सबद
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अपने लेखक होने का सबसे कम मुज़ाहिरा

3:16 am


भालचंद्र नेमाड़े से पहले मनुष्य की तरह मिलना होता है. मराठी हैं, यह उनकी हिंदी सुनकर लगता है. किसान होंगे, यह उनकी काया देख कर लग सकता है. लेकिन 'कोसला' और 'बिढार' के लेखक भी हैं, यह बताने पर ही ज़ाहिर होता है. दरअसल, ऐसे लोग अपने लेखक होने का सबसे कम पता देते हैं. इसीलिए पहले उन्हें मनुष्य की तरह मिलना/पाना होता है. हालाँकि मनुष्य की तरह मिलना सबसे आत्मीय ढंग से मिलना है, फिर भी उसमें ''पहली दफ़ा मिल रहे हैं'' का अहसास तो रहता ही है, लेकिन यहाँ तो यह अहसास भी नहीं. गीत को तो उन्होंने पढ़ा था और इसी नाते जानते थे, मुझ ना-कुछ के साथ तो यह भी नहीं था. पर वो मिल रहे हैं. और वो जारी हैं, हमें शामिल करके. पूछ रहे हैं, सुन रहे हैं...बातचीत चल पड़ी है... आप न कुछ में भी भरपूर रूचि ले रहे हैं...अभी होटल के कमरे में हैं, अभी आपके लिए एक कप चाय निकालेंगे. चाव से पियेंगें और इसकी परवाह नहीं करेंगे कि उनकी पकी हुई बड़ी मूंछें चाय का रंग पकड़ रही है. साहित्य का प्रसंग आएगा तो अपनी बात रखेंगे और ऐसे मानो बड़ी बातों को सहजता से कहने की आदत उनमें ७२ की उम्र ने नहीं डाली.


गीत चतुर्वेदी के कहानी-संग्रहों के लोकार्पण के लिए आए हैं, लेकिन गीत और मेरी उम्र के हो गए हैं और अब हम लोग इस बात से बेपरवाह कि शाम में लोकार्पण है, दिल्ली घूमने के नाम पर क़ुतुबमीनार देखने की इकठ्ठा चाहत पाल बैठे हैं. हम अपने ठिकाने से वहां जल्द पहुंचा देने वाली एक गाड़ी में सवार हुए हैं और क़ुतुब के परिसर में हैं. नेमाड़े जी मीनार और परिसर देख विभोर हो रहे हैं और इस बात से चकित हैं कि एक आम गर्म दिन में भी इस परिसर में करीब २५ हज़ार लोग आए हैं. सैलानी, जिज्ञासु, परिवार और प्रेमी...ज़्यादातर हमारी ही तरह किसी गाईड की मदद के बिना शिलालेख पढ़ने और उसे इंटरप्रेट करने में मसरूफ़ .


वे हमारी जिद पर कई जगह रुकते हैं और हम मराठी साहित्य में क़ुतुब जैसे ऊंचे कद के इस लेखक की तस्वीरें ले रहे हैं..वे अपनी दुनिया देखी हुई आंखों से हमें फर्क करके बता रहे हैं कि परिसर का कौन सा हिस्सा ठेठ हिन्दू काट का है...हम खुदे हुए अक्षरों से एकाध बार उनसे नज़रें बचाकर इसका अचरज भरा सत्यापन करते हैं...


क़ुतुब से लौटते हुए मेरे कमरे पर आए हैं....बहुत छोटा पैग व्हिस्की का लेकर किताबों की तरफ अपना रुख कर लिया है...और अब वे किताबें देख रहे हैं...फ़िल्में भी...हमारे सिने-प्रेम पर खुश हैं, किताबों के अटाले पर यह कह कर मुग्ध कि यह तो जीने का सबसे समृद्ध कबाड़ है... मुझे याद पड़ता है कि यह उनके आने वाले उपन्‍यास का थीम-सब टाइटल भी है, लेकिन यह याद नहीं पड़ता कि किसी बड़े लेखक ने इतनी देर तक और इतने चाव से  चुपचाप एक उमस भरी दुपहरी में दूसरी भाषा की किताबों को यहाँ इतना दुलारा हो...

अब तैयार हैं...गीत अपने फिक्शन के हीरो के साथ स्‍टेज शेयर कर रहे हैं... नेमाड़े जी, नामवरजी और पंकज बिष्ट के बीच बैठे हैं...लोकार्पण का कार्यक्रम जारी है...पंकज मुख्य वक्ता हैं, और यह बताकर कि वे गीत के दोनों संग्रहों की ६ में से बड़ी मुश्किल से २ कहानियां ही पढ़ पाए हैं, अपना मूर्ख-वक्तव्य शुरू करते हैं और उसे लगभग हास्यास्पद होने की हद तक खींचते जाते हैं... (बलिहारी समझ की!!!)...  उनके सवालों से ऐसा लगता है कि...  अब 'रूढि़यों की भी राजनीति' होनी है... नेमाड़े जी पंकज का हल्कापन अपने वक्तव्य से ढांप लेते हैं और नामवर जी के अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य से ऐसा लगा कि उन्‍होंने गीत की कहानियों के साथ 'क्षण-भर' नहीं, कम से कम आज दिन-भर की संगत की है... उपरांत-गोष्ठी में नेमाड़े जी जैसे गैर हिंदी-भाषी तक नोट करना नहीं भूलते कि क्यों नामवर के यहाँ आलोचना इतनी समृद्ध है...
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कवि कह गया है : ६ : शिरीष कुमार मौर्य

9:33 pm

{ कवि कह गया है शीर्षक इस स्तंभ में हिंदी के महत्वपूर्ण युवा कवि शिरीष कुमार मौर्य का लिखना अपरिहार्य था, और हमारे आग्रहों पर उन्होंने अपनी कविता के जिन स्रोतों की ओर यहां इशारा किया है, वे उनकी कविता की हमारी समझ को और बेहतर बनाने में मददगार सिद्ध होंगे, इसमें दो राय नहीं. }

शर्मिन्दा होना भी कवि होना है

अपनी कविता के तीन निर्णायक और बुनियादी तत्वों के बारे में कुछ बातें रखूँगा...

स्मृति
कविता से परिचय पुराना है और नया भी। 12-13 बरस का था। पहाड़ में बहुत ऊंचाई पर बसे अपने गांव नौगांवखाल से चीज़ें ज़्यादातर सुन्दर ही दिखती थीं। आसपास बिखरा जीवन स्वाभाविक रूप से संसाधनहीन था पर उसे हम अपना मानते थे और ख़ुश रहते थे। स्कूल के अलावा छुट्टियों में गाय चराने जाना, दाय रिंगाना यानी गेंहू की बालियों पर मुंह बंधे हुए बैल घुमाना, सीढ़ीदार खेतों में हल चलाने की कोशिश करना और अपने विशालकाय 70 किलो वज़नी कुत्ते के साथ चीड़ की गिरी हुई पत्तियों पर फिसलना जैसे कई शगल थे। स्तब्ध रातों में जंगलों से निकल कर कुत्ते और गायों को शिकार बनाने वाला तेन्दुआ जिसे हम बाघ कहते, हमारे दिलों में छुपा एकमात्र भय था। बालों को कंघी से संवारने की जगह कबरी नाम की गाय से चटवा कर उनके साथ वैसा सलूक करना जैसा आज के किशोर जैल लगाकर करते हैं, हमें प्रिय था। वह गाय इतनी रहमदिल कि अपने बछड़े के साथ-साथ हमें भी उतनी ही ममता से चाटती थी। यह पूरा जीवन ही कवितामय था, कविता जिसे हम जानते नहीं थे, कोर्स में पढ़ते ज़रूर थे। तब किताबों में सूर, तुलसी, कबीर को पढ़ते तो लगता यह धर्म जैसी कोई चीज़ है, जिसे बिना समझे रट लेना और स्वीकार करना ही विद्यार्थी के रूप में हमारा कर्त्तव्य है।

समूचा जीवन ही मानो कविता था पर कविता लगभग नहीं थी। इस जीवन के अपने संघर्ष थे। उनमें कितनी तो औरतें थीं - काम में खटतीं, थोड़े-से प्यार और सम्मान की आकांक्षा लिए ज़माने से जूझतीं और पिटतीं। उन औरतों ने ही मेरा व्यक्तित्व बनाया, यह बात आज मेरे लिए जीवनमूल्य की तरह है। इलाक़े में न बिजली थी, न नल। पानी के लिए नौलों (जल स्रोतों) तक जाना होता था। सर पर बंठे और हाथ में जरीकेन लिए गांव की औरतें ही इस सफ़र में हमारी अगुआ होती थीं। हम नौलों पर नहाते और टैडपोल पकड़ते, औरतें कपड़े धोतीं और घर तक ले आने को पानी भरतीं। पानी लाने के बाद खेतों कमर झुकाए काम करतीं, ढलानों पर घास काटतीं, पेड़ पर लूटा लगाने में मर्दों से मदद की मनुहार करतीं वे औरतें....उफ़ वे औरतें......लड़कपन जाने के बाद उनके श्रम को भीगी आंखों देख पाया हूँ क्योंकि कवि हूँ ! हो न हो, जीवन में घट रहे बुनियादी श्रम को जानना ही कवि होना है। वह दिल को आरपार भेद जाने वाली चीज़ है...आज उसकी याद भर से ही दिल टूटता है...शर्मिन्दगी होती है....हो न हो, शर्मिन्दा होना भी कवि होना है ।

सबद के पन्ने टटोलते हुए कहना चाहता हूँ कि स्मृति के नाम पर बार-बार मिथकीय महाकाव्यों और उनके विद्रूप और विषाद में जाने वाले दोस्तो...हो सके तो स्मृति को मिथक बनने से बचाओ। ये एक हाड़मांस से बनी मस्तिष्क के भी भीतर कोई एक और मस्तिष्कनुमा चीज़ हैं, जिसमें वास्तविक मानवीय सन्देश ले जाने वाले न्यूरॉन्स दौड़ते हैं। इनमें असली छुअन है - ममतालू कमेरी औरतों के कठोर हाथों की छुअन! इनमें वास्तविक गंध है - जीवन में खिले पहले फूलों और फिर हमारे सड़ चुके सामाजिक-राजनीतिक ढांचे और उसके विद्रूपों की गंध! पहाड़ी आदमी हूँ इसलिए कहूँगा कि इनमें जाड़ों के दिनों की गर्म सुखद भाप है- कविता में विलीन हो जानेवाली हमारे पूरे वजूद से उठती भाप! इनमें कुछ खेल हैं - सपाट मैदानों में भरपूर दौड़ते उपद्रवी बच्चों के और भाषा में कुछ अन्दरूनी कूदफांद, कुछ खिलवाड़ - जानलेवा, जैसे जानबूझ कर ग़लत वक़्त पर सड़क पार करना!

स्मृतियाँ बेइन्तहा हैं - भारी और थिर मगर भीतर के भूचालों में हिलते पहाड़ों जैसी, कभी शान्त तो कभी गहराते-हहराते समन्दरों जैसी, घास के बेहद छुपे हुए नन्हें-पतले-हल्के बीजों जैसी -- मेरे लिए जब वे कविता में हैं तो कविता है-- जो मेरे लिए तो कविता पर औरों के लिए शायद लगातार जारी रहने वाला स्मृतिलेख -- अनापशनाप -- वैसा ही मेरा जीवन भी उनमें -- बढ़ाचढ़ा -- ऊटपटांग! हमेशा बाक़ी रह जाने वाला। चन्द्रकान्त देवताले ने एक बार कहा फोन पर कि शिरीष सबसे ज़रूरी बात हमेशा रह जाती है - वैसी ही कई ज़रूरी स्मृतियां मेरी, वैसी ही अधूरी और बेबस, बाद में भीतर से टीसती इतनी सारी बातों से भरी पर सबसे ज़रूरी को छोड़ जाने वाली कमबख़्त कविता मेरी!
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स्वप्न

कितने स्वप्न जीवन में, कितने ज्यों के त्यों कविता में भी। रातों को, सुबहों - दोपहरियो और शामों को गुंजाते हुए स्वप्न। नींदों में ले जाने और नींदों से बाहर लाने वाले स्वप्न। उनमें कितनी राजनीति, कितना समाज, कितना व्यक्ति, कितनी प्रकृति, कितना प्रेम, कितना प्रतिशोध, कितना क्षोभ, कितनी वीप्सा उनमें ....कितना वक़्त ज़ाया किया उन्हें देखते...कभी बहुत धीमे तो कभी तेज़ी से। निकल गए कितने ही क़ाफि़ले, कितने दोस्त- मैं स्वप्नों में भटकता रहा, वे चलते रहे स्वप्न से बाहर- मैंने उन्हें चलता देखता रहा, उनके साथ क़दमताल करने की ख़्वाहिश नहीं जगी कभी मन में। अपने जीवन की क्रूर, दयनीय और भयावह वास्तविकताओं से थककर सोया कभी तो महान, अनन्त और अपार स्वप्नों ने जगाए रखा। मालूम नहीं कब वे स्वप्न से वास्तविकता में बदलते गए, उतने ही महान, अनन्त और अपार। कई कविताएं स्वप्न में बनीं और पन्ने पर उतारते हुए स्खलित-असफल हो गईं। इतना ज़रूर कहूँगा कि कभी कुछ खोया नहीं स्वप्न में, हमेशा पाया ही। जीवन पाया और कविता भी। यथार्थ भी पाया वहीं, छटपटाता हुआ।
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यथार्थ

स्मृति और स्वप्न के बीच एक जगह। मेरे लिए प्रॉमिस्ड लैण्ड - पाकज़मीन - येहूदा की कविताओं के अनुवाद करते हुए जाना ये शब्द। सैद्धान्तिक होने के बावजूद यथार्थ एक शानदार चीज़ है। दारूण, कारुणिक, भयावह, क्रूर, जैसा नहीं होना चाहिए, वैसा.... मगर शानदार! इंसानियत और कवित्त दोनों को जगाए रखनेवाला। उसमें मेरी राजनीति है, मेरे लोग हैं, मेरा प्रेम है, मेरा परिवार है, मेरी कविता है, मेरे दोस्त हैं। उसमें धमकियां हैं, हौसला है, लड़ाई है, हार है, असफलताएं हैं उसी में कहीं ठीक बीचोंबीच। पुरखे कवि हैं स्मृति और स्वप्नों के बीच खड़े हुए - इसमें से कुछ यथार्थ उनका भी है - कुछ सिर्फ़ मेरा है - पहचान पाएं या नहीं, कुछ दोस्तो का भी है। उसे कभी मैं बदलकर दूसरा यथार्थ कर देना चाहता हूँ और कभी लौट कर पिछला वाला ही!

