Wednesday, March 31, 2010

कवि की संगत कविता के साथ : ६ : विजय शंकर चतुर्वेदी

आत्मकथ्य

इससे
पहले इस तरह से कभी सोचा नहीं था. अब भी बड़ा अटपटा लग रहा है. अब सोच रहा हूँ तो सबसे पहले यही प्रश्न मन में उभर रहा है कि मैं कविता क्यों लिखता हूँ. अहसास होता है कि मैं 'स्वान्तः सुखाय' तो नहीं ही लिखता. चाहता हूँ कि मेरी बात, मेरे विचार परिष्कृत रूप में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचें, मेरी कविता जनजीवन में व्याप्त उदासी-निराशा-हताशा और राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक क्षरण से जूझने का एक नुस्खा बन सके, कविता की जीवनी शक्ति और सामाजिक चेतना द्वारा समाज के अंतःकरण तक पहुँच सकूं आदि-आदि. तुलसी बाबा ने भी 'स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा' कोई खुशी-खुशी नहीं लिखा था, बल्कि वह अपने विरुद्ध चतुर सुजानों के बनाए गए माहौल की एक साहित्यिक काट थी. लेकिन आजकल चंद लोग कविता लिखने को स्वान्तः सुखाय कहकर गुणी जनों का और अपना मनोरंजन किया करते हैं और 'बचे' रहते हैं.

आगे पाता हूँ कि मेरे आस-पास कविता का रेगिस्तान जैसा वायुमंडल है. कंपनी की जिस बस में घर से दफ्तर जाता हूँ, जिन सरकारी बसों में लोगों से मिलने-मिलाने निकलता हूँ, जिन ट्रेनों से लम्बी दूरी की जरूरी यात्राएं करता हूँ वहां कविता का कोई माहौल नहीं नज़र आता. किसी को मैंने किसी की कविता गुनगुनाते नहीं सुना. मित्रों से बातचीत में कविता का जिक्र नहीं आता. समकालीन कविता के एक महत्वपूर्ण कवि ने एक दिन कहा कि उसे तो कविता से बोरियत होने लगी है और कविता लिखने से कुछ नहीं बदलता. ऐसे में कविता को लेकर मन निराशा से भरने लगता है और सोचने लगता हूँ कि क्या कवि कर्म निरर्थक है! लेकिन तभी मुझे हमारे समय के एक बहुत बड़े कवि कुंवर नारायण जी की ये पंक्तियाँ संभाल लेती हैं-

“आदमी के आदमी होने की सबसे पक्की पहचान और लक्षण उसका साहित्य, कलाएं और विचारशीलता रहे हैं- पहले भी, और आज भी. कविता के हाथों में जीवन और विचार का सबसे सशक्त माध्यम भाषा है. कविता को चाहिए कि वह सामाजिक चेतना को सीधे संबोधित करे. लेकिन जीवन संभालने की सारी जिम्मेदारियां अगर कविता पर लाद कर उसकी सामर्थ्य को आंका जाएगा तो वह चरमरा कर बैठ जायेगी. वह 'बेचारी', 'बेबस' और 'असमर्थ' नज़र आयेगी.”

एक दिन मैं करता यह हूँ कि कंपनी की बस में अजनबी बने मशीनी मुद्रा में बैठे लोगों से साहित्य और प्रकारांतर से कविता का जिक्र छेड़ता हूँ. कुछ दिनों में ही सहजता आने लगती है. कुछ लोग बताते हैं कि उन्होंने कबीर को पढ़ा है, मीरा बाई को सुना है, सूर-तुलसी के पद और चौपाइयां रेडियो पर हर सुबह सुनते हैं, दिनकर को पढ़ा है, कुसुमाग्रज को पढ़ा है, पु.ल. देशपांडे के वे घनघोर प्रशंसक हैं, विंदा करंदीकर और नारायण सुर्वे का साक्षात काव्य पाठ उन्होंने सुना है. कंपनी के स्वास्थ्य बीमा विभाग का प्रमुख तो खुद अच्छा-खासा कवि निकल आता है.

इसी तरह एक बार लम्बी दूरी की यात्रा के दौरान इलाहाबाद से चढ़ा यात्री हाल-चाल पूछने पर बात-बात में रामचरित मानस की चौपाइयों का हवाला देता है. एक अन्य यात्रा में पिपरिया का सहयात्री मौसम के मिजाज को घाघ-भड्डरी की उक्तियों से बयान करता है और दिल्ली से भोपाल आते समय मिले महफूज अली दुनिया के हर विषय पर मौजूं अश'आर का पिटारा खोल देते हैं.

ऐसे में कौन कह सकता है कि जीवन से कविता गायब हो चली है! गायब नहीं है, बस घनघोर ग्रीष्म के इस मौसम में कविता की धारा कृशकाय अवश्य है और वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति के शब्दों में कहूं तो-

'रेत के द्वीप पसर आये हैं गंगा के बीच तक....
...……
…..
मछलियों के पीछे-पीछे अपनी प्रसिद्ध सुस्त चाल से,
कितना तेज़ चलते हुए गुज़र गए कछुए...'.

मेरा मानना है कि कविता की सरस्वती हमारे दैनंदिन संघर्षों के ऐन बीच में विलुप्त होती जा रही है, हाथों से थोड़ा रेत इधर-उधर करने से हम उसे अंजुलियों में भर कर जीवन की प्यास बुझा सकते हैं.

