Monday, December 27, 2010

स्‍वगत : ६ : गीत चतुर्वेदी



[ यह, यानी आप जो आगे पढ़ने जा रहे हैं, कुंवर नारायण सरीखे कवि की उपस्थिति का महज खाका नहीं है, इसलिए यह सहज ही उस रीडिंग से भिन्न है जो कुंवर जी पर और उनसे परे आपके ज़ेहन में आलोचना के नाम पर पुख्ता है. यह आलोचना की 'हिंदी-हदबंदी' से बाहर शुरू हुआ है. इस तरह इसे पढ़ने का 'हिंदी-बाहर' ढंग करार दिया जाये तो अचरज नहीं. लेकिन अगर यह वह है भी तो आसानपसंद लोगों के उन अर्थों में नहीं, जो विदेशी साहित्य-सन्दर्भ या लेखक का नाम आदि देख कर ही  कुपित हो जाते हैं. यह अपनी भाषा के जेठे कवि की कविता को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का जतन है : अतः  ध्यान और धीरज का गद्य है. इसमें अगर न के बराबर सुना-सुनायापन है तो इस वजह से क्योंकि इसके लेखक ने अपने काव्य-पुरुष की प्रदत्त समझ को नेपथ्‍य में छोड दिया है. आलोचना में सुमिरन को कितना महत्व दिया जाता रहा है, काश कि ऐसा दुर्लभ 'छोड़ना' भी उसमें कभी-कभार घटित होता ! ]     


एक कवि की जेनेसिस और रिवर्स जेनेसिस

रूसी भाषा के कवि जोसेफ ब्रॉडस्की ने थॉमस हार्डी पर एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया था कि इतने बरसों बाद भी हार्डी अपनी ही भाषा में उपेक्षित हैं और उन चीज़ों को नहीं पा सके हैं, जिसके वे हक़दार थे। उनका मानना था कि हार्डी को उनके आलोचक आधुनिक भावबोध से देखते हैं, जबकि उन्हें उससे एक सीढ़ी पहले यानी आधुनिकता से पूर्व-बोध को ध्यान में रखना चाहिए। कविता को पढऩे के तरीक़ों पर यह एक सुंदर लेख है। बाद के बरसों में ब्रॉडस्की के निबंधों पर लिखे एक लेख में जे. एम. कोएट्ज़ी ने उनकी इस प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिलाया कि ब्रॉडस्की जब भी अपने प्रिय कवियों के बारे में लिखते हैं, उनमें वे सारी बातें खोज लेते हैं, जो दरअसल वह अपने भीतर पाना चाहते हैं।

समीक्षक या आलोचक को अपने विषय-लेखकों पर अपने आग्रहों को आरोपित नहीं करना चाहिए, ऐसा आमतौर पर माना जाता है। उससे उम्मीद की जाती है कि वह उन्हीं चीज़ों के इर्द-गिर्द घूमे, जिन्हें मूल लेखक ने अपने रचना के स्वभाव व रचनाकर्म से अर्जित किया है, पर लेखकों से नियमों का पालन नहीं हो पाता। साधारण तौर पर ऐसे नियमों को तोड़ जाना उनकी रचनात्मक विवशताओं का ही हिस्सा होते हैं। इसीलिए आम तौर पर दुर्गुण मानी जाने वाली चीज़ें बड़े कवियों का सिंगार बन जाती है। यह एक दुर्लालित्य है, जो अक्सर चीज़ों को नए तरीक़े से देखने या कुछ नई सुंदरताओं तक पहुंचने का माध्यम बन जाता है।

अपनी उल्लेखनीय या सूक्ष्म, विशेषताओं को अपने पहले के प्रिय कवियों में प्रत्यारोपित कर ब्रॉडस्की परंपरा के पहियों को थोड़ा-सा उल्टा घुमा देते हैं। जिन चीज़ों को वह अपने भीतर विकसित पाते हैं, उन चीज़ों के बीज उन्हें हार्डी से मिले थे, ऐसा बताकर वह अपनी जेनेसिस की मैपिंग का रास्ता ही दिखा रहे थे। उन्हें पढ़ते हुए मुझे हमेशा लगता है कि क्या एक रिवर्स-जेनेसिस भी हो सकती है, जिसमें ऐसा हो कि जिन चीज़ों के बीज हमें ब्रॉडस्की में मिलते हैं, पहले से ही हार्डी के भीतर उन सबकी एक भरे-पूरे विकसित वृक्ष के रूप में उपेक्षित अनुपस्थिति थी? यह संभव है।

कुंवर नारायण की कविताओं को पढ़ते हुए मुझे यह संभव दिखाई देता है। उनकी कविताओं की संरचना जिस तरह स्वीकृत-सरल-शास्त्रयीता की देह पहनती है और उनकी कविताओं का भावबोध जिस तरह लगभग अस्वीकृत, दुविधा में डाल देने वाला, जटिल भावबोध होता है-- ये दोनों चीज़ें यह सोचने पर विवश कर देती हैं कि क्या कुंवर नारायण मोनो-जेनेसिस के कवि हैं? यानी क्या उनके कवि, उनकी कविता और उनकी कविता के जीवन की उत्पत्ति सिर्फ़ एक कोशिका से होती है? कोई आदिम, प्राचीन, प्रारंभिक कोशिका?

