Friday, January 29, 2010

स्मिता पाटिल

वह खड़ी थी, सीढ़ी के निचले तल पर, मुस्कुराती, मोड़ पर लड़की जिसकी प्रतिभा का प्रस्फुटन अभी होना है.

उसका नाम है स्मिता.

वह खड़ी थी, शर्माती, बम्बई दूरदर्शन स्टूडियो के गलियारे में, अपने आस-पास की दुनिया के शोरोगुल बरदाश्त करती.

फिर, हम उसका न्यूज़ पढना देखते हैं. उस युवती की छवि ने उन ब्यौरों को महत्वपूर्ण बना दिया कि हम चकित रह गए.

जल्द ही इसके बाद, हमने एक मौन अलिखित समझौता किया. ठंडी हवाएं आघात पहुंचा रही थीं...जो हमें आतंकित कर गईं कि हम धरा से अलग हो जायेंगे...लेकिन उस भरोसा था...जिसकी वजह से वह जुडी रही. ज़िन्दगी के अवास्तविक परदे पर सांस लेती रही.

उसका उत्साह कम नहीं होता जब सुबह की मासूम घड़ियों तक हम काम करते, चर्चाएँ करते...आप यही सोचते...कि उषा की पहली आश्चर्यचकित और ऊर्जस्वित करने वाली किरण की आप झलक पा रहे हैं.

यह मुझमें आश्चर्य भर देता, साहसिक काम की खोज में निकले बच्चे की तरह, हम कई बार अपनी माँ के ख़ज़ाने और उसकी निर्मिति को खंगालने की कोशिश करते...लेकिन जितना उससे लेते वह उतना ही अधिक देती.

मैं अत्यंत दुःख के साथ याद करता हूँ कि कैसे उसने अपने भीतर एक बच्चे को पलना चाहा. मैं उसकी सहजता और ख़ुशी याद करता हूँ जब वह बच्चे की नेपकिन्स बदलती. वैसे उसकी आँखों में क्रोध भरा होता जब भय और हिंसा के दानवों के लिए वह चुनौती बन जाती.

वह अपने अंदरूनी स्रोतों से अनजान थी कि उन प्रेरक क्षणों को संजोती जो उसने हमें उपहार में दिए.

उसका प्यार हमेशा सच्चा और पवित्र रहा, हमेशा रहेगा.

कमल के फूल-पराग से जिसके केश से हम आकर्षित थे अपनी पहली सुबह की ताज़गी के साथ-साथ.

Tuesday, January 19, 2010

अकेला मेला

अपनी बहुविधात्मक रचनाशीलता के लिए ख्यात रमेशचंद्र शाह की डायरी का पहला हिस्सा 'अकेला मेला' नाम से छप कर आया है। इसमें मुख्यतः १९८० से ८६ तक की इंट्रीज हैं। इस डायरी को पढ़ते हुए मुझे सहसा उनका यात्रा-संस्मरण 'एक लम्बी छांह याद' हो आया। इंग्लैंड और आयरलैंड के छवि-अंकन से बढ़कर वह पुस्तक एक बौद्धिक सहयात्रा का आनंद देती है। इस डायरी में भी वे अपने पाठक को वैसी ही यात्रा पर न्योत रहे हैं। जिस दौर में शाह ये डायरियां लिख रहे हैं, वह उनके लेखन-पठन के महत्वपूर्ण वर्ष हैं। तारीफ यह कि वे अपने लिखने की बात पर पढ़ने को तरजीह देते हैं, इसीलिए उनकी इंट्रीज में किसी लेखक या कृति के बारे में जगहें कहीं ज़्यादा है। यही वे जगहें हैं जो आलोचना के परम्परित बंधाव में आने से रह जाती हैं। शाह साब का आलोचक मन उसे हिसाब में लेता है और किसी कृति को पठनानुभव के इस धरातल पर खोलने में रमता-रमाता है। अहंलीन निजी ब्योरों से भरी डायरियों के बरक्स उनकी डायरी का यह गुण हिंदी में सिर्फ़ उनके सर्जक सखा मलयज की डायरियों में ही मिलता है। हालाँकि मलयज के यहाँ एक दुर्लभ गुण की तरह उनका 'निज' भी उपस्थित है। शाह साब ने इस डायरी में खुद को नेपथ्य में भले रखा हो, पर अज्ञेय या निर्मल वर्मा सरीखे लेखकों के संग-साथ और लेखन का उनके मन पर इन वर्षों में जो इम्प्रेशन रहा है, उसे बखूबी दर्ज किया है। इस डायरी को इसीलिए एक लेखक के सर्जनात्मक मन की तरह पढ़ा जाना चाहिए। एक मन जो इतना खुला और समावेशी है, जो लिखे हुए का प्रभाव ग्रहण करता है, उसकी व्याख्या करता है और उससे जब-तब जिरह कर कृतज्ञ भी होता है। शाह की डायरियों की अगले किस्त की प्रतीक्षा इसी कारण से मन में अभी से है।
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Wednesday, January 13, 2010