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि यह किस तरह की कविता होगी जो मनुष्य का जीवन जल बन सकेगी. इसका कोई सीधा-सादा उत्तर मैं सोच नहीं पाता. मुझे लगता है कि हज़ारों साल पहले भी यह प्रश्न उपस्थित हुआ होगा और लोगों ने उसका उत्तर अपने-अपने ढंग से खोजा होगा. भूतकाल में ऐसा करने में जो लोग सक्षम हुए उन्हें ही हम वर्त्तमान में महाकवि माना करते हैं. वर्त्तमान काल की प्रकृति और एक प्रवृत्ति यह भी है कि उसमें काफी कुछ जान लिया गया होता है जबकि बहुत कुछ को अभी जाना और खोजा जाना होता है. यही बात कविता को लेकर सच है.

भविष्य की कविता अपरिमित और अज्ञात है. लेकिन कवि का समाजशास्त्री वाला रूप यहीं उसकी मदद करता है. तुलसीदास ने कलिकाल की जो महिमा गाई है वह किसी नजूमी, भाष्यकर्ता, भविष्यवक्ता, ज्योतिषी या त्रिकालदर्शी होने के नाते नहीं बल्कि अपने समाज के वर्त्तमान को गहराई से पढ़कर भविष्य का खाका खींच सकने की सामर्थ्य के कारण है. आमजन आज भी बात-बात पर कहते हैं कि देखो तुलसी बाबा ऐसा कह गए थे और वही आज हो रहा है! लेकिन ये जो पल-पल नया जन्म ले रहा है और अनंत गहराइयों में समाता जा रहा है, उसे महसूस कर पाना कठिन है और कविता में पकड़ पाना तो और भी दुष्कर है. आज के कवि के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती है. इसके लिए मानव मन के भीतर गहरे पैठना तो अनिवार्य शर्त्त है ही, उसे विभिन्न विषयों का सम्यक अध्ययन करना होगा और समूचे वैश्विक घटनाक्रम पर पैनी नज़र बनाए रखना होगी.

आगे सोचना बंद करता हूँ तो पाता हूँ कि यही बातें हूबहू मेरे लिए भी सच हैं!
****

तीन नई कवितायें

बात है कि

गोरे झरनों
और काली चट्टानों का
जंगल में एक साथ गुज़र है,
क्या शहर वालों को नहीं इसकी ख़बर है!
****
हम सबके दर्शक होते हैं

हम सबके दर्शक होते हैं
हम कोई सिनेमा या नाटक नहीं हैं
लेकिन दुनिया के रंगमंच पर पल-पल नजर रखी जाती है हमारे किरदार पर
अच्छे काम पर बजती हैं तालियाँ
बुरे काम पर गालियाँ पड़ती हैं
ये मनोरंजन के लिए जुटे दर्शक नहीं
खेद या सहानुभूति जताने आये इष्ट-मित्र भी नहीं
ये खुले सभागृह में उपस्थित सर्जक होते हैं.

कुछ होते हैं हमारे मूकदर्शक, कुछ प्रशंसक
कुछ अनचीन्हे आलोचक तो कुछ उदार समालोचक
इनकी नज़र में अक्सर बदलती रहती है हमारी तस्वीर
कभी वह हो जाती है सफ़ेद तो कभी स्याह
कभी स्याह-सफ़ेद हो जाती है जाने-अनजाने
इन दर्शकों को रिश्वत देकर बरगलाया नहीं जा सकता
कोई एजेंसी नहीं चमका सकती हमारी दागदार छवि
हमारी चमक को धूमिल भी नहीं किया जा सकता इनकी नज़र में.
कन्धों पर बैठे कथित जय और विजय की तरह
ये रखते हैं हमारे धतकरमों का पूरा लेखा-जोखा.

जब हम निकलते हैं घर से
तो हमें निहारते हैं पेड़ अपने हज़ार-हज़ार फूलों-पत्तियों की आँखों से
इमारतें हमारी चौकसी करती हैं चुपके से खिड़कियाँ खोलकर
सड़क पर आते-जाते वाहन हमें घूरते हुए चलते हैं
दफ़्तर में हम पर नज़र रखती हैं मेज़ और कुर्सियां
सर पर चक्कर काटता पंखा गौर करता है हम पर विहंगम दृष्टि से
दराज़ों में पड़ी फ़ाइलें ताकती रहती हैं हमारे हाथों की तरफ टुकुर-टुकुर
दीवार पर टंगे कैलेण्डर और परदे
हमारे धतकरम देखकर भी शर्म से आँखें नहीं मूंदते.

हमें अहसास भी नहीं हो पाता
कि हमें किस नज़र से देख रही है दुनिया
यह पलकों के झपकने की तरह होता रहता है अनायास
और हमें लगातार देखा जाता है
हमारा अवलोकन करते रहते हैं हमारे विचार
कि आज का दिन कैसे जिया
किसका अच्छा किसका बुरा किया
जब हम सो रहे होते हैं
तब भी हमारा ख़ामोश नज़ारा करती रहती है हवा
और सपनों को हमारी नींद में आने का रास्ता दिखाती है.

हम अपने दर्शकों को देख नहीं पाते
लेकिन उनके होने से इनकार करना
अपनी हस्ती मिटाने से कम नहीं
वे हमारे आसपास ही मौजूद रहते हैं
और कच्चे घड़े की तरह हमारा व्यक्तित्व गढ़ा करते हैं.
****
नफ़रत से नफ़रत

नफ़रत किधर से आती है
नफ़रत किधर को जाती है
क्या यह किसी से किसी को प्यार करना भी सिखाती है?
प्यार के लिए कितने लोगों ने जान गवांई होगी बूझो तो?
लेकिन नफ़रत से हुई मौतों के आंकड़े कोई पहेली नहीं हैं.