या वह पॉली-जेनेसिस के कवि हैं? यानी उनके कवि, उनकी कविता और उनके कविता के जीवन की उत्पत्ति किसी एक कोशिका से होने के बजाय, फूलों की तरह उनके बीजारोपण में एक ख़ास कि़स्म का बंजारापन छिपा हुआ है? जैसे परागकणों को मधुमक्खियां, चिडिय़ां, हवाएं उड़ा ले जाती हैं और किन्हीं दूसरे पर्यावरणों में वह कण जब पैदा होता है, तो अपना स्वभाव थोड़ा-सा बदल लेता है, अपनी विशेष पारिस्थितिकी से समन्वय के क्रम में। इस तरह, हर बार उसमें कुछ न कुछ बदलाव आता है और एक दिन वह एक स्वतंत्र नस्ल बन जाता है।

ब्रॉडस्की की ही तरह कुंवर नारायण में जेनेसिस और रिवर्स-जेनेसिस की यह प्रक्रिया एक साथ दिखाई पड़ती है। ये दोनों चीज़ें एक ही सरल-रेखा या परस्पर समांतर सरल रेखाओं में नहीं होतीं, बल्कि रिवर्स-जेनेसिस बहुधा जि़ग-ज़ैग, आड़ी-तिरछी, रैंडम रेखाओं में होता है। वह अपनी कविताओं में समय के व्यक्तित्व को नष्ट होने से बचाने की कोशिश करते हैं; समय को अपने विचारों के वाहन के तौर पर इस्तेमाल करते हुए। वह अपने समय और उसके बीतेपन को, पुराने समय और उसके बीतेपन को, सतत जिज्ञासु और शंकालु, जवाबों के बीच से निकलने वाले सवालों के ज़रिए देखते हैं। वह वर्तमान को अतीत से देखते हैं और अतीत को वर्तमान से देखते हैं। वह जीवन की सुंदरताओं की खोज में एक बहुत लंबी यात्रा करते हैं और सुदूर मिथिहास में जाकर यह बताते हैं कि उनकी कविता का उत्स शायद यहीं-कहीं है। वह जीवन, प्रेम और मृत्यु के त्रिगुणसूत्री भारतीय चिंतनवृक्ष को अपने भीतर उगा हुआ महसूस करते हैं, तो समय की इसी सुदूर यात्रा के कारण। यह वृक्ष बीजरूप में मिथिहास में मौजूद है। यह जेनेसिस की प्रक्रिया के अंतर्गत है।

फिर वह मिथिहास और इतिहास की कंदराओं में भटकते हुए ठीक आज के समय के बारे में बताते हैं, पर वह सिर्फ प्रॉफेसी नहीं होती। वह मानवीय गुणों की विरासत को सहर्ष स्वीकार करते हैं। कवि के रूप में वह यथार्थ समय और काल्पनिक समय के बीच लगातार आवाजाही करते हैं, इस तरह से कि यथार्थ और कल्पना उनके लिए लगभग समार्थी शब्द बन जाते हैं- समार्थी जैसे कि अर्थ के सम तक पहुंचाने वाले शब्द। इन दोनों समयों की यात्रा के दौरान उन्हें कई अनुभव होते हैं, वह विभिन्न पर्यावरणों में रहते हैं, कई देशों और उपदेशों में अतिथि की तरह या नागरिक की तरह रहते हैं, उससे उनमें कई बदलाव आते हैं। वह इन सारी चीज़ों को विरासत में मिले अपने सांस्कृतिक अनुभव में मिश्रित कर देते हैं। लोहिया ने मिथकों को 'मनुष्य की कलात्मक कल्पनाएं’ कहा है। यह दृष्टि दरअसल आज दिन में बैठकर उस पूरे मिथिहास को देखने से बनती है। कुंवर नारायण अपनी रचनाओं में इस दृष्टि में भरोसा करते दिखते हैं, तो यह मनुष्य की तमाम वर्तमान व ऐतिहासिक कलात्मकताओं और कल्पनाओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। व्यक्ति और समाज के अद्वैत और गुणों के परस्पर समावेश की जो प्रवृत्ति उनकी कविताओं में बीजरूप में मौजूद हैं, वे दरअसल वृक्ष के रूप में मिथिहास में मौजूद है। यह उनकी रिवर्स-जेनेसिस है।