स्वगत : ३ : कुमार अंबुज

{ साहित्य में कुछ सवाल चिरंतन होते हैं. हर युग में ये सवाल कवि-लेखकों के सामने उपस्थित हो जाते हैं. इनका सामना सब अपने-अपने ढंग से करते हैं. जैसे 'कविता क्या है' सरीखा सवाल ही हमेशा से एक ज़रूरी पड़ताल का विषय रहा है, उसी तरह 'समकालीनता' या 'प्रासंगिकता' जैसे प्रत्यय भी. कहना न होगा कि इन सबों का उत्तर युग-सापेक्ष अतः अनंतिम है. महत्वपूर्ण हिंदी कवि कुमार अंबुज ने समकालीनता के बारे में अपने विचार यहाँ प्रस्तुत किये हैं. अंबुज जी का कुछ और गद्य भी सबद पर प्रकाशित है. इस स्तंभ के अंतर्गत आप इससे पहले गीत चतुर्वेदी और व्योमेश शुक्ल को भी पढ़ चुके हैं. }

समकालीनता:अनुभव और आशा

कुमार अम्बुज

समकालीन कविता का अर्थ 'एक समय में लिख रहे कवियों की कविता भर से नहीं बल्कि अपने समय, काल की प्रमुख प्रवृत्तियों और यथार्थ को दर्ज करने के उपक्रम में' देखा जाना चाहिए। केवल शब्‍दकोशीय अर्थ लेकर हम साहित्य की समकालीनता को समझने में चूक कर सकते हैं। हर युग की समकालीन कविता की प्रवृत्तियाँ भी अलग होती हैं। रीतिकाल, भक्तिकाल या छायावादी समय की समकालीन कविता से हम उस युग के सामाजिक, सांस्कृतिक स्वभाव और प्राथमिकताओं का आकलन कर सकते हैं। जाहिर है, आज इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता की समकालीनता को समझने के लिए हमें कविता की अब तक की यात्रा और आज के समाज की मुश्किलों और चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा।

‘साहित्य समाज का दर्पण है’, इस उक्ति से आगे मुक्तिबोध ने कहा है कि ‘जीवन विवेक ही साहित्य विवेक है'। यह जो विवेक का शामिल होना है, यह आज की समकालीन कविता की प्राणशक्ति है। उसका केंद्रक है। धुरी है। इस विवेक में विचारशीलता, प्रतिबद्धता और प्रतिरोध के तत्व अनिवार्यतः शामिल हैं। इसलिए यह कविता वायवीय नहीं है, रूमानी नहीं है, यद्यपि कल्पनाशील है, स्वप्न देखती है, यथार्थ पर बहुआयामी निगाह रखती है लेकिन किसी अवसाद में स्खलित नहीं होती। समकालीन कविता को केवल ‘रूप’ से नहीं, जैसे कि आज मुक्तछंद है, अपितु उसके कुल विन्यास और आशयों में ही समझा जा सकता है।