नफ़रत बिल्लियों की तरह कहीं भी आ-जा सकती है बेरोकटोक
तुम उस पर पहली नजर में शक नहीं कर सकते
रीढ़ की हड्डी में नागिन की तरह कुण्डली मारे बैठी रह सकती है बरसों बरस
वह कलम की स्याही बनकर झर सकती है मीठे-मीठे शब्दों की आड़ में
नफ़रत को झटक दो कि वह तुमको तुमसे ही बेदखल कर रही है

नफ़रत हर ख़ास-ओ-आम में मिल जाएगी
किसी पैमाने से उसे मापा नहीं जा सकता
खिड़की बंद करके उसे रोका नहीं जा सकता
नफ़रत हवाओं में उड़ती है विमानों के साथ-साथ
पानियों में घुलकर एक से दूसरे देश निकल जाती है
हर दरवाजे पर दस्तक देती फिरती है नफ़रत
कई बार वह आती है किताबों के पन्नों में दबी हुई
लच्छेदार बातों की शक्ल में तैरती हुई पहुँचती है तुम तक
गिरफ्त में ले लेती है विश्वामित्र की मेनका बनकर
नफ़रत एक नशा है जो आत्मा को फाड़ देती है दूध की तरह

नफ़रत कब तलब बन जाती है यह पता भी नहीं चलता
हम रोज सुबह पछताते हैं कि अब से नहीं करेंगे नफ़रत
लेकिन नफ़रत के माहौल में करते हैं सुबह से शाम तक नफ़रत
हम भुलाते जाते हैं सब कुछ नफ़रत की पिनक में
फिर वह ऐसा सब कुछ भुला देती है जो जरूरी है इंसान के हक़ में

वैसे सही जगह की जाए तो नफ़रत भी बुरी चीज़ नहीं
पर यह क्या कि दुनिया की हर चीज़ से नफ़रत की जाए!
नफ़रत करो तो ऐसी कि जैसे नेवला साँप से करता है
शिकार शिकारी से करता है
बकिया मिसालों के लिए अपने आस पास ख़ुद ढूँढ़ो
कि कौन किससे किस कदर और क्यों करता है नफ़रत

वैसे भी प्यार का रास्ता आम रास्ता नहीं है
इसलिए नफ़रत से जमकर नफ़रत करो
कि नफ़रत हमारे और तुम्हारे बीच नफ़रत बनकर खड़ी है
****
( इस स्तंभ के तहत अब तक आप चंद्रकांत देवताले, असद जैदी, गीत चतुर्वेदी, लाल्टू तथा सुन्दर चन्द ठाकुर को पढ़ चुके हैं.)

Thursday, March 25, 2010

स्वगत : ४ : व्योमेश शुक्ल


{ इस निबन्ध में पर्याप्त अराजकता है और ज्यादातर प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की गई हैं और प्रतिक्रियाएँ निष्कर्ष नहीं होतीं। ‘विषय’ के साथ भी एक मनमानापन यहाँ है। यह निबन्ध भूमण्डलीकरण के प्रभाव की व्याख्या करने की बजाय भूमण्डलीकरण के परिप्रेक्ष्य में कविता, और उसमें भी हिन्दी कविता और उसमें भी समसामयिक हिन्दी कविता की कुछेक उलझनों से मुखातिब है। ये सीमाएँ हैं। कहीं-कहीं कुछ भर्त्सना और टोकाटोकी का भाव भी है। इन्हें आत्मभर्त्सना या आत्महनन के ही एक प्रकार के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। }
- लेखक


1
कविता लिखने की वजहें क्या होती हैं ? क्या वे संख्या में कविता न लिखने की वजहों से ज्यादा होती हैं ? या कम! क्या वजहों के बीच कोई मुकाबला कहीं चलता रहता है ? अगर चलता रहता है तो कहाँ ? भीतर कि बाहर! और ये मुकाबला जीत लेने वाला क्या करता है ? कविता लिखने लगता है या कलम तोड़कर कविता लिखना बंद कर देता है।

2
क्या कविता हमेशा कविता न लिखने की वजहों के खिलाफ लिखी जाती है ? क्या कविता न लिखने की वजहें कविता का अनिवार्य प्रतिपक्ष हैं ? क्या कविता हरेक अवसर पर एक ‘निश्चित’, ‘स्थिर’ और ‘ज्ञात’ पक्ष है - जिसका कोई न कोई उतना ही ‘निश्चित’, ‘स्थिर’ और ‘ज्ञात’ प्रतिपक्ष होगा ही ? क्या पक्ष और प्रतिपक्ष के द्वैतों में सीमित होकर ही कविता संभव है ?

3
जाहिर है कई जवाब हैं। बहुत सीधे, सपाट और सख्त जवाबों से लेकर अत्यन्त सूक्ष्म कलात्मक उत्तरों तक। कोई यहाँ तक भी बता सकता है कि पहले पूछे गये सवाल ही अपनी ‘प्रकृति’ में इतने ‘रेटरिकल’ हैं कि उन्हीं में उनके जवाब भी निहित हैं; याने पूछने वाले को खुद इनके जवाब पता हैं, इत्यादि-इत्यादि।

4
खैर, हम पुनः कविता लिखने की वजहों की ओर लौटें! अतीत में कवियों के कविता लिखने की जो वजहें हमें मालूम हैं वे अक्सर अत्यन्त साधारण, सर्वथा अप्रत्याशित और निरायास हैं। वे कई बार हास्यास्पदता की हदों तक पहुँची हुई हैं और एक अच्छी कविता की ही तरह उलझन में डाल देती हैं। कविता लिखने के कारण और लिखी गयी कविता के वैचारिक-कलात्मक उत्कर्ष के बीच वहाँ कोई दूर का ही सम्बन्ध मुमकिन है। कविता के असर को कविता लिखने की वजहों में सामित करके देखने से धोखादेह और गलत नतीजे निकल सकते हैं। मसलन् एक प्रेमरत पक्षी युगल की हत्या से उत्पन्न शोक। बेशक, कविता लिखने की यह वजह हमारी निधि है, लेकिन इस वजह से आरम्भ होने वाली अपार महाकाव्यात्मकता हमारी ज्यादा बड़ी सम्पदा है और हम दोनों को - याने कविता लिखने की वजह और कविता को अलग-अलग और साथ-साथ पढ़ना जानते हैं।