ऐसा करते समय वह प्रस्तुत लीनिएज को नकार देते हैं। जो लीनिएज उन्हें जेनेसिस की प्रक्रिया में मिलती है, उसे वह थोड़ा-सा स्वीकार करते हैं और उल्टी प्रक्रिया में वह नए पड़ावों, नए मार्गदर्शकों को शामिल करके नितांत नई मिश्रित लीनिएज का प्रस्ताव करते हैं। बड़ा कवि अपना लीनिएज ख़ुद बनाता है। इसे अगर सरल शब्दों में कहने की ज़रूरत हो, तो बिल्कुल सड़क की भाषा में यह कहा जा सकता है कि बड़ा कवि यह ख़ुद तय करता है कि उसकी कविता का बाप कौन होगा। ऐसा करके वह परंपरा में अपनी तरह से उलटफेर करता है। ऐसा करके वह अपने समय की कविता के इतिहास को दुबारा लिखने के लिए विवश कर देता है। ऐसा कवि अमूमन पॉली-जेनेटिक कवि होता है। कुंवर नारायण ऐसे ही कवि हैं।

मोनो-जेनेटिक कवि अक्सर एक समय, एक विचारधारा, एक विशेष राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति, एक विशेष निष्ठा, एक विशेष आस्था यानी संक्षेप में, अपनी रचनाओं के व्यक्तित्व के लिए एकलताओं का चयन करता है। उसमें नज़रअंदाज़ न की जा सकने वाली 'एक्सक्लूसिवनेस’ होती है। उसकी निजी जि़ंदगी जोखिम से भरी होती है, लेकिन ज़्यादातर वह अपनी कला में बड़े जोखिम नहीं उठा पाता। मेरी नज़र में लोर्का और ब्रेख़्त, शिम्बोर्स्काह और सिल्विया प्लाथ इसी श्रेणी में आते हैं।

पॉली-जेनेटिक कवि, जैसा कि ऊपर के विलोम से इशारा मिल जाता है, अक्सर एक साथ बहुत सारे समयों, कई राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों के बीच, कई आध्यात्मिक यात्राओं को भी पूरा करते हुए, कई सांस्कृतिक रिसेप्शंस को समाहित करते हुए, यानी अपनी रचनाओं के व्यक्तित्व के लिए बहुलताओं का चयन करता है। वह सतत आर्गुमेंटेटिव, समाधानों से ज़्यादा नई समस्याओं का अनुसंधान करता, सहज ही ‘इन्लूक्त सिव’ और यूनिवर्सल अप्रोच व अपील का कवि होता है। उसकी निजी जिंदगी जोखिम से भरी हो सकती है या नहीं भी हो सकती, लेकिन अपनी कला में वह बड़े से बड़े जोखिम उठाता है। मेरी नज़र में बोर्हेस और मिवोश, नेरूदा और एलियट ऐसे ही कवि हैं।

मेरे लिए यह सवाल मायने नहीं रखता कि इन दोनों श्रेणियों के बीच कवियों की बड़ी श्रेणी कौन-सी है? पर यह देखना फिर भी ज़रूरी है कि मोनो-जेनेटिक कवि संख्या में बहुत होते हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ही मेजर पोएट्स बन पाते हैं। जबकि पॉली-जेनेटिक कवि हमेशा संख्या में कम होते हैं और उनमें से बहुत ही कम माइनर पोएट्स कहलाते हैं।

पिछले कुछ समय से हम जैसा समाज देख रहे हैं, आक्रांताओं ने अपना रूप बदल लिया है, तलवारों की धार भले सान न चढ़ाई गई हो, रुपए के नोटों की धार इतनी तेज़ है कि गला रेत दे, एक निश्चित दिशा में एक अनियंत्रित दौड़ चल रही है, आदमी को आत्मा की तरह नहीं, एक वस्तु की तरह देखा जा रहा है, स्वीकार कर लेने की विवशताएं और लाभ बताकर अस्वीकार करने के सामूहिक बोध को समाप्त किया जा रहा है, मुझे ऐसा लगता है कि आज के सारे बड़े कवि पॉली-जेनेटिक कवि ही होंगे। वे ऐसा चयन करें न करें, पर ऐसा होना उनकी रचनात्मक और आत्मिक विवशता होगी।

आगे की पंक्तियों में संक्षेप में मैं उन विशेषताओं की चर्चा करूंगा, जो कुंवर नारायण की कविताओं में प्रधानता से हैं। प्रधान शब्द अपने भाव और व्यवहार में एकल होता है, लेकिन कुंवर जी की कविताओं के बारे में बात करते समय यह बहुलताबोधी हो जाता है। दरअसल, बहुलताबोध भी उनका एक गुण ही है। अकेले व्यक्ति पर बात करते हुए भी उनमें बहुलताबोध होता है-