समकालीन कविता की जगह प्रतिपक्ष की बेंच है। वह उसका स्थायी अड्डा है। वह सदैव ‘जो है उससे बेहतर चाहिए’ की कल्पना में इस तरह शामिल है कि जीवन में उसे लागू किया जा सके। इस तरह वह एक सक्रिय कार्यवाही भी है। वह सत्ता संरचनाओं के विरुद्ध है और वंचित मनुष्यों के, उपेक्षित समाज के साथ स्वाभाविक रूप से खड़ी है। ये सब कारण और लक्षण मिलजुलकर ही उसे ‘समकालीन कविता’ बनाते हैं। यदि ये चीजें आज किसी कविता में अनुपस्थित है तो भले ही वह आज के समय में लिखी जा रही है मगर उसे समकालीन कविता की कोटि में नहीं रखा जा सकता। वह तो एक पुरानी, बीत गयी और बासी कविता की नकल हो सकती है, स्मृतिजीवी या पुनरुत्थानवादी हो सकती है, समकालीन नहीं।

सामाजिक विकास में अर्जित मूल्यों के प्रति सजगता समकालीन कविता का एक प्रधान लक्षण है। यथा मनुष्य की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय इसके मूल में है। लोकतांत्रिकता और बहुलतावाद भी। इसलिए कह सकते हैं कि समकालीन आंदोलनों और संघर्ष से ही जुड़कर कविता सच्चे अर्थों में समकालीन होती है। हमारे बाहरी जगत की नकारात्मक शक्तियों से कवि की टक्कर धमाके पैदा करती है, यह मुठभेड़ भी कविता को समकालीन बनाती चलती है।

लेकिन समकालीनता और परंपरा का एक गहरा रिश्ता है। उसकी अपनी एक आनुवांशिकी है। समकालीन हिन्दी कविता यदि आज संपन्न दिखती है, उसमें वैविध्य और छलांगें हैं तो इसलिए कि अपनी परंपरा में वहां कविता की समृद्ध धारा उपलब्ध है। कोई भी समकालीनता परंपरारहित नहीं हो सकती। परंपरा की लकीर पीटने या उसका अनुकरण करने से समकालीनता का निर्माण नहीं होता किंतु परंपरा का ज्ञान, उसके उन्नत पक्षों को यथायोग्य ग्रहण करने, उसे विकसित करने से ही किसी विधा का विकास संभव है। यह भी ठीक से समझना-जानना जरूरी है कि परंपरा और समकालीनता में कोई द्वैत नहीं है बल्कि वे एक अविरल, अटूट धारा के हिस्से ही हैं। परंपरा समकालीनता का पोषण करती है और समकालीनता उस परंपरा को प्रगतिमूलक अर्थों में पल्लवित करती है।

(2)
समय के साथ-साथ सामाजिक, राजनैतिक और नैतिक मूल्य बदलते हैं और ये मूल्य बार-बार सत्ता पक्ष द्वारा आरोपित भी किए जाते हैं। इस आरोपण का कविता व्यापक अर्थों में प्रतिरोध करती है। कविता के क्षेत्रफल में यह प्रतिरोध गहरे, मानवीय अर्थों में घटित होता रहा है और इस तरह वह समाज में कविता की जरूरत को रेखांकित करता है। क्योंकि कविता राजकीय नैतिकता के बरअक्स मानवीय नैतिकता का पक्ष लेती है और उसकी अनिवार्यता को प्रस्तावित और प्रसारित करती हैं। यहाँ इस कठिनाई को भी याद कर सकते हैं, जिसकी तरफ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ध्यान दिलाया था कि ज्यों-ज्यों सभ्यता आगे बढ़ेगी, कविकर्म अधिक कठिन होता जाएगा किंतु उसकी आवश्यकता भी बढ़ती जाएगी। इस कठिनाई को भी समकालीन कविता में आज अनेक स्तरों पर देखा जा सकता है।

आज यदि कुछ बातें याद करें तो दलित-अल्पसंख्यक विमर्श, बाजारवाद, आर्थिक उदारीकरण, स्त्री विमर्श, किसान विमर्श, भूमंडलीकरण और पर्यावरण के प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं। हमारे व्यक्तिगत जीवन पर, रिश्तों, घर, गली-बाजार से लेकर व्यापक समाज, प्रांत, देश और संसार पर पड़ रहे इनके सूक्ष्म और स्थूल प्रभावों को जाने-समझे बिना समकालीन कविता का चित्र पूरा नहीं होगा। ऐसे और इनसे संबद्ध अनेक सवाल कवि के सामने उपस्थित होते हैं: पूँजीवाद, उपभोक्तावाद, अन्याय, अत्याचार, शोषण, विस्थापन, प्रदूषण, वैश्वीकरण और हिंसा के तमाम रूप। इन प्रसंगों और सवालों से कोई कवि बचकर नहीं गुजर सकता। समकालीन कविता इसलिए समकालीन विचार-विमर्शों के बिना संभव नहीं हो सकती। कह सकते हैं कि हमेशा ही समकालीन कविता एक सामाजिक उपादान और कार्यवाही रही है। भले ही अपने प्रच्छन्न रूप में ही। और बकौल मुक्तिबोध कविता को ‘सच को पूरी ताकत से बाहर लाने का काम करना होता है’।