5
कविता लिखने की वजह एक तथ्य है, जैसे कविता का शीर्षक कविता का नाम एक तथ्य है लेकिन कविता सिर्फ तथ्य नहीं है। हो सकता है तथ्य की सतह पर भी वह मौजूद हो, लेकिन उसे महज नहीं देख पाना अपने पाठ को भी तथ्यात्मक और अन्ततः भ्रामक बना डालना है।

6
तो कविता लिखने की वजहों से इनकार नहीं है। ये वजहें होती ही हैं। कभी घोषित, विज्ञापित, वाचाल होकर, कभी गोपनीय और चुपचाप तरीके से । वे लगातार अपना काम करती रहती हैं। कविता का जीवन इन्हीं वजहों से शुरू होता है, लेकिन इन्हीं वजहों पर आकर खत्म नहीं हो जाता। कविता ‘वजह’ नहीं हैं। वह अपनी शर्तों पर है, वजह की शर्त पर नहीं। वह स्वयंभू है और इसी स्तर पर उसका स्रष्टा निरंकुश है।

7
इसलिए भूमण्डलीकरण या भूमण्डलीकरण जैसी किसी भी अवधारणा के साथ कविता के रिश्ते को हमेशा के लिए तय नहीं किया जा सकता। जब भी कविता किसी अवधारणा से नजदीकी या दूरी के तर्क से अपना जीवत्व और पोषण प्राप्त करने लगती है, वह इकहरी, बेलोच, अमौलिक और निष्कर्षवादी होने का खतरा उठा रही होती है। वह खुद को पूर्वनिर्धारित और पूर्वानुमेय और इस प्रकार कुछ कम कविता बना रही ह¨ती है। इस रास्ते पर चलकर किसी अवधारणा का बेहतर उदाहरण तो हुआ जा सकता है, बेहतर कविता नहीं। आखिर वह कविता ही क्या जो किसी बात का प्रमाण या किसी धारणा का उदाहरण बन जाए। कमलेश की एक कविता के शब्दों में कहें तो :

हलके-फुलके तमाम रंगों के घन-गुच्छों के पीछे
बार-बार अपना नीलापन बदलता हुआ आसमान
जो हर जगह का आसमान नहीं है
और इस आसमान में एक पतंग उड़ रही है
तमाम रंगों के घन-गुच्छों की छाया में
सुगन्धित चीड़ हैं आसमान को छूते हुए
पहाड़ी पर और भी वनस्पतियाँ हैं
फूलों से लदी हुईं
- इनका क्या नाम है ?
फूल ये अवश्य हैं पर, हर फूल नहीं हैं
और इस पहाड़ी पर, किसी शिखर पर से एक लड़का
यह पतंग उड़ा रहा है
कौन-सी पहाड़ी है यह - (जिले का गजेटियर इसका नाम नहीं देता) -
कोई भी हो - यह हर पहाड़ी नहीं है
झरने फूटते हैं-बहते हैं
जलधाराएँ बहती हैं हमेशा सपाट मैदान
की ओर
हम खड़े रहते हैं-एक चील को उड़ते देखते
हम पतंग क¨ देखते रहते हैं.
- गुलाबी रंग की पतंग
हमें डोर नहीं दिखती।
इस चोटी पर, इसका क्या नाम है?
इस पर जाने का रास्ता तो होगा?
- रास्ता जरूर को होगा, पर
वह हर रास्ता नहीं होगा।

एक और उदाहरण से बात शायद ज्यादा साफ हो। हिन्दी की समकालीन कविता का खासा बड़ा हिस्सा विरोध की कविता लिखता है। एक कवि के रूप में मैं इसी हिस्से का नागरिक हूँ। यहाँ कविता लिखने की वजह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में हो रहे तमाम अन्यायों का विर¨ध करना है। लेकिन क्या जीवन में दमन और अन्याय के रूप इतने उल्लिखित, प्रकाशित और ज्यों के त्यों हैं कि उनके विरोध को एक स्थिर और स्थापित तथ्य के रूप में बरता जा सके ? उसे पेश किया जा सके ? उसे उसकी यथास्थिति में अहर्निश जारी रखा जा सके ? विरोध का एक पूर्वनिय¨जित घोषणापत्र तैयार हो सके ?

8
मेरा यह खयाल है कि विरोध की कोई भी रणनीति अनेकांत, अनंतिम और असमाप्त होने को अभिशप्त है। तब हिन्दी साहित्य संसार में सक्रिय विरोध की क्रियाएँ, विरोध के संगठन और विरोध की सत्ताएँ इतनी आत्मविश्वस्त क्यों नजर आती हैं ? विरोध करने वाली सभी संज्ञाएँ और विशेषण इतने सुस्पष्ट कैसे है ? क्या विरोध की सभी सम्भावित जगहों, विरोध करने वाले नागरिकों-लेखकों-कलाकारों के नाम पहले से तय किये जा चुके हैं ? मैं विरोध की नीयत पर शक नहीं कर रहा हूँ। ऐसा कभी नहीं किया जा सकता। स्वप्न में भी नहीं। वह हमारा समवेत प्रतिफल है। लेकिन विरोध के ‘रिवाज’ और ‘प्रतिष्ठान’ में रूढ़ होते जाने की अफसोसनाक प्रक्रिया पर हम निरन्तर सवाल उठाते रहेंगे और विरोध के फैशन, विरोध के क्लिशे और विरोध की मुद्राओं की खातिर मौलिकता को हलाक नहीं होने देंगे क्योंकि विरोध के नव्यतम तौर-तरीकों के आविष्कार की कठिन राह में यही मुद्दे बार-बार बाधा बनकर हाजिर हो जाते हैं। हम जीवन और रचना के वृहत्तर परिसर में विरोध के अभिनव-अप्रत्याशित रूपों की तलाश करेंगे।