फूलों को जब भी देखता हूं,
बहुवचन में देखता हूं

या

पूरे विश्वास के साथ बहुलता को दे जाना चाहता हूं

कुंवर नारायण मुझे गहरे अस्वीकार के कवि लगते हैं। उनकी कविता अपने समय के प्रचलित वादों, मुहावरों, दृश्य-विधानों, तेज़ी, भाषा के साथ चंचल व्यवहार, अत्यंत मुखर जोश-ख़रोश, वैचारिक ख़ूनख़राबा आदि को वृहत्तर अस्वीकार करती है। जिस समय कविता के भीतर कम्पोजीशन, फॉर्म और स्ट्रक्चर के स्तर पर क्लासिकीय होने से सतर्क तरीक़े से बचा जा रहा था, वह इस बचने को अस्वीकार करते हैं और उसी क्लासिकीय टोन की प्रतिष्ठा करते हैं। जब कविता वृहत्कथाओं की रचना नहीं कर रही थी, वह खंड-काव्य लिख रहे थे। जब भाषा के घोड़ों को ऊबडख़ाबड़ मैदानों पर दौड़ाया जा रहा था, वह उसके गोल या नुकीले किनारों को नफ़ासत से सहला रहे थे। जो चल रहा था, वह उससे अलग चल रहे थे। ख़ुद उन्हीं के शब्दों में कहा जाए, तो कवि वही है, जो अस्वीकार करना जानता हो। अस्वीकार कवि की बहुत बड़ी शक्ति होती है। वह उसे अपने लिए नए रास्ते तलाशने को प्रेरित करती है। आज़ादी के बाद एक देश के तौर पर इस भूगोल ने ख़ूब भौतिक तरक़्क़ी की है, लेकिन एक समाज के तौर पर इसका नैतिक बल लगातार कमज़ोर होता गया है। अपने अकेलेपन में भौतिकता समाजों के नैतिक बल व मनोबल पर आघात करती है। ऐसा अस्वीकार इसी बल को बढ़ाता है और उनकी कविता को फ़क़ीराना सादगी के वैभव से भर देता है। अस्वीकार प्रतिरोध की बुनियादी शर्त है और जिन लोगों को कुंवर जी की कविता में प्रतिरोध के स्वर नहीं मिलते, उन्हें इन कविताओं के नैतिक अस्वीकार का पुनर्पाठ अवश्य करना चाहिए।

जिस समय कुंवर नारायण ने कविता लिखना शुरू किया था, उस समय भारत पांच कि़स्म के परिवर्तनों से एक साथ गुज़र रहा था- शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, राष्ट्रीयतावाद, लोकतंत्र की समझ और सामाजिक बदलाव। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इन सबको अलग-अलग क्रांतियां कहा है और ज़ोर इस बात पर दिया है कि ये सब ‘एक साथ’ हो रहे थे। इतने स्तरों पर एक साथ होने वाला परिवर्तन व्यक्ति पर इनसे भी ज्य़ादा प्रभाव डालता है। इन सबने मिलकर एक व्यक्ति को नागरिक, उपभोक्ता, वस्तु, कलपुर्जा, संसाधन में तब्दील करने की प्रक्रिया में कोई क़सर नहीं छोड़ी। पांचों स्तरों पर चलने वाला यह परिवर्तन अभी भी पूरा नहीं हुआ है और उसमें बाज़ार, अर्थव्यवस्था आदि ने और नये आयाम जोड़ दिए हैं। व्यक्ति का समाज के साथ क्या संबंध होता है और ये सारी चीज़ें उसके मेटाकॉन्शस को किस तरह डिस्टर्ब करती हैं, इस पर बहुधा बातें होती हैं। कुंवर नारायण हिंदी के उन बहुत थोड़े कवियों में हैं, जिन्होंने व्यक्ति और समाज के मेटाकॉन्शस को अपनी कविताओं में केंद्रीयता दी है। उनकी कविताएं यथार्थ का सिर्फ़ सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक पहलू ही नहीं देखतीं, बल्कि इनके बीच एक आत्मिक-आध्यात्मिक यथार्थ की जगह को परिभाषित भी करती हैं। उनमें जीवन को जीने लायक़ बनाने की बुनियादी भौतिक शर्तों, उसके लिए संघर्ष करने, स्वप्न देखने का स्वाभाविक अनुमोदन करते हुए मनुष्य की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को भी संबोधित करने का साहस है। आज और पिछले पचास बरसों की हिंदी कविता में मनुष्य की आत्मिक आवश्यकताओं का जि़क्र-भर कर देना बड़ी बौद्धिक आपदाओं, सुनियोजित उपेक्षाओं और पीठ पीछे उपहासों को आमंत्रित करने का बड़ा ख़तरा पैदा करना है। उनकी कविता, जीवन, जीवनमूल्यों और कविता की उपस्थिति-ताक़त में गहरा भरोसा करती है, इसीलिए वह इनटैक्ट रहते हैं।