मैं 73 के अखीर में पैदा हुआ पर 1857 का यथार्थ मेरा है, चालीस और पचास और साठ! ये मेरे यथार्थ हैं, जिनसे वह यथार्थ बना, जिसमें मैं आज रहता हूँ। मेरे दादा तन मन से समर्पित सामन्त थे, पिता बीच में झूलते रहे, मैं पूरी तरह अध्यापक बना ! आज पुरखों की ज़मीन बिक चुकी तो पिता उदास हैं, आज उन्हें कोई उतनी इज़्जत नहीं देता, जितनी उनके पिता को, तो वे उदास हैं, कुछ है, तो वे उदास हैं, कुछ नहीं है, तो वे उदास हैं - पिता उदास हैं, तो मैं ख़ुश हूँ। उनकी स्मृतियों और स्वप्न के बीच जहां अब कोई जगह नहीं, ठीक वहीं मेरे पैरों ने सीधा खड़े हो पाने का भरोसा पाया - यह निजी यथार्थ है।

फिर सामाजिक यथार्थ - विकल हाहाकार से भरा, टूटता, बिखरता, शर्मिन्दा करता! मेहनतकश कौमों को रौन्दता। देखिए ज़रा ग़ौर से हज़ारों साल पुरानी सभ्यताओं के टीलों में कुछ सांप सा बिलबिलाया !

फिर राजनीतिक यथार्थ - साम्प्रदायिकता, जातीयता और वैश्विक प्रपंचों से अटा एक दीर्घकाय अंधकार। दीवारों पर लिखने, पोस्टर चिपकाने, जुलूस निकालने और नारे लगाने के सिर्फ आशय नहीं बदले, अर्थ भी बदल गया। शाखामृगों ने धरती सम्भाली और धरती के प्राणी पहले भूमिगत हुए फिर मायावी। बजंरगबली छात्रनेता बने, फिर विधायक और फिर मुख्यमन्त्री-प्रधानमन्त्री। मलेच्छ को राष्ट्रपति बनाने का पुण्य कमाया- रामनाम भाया!

फिर आर्थिक यथार्थ - बड़ी तनख़्वाहों और खेतिहर कमकरों की आत्महत्याओं का यथार्थ - राष्ट्रीय और कितना तो बहुराष्ट्रीय। पहले राजीवनयन, मनमोहन और अटल - और फिर हर कहीं सोनियासमन्दर लहराया!

फिर साहित्यिक यथार्थ - जनता बिला गई। स्वप्न डूब गए। नैतिकता मुहावरा बनी। कुछ लोग तब भी लगे रहे। बचे रहे। पुरखे बने, अगुआ बने-अग्रज बने, साथी बने। अंधेरे में टटोलने पर हाथ आयी डाल बने। कविता में भी सत्ता बनी, थूकी गई गिलौरी फिर पान का नया पत्ता बनी। कुछ लोग तब भी मुंह मोड़े रहे, बिलाई हुई जनता से दिल जोड़े रहे। उनके दिल टूटे पर कविता जुड़ी रही। उन्हें देखता-उनकी आहटें और राहें टोहता आह भरकर कहता हूँ चलो इस लिखने-पढ़ने से कुछ तो पाया!
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मैं कुछ कहूँ और बाक़ी न रहे! सबसे ज़रूरी बात हमेशा रह जाती है। अब भी रह गई होगी। जैसा कि एक कवि ने कहा है -अनिद्रा की रेत पर तड़पड़ तड़पती रात / रह गई है / रह गई है कहने से सबसे ज़रूरी बात !
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सम्‍मुख - 1 : गीत चतुर्वेदी

7:30 am
साक्षात्कारों की यह सीरीज हिंदी के प्रखर युवा कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी के साथ शुरू हो रही है और 'सम्मुख' नामक यह स्तंभ उन जैसे रचनाकारों के साथ संवाद को ही समर्पित रहेगा. सबद विस्तार से की गई ऐसी बातचीत के ज़रिये 'नए' को लेकर फैलने वाली अफवाहें और भ्रम की स्थिति दूर करने की भी न्यूनतम आकांक्षा रखता है. गीत के साथ यह बातचीत अनेक चरणों में संपन्न की गई और इसमें सम्मुख के अलावा दूरदर्शन के लिए रिकॉर्ड किये गए साक्षात्कार अंश और उन तमाम फ़ोन काल्स, ई-मेल्स और चैट को भी शामिल किया गया है जिनमें उठे प्रश्नों और जिज्ञासाओं का शमन उन्होंने मुझे सम्मुख मानकर ही किया.

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लिखना दरअसल कविता लिखना है


बातचीत की शुरुआत आपकी कहानियों से करते हैं. आप लंबी कहानियां लिखते हैं. लेकिन उसे लोग ज़रूरत से ज्यादा लंबी बता कर पढ़ते/छोड़ते रहे हैं...आपको फर्क पड़ता है?


नहीं. मैं ऐसे लोगों से मिला हूं, जिन्‍हें कहानी से ज़्यादा उसकी पृष्‍ठ संख्‍या में दिलचस्‍पी होती है, वे उसी आंकड़े से उसे रेफ़र करते हैं या उसकी निंदा करते हैं. मुझे हंसी आ जाती है, उनके लिए एक नया विधात्‍मक नाम बहुत लंबी कहानीकी स्‍थापना करनी होगी? किसी लेखक का एक उपन्‍यास 272 पेज का है और दूसरा उपन्‍यास 972 पेज का, तो क्‍या वह दूसरे उपन्‍यास को लंबा उपन्‍यासकहना चाहेगा? वरना उसे उपन्‍यास नहीं माना जाएगा?

फिर आपके लिए लंबी कहानी के क्‍या मायने हैं?

मेरे लिए लंबी कहानी, ‘नॉवेलाके लिए एक क़रीबी हिंदी पर्यायवाची शब्‍द है. नॉवेला कहानी यानी शॉर्ट स्‍टोरी से ज़्यादा दुस्‍साहसी होता है, कई बार उपन्‍यास का दरवाज़ा खटखटाता है, पर उसमें प्रवेश करने जितना साहस नहीं जुटा पाता. जो कि लघु उपन्‍यास (मुझे फिर यह शब्‍द अधूरा ही लगता है) या उपन्‍यासिका या नॉवलेट को बहुधा लांघ जाता है. इसलिए मैं कभी उसकी आकारगत लंबाई पर बात नहीं करना चाहता.

आपके फि़क्‍शन की दो अंतर्धाराएं हैं- एक जो ऊपरी सतह है, वह गल्‍प का लगभग निषेध करते हुए आगे बढ़ती है, दूसरा अंदरूनी सतह बनता ही छोटे-छोटे कि़स्‍सों, उपकथाओं से है. कहां मन रमता है आपका?

यह सही है. ऊपरी सतह के विवरण आपको भ्रम में डालते हैं कि क्‍या यह कहानी है भी? दूसरी अंदरूनी सतह पर तरलता है, वह आपको पकड़ सकती है, लेकिन मैं इस दूसरी अंतर्धारा में इतना ज़्यादा नहीं जाना चाहता कि पाठक का ऊपरी सतह से संपर्क टूट जाए. इसका उल्‍टा भी नहीं करना चाहता. यानी वह पूरी तरह निचली तरलता में रहने के बजाय ऊपर आकर बीच-बीच में ऊपरी धारा के प्रवाह से टकराए भी. कम से कम लिखते समय तो मैं ज़रूर ही टकराऊं. इस टकराने से अर्थों की चिंगारियां निकलती हैं. जैसे मुझे याद पड़ता है, जब बोलान्‍यो का 2666आया था, तो एक समीक्षक ने लिखा था- इस उपन्‍यास को पढ़ना नहीं होता, इससे कुश्‍ती लड़नी होती है.मेरे लिए यह रीडिंग का बहुत आकर्षक तरीक़ा है. हर बड़ी किताब आपको चुनौती देती है. आज आप वार एंड पीसपढ़ें, तो आपको उससे भी वही कुश्‍ती लड़नी होगी. और एक निख़ालिस पाठक को यह हमेशा सहर्ष स्‍वीकार होती है. आप तरलता से किताब को पढ़ते जाएं, उसमें डूबते चले जाएं, वह सम्‍मोहित करके आपको जहां चाहे, तहां ले जाए, यह स्थिति मुझे बड़ी दयनीय लगती है. यह कंफर्ट की रीडिंग है. मैं ऐसी रीडिंग नहीं पाना चाहता. उसमें आप डूबकर बाहर निकलते हैं, तो पाते हैं कि आपके कपड़े भीगे हुए हैं, लेकिन आप शांत, निर्मल, वासुदेव कृष्‍ण की तरह मुस्‍कुरा रहे हैं.

यानी पाठक और रचना के बीच कोई मुरव्वत का सम्बन्ध न बने?

बिल्‍कुल, बिल्‍कुल. पाठक कहानी को अपनी तरह से कहीं ले जाना चाहता है, लेकिन कहानी उसके नियंत्रण में नहीं होती. उसे लेखक कहीं पहुंचा चुका होता है. जब पाठक और रचना का संघर्ष चल रहा होता है, तो कहानी एक तीसरी जगह पहुंचती है, जिसकी कल्‍पना न लेखक ने की होती है और न ही पाठक ने. इसीलिए किताबों को लेकर लेखकों का दृष्टिकोण अलग होता है, पाठकों का अलग और अकादमिक आलोचकों का अलग. हर तरह की रीडिंग रचना को संपन्‍न बनाती है. इसीलिए इन दोनों अंतर्धाराओं से मैं अपने कंफर्ट ज़ोन को तोड़ता हूं, इसी के साथ-साथ पाठक के कंफर्ट ज़ोन को भी तोड़ते रहना होता है. इसी के कारण एक से ज़्यादा अर्थों की तरफ़ जाना हो पाता है. विचार व थीम के एक से ज़्यादा स्‍तर. ऊपर से एक, पर भीतर से अनेक.

इस अनेक में कहानी का एक, या मुख्‍य थीम को कैसे उभारते हैं आप?

मेरा पहला ध्‍यान एक पर होता है, क्‍योंकि एक की उपस्थिति के बिना अनेक की परिकल्‍पना नहीं हो सकती. इसीलिए कि वहां आइरनी हैं, डार्क ह्यूमर है. इसीलिए वहां क़हक़हे का अनुवाद एक विरल रुदन में हो सकता है. जैसा कि साहिब है रंगरेज़में है. अगर आप सिर्फ़ क़हक़हा पढ़ेंगे, तो उसे तुरंत स्‍त्रीविरोधी मान लेंगे, जैसा कि कुछ आलोचकों ने उसके बारे में लिखा भी. लेकिन वे सारे लोग पुरानी आसान पाठकीय परंपरा से संबंध रखते हैं. वे निचली धारा की तरफ़ जाएंगे, तो उन्‍हें ख़ुद अपने सवालों का जवाब मिल जाएगा. मैंने एक बार कहा भी था-- मेरी कहानियां त्‍वचा के मोमजामे में लिपटे शरीर की तरह हैं, बाहर से जुड़ी-ढंकी, आकार में, लेकिन भीतर नसों-शिराओं-अवयवों का अनमैप्‍ड मायाजाल है. जो नस पैर की ओर जाती दिखती है, उसे पकड़ें, तो दिमाग़ तक पहुंचा देगी. इनमें बहुत-से स्‍वर-स्‍तर हैं, कई थीम, कई विचार, जो अपने आलाप में लगातार जटिल व समस्‍यामूलक होते जाते हैं, जिन्‍हें छूने या पकड़ने के लिए विस्‍तार की ओर जाना पड़ता है. एकल वाद्य नहीं, मांतोवनी के ऑर्केस्‍ट्रा की तरह बहुत सारे, कुछ तीखे भी. जो चीज़ें कहानी के बाहर की मानी जाती हैं, वे भी मेरे यहां कहानी के भीतर हैं. इनमें औपन्‍यासिक तत्‍वों का प्रयोग होता है, लेकिन फिर भी ये उपन्‍यास नहीं, कहानियां ही हैं.