यों, हम प्रतिकार पर कुछ खास लोगों के एकाधिकार को भंग कर देंगे। विष्णु खरे की एक कविता के नैरेटर के मुताबिक ‘मैं अपने नियमों से अपना खेल अकेले ही खेल लूंगा।’

9
फिलहाल भूमण्डलीकरण की अमानवीयताओं से लड़ने में हमारी समकालीन कविता की काफी ऊर्जा लगातार खर्च हो रही है। इस मश्क का भरसक आदर किया जाना चाहिए। लेकिन वस्तुस्थिति में पर्याप्त दुर्भाग्य घुसा हुआ है। जो कविता हमारे दृश्य में भूमण्डलीकरण का सर्वाधिक शाब्दिक विरोध कर रही है, उसके भीतर कई समस्याएं हैं। उन समस्याओं की प्रकृति और स्वयं भूमण्डलीकरण की प्रकृति में हैरतअंगेज नैसर्गिक साम्य है। हो सकता है समीक्षा की भाषा के स्तर पर इसे सिद्ध करना व्यापक अध्यवसाय और कठिन मेहनत की मांग कर रहा हो, लेकिन जो चीजें दुर्घटना की मानिन्द साफ-साफ दिखाई दे रही हैं उनकी पहचान में हमें क्यों प्रतीक्षा करनी चाहिए?

10
मसलन्, भूमण्डलीकरण के वकीलों की आमतौर पर यह मान्यता है कि एक उदारतावादी लोकतंत्र ही अब एकमात्र विकल्प है। उनके मुताबिक वह बेहद फैले हुए राज्य को चलाने की एकमात्र पद्धति है। हो सकता है यह बात यूरोप के लिए सच हो, लेकिन क्या भारत समेत तीसरी दुनिया के देशों के लिए भी यह उतनी ही सार्थक है? शायद उदारतावादी लोकतंत्र भूमण्डलीकरण की पूरी प्रक्रिया से बिल्कुल अलग हो जाने के विकल्प को नामुमकिन बना देता है, कम से कम हमारे आस-पास का इतिहास तो इस धारणा का प्रमाण है, इसलिए उसे ही उम्मीद की अन्तिम और एकमात्र किरण की तरह पेश किया जा रहा है। इस उदारतावादी लोकतंत्र ने राजनीतिक बराबरी के चमकीले सिद्धांतों की ओट में कितनी बीहड़ आर्थिक-सामाजिक गैरबराबरी को पुख्ता किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। यह भी कि इसने तीसरी दुनिया की अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जरूरतों के भीतर से निकलने वाले लोकतान्त्रिक रूपों को आत्यंतिक तरीके से हतोत्साहित किया है।

11
ऐसी परिस्थिति में हमारी समसामयिक हिन्दी कविता का अधिकांश क्या करता है ? वह लोकतंत्र के वर्तमान रूप से रुष्ट होकर टीका-टिप्पणी और कोलाहल करता है। लेकिन इस शोर में से विकल्प की अंतर्वस्तु निकल कर नहीं आ पाती। क्या बार-बार यह कहने की इच्छा नहीं होती कि यह कविता अपनी आरंभिक प्रतिज्ञा में उपलब्ध उदारवादी लोकतंत्र का पहला और अंतिम और एकमात्र विकल्प मानकर चलती है और ज्यादा से ज्यादा उसी के भीतर कुछ संशोधन सुझाती रहती है। मै अपवादों की बात नहीं कर रहा हूँ, और अपवाद भी नियम को पुष्ट ही करते हैं। आप विरोध की समूची कविता को एकबारगी देख जाइये, वह उदारतावादी लोकतंत्र के पार नहीं जा पाती। हम विरोध करते हैं, लेकिन हमारी आलोचना में से विकल्प का नक्शा निकल कर नहीं आ पाता। हमारा सारा क्रोध और क्रन्दन, यों, कई बार, उसी विराट तन्त्र का हीनतर अनुषंग बन जाने को बाध्य है, जिसका वह विरोध करता रहता है।

12
हिन्दी साहित्य संसार में इसी दिक्कत के भीतर से एक और दिक्कत पैदा होती है। वह है यथार्थ के सामने पराजित हो जाने की दिक्कत और जितनी पराजय वाकई हुई है, उससे कहीं ज्यादा पराजित दिखने की दिक्कत। व्यक्तिगत पराजय को समूह की हार के तौर पर ग्रहण करने की दिक्कत। कुछ बुजुर्ग कवि आवाजें यह कहती पाई जाती हैं कि 90 के बाद का भूमंडलीकृत यथार्थ इतना बीहड़, विस्तृत और असमाप्त किस्म का हो गया है कि वह टुकड़ा-टुकड़ा सर्जनात्मकता में ही उपलब्ध हो सकता है। अपनी किताब ‘एक कवि की नोटबुक’ में राजेश ज¨शी लिखते हैं - ‘हमारे समय का सच और उसका मेटाफर थोडा विश्रंृखलित और बँटा हुआ है। .....इसलिए आज के सच की शक्ल टुकड़ा-टुकड़ा जुड़कर ही तैयार हो सकती है। यह हमारी आज की कविता की सीमा भी है, गुण और अवगुण भी।’