अध्यात्म को हमारे यहां जितनी कैजुअल सरलता के साथ सीधे-सीधे धार्मिक अंधत्व से जोड़ कर देख लिया जाता है, उसे गली-मुहल्लों-टीवी चैनलों में दिखने वाले बाबाओं के उपदेशों-प्रवचनों मात्र से जोड़ दिया जाता है। एक फूहड़ जि़द के साथ यह मानने से इंकार कर दिया जाता है कि अपने व्यावहारिक-ऐतिहासिक अर्थों में हमारे अंतर्मन को भी एक अ-भौतिक भोजन की आवश्यकता होती है। एक चित्र को देखने से जो आनंद मिलता है, संगीत की कोई ध्वनि हमारे भीतर किसी लहर को पैदा कर देती है, एक अजनबी चेहरे को मुस्कराता हुआ देखना किस तरह का सुख और संतोष देता है? ये सब हमारे भीतर के कवि के अध्यात्म हैं। मनुष्य की आत्मा का भोजन। क्या ख़ुद कविता ही बहुधा इसी रूप में हमारे पास नहीं आती? अनुभूतियों के बीहड़ ज्वार के साथ? हमारे समय के महान पोलिश कवि एडम ज़गायेवस्की इसे 'मिस्टिसिज्म फॉर बिगिनर्स’ कहते हैं।

कुंवर नारायण पूरे समाज की आत्मिक-आध्यात्मिक चेतना को झिंझोड़ते हैं। उनकी कविताएं सिर्फ़ इंडीविज़ुअल नहीं, कलेक्टिव अनकॉन्शस को संबोधित हैं। यह सीधी नहीं, असेंब्ली लाइन प्रक्रिया है। प्रतिरोध की कविता भी अनिवार्य रूप से मिस्टीक होती है। तभी वह मनुष्य के अधि-जगत को सूक्ष्मता से टिटिलेट कर पाती है। इतिहास के सबसे प्रतिरोधी व्यक्तित्वों ने भी, प्रतिरोध की अपनी मुहिम के दौरान मनुष्य के मेटाकॉन्शसनेस को लगातार एड्रेस करते रहना कभी नहीं छोड़ा था। यलगार कहने से ठीक पहले तक इसी मेटाकॉन्शसनेस को सहलाते रहने की एक प्रक्रिया होती है- याद कीजिए, 'सेवन समुराई’ में काम्बेई आखि़री मुक़ाबले से पहले अपनी टोली का मनोबल इसी तरह ऊंचा करता है।

एक कमज़ोर नैतिक बल वाले इस समाज में, उपनिवेशों और आक्रांताओं से टूटे हुए मनोबल वाले इस इतिहास में, आत्मबल जुटाने की कोशिश में हांफ रहे इस भूगोल में, एक कवि जब अपनी कविताओं के ज़रिए यह भूमिका अदा करता है, तो दरअसल वह कितनी बड़ी भूमिका है। इसीलिए कुंवर नारायण की कविताएं कलेक्टिव मेटाकॉन्शस को संबोधित एक मानसिक-मनावैज्ञानिक मोर्चा हैं। वे हमारी कलात्मक, सांस्कृतिक और मानवीय अनुभूतियों की गहराई तक को छूने वाली आवाज़ हैं।

येट्स की एक पंक्ति याद आती है कि रेटरिक क्या है? दूसरों के साथ संघर्ष की हमारी भाषा है। कविता क्या है? ख़ुद के साथ संघर्ष की हमारी भाषा का नाम है।

