' उसने सोचा कि सेमल के झुकते ही हम उसपर रेंगते-रेंगते जंगल के पार हो जायेंगे। सेमल का पेड़ झुक गया। सातों बहनें उस पर चढ़कर रेंगते-रेंगते, मुश्किल से चलती हुई जंगल के पार निकल गयीं।

वे कुछ ही दूर चली थीं कि सामने खेत में अलसी और काँस फूली थी। अलसी के नीले और काँस के सफ़ेद फूल मिलकर हवा में पानी की लहरों की तरह हिल रहे थे। सातों बहनों ने सोचा, "अरे ये तो तालाब है। वहीं जाके हम पानी पी लेते हैं।' वे चलते-चलते उस खेत के पास पहुँची तो देखा, वहाँ पानी नहीं है। अलसी और काँसे के फूल हवा में पानी की लहरों की तरह हिल रहे हैं। वे कहने लगीं, "ये हमारे साथ क्या हो रहा है। दादा हमें छोड़कर चले गये और प्यास से बेहाल हम जब यहाँ पहुँचीं, यहाँ तालाब नहीं है।'

वे चलते-चलते बहुत दूर निकल गयीं। वहाँ उन्होंने एक राजा का नया बना तालाब देखा। उसके चारों तरफ सुन्दर अमराई थी। तरह-तरह के पेड़ लगे थे। तालाब लबालब भरा था लेकिन अभी उसका इस्तेमाल होना शुरू नहीं हुआ था। तालाब की निगरानी राजा के सिपाही कर रहे थे। वे यह ध्यान रख रहे थे कि कहीं कोई पशु-पक्षी या आदमी तालाब को जूठा कर दे। बहनों ने जब तालाब देखा तो उन्होंने सोचा "आखिरकार हमें पीने को पानी मिल ही गया।' वे पानी पीने तालाब में जाने लगीं लेकिन जैसे-जैसे वे तालाब में जातीं, तालाब का पानी पीछे हटता जाता। जब वे तालाब के बीच में पहुँची, तालाब का सारा पानी सूख गया। उसमें एक बूँद भी बाकी रही। वे निराश होकर सोचने लगीं, "अब हम क्या करें, हमें देखकर पानी सूख गया। हम जायें तो कहाँ जायें।' बड़ी बहन बाकी बहनों की माँ जितनी बड़ी थी। छोटी बहन की अँगुली में हीरे की अँगूठी थी। बड़ी बहन छोटी बहन से बोली, "ला बहन अपनी अँगूठी मुझे दे दे। इससे हम तालाब के बीच में बँधना बाँधेंगे, तभी तालाब में पानी आयेगा। वरना हम प्यास से मर जायेंगे।' छोटी बहन भी प्यास से छटपटा रही थी। उसने तुरन्त अपनी हीरे की अँगूठी (हिरौंदी मुँदरी) निकालकर दे दी। बड़ी बहन ने अँगूठी को लेकर बीच तालाब में एक खम्भे में गाड़ दिया। जैसे ही अँगूठी गड़ी, पानी छलछलाता हुआ तालाब में भरने लगा। देखते-देखते पूरा तालाब पानी से भर गया। सातों बहनों ने छककर पानी पीया। वे पास ही की अमराई में पेड़ों के नीचे जाकर आराम करने लगीं। बड़ी बहन ने छोटी से कहा, "बाई, ज़रा मेरा सिर देख दे।' छोटी बहन ने जैसे ही बड़ी का सिर देखना शुरू किया, उसकी नज़र अपनी अँगुली पर गयी। अपनी सूनी अँगुली देखकर वह बड़ी बहन से बोली, "दाई, मेरी अँगूठी वापस कर दे। मेरी हीरे की अँगूठी वापस कर दे।' यह कहते-कहते वह रोने लगी। बड़ी बहन ने उसे समझाया, "अगर मैं तुम्हारी अँगूठी तुम्हें लौटा दूँ, तुम मुझे खो दोगी। मुझे अँगूठी लाने तालाब में जाना पड़ेगा, लेकिन तब मैं डूब जाऊँगी।' बड़ी बहन ने छोटी को बहुत समझाया पर वह मानी। वह अँगूठी की रट लगाती चली गयी। यह देखकर बड़ी बहन बोली "मैं तुम्हारी अँगूठी तुम्हे ला देती हूँ।' बड़ी बहन यह कहकर तालाब में जाने लगी। बाकी बहनों ने कहा, "अगर ये तालाब में गयी तो हम भी इसके साथ जायेंगे।' इस तरह छहों बहनें तालाब में जाने लगीं। वे तालाब के थोड़ा-सा भीतर गयीं और गाने लगीं:

टखने तक गया पानी, नहीं मिलती तेरी हीरे की अँगूठी।

फिर वे थोड़ा और आगे गयीं और गाने लगीं :
घुटने तक गया पानी, नहीं मिलती तेरी हीरे की अँगूठी।

वे थोड़ी और आगे गयीं :
जाँघों तक गया पानी, नहीं मिलती तेरी हीरे की अँगूठी।

वे और आगे गयीं :
कमर तक गया पानी, नहीं मिलती तेरी हीरे की अँगूठी।

फिर :
पेट तक गया पानी, नहीं मिलती तेरी हीरे की अँगूठी।

फिर :
छाती तक गया पानी, नहीं मिलती तेरी हीरे की अँगूठी।

वे गाते-गाते ठुड्डी तक डूब गयीं और तब भी उन्हें छोटी बहन की हीरे की अँगूठी नहीं मिली। किनारे खड़ी छोटी बहन उनसे कहती जा रही थी, "दीदी और आगे जाओ। मुझे मेरी हीरे की अँगूठी चाहिए।' बड़ी बहन रोते हुए बोली, "हमारी ठुड्डी तक पानी गया है, अब भी तेरी अँगूठी नहीं मिली है। इसके आगे हम डूबकर ही तेरी अँगूठी खोज सकेंगे। तुम्हें अँगूठी मिल जायेगी, हम नहीं मिलेंगे।' किनारे पर खड़ी छोटी बहन बोली, "कोई बात नहीं, तुम लोग डूब जाओ पर मुझे मेरी अँगूठी चाहिए।' छहों बहनें बीच तालाब में पहुँच गयीं। वहाँ से उन्होंने छोटी बहन की अँगूठी उठाकर बाहर फेंकी और डूब गयीं।

वे डूबीं और डूब कर वे पाताल लोक में उतर गयीं। वहाँ सुन्दर बने हुए मकान थे। छहों बहनें वहाँ आराम से रहने लगीं।

छोटी बहन ने जैसे ही अँगूठी पहनी, उसने अपनी बहनों को बुलाना शुरू कर दिया, "आओ दीदी, वापस जाओ। आओ दीदी, आओ...' दीदियाँ कहाँ से आतीं। छोटी बहन अमराई के एक आम के पेड़ पर चढ़कर रोने लगी। उसी समय वहाँ राजा आया और उसी पेड़ के नीचे जाकर सो गया जिस पर बैठी छोटी बहन सिसक रही थी। राजा के शरीर पर आँसू की कुछ बूँदे गिरीं। राजा ने अपने नौकर को बुलाया और कहा, "इसे चाँटो और बताओ कि ये नमकीन है या खट्टा।' मनुष्य का होगा तो नमकीन लगेगा, पक्षी का होगा तो खट्टा लगेगा। नौकर ने राजा की छाती के बीच गिरे आँसू को चाँटा और बताया कि वह नमकीन है। राजा बोला, "पेड़ पर ज़रूर कोई मनुष्य है, चलो ढूँढो उसे।' नौकरों में एक काना था। उसे ही पेड़ पर पत्तों के बीच छिपी छोटी बहन दिखायी दी। सब उससे कहने लगे, "दोनों आँख वालों को कुछ नहीं दिखा और तुम्हें दिख गया।' काना बार-बार बताता रहा, "देखो वो बैठी है, देखो वो बैठी है।' सब ने वहाँ देखा। ऊपर की डाल पर एक लड़की बैठी रो रही थी। कोई बोला, "जल्दी नीचे उतर वरना गोली मार देंगे।' छोटी बहन डरकर नीचे उतर आयी।