मुझे लगता है कि इस वक्तव्य में समूह के साथ कुछ ज्यादती हो जा रही है। हो सकता है कि किसी को अपने सच की शक्ल इतनी छिन्न-भिन्न दिख रही हो, लेकिन यह भी तो सम्भव है कि उसी वक्त में किसी दूसरे आदमी को अपने हिस्से का सच इस कदर विश्रंृखलित न लगता हो। कम से कम ‘भूमण्डलीकरण’ का अपना सत्य तो बिल्कुल ठोस, रणनीतिसम्पन्न और जालिम तरीके से हम पर जाहिर हो रहा है। तो जब प्रतिपक्ष इतना तैयार और उदग्र हो तो युद्ध का कर्तव्य क्या है ? थकी-हारी बातें करके पलायन का माहौल बनाना या अपनी समूची आत्मवत्ता और अध्यवसाय और ईमान को एकाग्र करके सर्जनात्मकता के एक नये अध्याय की शुरूआत करना। हमें अपनी नीयत और सामर्थ्य के मुताबिक इन दोनों में से कोई एक विकल्प चुन लेना चाहिए।

13
दरअसल समस्या यह भी है कि हम अंतिम चयन करने में झिझकते है या सहम जाते हैं। हम कई नावों की सवारी करना चाहते हैं। हम एक स्वीकार्य और सुपाच्य कविता लिखना चाहते हैं। हम लोकप्रियता से आगे के मकाम नहीं देखना चाहते। हम विश्लेषण की सुदीर्घ प्रक्रिया और उसकी परिणतियों से घबराते हैं, इसलिए वह हमारी कविता में हमेशा कम ही होता है। हमारा काम बहुत थोड़ी सुन्दरता से चल जाता है। शिल्प के स्तर पर हम संतोष या समझौता करना चाहते हैं और प्रायः उतने ही पैर फैलाते हैं जितनी लम्बी चादर हो।

14
जबकि कविता के लिए पहला रास्ता तो यह हो सकता है कि वह इस भूमण्डलीकृत यथार्थ के पारा-पारा रूपों की अधुनातन जाँच-परख करे। वह अभिनव औजार से सम्पन्न होकर पूँजीवादी साम्राज्यवाद के इस नये संस्करण के निर्माणों, मिथकों और काम करने की शैलियों को बेहद वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण तरीके से विखंडित कर दे। वह पूँजी, हिंसा, सत्ता, समूह, एन.जी.ओ., कारपोरेशन्स, चंचलता, घटनाओं के बेसम्भाल प्रवाह और मुख्यधारा की सतह के भीतर घुस जाए और एक विलक्षण सैद्धान्तिक अखाड़ेबाजी वहीं पर सम्भव कर दे। वह गद्यात्मकता और पद्यात्मकता सरीखा घरेलू और प्रापंचिक आरोपों को कुचलकर नए विजन के लिए बड़ा साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्पात करे। देवी प्रसाद मिश्र की कविताएँ इस रास्ते का श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

और एक रास्ता कविता का यह हो सकता है कि भूमंडलीकरण और उसके समस्त विकारों को एकबारगी अपदस्थ कर डालने वाले एक अत्यन्त सम्पन्न सौन्दर्यलोक का आविष्कार अपनी कल्पनाशक्ति से कर दे। लेकिन याद रहे, यह काम फुटकर किस्म की सुन्दर्ताओं और एकाध बिम्बमालिकाओं से नहीं होगा, छिटपुट कौशल से भी नहीं। उस वैकल्पिक सौन्दर्यलोक को इस उपलब्ध बाजारवादी मायालोक से कहीं ज्यादा प्रगाढ़ और स्थायी और दिव्य कल्पनाशक्ति की दरकार होगी। उसके भीतर एक पूरा संसार विन्यस्त होगा। मसलन उदयन वाजपेयी की कविता।

मैंने दो कवियों के उदाहरण दिये हैं। ये अंतिम उदाहरण नहीं हैं। लेकिन यहाँ से आगाज किया जा सकता है, इसमें .जरा भी शक नहीं। और भी रचनाकार हैं - शक्ति और सौंदर्य की अभिनवता के प्रमाण। इस सभागार में ही गीत चतुर्वेदी और नीलेश रघुवंशी बैठे हुए हैं। इन दोनों रचनाकारों की पोजीशंस हिन्दी के ‘पोलेमिकल’ पर्यावरण में पर्याप्त भिन्न-भिन्न हैं। लेकिन अपने रचनात्मक अभियानों को लेकर दोनों द्वारा अर्जित आत्मविश्वास से वह जगह - वह कामन स्पेस निर्मित होती है जहाँ खड़े होकर हम कविता की चुनौतियों को लेकर एक निर्णायक, समावेशी और स्वप्नमय संवाद का आरम्भ कर सकते हैं।
****

( भारत भवन द्वारा ‘भूमंडलीकरण और कविता की चुनौतियाँ ' शीर्षक विषय पर आयोजित संगोष्ठी में पढे गये निबंध का लगभग अविकल रूप )

