सबद
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कोई खिड़की नहीं



(उर्फ़ कैब में प्‍यार)

उसके आने से वह जगह घर बन जाती

घर बनना शिकायत से शुरू होता और हंसी पर ख़त्म
शिकायत यह कि 'बाहर की तेज़ हवाओं से मेरे बाल बिखर जाते हैं'
और हंसी इस बात पर कि 'इतना भी नहीं समझते'

हंसी की ओट में लड़के को शिकायत समझ में आती
और यह भी कि लड़की की तरफ़ से यह दुनिया से की गई
सबसे जेनुइन शिकायत क्यों है

फिर शिकायत के दो तरफ़ शीशे की दीवार उठ जाती
और हालांकि दीवार में तो एक खिड़की का रहना बताया जाता है,
१२ किलोमीटर के असंभव फैलाव और अकल्पनीय विन्यास में
उसके आ जाने भर से रोज़- रोज़ आबाद
घर की दीवार में कोई खिड़की नहीं रहती

बाहर रात, सड़क, आसमाँ और चाँद-तारे रहे होंगे,
भीड़, जाम, लाल या हरी बत्तियां भी,
इस घर में तो लड़के का अजब ढंग होना और
लड़की की आंखों में शरीफ काजल ही रहा.

बाहर का होना
घर टूटने के बाद याद आया :
दोनों को
अलबत्ता बहुत अलग-अलग.
****
 
(इसके पहले की कविता देखें यहां  
तस्‍वीर : मधुमिता दास)
36 comments:

'वाह' से अधिक अच्छा और ज़्यादा 'जेनुइन' शब्द नहीं हो सकता इसके लिए. दीवार में एक लम्बे समय से रह रही खिड़की का घर से जाना तय था,उसके जाने के बाद. घर का टूटना अद्भुत है और इसी के बाद पता चलना था कि उस बने हुए घर के बाहर भी बहुत कुछ था, जिससे वे बेखबर थे और शायद रहना चाहते भी थे. कविता में अलगाव को सफलता के साथ दिखा पाना मेरी नज़र में एक श्रेष्ठ काव्य-गुण है, जो आपमें मिलता है अनुराग भाई.
मुझे थोड़ी याद ग़ालिब की भी आ सकती है:-
इश्क़ से, तबी'अत ने, ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई, दर्द-ए-बेदवा पाया

बहुत ख़ूबसूरत...


ये शब्द कहीं न कहीं संवेदनाओं को छू पाने में सफल हो रहे हैं..इस तरह के लेखन में बहुत अपनापन लगता है..


बाहर के परिवेश में थोड़ी सी जगह घेरकर घर बन जाता है, ढेरों ऐसे ही नवपरिवेश हमारे हृदयों में हैं।


Behadd umda....jo tareef lafzon me bayan kar di jaye wo adhuri si lagti hai!!! zyada na kehte hue bas yahi likhungi ki mujhe boht pasand aayi....!


behatreen aur sukhad ke sath dukhad bhi...ghar tutne ke baad hi samajh aata hai ki usme kitni khushiyaan thi...


I read it once, and then again and then again....evocative...extremely evocative and the eye (the one without kajal) for detail does a great job - first when it misses (the outer world) and later when it catches the eye (the one with kajal)...thanks a lot...


bahut hi sundar...mann kar raha hai bus padhte jao..


Bhai..tumhari kavita padh ke thoda aankh band kar ke letne kaa maan karta hai!!


इस घर में तो लड़के का अजब ढंग होना और
लड़की की आंखों में शरीफ काजल ही रहा.



कोई किस तरह बेखबर हुआ,
प्रेम इस तरह हम नज़र हुआ,
टूटी दीवार, टूटी खिड़की,
बच ना पाया घरौंदा भी,
तुम कविता कहते हो अनुराग,
हर लफ्ज़ का ग़ज़ल सा असर हुआ.

बहुत सुन्दर.


anything original attracts always....and ur poem is really beautiful.


बाहर रात, सड़क, आसमाँ और चाँद-तारे रहे होंगे,
भीड़, जाम, लाल या हरी बत्तियां भी,
इस घर में तो लड़के का अजब ढंग होना और
लड़की की आंखों में शरीफ काजल ही रहा.

anurag ji bahut hi gahari baaten likhi hain aapne

shabdon ko achchi lay me piroya hai aapne bahut sunder


वाह दो के बीच के अपने पन की शिकायतों से शरू होकर ये सफर आखों के शरीफ काजल तक फिर काफी दुखद अंत की और ...अच्छे शब्दों में अभिव्यक्ति जी आप की अनुराग जी !!!!!!!!!!!!Nirmal Paneri


' bahar ka hona ghar tootne ke bad yad aya' bahut khoob vats ji . speechless. poori kavita prem our bikhrav ki bahut sundar abhivyakti.bahar ke hote huye bhi na hone ka ahsas prem ki upasthiti me hi sambhav hai. judav our algav ka behtareen shabd chitr prastut kiya hai apne . badhayee.