राजा की छह रानियाँ थीं। छहों को एक भी बच्चा नहीं था। नौकरों ने राजा से कहा, "तुम इसे रानी बना लो, शायद इससे तुम्हें सन्तान सुख मिल जाये।' राजा ने उसे अपनी रानी बना लिया। बाकी छह रानियाँ इस नयी रानी को दुश्मन की तरह देखने लगीं। वे सोचने लगीं, "ये एक ओर गयी हमारे ऊपर।'

उस नगर में एक साधू आया। राजा ने साधू को अपनी कुण्डली दिखायी, यह जानने के लिये कि उसकी सन्तान होगी या नहीं। साधू कुण्डली देखकर बोला, "तेरे भाग्य में बच्चा है। मैं तुझे एक डण्डा देता हूँ। तू जाकर इसे उस आम के पेड़ पर फेंक। जितने भी आम गिरें उतने लेकर अपनी रानियों को खिला देना। ध्यान रहे डण्डा दूसरी बार मत मारना।' राजा ने जाकर आम के पेड़ पर डण्डा मारा। पाँच आम गिर गये। राजा ने सोचा, "इन पाँच आमों से तो सिर्फ़ पाँच लड़के होंगे, एक बार डण्डा और मारता हूँ, पाँच और आम पा जाऊँगा।' उसने दूसरी बार डण्डा चलाया। उसके दूसरी बार डण्डा मारते ही गिरे हुए पाँचों आम दुबारा जाकर पेड़ पर लग गये और डण्डा भी हाथ से छूटकर ऊपर टँग गया। राजा साधू के पास लौटा। साधू बोला, "मैंने तुम्हें इतना समझाया था कि दो बार डण्डा मत मारना तब भी तुम माने नहीं।' राजा के क्षमा माँगने पर साधू ने विचार कर उसे एक बार फिर डण्डा दिया। "इसे किसी भी हाल में दूसरी बार मत मारना।' राजा ने आम के पेड़ के पास जाकर डण्डा मारा। तीन आम गिरे। राजा उन्हें उठाकर अपनी रानियों के पास गया और उन्हें देकर बोला, "इन्हें आपस में बाँट कर खा लो।' राजा को पता नहीं था कि छहों रानियों की सातवीं नयी रानी से दुश्मनी थी। छहों रानियों ने राजा के दिये आम आपस में बाँट कर खा लिये। उन्होंने सातवीं को कुछ नहीं दिया।

छहों रानियों ने आम खाकर गुठलियाँ आँगन में फेंक दीं। सातवीं रानी ने उन्हें चुपचाप उठाकर चूस लिया। छहों रानियों को कुछ नहीं हुआ। सातवीं छोटी रानी गर्भवती हो गयी। छहों रानियों को चिन्ता होने लगी, "अब इसके सन्तान हो जायेगी तो राजा इसे और अधिक चाहने लगेगा।' वे सातवीं रानी को और अधिक परेशान करने लगीं। राजा शिकार खेलने जा रहा था। उसने छोटी रानी को एक सुख की बाँसुरी दी और एक दु: की। वह बोला, "जब दु: हो, दु: की बाँसुरी बजाना, मैं तुरन्त भागकर जाऊँगा। जब सुख हो, सुख की बाँसुरी बजाना।' यह कहकर वह शिकार पर चला गया। छोटी रानी ने एक दिन सोचा कि ये बाँसुरी बजाकर तो देखूँ राजा आता भी है या नहीं। देखूँ तो वह मुझसे कितना प्यार करता है। उसने दु: की बाँसुरी बजा दी। सुख की बाँसुरी तो वह रोज़ ही बजाती थी। राजा उसे सुनते ही कहीं सिर टकराता, कहीं पैरों से खून बहाता ताबड़-तोड़ भागता हुआ छोटी रानी के पास गया। जब उसने देखा कि रानी को कोई दु: नहीं है। उसे बहुत गुस्सा आया। वह यह सोचकर वापस चला गया, "अब मैं इसके बुलाने पर वापस नहीं आऊँगा।'