Sunday, March 07, 2010

विष्णु खरे की कविता का संशोधित प्रारूप

( आगे दी जा रही कविता पिछली पोस्ट में छपी विष्णु खरे की कविता का ही संशोधित और अंतिम प्रारूप है। कवि ने इसे भेजते हुए यह स्पष्ट किया है कि संशोधन का कविता पर हुई पिछली बहसों से कतई संबंध नहीं है। इसे नई पोस्ट में देने के पीछे इन बदलावों को ही लक्षित करना है। जिन बंधुओं ने बहस में शिरकत की उनमें से अधिकांश ने कविता पर मूल्यवान विचार व्यक्त किये। उनका आभार। बेनामी बंधुओं ने कविता के अलावा भी बहुत से मुद्दों पर बहस की। हालाँकि ऐसा करते हुए उनके तर्क बहुधा व्यक्तिगत आक्षेपों तक पहुँच गए। यह शोभनीय नहीं। )

कल्पांत
(तुभ्यमेव भगवंतं कृष्णद्वैपायनं)

दिवस और रात्रि में कोई अंतर नहीं कर पाता मैं      दोनों समय ऐसे दीखते हैं जैसे सूर्य चन्द्र नक्षत्रों से ज्वालाएं उठती हों

दोनों संधिवेलाओं में देखता हूँ एक मृत शरीर दिवाकर को घेरे हुए जिसके सिर भुजा जंघाएं नहीं हैं       धधकती हैं दोनों संध्याओं की दिशाएं

अंतरिक्ष में टकराते हैं धूमकेतु उल्काएं ग्रह उपग्रह तारागण       क्या गरजता है यह       मेघों के बिना कौन-सी विद्युत् कौंधती है रात में बरसते हैं रक्‍त मांस-मज्जा

नदियों के जल में लहू पीब भ्रूण बहते हैं      वे अपने उद्गमों को लौटने लगती हैं      कूपों तड़ागों नालों से विषैले फेन उठते हैं

पर्वतों से कौन-सा भयानक नाद उठता है यह       उनके शिखर और शिलाएं रेत जैसे ध्वस्त होते हैं

सागर उफनते हैं भूडोल से अपने तट तोड़कर धरती को डुबोते हुए

दुर्गन्ध उठती है अग्नि से

कभी आकाश में सात सूर्य एक साथ उदित होते हैं       राहु और केतु मुंड और कबंध की तरह कभी जुड़ते कभी विलग दीखते हैं        लोप हो चुका है चन्द्र का कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष कब परिवर्तित होते हैं ज्ञात नहीं होता

नष्ट हो गई हैं मेरी इन्द्रियों की क्षमताएं        अपनी चेतना खो चुका हूँ मैं

वंध्या शाखाएं वर्णगंधहीन अवास्तव फलों से लद गई हैं जिन पर कुछ नहीं मंडराता जिन्हें कोई नहीं खाता        हरे वृक्ष स्वतः कट जाते हैं ठूंठ हो जाते हैं जलने लगते हैं

कभी भी चलने लगते हैं डरावने बवंडर       उनसे बालुका नहीं पीसी हुई हड्डियों का चूर्ण बरसता है        मध्याह्न में अमावस्या की अर्धरात्रि का तमस छा जाता है

लुप्त सरिताएं ज्येष्ठ और वैशाख में नगरों को डुबो देती हैं        मरुप्रदेश में दिन के समय हिमपात होता है सरीसृपों को नष्ट करता हुआ

एक गरुड़ दीखता है जिसके माथे पर शिखा और सींग हैं उसके तीन पंजे हैं और चोंच के स्थान पर चार दाढ़ें हैं

वृक्षों पर बैठे गीध श्येन और चील शवों की घात में नीचे देखते हैं        कोकिलों शुकों मयूरों चातकों के कंठ से लपटें और चीत्कार निकलते हैं         ध्वजों पर बैठकर वे उन्हें डालते हैं

रात में एक पक्षी मंडराता है जिसके एक आंख एक डैना एक पंजा है और जब वह क्रुद्ध होकर बोलता है तो ऐसे कि कोई रक्त वमन करता हो

गीध घरों में घुस आते हैं और जीवित मनुष्यों का मांस नोचते हैं आतंकित जो आर्तनाद तक नहीं कर पाते

आकाश कभी भी टिड्डियों से आच्छादित हो जाता है जो प्रत्येक हरित वनस्पति और जीवित प्राणियों को खाती हैं

गर्दभों को जनती हैं गायें हाथियों को खच्चरियां श्वानों को शूकरियां

दो मस्तक चार नेत्र तीन सींग अनेक दाढ़ों पांच पैर दो मूत्रेंद्रिय तथा दो पूँछ वाले अकल्पनीय पशु जन्म लेते हैं और भयावह अश्रव्य वाणी में बोलते हैं

चूहे छछूंदर गोधिकाएं चीटे तिलचट्टे सोते हुए स्त्री-पुरुषों के नख केश उँगलियाँ कुतरकर खाते हैं और उन्हें भान नहीं होता

सियार लोमड़ियाँ और लकड़बग्घे भरी दोपहर झुण्ड बनाकर निकलते हैं और कुत्तों बिल्लियों बछड़ों का आखेट करते हैं

बंधे हुए पशु अचानक चौंकने बिदकने लगते हैं पसीना पसीना हो जाते हैं उनकी आँखों से आंसू मूत्रेंद्रिय से रक्त बहता है

गायों का आखेट और भक्षण करते हैं मृग         मार्जारों की वाणी बोलते हैं सिंह दिन में गरुड़ाकार उलूक भवनों की मुंडेरों से मंत्रोच्चार-सा करते हैं

अट्टालिकाओं पूजास्थलियों वाहनों के ध्वज कांपते हैं जलने लगते हैं       मानवहीन रथ चलने लगते हैं        शस्त्रों से लपटें उठती हैं