यह भी एक वास्तविकता है कि आज की कविता में पृथक से कोई आंदोलन नहीं है, समाज में भी बड़े आंदोलन नहीं है लेकिन समकालीन कविता समाज में फैले शोषण, अत्याचार और अनैतिकता के विरुद्ध एक अनवरत मानवीय प्रतिरोध है, प्रतिवाद है और अंतर्विरोधों को हल करने की आकांक्षा में गंभीर सर्जनात्मक कोशिश भी है। भले ही कई बार वह छोटे-छोटे, मामूली अनुभवों की कविता होती है लेकिन उसकी दृष्टि, उसके सरोकार विस्तृत हैं।

स्मरण कर सकते हैं कि कविता साहित्य की सबसे पुरानी विधा है। भाषा के असंख्य रंग, आवाजें, चित्र, जीवन की मार्मिकताएँ, विशालताएँ और तुच्छताएँ इसमें प्रकट हुई हैं। समकालीनता को समझने के लिए इस परंपरा को समझना और याद रखना जरूरी है। और यह भी कि समकालीन कवि अपने इतिहास और भविष्य, दोनों के संग एकसाथ उपस्थित होता है। अनुभव और आशा, दो चीजें उसे संचालित करती हैं। वह परंपरा में से श्रेष्ठ का चुनाव करता है और वर्तमान की मुश्किलों को, उन मुश्किलों के चरित्र को देखते हुए भविष्य में कुछ बेहतरी के प्रस्ताव पेश करता है।

इसलिए यह कोई अचरज की बात नहीं है कि दसवीं, ग्यारहवीं सदी के अनेक कवियों की संस्कृत कविता, जो उस समय के आमजन के दुखों का वर्णन करती है और प्रायः अज्ञात, अकिंचन कुलशील की रहती आई है, उसका पुनराविष्कार और पुनर्पाठ हमें उसकी अंतर्वस्तु के कारण आज की समकालीन कविता के बहुत निकट जान पड़ता है। (संदर्भःराधावल्लभ त्रिपाठी द्वारा उस काल की संस्कृत से अनूदित, पुनर्रचित कुछ कविताएँ।) वह कविता यथार्थ में धँसती है और ऐसे चित्र प्रस्तुत करती है जो उस समय के राजकवि नहीं कर सकते थे। दरअसल, अपने सामाजिक सरोकारों की पहचान किए बिना कोई कवि समकालीन हो सकता है, इसमें संदेह है। इन सरोकारों में मनुष्य, प्रकृति और प्रस्तुत संसार का समन्वय शामिल है।

(3)
यहाँ प्रसंगवश उल्लिखित समकालीन कविता के लक्षणों की यह साम्यता और सार्वभौमिकता ही है कि हम इस महादेश में, विभिन्न प्रांतो और भाषाओं में लिखी जा रही कविता में एक तरह की सूत्रबद्धता देख सकते हैं। इसलिए यहाँ मलयालम के अय्यप्प पणिक्कर, ओवीएन कुरुप, सावित्री राजीवन और के. सच्चिदानंदन जैसे कवियों की कविताएँ हिन्दी की समकालीन प्रमुख कविता की सहचर और पूरक लगती हैं। ऐसे ही उदाहरण अन्य भारतीय भाषाओं में और संसार की अनेक भाषाओं के कवियों की कविताओं में देखे जा सकते हैं, जो एक दूसरे को शक्ति देते हैं, अनुप्राणित करते हैं।