बच्चा होने के समय छोटी रानी पर जब दु: पड़ा, उसने दु: की बाँसुरी बजायी। राजा नहीं आया। वह छहों रानियों से पूछती रही, "मैं क्या करूँ?' उसे बहुत दर्द हो रहा था। वह पहली बार माँ बन रही थी। उसे सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करे। उसने छहों रानियों से फिर पूछा, "मैं क्या करूँ?' छहों रानियाँ बोलीं, "काढ़ी में पाँव डाल लो और कोठी के छेद में सिर डाल लो।' छोटी रानी समझ गयी कि ये रानियाँ उसकी मदद नहीं करेंगी। किसी तरह मुश्किल से उसने जुड़वाँ बेटों को जन्म दिया। छहों रानियों ने आकर उन्हें उठाया और ले जाकर घुड़सार में डाल दिया और छोटी रानी से कह दिया, "तुम्हें लोढ़ा-सिलौटी हुए हैं।' उन्होंने लोढ़ा-सिलौटी लाकर छोटी रानी के सामने रख दिये। उन्होंने यह सोचा था कि हम राजा से भी यही कहेंगे कि छोटी रानी को लोढ़ा-सिलौटी हुए हैं और तब तक घोड़े इसके बच्चों को रौंद डालेंगे। राजा आया। उसने पूछा "क्या रानी की जचकी हो गयी?' रानियों ने बताया कि उसे लोढ़ा-सिलौटी हुए हैं। शाम को जब घोड़ी अपने बच्चों को दूध पिलाने घुड़सार में आयी, उसने वहाँ पड़े बच्चों को देखकर सोचा, " हो राजा के बच्चे यहाँ कैसे गये? मैं इनको भी दूध पिला देती हूँ।' घोड़ी ने इस तरह राजा के बच्चों को दूध पिलाया। सुबह घुड़सार में जब साईस आया तो उसने रानियों से बताया कि बच्चों का कुछ नहीं हुआ है। रानियों ने उन्हें हाथियों की सार में डलवा दिया कि हाथी इन्हें रौंद डालेंगे। शाम को जब हथिनी अपने बच्चे को दूध पिलाने हथिसार आयी उसने वहाँ पड़े बच्चों को देखकर सोचा, " हो राजा के बच्चे यहाँ कैसे गये। मैं इनको भी दूध पिला देती हूँ।' इसके बाद रानियों ने उन बच्चों को गाय के सार में डाला। वहाँ गाय ने उन्हें दूध पिलाया। फिर उन्हें भैंस के सार में डाला गया। वहाँ भी वही हुआ। इस तरह दूध पी-पीकर बच्चे बड़े हो गये। रानियों ने जब यह देखा तो उन्होंने बच्चों को कचरे के घूरे पर डालवा दिया। उनके ऊपर गोबर डाल दिया। बच्चे गुबरीले खा-खाकर और बड़े हो गये। जब वहाँ भी वे नहीं मरे, रानियों ने सोचा कि उन्हें तालाब में डलवा देते हैं। उन्होंने टोकनी में दोनों बच्चों को रखा और उनके ऊपर फूल रख दिया और राजा से बोली, "हम तालाब में नहाने जा रहे हैं। पहले हम फूल सिरायेंगे फिर नहा कर लौट आयेंगे।'

वे तालाब पर गयीं और उन्होंने टोकनी में रखे बच्चों को तालाब में डाल दिया। तालाब के नीचे पाताल लोक में बच्चों की छहों मौसियाँ रह रही थीं। उन्होंने नीचे ही नीचे बच्चों को अपने आँचल में झेल लिया। जब रानियाँ लौटकर आयीं, उन्होंने छोटी रानी को आधे नारियल में पानी और आधे में चने भरकर दिये, सात गठान वाला फटा-चिथड़ा कपड़ा पहनाया और कहा, "तुम तालाब के किनारे के बाग में जाकर उसकी देखभाल करो।'

छोटी रानी तालाब के किनारे के बाग की देखभाल करने लगी। वहाँ मटर, गोभी और भी कई सब्ज़ियाँ लगी थीं। वह दौड़-दौड़कर उनकी रखवाली करने लगी। तालाब में कमल के दो खूबसूरत फूल खिले। राजा ने उन्हें देखा और सोचा कि इन खूबसूरत फूलों को तोड़ना चाहिए। राजा जैसे ही उन फूलों को तोड़ने हाथ बढ़ाता, वे फूल तालाब के बीच में चले जाते। जब वो हाथ हटाता, वे दोबारा उसके पास जाते। राजा परेशान हो गया पर उन्हें नहीं तोड़ पाया। उसने गाँव के सारे लोग बुलवाये। वे भी उन फूलों को नहीं तोड़ पाये। गाँव वाले गाने लगे :
मोरे गोड़ तरे तरे आवे रे
बकुला के फूल।