साहिब है रंगरेज़ जैसे आसान पठन की शिकार आपकी ताज़ा कहानी पिंक स्लिप डैडीभी हुई... उसके मल्‍टी-लेयरिज़म, जो आपके फिक्शन में एक ज़रूरी तत्व की तरह मौजूद है, को नज़रंदाज़ कर उसे सीमित यथार्थ को एड्रेस करनेवाली कहानी तक कहा गया..

पिंक स्लिप डैडीएक अपर-मिडिल क्‍लास आदमी की कहानी है, जो जीवन में सफलता पाने के लिए किसी भी स्‍तर तक जा सकता है, इसके बैकड्रॉप में कॉर्पोरेट है और इन दिनों जैसा चल रहा है कि कॉर्पोरेट जीवन के हर हिस्‍से में शामिल हो गया है, चाहे हम सब्‍जी लेने जाएं या फ़सल काटने जाएं, कॉर्पोरेट हर जगह हमारे जीवन को संचालित कर रहा है. तो कॉर्पोरेट, अपने दुष्‍प्रभावों के साथ व्‍यक्ति के जीवन को किस तरह मूल्‍यविहीन कर रहा है, यह उस कहानी में मोटे तौर पर है, लेकिन कहानी सिर्फ़ एक लेयर पर नहीं चलती, उसमें बहुत सारे लेयर्स, कई सारे धरातल एक साथ.... प्रेम,छल, सफलता की षड़यंत्र भरी कामना, उससे पैदा अकेलापन, स्‍वांग, भ्रम, एलिनियेशन और एस्‍ट्रेंजमेंट. ये सब. तो उसे सीमित यथार्थ काजैसा कहना एक बहुत फ़ौरी और सतही रीडिंग है...मेरे लिए पीएसडीकॉर्पोरेट की ही कहानी इन्हीं वजहों से नहीं रह जाती.

''पीएसडी'' का हर किरदार प्रेम की उत्‍कट इच्‍छा से भरा हुआ है, फिर भी वे प्रेम की स्थितियों को मैनीपुलेट करते हैं?

वह इसलिए क्योंकि उनकी प्रेम की उत्कट इच्छा में भी इतना छल आ चुका है कि प्रेम अपनी सरलता और मासूमियत में बरक़रार ही नहीं रह पाता. ऐसे में वे इन स्थितियों को मैनीपुलेट करते हैं. वहां हर विचार एक स्‍वीकृत सफलता की ओर जाता है. सफलता इस समय का सबसे बड़ा दबाव है. आप असफल नहीं होना चाहते, जीवन दो ध्रुवों के बीच झूलता है, हर चीज़ को हार और जीत के पलड़ों पर तौला जाता है, यहां तक कि दो लोगों के बीच की साधारण बातचीत में भी यह तय किया जाता है कि कौन विजयी रहा. ताज्जुब नहीं कि प्रेम और सेक्‍स के क्षणों में हार-जीत खोज ली जाती है. यह सिर्फ एक कंपनी की सचाई नहीं है, बल्कि पूरे कॉर्पोरेटेड समाज का डेपिक्‍शन है. एक ऐसा एस्‍ट्रैंजमेंट और एलिनियेशन है, जो पिछले दस-पंद्रह बरसों में बहुत फूहड़ तरीक़े से हमारे जीवन में आया है. यह चालीस-पचास के दशक का इम्‍पोर्टेड एलिनियेशन नहीं है, जिस पर हिंदी की नई कविता व नई कहानी लिखी गई थीं.

तो यह एस्‍ट्रैंजमेंट और एलिनियेशन हमारे जीवन में कहां से उग आया है?

यह बिल्‍कुल देशज है. जो हालात दो दशकों में बने हैं, उनके कारण बिल्‍कुल ईडियोसिन्‍क्रेटिक इंडियन स्‍टाइल में यह पैदा हुआ है. ये सारे चरित्र इससे जूझ रहे हैं, लेकिन सफलता पाने के मंत्रों की किताबों ने इन्‍हें सिखाया है कि अपने अवसाद को स्‍वीकार मत करो, तो वे उसे स्‍वीकार नहीं कर रहे, लेकिन उनके पास उसके चंगुल में फंसते चले जाने के अलावा कोई रास्‍ता नहीं, क्‍योंकि इसके लिए सिर्फ वे ही जि़म्‍मेदार नहीं हैं. वे लड़ नहीं रहे हैं, बल्कि भाग रहे हैं, लेकिन अपने भागने की इस तरह मार्केटिंग और पोजीशनिंग कर रहे हैं कि उनका भागना उनके लड़ने की तरह दिखने लगे. हमारे समय के ब्रांड-कांशसनेस ने यह सबसे ख़तरनाक बात हमें सिखाई है.

पीएसडीमें होमोजेनाइज़ेशन की ओर भी आपने बड़ा महीन इशारा किया है...

''पीएसडी'' के सारे किरदार एक-दूसरे जैसे होते जा रहे हैं, इस लिहाज सेहोमोजेनाइज़ेशन तो है ही. लेकिन आप मार्क करेंगे कि इसके साथ-साथ वे एक-दूसरे जैसा न होने की जद्दोजहद भी कर रहे हैं. यानी होमोजेनाइज़ेशन के बीच एक क्‍लैश भी चल रहा है सारे किरदारों के बीच, जिसे हम आज के समय में सिविलाइज़ेशंस के क्‍लैश की तरह भी देख सकते हैं. एक पावर-सेंटर है, अमेरिका की तरह एक इंसान है, उसकी कई प्रेमिकाएं हैं, जिनमें से एक मुस्लिम है, जिसे वह अपमानित करते हुए छोड़ता है, एक ईसाई है या हिंदू है, यह तय नहीं, लेकिन उसका नाम ईसाई है पर उसके तंत्र-मंत्र हिंदू मिथॉलजी से आते हैं, वह स्प्लिट पर्सनैलिटी की शिकार है, एक साफ़ हिंदू है, जो उसकी पत्‍नी है, जो उसे छोड़कर चली जाती हैयानी सत्‍ता का केंद्र अपनी त्रिज्याओं के साथ सिर्फ इतना व्‍यवहार रखता है कि उसकी ख़ुद की केंद्रीयता बरक़रार रह सके. एक दूसरे विशाल वृत्‍त के घेरे में वह केंद्र नहीं, सिर्फ एक बिंदु है, और वह वहां भी केंद्र में तब्‍दील हो जाने के लिए परिधियों का पुनर्सीमन करना चाहता है.

आपने छह कहानियों से दो संग्रह क्‍यों बनाए हैं?

इसका एक व्यावहारिक जवाब यह है कि छहों कहानियों को एक साथ रखने पर किताब की पृष्‍ठ-संख्‍या बहुत ज़्यादा हो जाती जो कि मैं नहीं चाहता था. दूसरी बात यह है कि शुरुआती तीनों कहानियां सम्मिलित रूप से एक स्‍वतंत्र पुस्‍तक का निर्माण करती हैं. जब मैं सावंत आंटी की लड़कियां लिख रहा था, तो उस समय मेरी योजना यह थी कि यह कहानियों की एक सीरिज होगी, जिसमें मूड, थीम, भाषा और परिवेश की साम्‍यता होगी; ऐसे छह नॉवेला होंगे, जिन्‍हें एक जिल्‍द में रख दिया जाएगा, तो वे नॉवेल की शक्‍ल ले लेंगे. पर मैं इस सीरिज की तीन कहानियां ही लिख पाया. सावंत आंटी की लड़कियां’, ‘सौ किलो का सांप और साहिब है रंगरेज़’. आप देखें, ये तीनों कहानियां से शुरू होती हैं. इन तीनों में किरदारों की आवाजाही लगातार होती है, पहली कहानी के गौण किरदार अगली कहानियों के मुख्‍य किरदार हो जाते हैं, इसी तरह मुख्‍य गौण में तब्‍दील हो जाता है. वे अपनी गौणता में भी मुख्‍य को प्रभावित करते हैं, इस तरह मुख्‍य बहुत सारे गौणों का अनुषंग बन जाता है और उसकी मुख्‍यता भ्रम के अलावा कुछ नहीं होती. दरअसल, हर किस्‍म की प्रमुखता कई सारी गौणताओं का गुच्‍छा ही होती है.

ये तीनों कहानियां मिलकर शहर के भीतर बसे हुए क़स्‍बे-गांव का माहौल बनाती हैं. इन तीनों में स्त्रियां हैं, उनकी कहानियां हैं, प्रेम की उनकी आकांक्षाएं हैं, उनकी असफलताएं हैं, शहर की आकांक्षाएं, क़स्‍बे के दबाव हैं और फिल्‍म का उनके जीवन पर गहरा असर है. उन्‍हें प्रेम होता है या नहीं होता, यह ख़ुद उन्‍हें भी नहीं पता, लेकिन वे सब प्रेम के विचार से आक्रांत हैं, और यह इतना हल्‍लाख़ोर है कि वे कुछ भी कर गुज़रना चाहती हैं. मेरे तईं ये तीनों कहानियां, जो कि कभी न पूरा होने वाले एक उपन्‍यास का हिस्‍सा थीं, एक प्रोविंशियल जियोग्राफिकल एक्‍सप्रेशन हैं. तो उन तीनों को मिलाकर पहली किताब बनती है, जिसका शीर्षक सावंत आंटी की लड़कियां है.

और दूसरा संग्रह?

दूसरे संग्रह में भी तीन कहानियां हैं- गोमूत्र’, ‘सिमसिम और पिंक स्लिप डैडी’. मैं इन तीनों कहानियों को इमोशन्‍स ऑफ इकॉनमिक अंडरडेवलपमेंट मानता हूं. इसमें प्रोविंशियल परिवेश नहीं, ये ज़्यादा कॉस्‍मोपोलिटन और मेगापोलिस कल्‍चर की कहानियां हैं. इनकी शरणगाह रुदन नहीं है, ये चीज़ों को देखते हैं, महसूस करते हैं और ख़ारिज हो जाने के डर से ख़ारिज कर देने की एडवांस प्रतिक्रिया करते हैं. ये सबसे ज़्यादा डरे हुए लोग हैं, ये चंचल और कुटिल हैं, मनुष्‍य होने की सारी जटिलताओं से भरे हुए हैं. ये सबसे ज़्यादा ख़ुद से प्‍यार करते हैं और सबसे कम प्‍यार भी ख़ुद से ही करते हैं. ये उन लोगों की कहानियां हैं, जिनके लिए आपसी संबंध मानवीय संबंध नहीं होते, बल्कि सैद्धांतिकी के अनुसार इंटर-पर्सनल रिलेशनशिप होते हैं. इनके लिए गले लगना प्रेम व उसका प्रदर्शन नहीं है, दो व्‍यक्तियों के बीच संबंध की भंगिमा का एक औज़ार मात्र है. ये आर्थिकता का प्रति‍प्रश्‍न हैं. इनमें तार्किकताओं का निषेध है. मेरी नज़र में तर्क सबसे भंगुर चीज़ है. काटे जाने के लिए ख़ुद को आमंत्रित करता हुआ. और तार्किकता रचना के विकास का सबसे बड़ा रोड़ा. यदि तार्किकता सर्वोपरि होती, तो एलिस का आश्‍चर्यलोक न होता. दुनिया में फंटास्टिक लिटरेचर न होता. जैसा कि ज्‍यां लुक गोदार सिनेमा के बारे में कहता है कि उसमें आदि, मध्‍य और अंत होना चाहिए, लेकिन अनिवार्यत: ठीक उसी क्रम में नहीं तो इन कहानियों में भी यही है. इनमें अंत मध्‍य में आ गया है, और कहानी वहां से शुरू हो रही है, जहां वह ख़त्‍म हो गई है. पीएसडी दरअसल वहां ख़त्‍म नहीं होती, जहां वह सबको नौकरी से निकाल एक विजेता देश की तरह कुर्सी को ऊपर करता बैठा है, बल्कि उसका अंत आखि़री चैप्‍टर के पहले पैराग्राफ़ में है, जब वह यह सब कुछ करने के बाद चीफ़ फाइनांस मैनेजर नताशाबेन की कॉलबेल बजाने का निश्‍चय कर रहा होता है. यहां वह नताशाबेन के बेन को कोष्‍ठक में डाल देता है और जीवन में आए तमाम प्रेम को ठोकर मार चुकने के बाद एक बार फिर प्रेम की तलाश में दस्‍तक दे रहा है. उसकी खोज कभी पूरी नहीं होने वाली. यह उसे भी पता है, लेकिन जैसा कि मैंने कहा, वह उन लोगों में से है, जो हारकर भी हार को स्‍वीकार नहीं कर पाता. और जीत की तलाश में एक नई हार की कामना करता है, ताकि पिछली हार को उपेक्षित किया जा स‍के.