इन भूलभूलैय्या गलियों में अपना भी कोइ एक घर होगा
अंबर पे खुलेगी खिड़की, या खिड़की पे खुला अंबर होगा
आसमानी रंग की आखों में, बसने का बहाना ढूँढते हैं|

अदभुत लिखते हो भाई


आपके कवि रूप से यह पहला परिचय रहा. बहुत अच्छा लगा.


बाहर का होना
घर टूटने के बाद याद आया :
दोनों को
अलबत्ता बहुत अलग-अलग.

Zabardast!


bahut khoobsoorat laaine hain very good har line dil se takrakar jaati hai,,


बाहर का होना
घर टूटने के बाद याद आया :
दोनों को
अलबत्ता बहुत अलग-अलग.....

शाश्वत कहे जाने वाले प्रेम का एक समकालीन स्वरूप.... कविता सिर्फ़ सुन्दर नहीं सार्थक भी है... बधाई मित्र


अंतस की अभिव्यक्ति!


सुंदर विचारों की अभिव्यक्ति..........कविताओं से एक अलग रूप ले लेती है ............
इसी प्रकार की अभिव्यक्ति कोई खिड़की से पुकारे गए शब्दों से नहीं होती ........ कविता से ही होती है..........


साल के पहले दिन पढ़ी यह कविता : चिरस्मरणीय रहेगी. २३ कमेंट्स हैं ४८ घंटों के भीतर. कविता की सफलता ज़ाहिर है.

काफी गंभीर रचना है यह, हर्ष-विषाद, आशा-आकांक्षा और निराशा की आवाजाही कर कहीं गहरे धंसती हुई. भाव आकुलता और बेचैनी पैदा करती हुई, एक ही भाव से इस कविता को अलग-अलग व्यक्ति अपने भीतर ग्रहण कर भी नहीं सकता. पर मूल संवेदना सभी भावकों की एक जरूर होगी.

'अंधे का हाथी' की कथा याद आती है, एक ही सच सघन आत्मीय अनुभूति से आलोड़ित होना हर पाठक का तय है, हाँ, इस अनुभूति के कोने-अंतरे बेशक व्यक्तिगत सम्प्रेषण के अनुसार अलग-अलग होंगे! बधाई इस सुघर रचना के लिए!मैंने आपकी यह कोई पहली ही कविता सचेत रूप में पढ़ी है और अब इस कवि को न पढ़ना मुश्किल होगा!


अनुराग भाई, आपकी कविताएं पहली बार पढ़ी हैं लेकिन पहली बार में ही दिमाग में चढ़ गयी
बहुत सुन्‍दर


बाहर का होना
घर टूटने के बाद याद आया :
दोनों को
अलबत्ता बहुत अलग-अलग
bahut hi sundar....ek ghar ban jaane ki baat jo usse judi rehti hai or fir usi ghar ka ghar na rah jaana ek yaad ban kar bas jana or shayad yahi insaan bhi apne se bahar ka ho jaata hai, jaha khidkiya nahi hoti us samay wah apne bhitar hi rahta hai ek ghar ko bana leta hai apne bhithar or ek sansar bhi rach leta hai or jab wahi ghar tut kar bhikhar jaata hai fir wah apne aap se bhi duur ho jaata hai...kyunki uska self to usi process me usi anya k saath ban raha hota hai....
aapko is kavita k liye badhai..


सुंदर कविता। लड़का-लड़की का किस्‍सा। कितने प्‍यार से लिखा है। प्‍यार टपका पड़ रहा है। लेकिन एक बात बताओ, तुम इतनी कंजूसी से क्‍यां लिखते हो। मतलब इतना कम क्‍यों लिखते हो। और लिखो भाई। खूब खूब खूब।


bhut sunder linein padhin....


बहुत सुंदर कविता है...
पढ़कर मन प्रसन्न हो गया...


वाह ! शब्द नहीं हैं बयान करने के लिये! बहुत ही सुन्दर चित्रण ! पड़ने के बाद इस कविता ने चंद लम्हों में ही ह्रदय अपना घर बना लिया!


yahan der se aayaa! aur khoob pyara pyara paya!!


बहुत प्यारी कविता है.. बेहद खूबसूरत.. एक लडके की ज़िंदगी को जैसे बयां कर गयी।


ghar k bnnay main aur ghar k bsnay main bus ek khidki bher ka fasla hai....khidkyan gharon ki aankhay mani jati rhi hain ,jo baher ki dunya s jodti bhi hain aur ander k umes ko baher janay deti hain..taza hwa k zonko ko jegh detay huay...kidki k n hona kitna bhari ped skta hai dum ghutnay p pta chla....quite a symbolic poem,and yes ,diction here too is perfect....


kajal wali line achhi lagi aur ye tree ki pic bhi achhi lagai h.....


Behad Khubsurat Kavita ..Laajawab


बेहतरीन कविता.बिल्कुल दिल के आस-पास.


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