समकालीनता जितनी स्थानीय होती है, उतनी ही वैश्विक भी। और वह भाषाओं, काव्यरूपों को लाँघकर अपनी कुल संरचना, कुल प्रयास, कुल विचारशीलता और अंतर्वस्तु में बेहतर समाज के लिए प्रतिबद्ध बनी रहती है। और ऐसा वह अपने कला होने के अनिवार्य, मौलिक गुण की रक्षा करते हुए ही करती है। एक अच्छा कवि केवल प्रवक्ता नहीं, सर्जक और विचारक ही हो सकता है। इसलिए हम नेरुदा और मुक्तिबोध, मिवोश और रघुवीर सहाय या विष्णु खरे, के. सच्चिदानंदन और चंद्रकांत देवताले या मंगलेश डबराल, ज्ञानेन्द्रपति अथवा राजेश जोशी, अरुण कमल और बाद के कवियों यथा विमल कुमार, एकांत श्रीवास्तव, बोधिसत्व, कात्यायनी, बद्रीनारायण, देवी प्रसाद मिश्र, अनीता वर्मा, आशुतोष दुबे, नीलेश रघुवंशी से सुंदरचंद ठाकुर, गीत चतुर्वेदी और शिरीष कुमार मौर्य, व्योमेश शुक्ल तक अनेक कवियों की कविताओं में उन सारी चिंताओं को, यथार्थ से मुठभेड़ों को, उनके सामाजिक अभीष्ट और कल्पनाओं में देखा जा सकता है, जो इन्हें समकालीनता के धागे से बाँधती है, उन्हें वस्तुतः समकालीन बनाती हैं। कवियों की सूची देना यहाँ उददेश्य नहीं है, एक याददेही और इशारा है।

प्रसंगवश, यह भी याद करने में कोई हर्ज नहीं कि कविता का तर्क, गणितीय तर्क नहीं हो सकता। इसलिए निष्कर्षात्मक भी नहीं। वह विमर्शों और विकल्पों से, स्वप्नों से भरापूरा होगा। और एक अच्छी कविता में संगीत भी शामिल होता है। वैसा संगीत नहीं जो बाँसुरी या ढोलक से निकलता है बल्कि वह संगीत जो वाक्यों में से, उनके रचाव से, शब्दों में से, शब्दों के बीच की जगहों में से लगातार उठता है। इस अपरिभाषेय संगीत के बिना कविता संभव नहीं। कहना न होगा कि यह संगीत श्रेष्ठ समकालीन कविता में उपस्थित है। जहाँ नहीं है, वहाँ उसके कविता होने पर सवाल पूछा जा सकता है।

और इन्हीं सब कारणों से एक अच्छी समकालीन कविता, व्यापक अर्थों में और इच्छाओं में एक राजनीतिक कविता भी होती ही है। इस बात में कोई अंतर्विरोध नहीं है। जैसे त्स्वेतायेवा की इन काव्यपंक्तियों में कोई अंतर्विरोध नहीं हैः

कवियों का रास्ता पुच्छलतारों का रास्ता होता है
.....................................
कवि वह होता है जो मिला देता है ताश के पत्ते
गड्डमड्ड कर देता है गिनतियाँ

और न ही कबीर की इन पंक्तियों में :

सुखिया सब संसार, खावे अरु सोवे
दुखिया दास कबीर, जागे अरु रोवे।

अंतिम बात जो मैं जरूरी तौर पर यहाँ समकालीनता के संदर्भ में कहना चाहता हूँ, वह यह कि समकालीनता एक बाड़ा बनाती है, उससे एक तरह का कैदखाना भी बनता है, इसलिए उसमें रहकर, उसे पार भी करना जरूरी होता है। कालजयी होना और काल से होड़ लेना जैसे प्रत्ययों का गहरा सर्जनात्मक अर्थ है। समकालीनता कोई स्थिरांक नहीं है, न ही जड़ मूल्य है, वह अपने वर्तमान में भी अनवरत है और जैसा कि अभी कहा था कि उसमें इतिहास और भविष्य दोनों के सबक और चुनौतियाँ शामिल हैं। इसलिए ही किसी भी श्रेष्ठ समकालीन कविता में अनुभव और आशा, दोनों कलापूर्ण तरीके से गुँथे हुए होते हैं।
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{ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अंतर्गत कैथलिक कॉलेज, पतनमतिट्टा, केरल के हिंदी स्नातकोत्तर एवं शोध विभाग के तत्वावधान में आयोजित त्रिदिवसीय संगोष्ठी ( २७ से २९ अक्टूबर २००९ ) में दिए गए भाषण का सम्पादित रूप }

Wednesday, January 06, 2010

क्योंकि यही सब तो है जीवन...यही सब प्यार...