आपने इंटर-पर्सनल रिलेशनशिप की बात कही, तो याद आता है कि गोमूत्र में नायक कई जगहों पर अपनी पत्‍नी को अलग-अलग तरीके़ से संबोधित करता है, जैसे कहीं खाना बनाने वाली, कहीं चाय पिलाने वाली, कहीं प्रेम करने वाली, कहीं साथ सोने वाली. पत्‍नी को इस तरह संबोधित करने को कई लोगों ने स्‍त्री की अवमानना भी माना था.

हां, उसमें इस तरह के संबोधन हैं. नायक एक मध्‍यवर्गीय है, उसके पास तमाम चालाकियां हैं, वह व्‍यवस्‍था का इस्‍तेमाल अपनी तरह से करने की मध्‍यवर्गीय आकांक्षा का रोगी है, जबकि वह ख़ुद को ऐसी अर्थ-व्‍यवस्‍था में पाता है, जो उसे डिल्‍डो से ज़्यादा कुछ नहीं मानती, उसके लिबीडो को कभी मान्‍यता नहीं देती. यह एक आइरनी या इन्‍वर्टेड एक्‍सप्रेशन है. उसके जीवन में सब कुछ विखंडित है, वह एक उपभोक्‍ता नागरिक है, नागरिक उपभोक्‍ता से भी कम. वह छाती पर डियो का इस्‍तेमाल इसलिए करता है, ताकि उसकी सुगंध से मादाएं दौड़ी चली आएं. जैसा कि इन दिनों टीवी पर हर डियो के विज्ञापन दिखाते हैं. उस कहानी में फंतासी में जिन दृश्‍यों का प्रयोग किया गया है, वे या तो ब्रेख़्त, रघुवीर सहाय, मायकोवस्‍की, एडम ज़गायेवस्‍की की कविताओं से निकले हैं या फिर हमारे समय के लो‍कप्रिय टीवी विज्ञापनों से. वह नायक सारी चीज़ों को विज्ञापनों से परसीव करता है. स्‍त्री इन रूपों में कहानी में इसलिए आई है कि बाज़ार ने उसे ये सारे रूप दे दिए हैं. कि उसे मसालों का विज्ञापन दिखाया जाता है और एक रसोइया स्‍त्री के रूप में प्रस्‍तुत किया जाता है. कि फ़र्श को बाज़ार बना कर उसकी सफ़ाई वाले रूप को एक नई टेरीटरी बना दी जाती है. कि क्रीम, पाउडर, हेयर रिमूवर आदि को उसकी सफलता, सौंदर्य और प्रेम की संभावनाओं से जोड़ा जाता है और उसे ख़ालिस प्रेम करने वाली के रूप में दिखा दिया जाता है. इन सारे उत्‍पादों का उपभोग करने वाला व्‍यक्ति स्‍त्री को स्‍त्री की तरह न लेते हुए स्प्लिटेड टेरीटरी के रूप में लेता है. और वैसा सिर्फ़ वह नायक ही नहीं करता, यह एक प्रोटोटाइप मिडिल क्‍लास मस्‍कुलीन ट्रेट है.

आपके पहले संग्रह का क़स्‍बाती जीवन और दूसरे संग्रह का शहराती परिवेश यथार्थ की बहु-स्‍तरीयता की ओर एक संकेत-भर है या उससे कुछ अधिक?

हां, यह उसी बहु-स्‍तरीयता की ओर है. मल्‍टी-लेयरिज़्म एक ऐसा क्रिएटिव बम है, जो फटने पर जितना विध्‍वंस करता है, उतनी ही सर्जना भी करता है. यह उन सारी एकांगिकताओं का विध्‍वंस है, जिनसे मैं अपनी कहानी को बचा ले जाना चाहता हूं. जैसे सिमसिम है, उसमें हर चैप्‍टर की शुरुआत में एक लेखक की रचना का उद्धरण है. वह चैप्‍टर कैसा होगा, उसका मूड कैसा होगा, यह उस उद्धरण से तय हो जाता है. इससे ढेर सारी सरणियां और एवेन्‍यूज़ बनते हैं. मुझे वैसा करना पसंद भी है.
पर उतने सारे उद्धरण क्‍यों दिए गए थे, यह सवाल उस समय उठा भी था. कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा था कि लेखक अपने पठन का बौद्धिक आतंकवाद फैलाना चाहता है.
वह एक इंटर-टेक्‍स्‍चुअल फॉर्म की तलाश का प्रयास था. कहानी के हर हिस्‍से में जिस तरह के मूड आ रहे थे, उन पर मेरे पुरखों ने, या समकालीनों ने बहुत सुंदर पंक्तियां लिखी हैं, जो मेरी पढ़त में थीं और वे पंक्तियां मुझे उन मूड को, उनके शेड्स को दिखाने में बहुत मददगार दिख रही थीं. चैप्‍टर का मूड और थीम क्‍या है, यह मैंने चैप्‍टर में कहीं स्‍पष्‍ट नहीं किया बल्कि उसे वह उद्धरण स्‍प्‍ष्‍ट कर देता है. यहां तक कि कहानी की थीम को भी. वहां जितने चैप्‍टर हैं, जितने कोट हैं, उतनी ही थीम भी हैं, कोई एक केंद्रीय थीम नहीं. हर दृश्‍य के पास अपनी कहानी है और सारे दृश्‍य मिलकर एक वृहत्‍तर कहानी की रचना करते हैं और हर दृश्‍य अपनी निजता में उस कहानी में न केवल हस्‍तक्षेप करता है, बल्कि उसके गल्‍प का विकास भी करता है. वह कहानी की कथ्‍य-धारा को भी आगे बढ़ाता है. मैं उन लेखकों को एल्‍यूड भी करना चाहता था. जैसे चीन के फिल्‍मकार जिया झांगके की फिल्‍में देखें, तो पता चलता है कि वह कितनी बारीकी से ओज़ू और मिशिमा को एल्‍यूड करता है. झांगके की द वर्ल्‍ड की एक उपकथा का शीर्षक टोक्‍यो स्‍टोरी है. टोक्‍यो स्‍टोरी ओज़ू की अत्‍यंत चर्चित फि़ल्‍म है. झांगके ऐसा नहीं भी कर सकता था, लेकिन जैसे ही वह टोक्‍यो स्‍टोरी उपशीर्षक देता है, फिल्‍म की उस उपकथा की थीम पारिवारिक विघटन, जो सामाजिक विघटन में तब्‍दील हो जाता है और वाइस वर्सा, बिना झांगके के दिखाए दिख जाती है. इससे फिल्‍मकार का काम आसान हो जाता है, क्‍योंकि वह अपने पुरखे की एक कही हुई बात को रेफ़र कर उसे दुहराने से न सिर्फ़ बच जाता है, बल्कि उसकी सहायता से अपने लिए अनकहे का एक निजी सौंदर्य-तर्क-शास्‍त्र गढ़ लेता है. ऐसा एल्‍यूज़न द नेम ऑफ़ द रोज़ में ईको करते हैं, बोर्हेस के प्रति, बिना उन्‍हें कोट किए. पर मुझे यह कह देना चाहिए कि मैंने जिया झांगके की फिल्‍में सिमसिम लिखने के काफ़ी समय बाद देखी थीं.

और अश्‍लीलता के आरोप... पीएसडी में कई जगहों पर ग्राफिक ज़्यादा होना... हालांकि ये आपकी कहानियों के मामले में भी पुराना है. पिछली कहानियों में कहीं न कहीं लोग यह बात उठाते रहे हैं कि लेखक की रुचि व गति उस दिशा में ज़्यादा है.

देखिए, अश्‍लीलता का आरोप नया नहीं है. यह बहुत प्रि‍मीटिव किस्‍म का आरोप है. इस पर कुछ कहना, अश्‍लीलता की उनकी अवधारणाओं को मान्‍यता देना है, जो कि मैं बिल्‍कुल नहीं करूंगा. मैं राही मासूम रज़ा का एक उद्धरण देना चाहूंगा, वह पूछते हैं कि हम जिस समय में रह रहे हैं, वह ज़्यादा अश्‍लील नहीं है? उसकी अश्‍लीलताओं को जब हम अपनी कहानी या रचना में ले आते हैं, तो क्‍या वे समय के सामने सवाल नहीं खड़ा करते ? यह उन्‍होंने एक उपन्‍यास की भूमिका में कहा था, जब उन पर आधा गांवमें गालियों के प्रचुर इस्‍तेमाल का आरोप लगा था. यहीं मुझे चित्रकार अखिलेश की भी एक बात याद आती है; वह कहते हैं मेरा चित्रकर्म कोई अपराध-कर्म नहीं है, जिसके लिए मैं सफ़ाइयां दूं.

र्मैं एक प्राथमिक किस्‍म का सवाल करना चाहूंगा, वह इसलिए कि आप एक साथ दो विधाओं में सक्रिय हैं, और वह सक्रियता बहुत सार्थक ढंग से सामने आती है, तो दोनों विधाओं का संतुलन क्‍या है ? आप ख़ुद को क्‍या मानते हैं ? आप कहानी में कविता का ख़ूब इस्‍तेमाल करते हैं, जैसे गोमूत्र,पीएसडीया सिमसिमके कई हिस्‍से तो शुद़ध कविता ही हैं. जबकि कविता में आप कहानी या फिक्‍शन की तकनीकों का जमकर प्रयोग करते हैं. यह किसी विधा की अपर्याप्‍तता तो नहीं?

मेरे लिए लिखना प्राथमिक है. थोड़ा-सी पीछे हटकर इस सवाल का जवाब दूंकि यहां रॉबर्तो बोलान्‍यो की एक बात याद आती है किThe word writing is the exact opposite of the word waitingतो मैं भी यही कहना चाहूंगा कि यह एक तरह से प्रतीक्षा का विलोम है, और विलोम हमेशा मूल का एक एक्‍सटेंडेड फॉर्म होता है. तो लिखना कई बार एक अज्ञेय प्रतीक्षा में रत रहते हुए उसे लगातार आगे की ओर ठेलते रहना होता है. और प्रतीक्षा अपनी अनिश्चिचता में अवसाद से भरी होती है. और मैं यह शिद्दत से मानता हूं कि हर कविता एक अवसाद-लोक की निर्मिति करती है या उसी से निर्मित होती है. जब एक पहाड़ पर देवदूतों ने एक सामान्‍य आदमी पर एक भावी धर्मग्रंथ की तमाम इबारतें-आयतें नाजि़ल की थीं, तब भी वह सामान्‍य आदमी एक वृहत्‍तर अवसाद-लोक में ही पल-बढ़ रहा था. मैंने जब पहली बार सोहर सुने थे, पंडित छन्‍नूलाल मिश्र की आवाज़ में, तो मुझे बहुत रोना आया था- दुख के उफ़ान से, एक मेलंकलिक आवरण बन गया था, बाद में मुझे पता चला कि सोहर बेटे के जन्‍मने की ख़ुशी में गाए जाते हैं. तो यह संबंध मुझे बहुत अजीब लगता है. ख़ुशी को व्‍यक्‍त करने के लिए लिखी गई कविता भी दरअसल एक अवसाद है, उसकी दुनिया की निर्मिति.

कविता अवसाद-लोक है
, प्रतीक्षा भी, और लिखना प्रतीक्षा करना है, तो लिखना दरअसल कविता लिखना है, मैं कई बार यह सोचता हूं. और कई बार दोस्‍तों से कहता हूं कि कविता उन्‍हीं को लिखनी चाहिए, जो कविता को पूरी तरह समझ नहीं पाते, उससे एक निस्‍पृहता बनाए रखते हैं. और जो लोग कविता को समझते हैं, उसकी प्रक्रिया,निष्‍पत्तियों से लेकर उसकी पीड़ा, अवसाद और क्षयकारी प्रसन्‍नताओं को, जो उसमें शामिल होते हैं, उन्‍हें कहानी-उपन्‍यासों की ओर मुड़ जाना चाहिए, या मुड़ भी जाते हैं. अचरज नहीं होता कि कविता के सबसे अच्‍छे मुरीद अमूमन गद्यकार होते हैं. यहीं निकानोर पार्रा की एक पंक्ति याद आती है कि दुनिया की सबसे सु्ंदर कहानियां मीटर में लिखी जाती हैं और वहीं हैराल्‍ड ब्‍लूम की बात कि बीसवीं सदी की सबसे अच्‍छी कविता गद्य में लिखी गई है. काफ़्का, मारकेस, कल्‍वीनो, ओज़ और कोएट्ज़ी ये सारे लोग कवि हैं, जो गद्य के इलाक़ों में काम कर रहे हैं. और इन्‍होंने जो उपन्‍यास लिखे, उनका कैटेगराइज़ेशन फिक्‍शन की जगह पोएट्री कर दिया जाए, या उन्‍हें मोत्‍सार्ट,बाख़, शोपां, बीथोफ़न की तरह संगीतकार माना जाए और उनके उपन्‍यासों को एक विशाल सिंफनी, अंगड़ाई लेता एक प्रील्यूड, एक सकुचाया हुआ सेरेनेड कह दिया जाए. यानी उस केंद्रीय तत्‍व को पाने की कोशिश रही इनमें, जो इन्‍हें विधागत नाम-संज्ञाओं से परे लेकर चला जाए. यह निर्गुण-निरकार की उत्‍पत्ति नहीं, बल्कि यह सनातन अद्वैत है. यह पानी के बर्फ़ बन जाने और बर्फ़ के पानी बन जाने की अत्‍यंत जादुई लेकिन निहायत यथार्थवादी कला है. और बिना जादू के कोई यथार्थ संरचित ही नहीं होता. और वाइस-वर्सा भी.