इस समय लिख रहे कवियों में कुंवर सबसे ज़्यादा भारतीय हैं। यहां भारतीय का अर्थ वैसा ही डेफिनिट नहीं है, जैसा कहीं और का होना। जैसे अमेरिकी होना प्रतिस्पर्धी होना है। ब्रिटिश होना ऐसी कॉमेडी का होना है, जिसे सिर्फ़ वे ही लोग समझ पाते हैं। फ्रेंच होना ऐसे विट या प्रतीकों के बीच जाना है, जिनकी अब उम्र हो चली। कुंवर उन्हीं अर्थों में भारतीय हैं, जिन अर्थों में कुरोसावा और ओज़ू जापानी हैं। ये दोनों फिल्मकार जापानी दुनिया में पश्चिमी सिनेमा से सबसे ज़्यादा प्रभावित रहे, लेकिन अंतत: वे विशुद्ध जापानी फिल्मकार हैं, जो जापानियत के वैश्विक संदर्भों को पुनर्परिभाषित करते हैं। पश्चिमी संस्कृति और शैली ने उन्हें अपनी कला में प्राचीन जापानी शैली और मूल्यों की ओर लौटने को प्रेरित किया। कुंवर नारायण के साथ भी यही हुआ। वे जितना पाश्चात्य दर्शन से जुड़ते गए, उनके भीतर भारतीयता की पहचान पुख्ता होती गई। सिर्फ़ सामूहिक मिथकीय स्मृतियों की पुनर्यात्रा में ही ऐसा हुआ हो, ऐसा नहीं है। वह अपनी इच्छा से भारतीय हैं और अपनी 'कलात्मक कल्पनाओं’ से भी भारतीय हैं। उन्होंने समावेशीकरण के चिरंतन भारतीय मूल्य को अपनी कला में प्रतिष्ठित किया। इसीलिए शुरुआत से अब तक उनकी कविता का टोन लगभग एक-सा बना हुआ है। उनका टोन उनकी कविता का पक्ष स्पष्ट कर देता है। उनकी कविता की पंक्ति है-


न पकड़ से छूटता पुराना सामान
न पकड़ में आता छूटता वर्तमान

पुराने और नए दोनों के साथ सहज संबंध स्थापित कर लेने के कारण जब उनका कवि एक पुराने, सुदूर स्थित समय में जाता है, तब वह ख़ुद को किसी आश्चर्यबोध में फंस जाने से बचा लेता है। ऐसा करके उनका कवि अपनी औपनिवेशिक विरासत को कमोबेश झटक देता है। अपनी पहचान का आविष्कार, उनकी उपस्थिति के प्रति गहरा आश्चर्यबोध, उनकी स्वीकृति को लेकर मन में रहने वाली शंका और उससे उपजी आइडेंटिटी क्राइसिस पुराने उपनिवेशों की कलाओं में बहुधा एक ऐतिहासिक विकार, किंतु समकालीन दुर्लालित्य की तरह दिखती हैं। कुंवर नारायण अपनी गहरी वैचारिकता और बीहड़ संयम से इस आश्चर्यबोध को जांचकर रोकते हैं, भावनात्मकता का मुक़ाबला कर उसे बाहर का रास्ता नहीं दिखा देते, बल्कि ख़ुद भावनात्मकता को थोड़ा चकित कर देते हैं। वह अपनी दृष्टि को परिमित या रेस्ट्रिक्ट कर देते हैं, ताकि वह और दूर तक देख सकें। वह अपनी दुनिया को सीमाबद्ध कर देते हैं, ताकि वह दुनिया की सीमाओं का अतिक्रमण कर सकें। देखना उनकी कविताओं का महत्वपूर्ण अंतर्कर्म है। उन्हें अपने इस देखने पर यक़ीन है और उनमें अनदेखे से कन्फ्रंट करने का, उत्साह और आकांक्षा की भाषा का रोमांस है।

यही कारण है कि कुंवर की कविताएं कॉनफ्लिक्ट्स से भरी हुई हैं। उनकी कविताओं में वर्तमान और अतीत, नीति और राजनीति, सत्य और असत्य, अनुभूति व विचार, जीवन और मृत्यु, नया व पुराना, सही और ग़लत, क्लासिक और रोमांटिक, इन सबके भीतर एक कॉनफ्लिक्ट लगातार चलता रहता है। उनमें भारतीय और पश्चिमी सभ्यता, संस्कृति और विचार-दर्शन प्रणाली का कॉनफ्लिक्ट प्रमुखता से आता है। वह लखनऊ में हैं या क्राकोव में? शेक्सपीयर में हैं या अमीर ख़ुसरो में? काफ़्का के प्राहा में हैं या ग़ालिब की दिल्ली में? वेनिस की पानीदार गलियों में हैं या अयोध्या की उदास तंग गलियों में? बोर्हेस में हैं या निराला में? एकलता में हैं या बहुलता में? ख़ुद में हैं या बेख़ुद में? भौतिक दर्शन में हैं या आध्यात्मिक दर्शन में? जीवन में हैं या मृत्यु में? उनकी कविताएं इन सारी चीज़ों, मन:स्थितियों, विचार-प्रणालियों के कॉनफ्लिक्ट से बनती हैं।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि यह कॉनफ्लिक्ट उनकी कला का अंतर्कर्म है, देशों और समाजों में होने वाले कॉनफ्लिक्ट से इतर। भिडंत और युद्ध के अर्थों से भिन्न। यह सागर और तट की तरह है। कला में कॉनफ्लिक्ट सुमेल की संभावनाओं को बलवती करता है। इसीलिए कला में एक-दूसरे से लड़ती हुई दो तिरछी रेखाएं एक-दूसरे की सहयोगी रेखाएं बन जाती हैं। इसीलिए एक-दूसरे से बैर रखता दीखते दो शब्द एक-दूसरे को सहयोग देकर एक नया अर्थ स्थापित कर देते हैं। वह अलग-अलग दिखने वाली स्थितियों, विलोमों, विचारधाराओं के इसी कलात्मक कॉनफ्लिक्ट से अपने कविता का जीवन-सत्व हासिल करते हैं। कल्पना और यथार्थ का कॉनफ्लिक्ट एक संपूर्ण जीवन-यथार्थ की दृष्टि देता है, जो केवल देखी-पढ़ी व्यक्त दुनिया से ही नहीं, बल्कि अदेखी-अपढ़ी, अव्यक्त काल्पनिक दुनिया से भी बनता है। संपूर्ण काव्यदृष्टि के तौर पर वह इन सारी चीज़ों को अपने में शामिल कर लेते हैं, जैसे मानवकल्याण से जुड़ी सारी अनुभूतियों और विचारधाराओं को अंतत: मानवतावाद के विराट बिंदु में जाकर मिल जाना होता है। सांस्कृतिक और वैचारिक आवाजाही के नैरंतर्य से संभव हुआ यह कॉनफ्लिक्ट उनके यहां संयोजन के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल होता है। इसीलिए मैं उन्हें 'कलात्मक कॉनफ्लिक्ट्स का महाकवि’ कहना पसंद करता हूं।