उधार

सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी।
मैंने धूप से कहा : मुझे थोड़ी गर्मी दोगी उधार ?
चिड़िया से कहा : थोड़ी मिठास उधार दोगी ?
मैंने घास की पत्ती से पूछा : तनिक हरियाली दोगी--
तिनके की नोक-भर ?
शंखपुष्पी से पूछा : उजास दोगी--
किरण की ओक-भर ?
मैंने हवा से माँगा : थोडा खुलापन--बस एक प्रश्वास,
लहर से : एक रोम की सिहरन भर उल्लास।
मैंने आकाश से माँगी
आँख की झपकी-भर असीमता--उधार।
सब से उधार माँगा, सब ने दिया।

यों मैं जिया और जीता हूँ
क्योंकि यही सब तो है जीवन--
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गन्धवाही मुक्त खुलापन,
लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह,
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का :
ये सब उधार पाये हुए द्रव्य।

रात के अकेले अंधकार में
सपने से जागा जिसमें
एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर
मुझसे पूछा था : 'क्यों जी,
तुम्हारे इस जीवन के इतने विविध अनुभव हैं
इतने तुम धनी हो,
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे - उधार - जिसे मैं
सौ - गुने सूद के साथ लौटाऊँगा -
और वह भी सौ-सौ बार गिन के -
जब-जब मैं आऊँगा ?

मैंने कहा : प्यार ? उधार ?
स्वर अचकचाया था, क्योंकि मेरे
अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार।
उस अनदेखे अरूप ने कहा : 'हाँ,
क्योंकि ये ही सब चीजें तो प्यार हैं -
यह अकेलापन, यह अकुलाहट,
यह असमंजस, अचकचाहट
आर्त अनुभव,
यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय
विरह-व्यथा,
यह अंधकार में जाग कर सहसा पहचानना
कि जो मेरा है वही ममेतर है।
यह सब तुम्हारे पास है
तो थोड़ा मुझे दे दो - उधार - इस इक बार -
मुझे जो चरम आवश्यकता है।'

उस ने यह कहा,
पर रात के घुप अँधेरे में
मैं सहमा हुआ चुप रहा; अभी तक मौन हूं :
अनदेखे अरूप को
उधार देते मैं डरता हूं :
क्या जाने
यह याचक कौन है !
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{ अज्ञेय की कविता}.
( तस्वीर मधुमिता दास के कैमरे से. )

Monday, January 04, 2010

निर्मल वर्मा के पत्र

निर्मल वर्मा के पत्रों की दूसरी और तीसरी किताब अब सामने है। पहली किताब ''प्रिय राम'' के नाम से चार बरस पहले आई थी। उसमें निर्मल अपने अग्रज, प्रतिष्ठित चित्रकार और कहानीकार, रामकुमार से मुखातिब हैं और इन दो पुस्तकों ( देहरी पर पत्र तथा चिट्ठियों के दिन ) में कहानीकार जयशंकर और रमेशचंद्र शाह एवं उनके लेखक परिवार से।