मुझे नहीं पता कि मूलत: क्‍या हूं मैं, कवि हूं या कथाकार हूं, जैसे पत्‍ते को यह नहीं पता होता कि उसका नाम-प्रजाति पत्‍ता है. यह उसकी दुनिया का नाम है ही नहीं. रचे जाने से पहले भी रचना होती है, लिखे जाने से पहले भी लेख होता है. कोई ख़्याल, विचार या नदी के बीच का कोई भंवर. मन के भीतर की दुनिया में कौन-सी भाषा चलती है, किसे पता? सो बाहर काग़ज़ों पर जो कविता के नाम से स्‍वीकृत है,भीतर की दुनिया में उसका नाम कुछ और भी हो सकता है. यह विधात्‍मक सवाल से ज़्यादा अभिव्‍यक्ति की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है. ठीक यहीं पर कला की भूमिका बनती है. कला कोई तत्‍व नहीं, महज़ एक दबाव है. एक वृहत्‍तर दबाव, जो सारा खेल अपने उप-दबावों से करती है. कला हमेशा सयानी होती है, उसमें औसत परिमाण से ज़्यादा चतुराई, धूर्तता, समझदारी, विवेक और परिवेश-परिस्थितियों का अपने विकास के पक्ष में इस्‍तेमाल कर लेने की बुनियादी प्रवृत्ति होती है. कला कभी भोली-भाली नहीं होती,उसका भोला-भालापन भंगिमा या स्‍वांग होते हैं. इसलिए कलाकार दुनिया की किसी भी चीज़ के मुक़ाबले ज़्यादा चतुर और कुटिल होता है और ऐसा क्‍यों होता है, यह भी कहूं कि वह बुनियादी रूप से अपने भौतिक और आध्‍यात्मिक परिवेश-परिदृश्‍य में कमज़ोर होता है, वह सत्‍ता से कामनाएं करता है, सत्‍ता की कामनाओं को पूरा नहीं कर पाता, जैसे कि पारिस्थितिकी का सिद्धांत है कैमोफ़्लेज वाला, कि जो भी कमज़ोर होगा, उसमें सहज ही चतुराई के गुणों का विकास होगा, तो कलाकार अपनी निर्बलताओं के कारण कला की चतुराइयों का अर्जन करता हैइसीलिए वह अपनी अभिव्‍यक्ति को इस तरह नियंत्रित करता है कि उससे विधात्‍मक बोध हो, प्रतीकात्‍मक बोध हो. कला कभी स्‍वत:स्‍फूर्त नहीं होती, वह पूर्णत: नियंत्रित अभिव्‍यक्ति है.

इसलिए कविता में कहानी का इस्‍तेमाल और कहानी में कविता का इस्‍तेमाल अपने आप नहीं होता. यह सोचकर किया जाता है. इसलिए नहीं कि किसी विधा में कोई अपर्याप्‍तता है. बल्कि यह संपूर्णता का विकास है. एक चीज़ जो पहले से संपूर्ण है,उसका विकास कर उसे संपूर्णतर बनाया जाए. इससे दरअसल आप उसकी अपूर्णता को एक्‍स्‍प्‍लोर करते हैं. कला अपूर्णताओं का अन्‍वेषण करती चलती है. यह ऐसी प्रक्रिया है, जो संपूर्णता के विकास से अपूर्णताओं को प्रतिष्ठित करती है. इससे यह ज़ाहिर होता है कि सृष्टि में अपूर्णताएं असीमित व शाश्‍वत हैं. स्‍वयं सृष्टि भी एक अपूर्ण्‍ तत्‍व है. संपूर्णता के कारण ही अपूर्णता बनती है. आलोचना एक अलग विधा है, लेकिन जब रॉबर्तो बोलान्‍यो 2666 लिखते हैं, तो आलोचना के औज़ारों का प्रयोग गल्‍प-संरचना में करते हैं. परंपरागत फिक्‍शन के पाठकों को यह अहसास होता है कि यह कथा नहीं, निबंध है, लेकिन दरअसल, बोलान्‍यो ऐसे अवां-गार्द हैं, जो फिक्‍शन की सर्वमान्‍य संपूर्णता का विकास करके उसे एक ज़्यादा प्रासंगिक, ज़्यादा दायरों वाला,इंट्रूसिव किस्‍म का, व्‍यापक फिक्‍शन बनाते हैं, तो पुरातन की एक नई अपूर्णता को ज़ाहिर कर देते हैं. वह ख़ुद भी एक अपूर्ण फिक्‍शन की रचना करते चलते हैं. कुछ ऐसा ही कोएट्ज़ी की डायरी ऑफ अ बैड ईयर पढ़ने पर महसूस होता है. कुंडेरा के उपन्‍यास आत्‍म की खोज में उपन्‍यास की परंपरा को तोड़-फोड़कर एक नए आत्‍म का परिचय करा देते हैं. यह इसीलिए कि इनकी मौलिकता कई विभिन्‍न चीज़ों के आपसी सम्मिश्रण से बनती हैं. और यह सब तभी संभव है जब आप अपनी कला को महत्‍तम नियंत्रित करते हों.

यह इस्‍तेमाल भले नया न हो, लेकिन अनवरत ज़रूर है. और नएपन से ज़्यादा महत्‍वपूर्ण अनवरत होता है, क्‍योंकि नयापन अनवरत का ही एक अंग है. तो मेरे लिए गद्य के भीतर की कविता या कविता के भीतर का गद्य या कविता के भीतर कविता या गद्य के भीतर एक और गद्य उसके अवसाद-लोक को लगातार संपूर्णता देते रहते हैं. मुझे थोड़ी-बहुत कविता आती है, थोड़ी-बहुत कहानी, तो मैं दोनों का प्रयोग करता चलता हूं. अगर मुझे आलोचना का तरीक़ा पता हो, जैसा कि बोलान्‍यो, तो वह भी करता. अगर मेरे पास इतिहास का अच्‍छा ज्ञान होता और तर्कशास्‍त्र आता, जैसा कि बोर्हेस, तो मैं उसका प्रयोग भी करता. अगर मुझे फिजिक्‍स आता, जैसा कि खोर्गे़ वोल्‍पी इन सर्च ऑफ क्लिंगसर में, तो मैं वह भी करता. मैंने एक ही थीम पर कविता भी लिखी है और कहानी भी, लेकिन फिर भी दोनों अलग-अलग हैं. मेरी एक कविता है सिंधु लाइब्रेरी’, वह एक लाइब्रेरी के उपेक्षित होते जाने, उसकी जगह के भू-माफि़या द्वारा हड़प लिए जाने और सिंधी समुदाय के संघर्षों-चतुराइयों का विरोधाभासी चित्रण है. सिमसिम कहानी पूरी तरह उसी कविता पर केंद्रित है. या उसी कविता को कहानी में लिखने की अलहदा कोशिश है. गोमूत्र पूरी तरह ज़गायेवस्‍की की कविताआग पर आधारित है यानी कहानी की मैपिंग कविता में आई पंक्तियों के आधार पर ही होती है. वह कहानी ज़गायेवस्‍की की कविता का भारतीय संदर्भों में एक नया पाठ भी है.

आपकी कहानी और कविता का संगीत के साथ भी बहुत गहरा जुड़ाव है. उसकी प्रेरक उपस्थिति के बारे में भी बताएं.

हां, संगीत मेरे लिए उत्‍प्रेरक है. कई कविताएं संगीतकारों को ही समर्पित हैं. जब मैं छोटा था, तो बहुत कुछ बनना चाहता था. थोड़ा और बड़ा हुआ, तो संगीत के सपने देखता था. मैं चाहता था कि मेरा एक रॉक बैंड हो, जिसका लीड गिटारिस्‍ट और वोकलिस्‍ट मैं होऊं. मैं गिटार पर अपने लिए धुनें बनाया करता था, मेरे बाल जॉन बॉन जॉवी की तरह बहुत लंबे थे, मैं माइक को एक भाले की तरह अपने हाथ में रखना चाहता था, एक्‍सल रोज़ की तरह सिर पर स्‍कार्फ बांधकर मिर्च से भी तीखे आलाप लेना चाहता था, स्‍लैश और जो पेरी की तरह तार पर झूलना चाहता था. पर यह सब न हो सका. अब मैं गिटार देखकर घबरा जाता हूं. टूटे हुए सपने और छूटी हुई प्रेमिकाएं भय देती हैं. तो संगीत, ख़ासकर रॉक संगीत और वेस्‍टर्न क्‍लासिकल ऑर्केस्‍ट्रा. सिनेमा और संगीत मेरे फिक्‍शन के नैरेटिव को बहुत गहरे से प्रभावित करते हैं. रॉक म्‍यूजिक एक तरह से शोर और कोलाहल का सांगीतिक संपुंजन भी है. मेरी कहानियां और कविताएं भी. ब्‍लूज, जैज़, एक तरंग पर चलते हैं, उनमें आरोह और अवरोह का एक संगति होती है, जो एक ख़ास रेंज से बाहर जाएगी, यह सोचना बहुधा मुश्किल होता है. यह कोई रूढ़ नियम नहीं है, लेकिन वैसा मुश्किल होता है. जब एरिक क्‍लैप्‍टन गा रहा होता है, तो आपको उसकी रेंज का अंदाज़ा होता है, यह भी पता होता है कि यह कम से कम साज़ों का प्रयोग करेगा, अपनी आवाज़ की गुणवत्‍ता पर ज़्यादा भरोसा करेगा और इन्‍हीं मीटर के बीच कन्‍फ़ाइन्‍ड रहेगा. लेकिन जब गन्‍स एंड रोजेज़गा रहे होंगे, तो ऐसा कुछ नहीं होगा. वे अपने गाने में किसी भी समय सबसे गहराई में बसने वाले सातक चले जाएंगे, और किसी भी समय सप्‍तक के आखि़री छोर के निवासी सातक पहुंच जाएंगे. दो विपरीत ध्रुवों के बाशिंदों के बीच सुरों के कितने सारे धरातल हैं. और मैं तो इन्‍हें भारतीय सांगीतिक भाषा में कह रहा हूं, दरअसल, सुरों के वे स्‍तर, जो भाषा की पकड़ से कई प्रकाश-वर्ष दूर हैं, वे भी इनके बीच कितना मोहक नर्तन करते हैं, वह नर्तन किसी भी कलाकार, कथाकार की कल्‍पनाओं के तंतुओं को, बारीक फूंक से तूफ़ानी गति दे देने के लिए पर्याप्‍त होता है. वह मल्‍टी-लेयर्ड म्‍यूजिक है, जहां हर साज़ के पास अपनी कहानी है, वह अपने स्‍तर से उसकी कहानी कह रहा है और वे सारी कहानियां मिलकर एक अलग ही कहानी का आरोहण कर रही हैं. ऐसे ही वेस्‍टर्न क्‍लासिकल है, मांतोवनी है, फिलिप ग्‍लास है, बाख़,मोत्‍सार्ट और शोस्‍ताकोविच हैं, ये सब विस्‍तार के सौंदर्य की गढ़ना करते हैं. ये बारीकियों और तफ़सीलों के राजेंद्र हैं. मैं अपनी कहानियों में, कविताओं में, इन सबकी प्राण-प्रतिष्‍ठा कर देना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि मुझमें बीथोफ़न और शोपां एक साथ बजें, मुझमें एक्‍सल रोज़ और फिलिप ग्‍लास को एक साथ सुना जाए.

पिछले दिनों एक गोष्‍ठी में आपने बहुत भिन्‍न कि़स्‍म की राय जाहिर की- कि हिंदी कहानी पाठक के सामने न जाकर एक निर्जन में अपना चमत्‍कार प्रस्‍तुत करती है. आपने बोर्हेस की एक बड़ी प्रसिद्ध कहानी का उदाहरण भी दिया, जिसमें एक किरदार राख से गुलाब पैदा करता है, लेकिन जब उससे अपेक्षा की जाती है, तो वह उससे इंकार कर देता है...