यहीं वह विशुद्ध अर्थों में एक लेखक के रूप में दिखते हैं, जिसके सरोकार में (सबसे छोटी इकाई) व्यक्ति की बाहरी और भीतरी दोनों दुनियां होती हैं, लेकिन जिसकी प्रतिबद्धता अंतत: अपनी रचना के प्रति है, क्योंकि उन सरोकारों के प्रति उस लेखक का एकमात्र वही प्रस्ताव संभव और श्रेष्ठतम होता है।

जैसा कि पहले कहा मैंने, वह अपनी कविताओं के जीवन-सत्व की तलाश में बौद्ध दर्शन की तरफ़ भी जाते हैं, लेकिन सिर्फ़ इसी आधार पर उन्हें मध्यममार्गी कहना, किसी कवि को एक शब्द में रिड्यूस कर देने के जल्दबाज़ चिंतन से ज़्यादा कुछ नहीं। जो कवि यह लिखता हो कि तट पर हूं पर तटस्थ नहीं, वह मध्यममार्गी नहीं हो सकता। बुद्ध की तरह वह अपने लिए एक पक्ष चुन लेते हैं- जीवन और उसके सत्य का अन्वेषण। तभी तो नचिकेता एक पिता की क्रूरता के खि़लाफ़ एक पुत्र का विद्रोह है, जो आध्यात्मिक संघर्ष, ईश्वरीय सत्ता के ,खि़लाफ़ बग़ावत और अंतत: जीवन की जीत का पर्व-प्रतीक बन जाता है। एक नॉलेज फैनेटिक कवि का नॉलेज फैनेटिक चरित्र ख़ुद को जीत लेता है।

ऊपर जो विशेषताएं मैंने गिनाई हैं, और वे भी, जो समय के अभाव में इस बातचीत में नहीं आ पाई हैं, वह सिर्फ़ अकेले उन्हीं के कवि नहीं हैं। वह इन सारी विशेषताओं की सामूहिकता के कवि हैं। दरअसल, कुंवर नारायण में इतना वैविध्य है कि उन्हें किसी एक कल्ट में बांधा ही नहीं जा सकता। अच्छे कवियों का अकेला होना बहुत ज़रूरी है। जैसा कि बोर्हेस ने 'अ पोएट्स क्रीड’ में कहा है- बड़ा कवि अपना क्रीड या कल्ट ख़ुद ही होता है। कुंवर भी अपनी क्रीड के इकलौते कवि हैं। मेरी नज़र में वह दूसरी भाषाओं में इस समय लिख रहे इसी तरह के कवियों एडम ज़गायेवस्की, बेई दाओ, को उन आदि के समकक्ष हैं।

एक बार सत्यजित राय से एक इंटरव्यू में पूछा गया कि आपने, कुरोसावा, बर्गमैन और फेलिनी ने लगभग एक साथ काम शुरू किया था, फिर अब आप उनसे पीछे क्यों हैं? उनका जवाब था- क्योंकि मेरे पास उनके जैसे दर्शक नहीं।

कई बार मुझे लगता है कि यह सिर्फ़ राय की समस्या नहीं, हमारे पूरे कला-परिदृश्य, कलाकार और समाज की त्रासदी है।