गाना सुनकर वे फूल क़रीब जाते लेकिन जैसे ही गाँववाले उन्हें पकड़ने हाथ बढ़ाते, वे दूर हो जाते। राजा ने छहों रानियों को बुलाया। वे उनके हाथ भी नहीं आये। राजा परेशान हो गया। आखिर इन फूलों को कौन तोड़ सकेगा? अब तो कोई बाकी भी नहीं था। किसके हाथ में ये फूल आयेंगे। आखिरकार बाग की रखवाली करने वाली, कौए भगाने वाली छोटी रानी को बुलाया गया। छोटी रानी ने नौकरों से पूछा, "हमें काहे को बुलाते हैं। मैं कौआ हाँकने वाली, मैं नहीं जाती। मुझे राजा डाँटेगा।' नौकर बोले, "चलो चलो, तुम्हें राजा ने बुलाया है।' रानी बोली, "मैं ऐसे नहीं जाऊँगी। पहले मेरे लिये गरम पानी लाओ, मैं नहाऊँगी। नये-नये कपड़े लाओ, मैं पहनूँगी। अच्छे-अच्छे ज़ेवर लाओ, मैं सजूँगी। यहाँ से तालाब तक पैसे बिछाओ। एक हाथी लाओ। मैं हाथी पर चढ़कर राजा के सामने जाऊँगी।' नौकरों ने आकर यह सब राजा को बताया।

राजा बोला, "जो-जो रानी कहती है सो करो।' छोटी रानी नये कपड़े, ज़ेवर पहनकर बिछे हुए पैसों पर हाथी पर चढ़कर राजा के सामने आयी। वह बोली, "मैं ऐसे इन फूलों को नहीं बुलाऊँगी। पहले घाट पर बढ़िया आसन लगाओ।' घाट पर आसन लगाया गया। वहाँ बैठकर छोटी रानी ने गाना गया :
मोरे गोड़ तरे तरे आवे रे बकुला के फूल
मोरे गोड़ तरे तरे आवे रे
बकुला के फूल

तालाब के नीचे बच्चों ने पाताल लोक में रहती अपनी मौसियों से कहा :
देख तो बड़दाई
मोरी दाई मँगावे रे
बकुला के फूल
मोरी दाई मँगावे रे
बकुला के फूल
मौसियाँ बोली :
दै दे रे बेटा
दै दे रे बेटा
तोरी दाई मँगावे
बकुला के फूल

यह सुनकर बच्चे बोले, "ठीक है बड़ी माँ, हम जाते हैं।' दोनों बच्चे उछलकर छोटी रानी की गोद में गये। छोटी रानी बोली, "राजा ये मेरे बच्चे हैं। तू अपनी छहों रानियों को रख, मैं अपने बच्चों के साथ अकेली रहूँगी, भले ही मुझे भीख माँगना पड़े।' यह कहकर उसने राजा को उसके बच्चों के साथ घटी सारी घटना बतायी। उसने बताया कि कैसे छह रानियों ने बच्चों को घुड़सार में, हथिसार में, गोसार में फिकवाया था, घूरे पर डलवाया था, तालाब में फेंका था। राजा ने बहुत मनाया तो वह बोली, "मैं तुम्हारे घर में यूँही नहीं जाऊँगी। पहले उसके सामने कुँआ खुदवाओ। इनका सिर नीचा और पाँव ऊपर करके इन्हें उसमें लटकाओ और इनके पाँवों पर दीया जलाओ। मैं दीयों को कुचलते हुए घर के अन्दर जाऊँगी।' राजा ने उसकी यह शर्त मान ली। छह रानियों के पाँवों पर जगमग जलते दीयों पर पाँव रखकर बच्चों को हाथ में लिये राजा के साथ छोटी रानी अपने घर को चली।

पाताल लोक में छहों बहनें सुख से रहती रहीं। सातवीं, राजा और अपने बच्चों के साथ चैन से रहने लगी।



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*मेरे पाँव के नीचे जाओ, कमल के फूल।
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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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