मैं हिंदी कहानी का परंपरागत पाठक कभी नहीं रहा, क्‍योंकि मेरी यह पढ़ाई किसी पांरपरिक हिंदी परिवेश में या अकादमिक तौर पर नहीं हुई. मैंने रैंडमली चीज़ें पढ़ी थीं और वह सब मुझे अच्‍छा लगा था. आज जब दुनिया का थोड़ा-बहुत श्रेष्‍ठ साहित्‍य पढ़ पाया हूं, उसके आलोक में देखता हूं तो पाता हूं कि विश्‍व साहित्‍य के संदर्भ में हिंदी फिक्‍शन का कोई मूल्‍यवान या उल्‍लेखनीय स्‍थान नहीं है. मुझे ऐसा लगता है कि हिंदी फिक्‍शन पर लोकप्रियता के आग्रहों का बहुत ज़्यादा दबाव रहा है. हिंदी फिक्‍शन का विकास और हिंदी सिनेमा का विकास कमोबेश एक ही कालखंड में होता है, और हिंदी फिक्‍शन, हिंदी सिनेमा से लोकप्रिय कथ्‍यात्‍मक दबावों को बहुत गहराई से लेती है, तो इसके कारण हिंदी फिक्‍शन में यथार्थ और समय को देखने के आग्रह साफ़ तौर पर दो रंगों में बंटे हुए हैं- या तो वे ब्‍लैक हैं या वे व्‍हाइट हैं- यानी या तो वे बहुत अच्‍छे किरदारों की कथा है या कुछ चीज़ों को बहुत ही बुरा दिखाया गया है, जीवन में एक चीज़ सबसे ख़राब हो और एक चीज़ सबसे अच्‍छी हो यानी ब्‍लैक एंड व्‍हाइट, ऐसा नहीं होता. यह हिंदी फिलमों के कारण है. हमारे यहां फिल्‍मों के सबसे प्रयोगशील दौर में भी धूप-छांव का यह खेल चलता ही रहा था. उसमें भी सदऔर खलके वर्गों का बहुत साफ़ विभाजन है, जबकि संस्‍कृत के फिक्‍शन-एपिक्‍स-नैरेटिव गॉलिएथ्‍स में ऐसा बहुत कम था. आर्ट आफ फिक्‍शन या कहानी को एक कला के रूप में जब देखते हैं, तो भी हिंदी कहानी, लोकप्रिय कथ्‍यधारा के दबाव में बड़े जोखिम नहीं उठाती या बड़े प्रयोग नहीं करती, वह बड़ी महत्‍वकांक्षाओं की ओर ट्रेड नहीं करती. यह एक पाठक-भीरु लेखन है, जिसमें सबसे कम परवाह पाठक की ही की जाती है, लेकिन उसकी परवाह के नाम पर उसे कुछ नया, कुछ बड़ा देने से बच निकला जाता है; अपनी अक्षमताओं का ठीकरा उसकी काल्‍पनिक अनुपस्थिति पर फोड़ दिया जाता है. लो‍कप्रियता का यह दबाव कितना आइरनिकल है कि आप देखें, इस तत्‍व ने हिंदी सिनेमा की लो‍कप्रियता में जितना इज़ाफ़ा किया, हिंदी फिक्‍शन की लोकप्रियता को उतना ही कम करता गया. यानी लोकप्रियता का दबाव आपको अ-लो‍कप्रिय होने की कंदरा तक ले गया. आप वहां कन्‍फ़ाइन्‍ड हैं. आत्‍मशापित. आज आपके पास पाठक तक नहीं हैं. फिक्‍शन या नॉवेल या कहानी, महज़ स्‍टोरी-टेलिंग नहीं होती. और अगर स्‍टोरी-टेलिंग ही आपकी डिलीवरी है, तो पाठक या ऑडिएंस के पास किताबों से बेहतर ऑप्‍शन के रूप में सिनेमा हरदम मौजूद रहेगा.

आप आश्‍चर्य नहीं करेंगे, जब यह देखेंगे कि ऐसा कला या अभिव्‍यक्ति के उन सभी क्षेत्रों के साथ हुआ, जिनसे हिंदी का जुड़ाव है. मसलन, हिंदी सिनेमा, हिंदी प‍त्रकारिता, हिंदी फिक्‍शन, हिंदी समाज... इन सबने कभी बड़े प्रयोग नहीं किए, कभी बड़े जोखिम नहीं उठाए, ये हमेशा अपनी देहरी में क़ैद अपनी श्रेष्‍ठता का मायोपिक आल्‍हा गाते रहे. कई बार यह सोचता हूं कि क्‍या यह हमारी भाषा की केंद्रीय प्रवृत्ति बन गई है? जैसे ही हिंदी की बात होती है, उसकी मौलिकता को संदिग्‍ध मान लिया जाता है. हिंदी में कही गई बात विश्‍वसनीय नहीं होती. इसके महज़ आर्थिक कारण नहीं हैं. यह कहना फि़ज़ूल है कि लंबे समय तक हमारी भाषा में पैसा नहीं रहा (वह आज भी नहीं है), इसलिए लोगों ने इसमें बहुत ज़्यादा कुछ स्‍टेक्‍स पर नहीं लगाया. हम अपनी दोयम स्थिति को इस तरह स्‍वीकार कर चुके हैं कि कम से कम, अपनी कला तक में, अपने साहित्‍य तक में हम प्रथम के स्‍तर का गौरवूपर्ण अनभिज्ञ बहिष्‍कार कर चुके हैं. भाषागत उपेक्षा का रिटैलिएशन बड़े साहित्‍य के उद्भव से होता है. चाहे हज़ार साल पहले का फ़ारसी का उदाहरण लें, जब उसकी उपेक्षा ने फि़रदौसी को शाहनामालिखने के लिए प्रेरित किया था, या बीसवीं सदी के हिब्रू का उदाहरण, या केन्‍या की गिकियू भाषा का, जिसमें न्‍गुगी वा थ्‍यांगो ने जि़द के साथ लिखाइसका अर्थ यह नहीं कि उस भाषा का जबर्दस्‍त प्रसार हो गया, बल्कि यह कि लिंग्विस्टिक रिटैलिएशन ने सब-जॉनर्स के बिखराव के बजाय एक कलेक्टिव लिटररी असेंडिंग को पैदा किया. एक बड़ी लड़ाई फानने की जि़द हमारी भाषा में दिखाई नहीं देती. कुछ बरस पहले एक सवाल उठाया गया था कि हिंदी प्रदेशों ने बड़ी विपदाएं झेलीं, लेकिन हिंदी में उन पर कोई बड़ी कृति नहीं. अंग्रेज़ी राज, विभाजन, मध्‍य युग में हिंदुओं का दमन, बीसवीं सदी में मुस्लिमों का दमन, सांप्रदायिक इतिहास, आपातकाल जैसी विपदाएं, पर हिंदी में इन पर एक भी महान उपन्‍यास, एक भी विश्‍वस्‍तरीय कहानी नहीं. ऐसे विविध इतिहास पर ऐतिहासिक रचनाएं तक नहीं. यूलिसिस जैसे किरदारों की यहां कोई कमी नहीं, लेकिन हमारी भाषा में यूलिसिस नहीं. बौद्ध जैसे धर्म यहां जन्‍मते हैं और फिर नष्‍ट कर दिए जाते हैं, धर्मों-संस्‍कृतियों के उस द्वंद्व पर कुछ नहीं. लैटिन अमेरिका में स्‍पैनियार्ड्स की संस्‍कृति पर मारकेस के सॉलीट्यूड समेत कितनी रचनाएं हैं, यूरोप का साहित्‍य अपनी महान विभीषिकाओं के सहारे महान हुआ, रूसी साहित्‍य ने अपनी विपदाओं पर अपना कला-लोक गढ़ा, ऐसा ही सिनेमा, चित्रकला आदि में हुआ, लेकिन हिंदी में नहीं. चालीस साल से एक विरोधाभासी मध्‍यवर्ग इस देश की संस्‍कृति को संचालित कर रहा है, उसके चरित्र का निरूपण करने वाला कोई फिक्‍शन नहीं. इसके क्‍या कारण हैं, और वही कारण हिंदी फिक्‍शन के दलिद्दर का भी कारण हैं.

एक और चीज़ जो मेरे देखने में आती है, वह है इमिटेशन और रिजेक्‍शन के प्रति हमारा गहरा लगाव. हम जितनी तेज़ी से इमिटेट करते हैं, बिना किसी एजेंडा के, उतनी ही तेज़ी से रिजेक्‍ट भी करते हैं. हम अपनी अबूझ फर्जी मौलिकता के सबसे बड़े संवदिया हैं. सौ साल का फिक्‍शन उठा कर देख लें, एक-दो प्रोटोटाइप लेखक हर पीढ़ी में लौट-लौटकर आते हैं, उनके जैसा लिखे जाने को ही श्रेष्‍ठता घोषित किया जाता है. हमारे अधिकांश लेखक अपनी ग़फ़लत में इतने अधिक मौलिक हैं कि लगभग बर्बाद हैं. उन्‍हें अंदाज़ नहीं कि उनकी मौलिकता इतनी अधिक व्‍यापक है कि लगभग प्रागैतिहासिक है. वे आर्ट ऑफ फिक्‍शन की दुनिया की ताज़ातरीन धाराओं से कभी नहीं जुड़े. हां, जब वे दुनिया-भर में पुरानी पड़ने लगी, तो उसे अपने यहां ज़रूर इंपोर्ट कर लिया, बिना किसी पूर्व-योजना के, बिना उसे पर्याप्‍त कस्‍टमाइज़ किए, बिना उसके तर्कशास्‍त्र को पूरी तरह आत्‍मसात किए, बिना उसका विकास किए. हिंदी फिक्‍शन कभी चेखोवियन नैरेशन से बाहर नहीं निकल पाता, जबकि वह त्रेतायुगीन औज़ार की तरह हो गया है. इस नैरेशन की सुंदरता निर्विवाद है, लेकिन वह डेटेड भी है, वर्तमान की समस्‍याओं और चुनौतियों को देखते उसकी अपूर्णता पूरी तरह उजागर है. उसमें कोई अवां-गार्द नहीं. हिंदी फिक्‍शन और हिंदी फिक्‍शन राइटर कभी बड़ी महत्‍वाकांक्षाओं की तरफ़ नहीं गया. जब उसे बहुत कुछ चाहिए ही नहीं था, तो उसे बहुत कुछ मिला भी नहीं. हम छोटे मैदानों में खेले, इसलिए हमारे छक्‍के बहुत लंबे, बहुत ऊंचे न हो सके. कहीं न कहीं यह हमारी जातीयता से जुड़ा सवाल-संकट भी है; ये ऐसी बातें हैं, जिन पर यूं कुछ पंक्तियों में बात नहीं हो सकती, ये बहुत मोटी-मोटी बातें हैं, इनकी तफ़सील पर अलग से घंटों बात करने की ज़रूरत है. बल्कि इनके साहित्यिक-समाजशास्‍त्रीय-राजनीतिक-आर्थिक कारणों पर बाक़ायदा केस-स्‍टडीज की जानी चाहिए. इसकी बचाव-संहिताएं बनाने से पहले इसके स्‍वीकार की ज़रूरत है.

सिनेमा की लोकप्रिय कथ्‍यधारा के दबाव वाला नुक़्ता बड़ा दिलचस्‍प लगता है. क्‍या यही वजह है कि जिस तरह वेस्‍ट में या यूरोप में सिनेमा ने दूसरी कलाओं में, ख़ासकर लिटरेचर में कंट्रीब्‍यूट किया है, वह भारत में नहीं हो पाया है, हिंदी के संदर्भ में ऐसी विपन्‍नता जाहिर है ?