जयशंकर को लिखे पत्रों को पढ़ते हुए रह-रहकर रिल्के के उन पत्रों की याद आती है, जो उन्होंने युवा कवि को लिखे थे। पत्राचार की जिन वर्षों में शुरुआत होती है, वे जयशंकर के कथा-लेखन के आरंभिक वर्ष हैं और ज्यों-ज्यों बरस पर बरस बीतते हैं, संवाद में एक किस्म की गर्माहट और एक-दूसरे के पत्रों को पाने की चाहत बढ़ती जाती है। इसकी एक खास वजह है। जिस धरातल पर यह पत्राचार अनवरत चलता रहा है, वह अत्यंत उर्वर है। वह न सिर्फ सृजन का साझा धरातल है, बल्कि उसके इतर जो रुचियाँ हैं, खासकर पढ़ने और फ़िल्में देखने की, उस अनुभव को भी बांटने की आतुरता दुतरफा है। अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले तक लिखे गए कुल १६२ में कुछेक ही ऐसे पत्र हैं जिनमें निर्मल जी अपनी पढ़ी हुई किताब और जयशंकर की हालिया देखी गई फिल्मों के बारे में नहीं बताते-पूछते। कई पत्रों में इसी पूछ-बात के बीच निर्मल जी ने अंतर्दृष्टिसंपन्न टीपें भी दी हैं जिनको पढ़ते हुए किसी कृति या लेखक का एक सर्वथा अजाना अर्थ खुलता है। निर्मल जी जयशंकर को बतौर कहानीकार बहुत मान देते थे, पर यह महज स्नेह-सौजन्यवश नहीं था। जयशंकर को पत्रों में उनकी सख्त हिदायतों से भी अक्सर दो-चार होना पड़ा है, जो एक फन का उस्ताद अपने शागिर्द को बिना लाग-लपेट के देता है। जयशंकर की कहानियों और जर्नल्स पर निर्मल की राय को इस लिहाज से पढना उपयोगी होगा क्योंकि हिंदी के बीमार आलोचक अध्यवसाय किये बिना उन्हें महज निर्मल-स्कूल का विद्यार्थी कहकर आगे बढ़ते रहे हैं।

लेखक
-आलोचक रमेशचंद्र शाह से निर्मल के पत्राचार हालाँकि अनेक स्तरों पर चलते हैं, और उसमें कुछ-कुछ हिंदी के लेखकों-बौद्धिकों का चरित्र भी उजागर होता है, पर ये पत्र भी अंततः सर्जना के बिन्दुओं पर दो सर्जक व्यक्तित्वों के आत्मिक जुड़ाव की ही कथा कहते हैं। इस जुड़ाव में शाह का सर्जक परिवार ( पत्नी ज्योत्स्ना मिलन और बेटियां शम्पा और राजुला शाह) भी बराबर योग करता है। शाह परिवार से निर्मल जी की निकटता उनके भोपाल प्रवास के दौरान हुई थी जो अंत तक बनी रही। शाह साब से संवाद करते हुए उन्होंने अपने लेखन के बारे में बहुत-सी सूचनाएँ दी हैं। जिसे 'अ वर्क इन प्रोग्रेस' कहते हैं, उसके बारे में, और उसके लेखक के आंतरिक उहापोहों के बारे में जानना एक विशिष्ट अनुभव के साक्षात होना है। शाह साब को लिखे पत्रों के जरिये निर्मल जी के सर्जक मन से ऐसा साक्षात्कार आद्योपांत होता है। अलावा इसके भोपाल, अशोक वाजपेयी, उनका सृजनपीठ और सृजनपीठ प्रमुख होने के एवजी अपेक्षाओं का भी इन पत्रों में निर्मल जी ने अच्छा खुलासा किया है। आलोचना संपादक नामवर सिंह का दुर्भावना से प्रेरित निर्मल-केन्द्रित अंक निकलना भी नुक्तेनज़र की खामियों के साथ यहाँ दर्ज है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये तमाम बातें एक गरिमामय ढंग से कही गईं हैं। बहुत निजी और मैत्री के स्तर पर संप्रेषित हैं। ऐसी ग्रेसफुल जगहें लेखकों के पत्रों में दुर्लभ है। निर्मल के पत्रों में इसकी व्याप्ति उनके प्रति हमें कुछ और श्रद्धावनत करता है।

गगन गिल ने पिछले पत्र-संकलन की तरह इन संकलनों को भी अपनी संक्षिप्त भूमिका और संपादन के साथ प्रस्तुत किया है। निर्मल-प्रेमियों के लिए ख़ुशी की बात है कि २००५ में उनके देहावसान के बाद से गगन उनका लिखा-अनछपा हम सबके लिए धीरे-धीरे ही सही, उपलब्ध करा रही हैं।
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( पहला पत्र-संकलन प्रिय राम, ज्ञानपीठ से जबकि बाद के दोनों संकलन वाणी प्रकाशन से छपकर आये हैं.)

Friday, January 01, 2010

प्रार्थना

कमल के पत्ते-सा तुम्हारा मन हो जिस पर पानी की बूँद-सा दुःख गिरे जिसे मैं अपनी आँखों से चुन लूँ.

( उदयन वाजपेयी की कविता )