पाकशालाओं के भोजन में कीड़े बिलबिलाते दिखाई देते हैं

जिन्हें इस पृथ्वी पर कभी सुना नहीं गया ऐसे भीषण प्राणियों को जन्म देती हैं स्त्रियाँ जिनमें से कुछ एक साथ चार-चार पांच-पांच संतान उत्पन्न करती हैं जो जनमते ही नाचती गाती हंसती हैं

सारी मर्यादाएं तोड़कर समस्त नारियां समस्त पुरुष पशुओं जैसे मैथुन करते हैं हर असंभव कदाचार होता है         गणिकाएँ बनना चाहती हैं कन्याएँ सतियाँ साध्वियाँ

संग्राम से पलायन करते हैं सहसा नपुंसक हो गए नवयुवक धूर्तों लम्पटों दस्युओं वेश्यालयों के स्वामियों का क्रीतदास बनने के लिए जिनके समक्ष महत्वाकांक्षी ललनाएँ स्वेच्छा से निश्शुल्क निर्वसन होती हैं

किस निद्रा किस मूर्च्छा में चल रहा हूँ मैं        कब पिया मैंने नखों केशों अपवित्र वस्त्रों से दूषित जल उससे स्नान किया        किसी रजस्वला किसी अगम्या से सहवास बलात्कार का अपराधी नहीं मैं       असहायों उत्पीड़ितों निष्पापों की हत्या नहीं हुई मुझसे        तब पराभव कैसे हुआ मेरा

श्वास में इतनी शक्ति नहीं कि शंखनाद कर सकूँ       भुजाओं में जो बल था अब नहीं रहा       मेरा सारथी और मैं परस्पर रक्षक न रह सके      धनुष था किन्तु उसकी प्रत्यंचा तक न चढ़ा सका मैं         सारे बाण व्यर्थ हो चुके मेरे       तूणीर में कोई सायक शेष नहीं        अपने किसी मंत्रपूत अस्त्र का आह्वान नहीं कर सकता मैं        नष्ट हुआ मेरा यत्किंचित पुण्य मेरा पराक्रम        निर्मूल हुआ वंश

कौन से महापातक हुए मुझसे        किसी अपकार्य अधर्म को रोक न सका मैं

कैसे अश्रुतपूर्व महारोग फैलते हैं यह         अकल्पनीय अपराध होते हैं जो किसी स्मृति किसी संहिता में नहीं         माता-पिता पुत्र-पुत्री भ्राता-भगिनी पति-पत्नी परस्पर वध करते हैं          नर-मांस से कोई घृणा नहीं करता

मरीचिकाओं में दीखती है अट्टालिकाओं पण्यवीथियों द्यूतशालाओं कामदवनों क्रीड़ास्थलों स्वर्णगिरियों कल्पवृक्षों अप्सराओं की मयनगरी अमरावती जिसकी दिशा में दौड़ते हैं आबालवृद्ध नर-नारी जो कभी नहीं लौटते

दुराचरण और अन्याय की कोई सीमायें नहीं जानते सुधर्मा-सभा में प्रतिष्ठापित राजवंश अमात्य दंडाधिकारी       ऋषि मनीषी विद्वज्जन निबाहते हैं सूतों बंदियों किन्करों के कर्त्तव्य

सत्पुरुषों तपस्वियों पूर्वजों हुतात्माओं से द्वेष और परिहास करते हैं  लोग उनकी निंदा करते हैं                आराध्यों अवतारों द्रष्टाओं का तिरस्कार होता है        आश्रमों गुरुकुलों में हत्याएं की जाती हैं           ग्रन्थ जलाये जाते हैं

बालक विकलांग विकलमस्तिष्क होकर नाचते गाते अट्टहास करते हैं          शस्त्रास्त्र लेकर वे वीभत्स आकृतियाँ उकेरते गढ़ते हैं        परस्पर आक्रमण करते हैं       कृत्रिम नगर बसाकर युद्ध करते हुए उन्हें वे नष्ट कर देते हैं

देवताओं की मूर्तियाँ कांपती अट्टहास करती रक्त उगलती खिन्न और खंडित होती हैं        पूजागृह ध्वस्त हो जाते हैं

जब मंत्रोच्चार और जप किया जाता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि अज्ञात भाषाएँ बोलते हुए बर्बर समूह आक्रमण कर रहे हों किन्तु कोई दिखाई नहीं देता

किन्हीं दूसरे लोकों से आये राक्षसों जैसे प्राणी धन आभूषण छत्र कवच ध्वजा सहित नगरवासियों का भक्षण करते हैं

जब पूजा-अर्चना के वाद्य बजाए जाते हैं तो सूने घरों से घोर स्वर उठते हैं

जलते हुए खंडहर दिखाई देते हैं जिनसे दीन-हीनों अनाथों का विलाप सुनाई देता है

शाश्वत मृत्यु और आद्य यम के स्थान पर यह कौन-सी नूतन मृत्यु कैसा अभिनव यम है यह जो न स्वर्ग ले जाते हैं और न रौरव

लोग स्वप्नों में देखते हैं एक विकराल कृत्या जो अपने अस्थियों जैसे सफ़ेद दांत दिखाती हंसती हुई आई है और स्त्रियों के चूड़े सिन्दूर मंगलसूत्र लूटती हुई सारे नगर में दौड़ रही है

हाथ में पाश लिए अपना काला और पीला सिर मुंडाए हुए काल अहर्निश नगर के मार्गों पर चक्कर लगाता है        भवनों प्रासादों अट्टालिकाओं उपवनों यज्ञस्थलियों निवासियों नृपतियों को देर तक खड़ा ताकता रहता है        कभी दीखता है         कभी अदृश्य हो जाता है

फिर एक आग्नेय अट्टहास जो ब्रह्माण्ड के अंत तक टकराता गूंजता है
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