जी हां बिल्‍कुल. दुनिया के किसी भी बड़े लेखक का आत्‍मकथ्‍य या उसकी रचना प्रक्रिया के बारे में पढ़ें, तो हमें पता चलेगा कि उसके विकास में उसके समय या उसके पहले के सिनेमा का बड़ा योगदान है. उसने सिनेमैटिक तकनीकों को उठाया और अपनी कविता या कहानी में उनका इस्‍तेमाल करते हुए अभिव्‍यक्ति की एक नई सरणी खोजी. सहोदर कलाएं हमेशा नए मार्ग प्रशस्‍त करती हैं. चालीस साल पहले रशोमनबनी थी, ओरहन पमुक माय नेम इज़ रेडके लिए अपने नैरेशन की तकनीक वहां से प्राप्‍त करते हैं. द व्‍हाइट कैसलको एक बॉलीवुडीय फिल्‍म में बहुत आसानी से रिड्यूस किया जा सकता है, लेकिन उस उपन्‍यास का साधक उन सारे ख़तरों को लांघ जाता है. सलमान रूश्‍दी कहते हैं कि वह किताब पढ़ने से ज़्यादा मूवी देखना पसंद करते हैं क्‍योंकि वह उनके लिए ज़्यादा मददगार है. मिडनाइट्स चिल्‍ड्रनइस विज़ुअल डेपिक्‍शन के श्रेष्‍ठ उदाहरणों में से है. वहां भी सिनेमैटिक दबावों का सुंदर कलात्‍मक इस्‍तेमाल होता है. मारकेस उस विज़ुअल इंपैक्‍ट को पूरे महाद्वीप के लिए फींचते हैं. मुराकामी सिनेमा से एक क़दम आगे बढ़ते हैं और वीडियो गेम्‍स को फिक्‍शन के सबसे क़रीब मानते हैं. द वाइंड-अप बर्ड क्रॉनिकलऔर काफ़्का ऑन द शोरमें कई दृश्‍य ऐसे हैं, जिन्‍हें देखकर क्‍लासिक वीडियो गेम्‍स की शिद्दत से याद आती है. तो यह हर जगह है. ओज़ू की फिल्‍मों और कल्‍वीनो के गद्य में साम्‍यता देखिए. पता नहीं, कल्‍वीनो ने ओज़ू को उस तरह देखा था या नहीं, लेकिन सिनेमैटिक नैरेटिव्स में ओज़ू के प्रयोग कल्‍वीनो में कितनी ख़ूबसूरती से दिखते हैं. ख़ासकर आईलाइन्‍स मैचिंग को. इफ ऑन अ विंटर्स नाइट अ ट्रैवलरमें यह कल्‍वीनो के पास है. एक शॉट से दूसरे शॉट के बीच ओज़ू जान-बूझकर एक तीसरा असंगत ऑब्‍जेक्‍ट-शॉट रखते थे, बहुधा कोई आर्किटेक्‍चर या इंटीरियर, ‘कॉस्‍मीकॉमिक्‍सऔर द कैसल ऑफ क्रॉस्‍ड डेस्टिनीज़में भी इनके प्रयोग हैं, ओज़ू ओवर-द-शोल्‍डर लेवल से नीचे उतरे थे, संवाद के समय उनका चरित्र स्‍क्रीन के बीचोबीच होता था, और इस तरह दर्शक को भी लगता था कि चरित्र, दर्शक से बात कर रहा है, न कि दूसरे चरित्र से. कल्‍वीनो के यहां लगता है कि पाठक ठीक उनके नैरेटिव के बीच है, बिना लेखक की ओर से उपस्थिति का जायज़ा दिए. (अमोस ओज़ के यहां भी.) पर सबसे बड़ी साम्‍यता एलिप्सिस की है, एक नैरेटिव डिवाइस, जिसमें कुछ ख़ास घटनाओं को चित्रित नहीं किया जाता, पर अगले दृश्‍यों में उस घटना का आफ़्टर-टेस्‍ट ज़रूर रखा जाता है, जिससे पाठक या दर्शक ख़ुद अपने मन में उस घटना की कल्‍पना-संरचना कर लेता है. यह दोनों कलाकारों को प्रिसाइज़न का मास्‍टर बनाती है. इसे दोनों ने अपनी-अपनी विधाओं में ऊंचाई पर पहुंचाया, और शायद यह ओज़ू के उस दिशा में शुरुआती काम करने के कारण हुआ होगा. पर तकनीकों का यह इस्‍तेमाल इतना सटल होता है कि आप चिमटे से चुनकर उन्‍हें बाहर नहीं निकाल सकते. आप उनके बारे में जान रहे हैं, तो आप उन्‍हें छू रहे हैं.

स्‍वयं आपकी कहानियों में यह विजुअल इंपैक्‍ट, भाषा के साथ, बहुत दमदार तरीक़े से है, वह कई-कई पन्‍नों का विस्‍तार लेते हुए भी पुरअसर है. आपका सिनेमा के साथ लगाव, चाहे हिंदी न हो, यूरोपीय या ऐसे सिनेमा के साथ, इसकी वजह है ?

जी, बिल्‍कुल एक वजह है. सिनेमा ने ख़ासकर मेरे कहानी-लेखन में बहुत मदद की है; जैसे पोलिश फिल्‍मकार हैं, किस्‍लोव्‍स्‍की, उनकी फिल्‍मों को देखते हुए मुझे नैरेशन की नई स्‍टाइल का अंदाज़ा हुआ कि हम इस तरह से भी चीज़ों को देख सकते हैं. उदाहरण के लिए बताऊं कि किस्‍लोव्‍स्‍की की फि़ल्‍मों में दो या तीन किरदारों की कहानी एक साथ चलती रहती है, जब एक किरदार फोरग्राउंड में होता है, उसकी गतिविधियां कैमरे पर दिख रही होती हैं, उस समय दूसरा किरदार अपनी माइनर उपस्थिति में पीछे अपना कार्य-व्‍यवहार कर रहा होता है, यानी उन दोनों की कहानियां डिफरेंट हैं, किसी एक सूत्र में बंधी हुई हैं, लेकिन फिर भी दोनों की उपस्थिति आपको एक ही फ्रेम में दिखाई देती है. तो यह जो तकनीक है कि जो प्रमुख है, वह भी है, और जो प्रमुख नहीं है, लेकिन अगले कुछ पन्‍नों बाद प्रमुख बन जाएगा, उसकी अ-प्रमुख गतिविधियां भी उसी हिस्‍से में शामिल हैं. तो यह तकनीक के तौर पर बहुत लाभप्रद रहा. ऐसे बहुत सारे फिल्‍मकार हैं, जो इस तरह की मदद करते हैं. तारकोवस्‍की या बेला तार की तरह कई मिनटों लंबे सूखे शॉट, काउरिसमाकी जैसी एब्‍सर्डिटी-अर्थवान डेडपैन्‍स, अंतोनियोनी-नूरी बिल्‍गे जेलान जैसी चित्रात्‍मक चुप्पियां, किम की-दुक या वांग कार वाई जैसा ऐंद्रिक-सेंसुअस-विज़ुअल स्‍कोरये सब मुझे आकर्षित करते हैं.

अब बात कविताओं की. मेरी अपनी पढ़त में यह महसूस हुआ कि आपकी कविताओं में एक असंबद्ध संरचना शुरू से अंत तक रही है. असंबद्धनाम से आपकी एक कविता ही है. इस असंबद्ध संरचना के बारे में बताएं.

यह असंबद्धता मेरी कविताओं में ज्‍यामितीय संरचनाओं के नज़दीक से आती है. हम दो या तीन या चार परस्‍पर विरोधी किस्‍म की चीज़ों को, जो अपने स्‍वभाव में, अपने व्‍यवहार में, एक-दूसरे का विरोध करती हुई जान पड़ती हैं, ऐसा लगता है कि उन्‍हें एक साथ खड़ा नहीं किया जा सकता, और वे अपना अर्थ्‍ अपने अकेलेपन में तो दे सकती हैं, लेकिन उन्‍हें साथ रखने पर वे अर्थ नहीं देंगी, ऐसा संदेह होता है; तो ऐसी कई चीज़ों को एक साथ रखने की कोशिश ही यह असंबंद्धता है. इसका संबंध बीसवी शताब्‍दी के शुरुआत के दादाइस्‍ट पेंटर्स, जिन्‍होंने दादाइज़्म और सर्रियलिज़्म का सूत्रपात किया था, उनसे मिलती है, कि वे बहुत सारे ऑब्‍जेक्‍टस को एक साथ रखकर एक विजुअल नैरेटिव बनाते थे, उसी तरह मैं बहुत सारे ऑब्जेक्‍टस को उठाकर कविता में रखता हूं, और उनके बीच संबंध स्‍थापित करने की कोशिश करता हूं. उन्‍हें अलग रखने पर वे अलग अर्थ देंगी, पर साथ रखने पर बिल्‍कुल ही अलग. आलाप में गिरहकी कई छोटी कविताओं में यह प्रयोग है. सेब का लोहाइसी से बनी है. इधर, ‘उभयचर’, ‘जाना सुना मेरा जाना’, ‘मुद्रा-स्‍फीति’, ‘मध्‍य वर्ग का मर्म-गीतजैसी कविताओं में है. इसका एक पक्ष यह भी है कि हमारा जो पूरा समय है, उसमें एक साथ इतनी सारी घटनाएं, इतनी सारी चीज़ें हो रही हैं कि उन्‍हें एक-दूसरे के तारतम्‍य में देख पाना कई बार संभव नहीं लगता है, लेकिन जब हम उन्‍हें एक-दूसरे के क़रीब रखते हैं और जैसा कि सिमोन वील कहती है, डिस्‍टेंस इज़ द सोल ऑफ ब्‍यूटी, तो जब हम उन सारी चीज़ों को थोड़ा-सा दूर खड़े होकर देखते हैं, तो मेरे ख़याल से उनमें एक अंतर्संबंध दिखाई देने लगता है और समय की एक आवाज़ उसमें गूंजने या प्रतिध्‍वनित होने लगती है. यह कविता को लेकर मेरी एक नई कोशिश है. शेक्‍सपियर के शब्‍दों में कहूं, तो दिस इज़ अ मेथड टु माय मैडनेस. यह एक ऐसा बीहड़ है, जिसमें रचनाकार पूरी तरह खो गया है, सिर्फ़ रचना है, इमेज़ेस हैं, बातें हैं, अनुभूतियां और विचार हैं, वहां फिक्‍शन विदिन अ पोएट्रीका चरण-वार विकास नहीं है, उसे तोड़-झिंझोड़ दिया गया है, इसीलिए वह अनुभूतियों की क्रमवार कहानी नहीं बनाती. यह कहानी जितना खोती है, एक असंबद्ध काव्‍य-संरचना उतना उभर कर आती है. कविता में केंद्रीय अर्थ की तलाश की आदत को छोड़ने की कोशिश है. कविता में एक केंद्रीय अर्थ होता है, इसके मिथक की रवानगी है. यह सब मैं ख़ुद को, और इस संरचना को स्‍पष्‍ट करने के लिए कह रहा हूं, इसे वादा-दावा न माना जाए. पर इसकी ज़रूरत इसलिए भी लगी, कि हम लगातार कविता में एक कहानी कह रहे हैं, बरसों से. क्‍या उसे रिप्‍लेस किया जा सकता है? क्‍या कविता के भीतर से कहानी को बाहर फेंका जा सकता है? मैं उसके भीतर मटका, साइकिल, स्‍कूटर, ऑटो, पेड़, फूल, पत्‍ती, दरवाज़ा की कहानी नहीं कहना चाहता, बल्कि चाहता हूं कि ये सब मिलकर मेरे समय, जिसमें मेरा सुदूर अतीत और खाद्य भविष्‍य भी शामिल है, की घड़ी बन जाएं. हर पंक्ति इतनी प्रच्‍छन्‍न हो कि वह पूरी कहानी अलग से कहे. इस तरह कई सारी कहानियां एक साथ चलती रहें. यहां फिर वही मल्‍टी-लेयरिज़म की बात कहूंगा मैं. कविता और कहानी, दोनों में, अलग-अलग तकनीकों के साथ यह करना चाहता हूं.

आपकी कविता विचार-सघन कविता है. उसमें रिलीफ़ कम है. अनुभव से ज़्यादा विचार की गांठें हैं, जो कई दफ़ा सूंक्तियों की ऊंचाई छू जाती हैं. आप क्‍या कहेंगे इसके बारे में?

मैं पाठक को कोई रिलीफ़ नहीं देना चाहता. किसी भी सार्वजनिक होने वाली बातचीत में यह कहना बुरा माना जाएगा, फिर भी मैं कह दूं कि मैं ऐसे लेखन में यक़ीन भी नहीं रखता, जिसमें पाठकों की सुविधा का ध्‍यान रखा जाए. किसी भी रचना पर मुख्‍यत: दो ही दबाव होते हैं- या तो पाठक का, या फिर रचना के लिए वैध कलात्‍मक स्‍टफ्स का. मेरे लिए दूसरा दबाव ज़्यादा काम करता है. मज़े की बात है, लेखन को लेकर मैंने जितने वरिष्‍ठों को सुना-पढ़ा है, या विदेशी लेखकों के अनुभव पढ़े हैं, उनमें से ज़्यादातर पहले दबाव को तरजीह देते हैं, या दोनों ही दबावों में एक अद्भुत सामंजस्‍य बिठाने की सिफ़ारिश करते हैं. मुझे बराबर यह लगता है कि जो लोग पाठकों की आकांक्षाओं-सहूलियतों की चिंता करते हैं, वे दरअसल पाठकों के साथ छल कर रहे होते हैं. यह लोकप्रिय लुगदी-लेखन का पारंपरिक औज़ार भी है. और कलाकार के भीतर घर करने वाला एक बाज़ारी-शक्ति भी. वैसा लिखो, जैसा पाठक चाहे. चैपलिन की एक मशहूर बात याद आती है, जो उसने द सर्कसके बाद कही थी- दर्शक कभी नहीं जानता कि उसे क्‍या चाहिए. हम ही उसे बताते हैं कि देखो, तुम्‍हें यह चाहिए था, सो हमने दिया. से, आएम ग्रेट! यह एक किस्‍म का कॉरपोरेटाइज़ेशन भी है. कॉरपोरेट हमेशा अपने ग्राहक की चिंता करता है, उस चिंता का प्रचार करता है, पर हक़ीक़त में वह उसकी चिंता कभी नहीं करता, वह अपने मुनाफ़े की चिंता करता है और ग्राहक की चिंता का स्‍वांग इस मुनाफ़े की रणनीति का हिस्‍सा होता है. हमारे समय का सबसे बड़ा झूठ रचा गया है कि कस्‍टमर इज़ द किंग. रिलीफ़ की मांग भी ऐसी ही मांग है. बहुत हद तक बॉलीवुडीय, जो मेरे लिए बाज़ार की नीतियों का एक पर्याववाची शब्‍द ही है, जिसमें रिलीफ़ देने के लिए बसंती मना करने के बावजूद कुत्‍तों के सामने नाचने लग जाती है. और मैंने पहले कहा कि मेरी अभिव्‍यक्ति ऐसी है, शैली ऐसी है कि एक सूखी निगाह से चीज़ों को देखना. बिना अनुभवों के विचार कहां से बनेंगे और बिना विचारों के अनुभव कहां से आएगा? ये अनुभव के विचार हैं, जिनसे आपको विचार का अनुभव होता है. और मैं यही करना चाहता हूं. अनुभव को बता सकने की कथ्‍यात्‍मकता को धीरे-धीरे कम किया है मैंने. उसका कम से कम प्रयोग करके मैं कैसे कह सकता हूं अपनी बात, यह कोशिश की है. हम फॉर्म और कंटेंट के प्रेजेंटेशन के स्‍तर पर काफ़ी बात कर रहे हैं और उसमें यह सब साफ़ करने की ज़रूरत भी है; मैं फिर बोलान्‍यो को रेफ़र करूंगा, थोड़ा तोड़-मरोड़कर कि फॉर्म मैं चुनूंगा, कंटेंट मेरे पास अनायास आएगा, मैं फॉर्म का अभ्‍यास करूंगा और कंटेंट मेरा अभ्‍यास करेगा. कंटेंट हमेशा एक क्लिफ़हैंगर होता है (फिक्‍शन डिवाइस की ही तरह), तभी वह अनुभवों का कोलाज होता है.

जब आप कविता लिखने की शुरुआत कर रहे थे, तो उसमें बहुत पहले के कुंवर नारायण सक्रिय थे, त्रिलोचन के संग्रह आ रहे थे, बाद के अस्‍सी के दशक के पूरे कवि हैं, उन कवियों का, उनकी काव्‍यभाषा का बहुत परिष्‍कृत रूप आपकी आरंभिक कविताओं में दिखता है और उसके समांतर अपनी एक काव्‍यभाषा अर्जित करने की जि़द भी दिखती है, पिछली पीढ़ी से जुड़ाव या उससे मुक्ति का अहसास आपके भीतर कब घना हुआ ?

कवि हमेशा अपने लिए एक भाषा खोजा करता है. पाज़ कहता था कि भाषा सबसे पुरानी और सबसे सच्‍ची मातृभूमि होती है, मैं उसमें हमेशा यह जोड़ता हूं कि कविता ऐसी तमाम मातृभूमियों का महाद्वीप है. एक नया कवि अपनी भाषा अपने पहले की कविता से पाता है और वह चाहे कितना भी अवां-गार्द हो जाए, वह काव्‍य-शैशव की उन आदतों को कभी ख़ुद से अलग नहीं कर पाता. वह अपने से पहले की कविता से तीन चीज़ें सबसे पहले पाता है- स्‍टाइल, फॉर्म और भाषा. जैसे-जैसे वह सुचेत होता है और अलग होने की छटपटाहट बढ़ती है, वह यह शोध करना चाहता है कि जिस समय की कठिनाइयों को वह एड्रेस कर रहा है, वह स्‍टाइल, फॉर्म और भाषा क्‍या उस समय को अभिव्‍यक्‍त करने के लिए काफ़ी हैं? अमूमन इसका जवाब ना में मिलता है. वह पोएटिक इनोवेशन और इंप्रोवाइज़ेशन की तरफ़ तभी जाता है. ऐसा करके वह अपने से पहले की कविता की सीमाओं का अंदाज़ा भी ले रहा होता है. ठीक-ठीक किस समय मेरे साथ ऐसा हुआ, पर मुझे भी यह लगने लगा कि मुझसे पहले की जो पीढि़यां हैं, वह मेरे समय और यथार्थ को जिस तरह से देख रही हैं, जिस दृष्टि से, वह मेरी अपनी डिमांड्स को पूरा नहीं कर पा रहीं, वे इस बहुस्‍तरीय समय को नहीं पकड़ पा रहीं. उनसे अलग होने की कोशिश भी तभी से ही रही. कहते हैं न, समय अपना कवि ख़ुद चुन लेता है, उसी तरह मैं कहता हूं कि कवि भी अपना समय ख़ुद चुनता है. यह आपके ऊपर निर्भर है कि आप ख़ुद को किस समय में खड़ा पाएंउसमें पांच हज़ार साल पुराने दिन भी हों, तो दस हज़ार साल बाद की शाम भी; एक अनंत अतीत, एक अनादि भविष्‍य. इसीलिए इतनी लेयर्स की बात है. वरना यह बहुत आसान है कि अपने लिए एक सहूलियत भरा समय चुन लिया जाए और लगातार एक हेडोनिस्‍ट कविता लिखी जाए, जिसमें दुख का सुख हो, एक सुपाच्‍य मुद्रा हो, कुछ वक्रोक्तियां हों, एक सुकून भरी वाह हो.

एक और बात बतौर बदलाव लक्षित की जा सकती है आपकी कविताओं में, जैसे आपकी एक कविता का शीर्षक है कान बंद’, जिसमें जो प्रचलित दृष्टि है, जो हमारे यहां बहुत लंबे समय पहले कबीर ने दी थी आंखिन देखी, उस कविता में बहुत शिद्दत से उसके विपरीत जाने की कोशिश है, और कहा गया है कि आंखें फिल्‍म देखती हैं, यहां फिल्‍म देखना, फिल्‍म शब्‍द का प्रयोग बहुत व्‍यंजक है, मेरा ख़याल है, यह यथार्थ के दूसरे आयामों की तरफ़ इशारा करता है, वो आयाम क्‍या हैं ?

कविता की पंक्तियां हैं- मैं आंखों पर विश्‍वास नहीं करता / आंखें फिल्‍म देखती हैं. जैसा कि आपने कहा, आंखों देखी पर विश्‍वास करने की परंपरा बहुत पुरानी है, लेकिन जिस समय कबीर ने यह बात कही और उसके बाद के बरसों में जब यह लोकप्रिय मुहावरा बन गई, उस समय हमारे समाज में विजुअल मीडिया का कोई आतंक या आक्रांता स्थिति नहीं थी. पिछले दस-पंद्रह सालों में जिस तरह से चीज़ें बदली हैं, इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया का जिस तरह उत्‍थान हुआ है, और सारी चीज़ें जिस तरह एक विजुअल फ्रेम में बंद होकर दिखने लगी हैंजैसे एक साइकोएनालिस्‍ट ने पिछले दिनों कहा था कि पिछले पंद्रह-बीस सालों का जो रीसेंट इतिहास है, उसे देखते हैं, तो हमारे दिमाग़ में सबसे पहले एक विजुअल फ्रेम बनता है, जो कहीं न कहीं टीवी के फ्रेम की तरह होता है, यह मानसिकता में तेज़ी से बदलाव आया है, तो इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया का यह जो दबाव है व्‍यक्ति के जीवन पर, उसमें आंखों देखी, लाइव या सीधा प्रसारण है, वह ह‍मारे भीतर कहीं न कहीं सवाल जगाता है, हम जिन चीज़ों को स्‍थाई सत्‍य मानकर बैठे हुए हैं, वह उन स्‍थाई सत्‍यों को भी कई बार ख़ारिज करता है. वह पूरा का पूरा विजुअल प्रेजेंटेशन हमारे लिए संदिग्‍ध हो गया है, हम उस पर ठीक-ठीक विश्‍वास नहीं कर पाते हैं, उसने हमारी सेंसिबिली‍टीज़ पर हमला भी किया है, तो उसी बारे में मैं कहना चाहता हूं कि हम जो भी कुछ देख रहे हैं, वह सुनियोजित नाटकीयता है, उसका यथार्थ से बहुत कम या लगभग न के बराबर लेना-देना है. यह यथार्थ या सत्‍य की रैपिंग करके उसे किसी न किसी तरह सनसनीख़ेज़ बनाकर बेच देने की एक कोशिश है. निश्चित ही उसमें झूठ का सहारा लेना पड़ता हो, तो वे लेंगे. उस संदेह को कहीं न कहीं इस कविता के सहारे मैं दिखाना चाहता हूं. मैं जिस आदमी की जीत का सीधा प्रसारण देख रहा हूं, हक़ीक़त में वह जीता नहीं है; मैं जिसे अपनी आंखों के सामने हमदर्दी जताते देख रहा हूं, असल में हत्‍या उसी ने की है; अपनी आंखों से जो ख़बरें मैं पढ़ रहा हूं, टीवी पर जो देख रहा हूं, वे पेड न्‍यूज हैं; प्रदर्शन इस समय का सबसे अश्‍लील आचार है. और आंखें क्‍या देख रही हैं, सिर्फ़ भ्रम है. मैं यह बात यहां फिर दोहराऊंगा कि यह ज्ञात सभ्‍यता का एकमात्र ऐसा समय है, जब भ्रम महज़ एक मानसिक अवस्‍था नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित-सुचिंति‍त राजनीतिक हथियार है. भग्‍न-विश्‍वास का ऐसा इतिहास तो किसी जूलियस सीज़र के वर्तमान में भी नहीं था.

यह सचेत कवि-दृष्टि आपकी आज की कमाई है, लेकिन एक कवि-दृष्टि आप वहां से भी पाते हैं, जिन कविताओं से या जिन कवियों से आप गुज़रते हैं. ऐसे किन कवियों का आप नाम लेना चाहेंगे, जिनकी कविताओं का, सीधा-सीधा भले नहीं, पर आपकी काव्‍यचेतना पर जिनका गहरा असर है. हिंदी कविता की परंपरा में आप ख़ुद को कहां पाते हैं?

ऐसे बहुत सारे कवि हैं. मैंने जितने कवियों को पढ़ा है, मुझे उनका नाम याद हो या न याद हो, लेकिन यह ज़रूर कहूंगा कि मैंने जिनको पढ़ा है, कहीं न कहीं मैं उनके प्रति कृतज्ञ हूं, क्‍योंकि कोई भी कवि कभी यह बता नहीं सकता कि यह चीज़ उसने किस कवि के यहां से प्राप्‍त की. फिर भी मेरी काव्‍य-समझ या सेंसिबिलीटीज को एक शेप देने में हिंदी में रघुवीर सहाय और विष्‍णु खरे की कविताओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है. मैं ख़ुद को इन दोनों के बहुत क़रीब पाता हूं. हालांकि यह कहना मुझे बहुत फि़ज़ूल और भावुक लगता है कि फलां परंपरा ने मुझे चुना है या मैंने ख़ुद के लिए यह परंपरा चुनी है. परंपरा एक बहुत बासी, संदिग्‍ध और नाकाफ़ी शब्‍द है. परंपरा विकास-वीर्य-वंश-वृक्ष नहीं, महज़ एक वर्चुअल प्रेजेंस है. कैनन उससे बेहतर शब्‍द है, जिसे मैं अपने लिए चुनता हूं और जिसमें समय-समय पर बदलाव भी हो सकता है.

और विदेशी लेखकों में किनसे प्रेरणा या प्रभाव पाते हैं ?

विदेशी लेखकों में जो जाएंट्स और मास्‍टर्स हैं हमारे समय के, उनसे निश्चित ही बहुत कुछ सीखने को मिलता है. कविता में पाब्‍लो नेरूदा को पढ़कर, अनुवाद करके या समझ कर मेरी पोएटिक्‍स में दिलचस्‍पी बढ़ी और यह बात वही बताते हैं कि कविता अंतत: एक कला है. दूसरी तरफ़ बोर्हेस हैं, जिनकी कविता या गद्य..

मेरा ख़याल है, बोर्हेस आपके लिए उस लिहाज़ से निकट होंगे क्‍योंकि वह जितने कवि थे, उतने ही कहानीकार थे, उतने ही अच्‍छे कथेतर गद्यकार थे, उनकी आलोचनाएं भी उतनी ही मानीख़ेज़ हैं.

हां बोर्हेस. बोर्हेस से मैं इतिहास और समय को देखने की एक दृष्टि पाता हूं. जिस दृष्टि का एक मुख्‍य आधार यह भी है कि आप जो भी कुछ देख रहे हैं, उसे ज़रा संशयग्रस्‍त होकर देखिए. इतिहास की हर चीज़ पर आंख बंद करके विश्‍वास करने की प्रवृत्ति छोड़ दें, अपने पूरे समय को, इतिहास को, परंपरा को जब आप संदेह से देखना शुरू करते हैं, तब दरअसल आप कुछ नए सवाल खड़े करते हैं, और वे आपकी रचनाओं को एक स्‍टैंड देते हैं. ओल्‍ड मास्‍टर्स को छोड़ दें, वे तो ऑल टाइम ग्रेट हैं ही, चेस्‍वाव मिवोश और एडम ज़गायेवस्‍की हैं. बेई दाओ और ऑगस्‍ट क्‍लाइनज़ाहलर हैं. मारकेस, फेंतेस, बोलान्‍यो, कल्‍वीनो, अमोस ओज़, कोएट्ज़ी, पमुक, वोल्‍पी हैं. और इनमें से कई एक-दूसरे के एकदम उलट हैं.

आगे क्या लिख रहे हैं?

I dont count my chickens until theyve hatched. अभी तो, 27 जून को, दोनों कहानी संग्रह आने वाले हैं, बस इतना ही है.

*****

( सम्मुख : १ : के लिए कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का स्केच गौतम चक्रवर्ती ने बनाया है,

जबकि उनकी तस्वीरें
ज़ाहिद मीर ने क्लिक की है.)
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