{ गीत चतुर्वेदी हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कवि-कथाकार हैं. उन्होंने यह आलेख कुंवर नारायण को साहित्य अकादमी द्वारा २० दिसंबर को महत्तर- सदस्यता अर्पित किये जाने के मौके पर पढ़ा था. यह दूसरा अवसर है जब सबद पर उनका पठित आलेख इस स्तंभ के तहत छप रहा है. उनका अब तक का लेखन यों है : कविता संग्रह 'आलाप में गिरह' और दो कहानी संग्रह 'सावंत आंटी की लड़कियां' व 'पिंक स्लिप डैडी' प्रकाशित. वर्ष 2007 में 'मदर इंडिया' कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार से सम्‍मानित. चार्ली चैपलिन की जीवनी और पाब्‍लो नेरूदा के दुर्लभ गद्य के अनुवाद की पुस्‍तक 'चिली के जंगलों से' के अलावा  अनुवाद के कई बहुप्रशंसित काम. यहां दी गई उनकी तस्वीरें प्रीति मान तथा शाहनवाज़ मलिक के कैमरे से. }

9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

विविधता से पूर्ण लेखन और तथ्यों की समुचित गहराई, कुँवर नारायण जी को रोचक व पठनीय बनाता है।

चन्दन said...

नई बात.समझदार गद्य.पढ़ कर अच्छा लगा.

Hindi Sahitya said...

एक महत्वपूर्ण और जरूरी आलेख.इससे न केवल कुंवर नारायण जी की कविता वरन् समग्र कविता को समझने में मदद मिलेगी. इतने सारगर्भित आलेख के लिये बधाई.

Pratyaksha said...

कवि को समझना और कविता को समझना किसी भी डेफिनेशन के परे है ,उसे हमेशा ओपेन एंडेड होना चाहिये ..गीत ने इस समझ को एक नया डाईमेंशन देने की गंभीर कोशिश की है ।समग्र भाव से गहरे और भीतर जाते हुये उतना ही एक रेडियल फैलाव का दुरूह उद्यम करना आसान नहीं । कुँवर जी की कविताओं पर ऐसी टिप्पणी पढ़ना एक अलग नज़रिये से कवि को देखने के साथ ही गीत के "कवि समझ "को देखना भी हुआ ..

शिरीष कुमार मौर्य said...

सचमुच बहुत गंभीर आलेख है गीत का. कुंवर जी के बारे मेरी समझ जिन लोगों की बदौलत विकसित हुई है...उनमें गीत और असद ज़ैदी सर्वोपरि हैं. इन दोनों का लिखा मैंने सबद पर ही पढ़ा...तुम्हें शुक्रिया अनुराग.

Meenu Khare said...

अनन्य सरसता समेटे अति गम्भीर साहित्यिक विवेचना बहुत पसंद आई.बहुत बधाईयाँ अंतर्मन से.

रामजीलाल चौधरी said...

लेकिन अगर यह वह है भी तो आसानपसंद लोगों के उन अर्थों में नहीं, जो विदेशी साहित्य सन्दर्भ या लेखक का नाम आदि देख कर ही कुपित हो जाते हैं.

ऐसे कौन लोग हैं?

हिंदी के कई (कितने?) लेखकों ने अंग्रेज़ी साहित्य और अंग्रेज़ी की छलनी से दूसरी विदेशी भाषाओं के साहित्य का अनुवाद किया है। कितनों ने विदेशी साहित्य पढ़ा होगा इसका तो क्या मालूम। इससे यह अंदाज़ा तो लगा सकता हूँ कि कम-से-कम इन्हें तो विदेशी साहित्य से चिढ़ तो नहीं होगी। और यों कुपित होने वाले अधिसंख्य तो नहीं होंगे।

क्या आपको कोई शक था कि गीतजी के इस भाषण को लेकर कुतर्क दिया जा सकता है कि वे अंग्रेज़ीपरस्त हैं? मेरी राय ऐसी तो नहीं है लेकिन यह कहूँगा कि गीतजी स्वच्छंदता से अंग्रेज़ी व्यंजनाएँ बरतते हैं। अपनी बात करूँ तो मुझे हर संकल्पना के लिए अपनी भाषा में शब्द या पद खोजने या गढ़ने का शौक़ है। इसलिए गीतजी को चाव से पढ़ते हुए भी मेरे पेट में दर्द होता है, थोड़ा-बहुत।

Manohar said...

जो समाज के metaconscious को समझते है वो प्रतिरोध के कवि के अलावा कुछ नहीं हो सकते और शायद समझना ही काफी नहीं होता उस समाज में मौजूद जितने भी सीमाए है उन्हें लगातार लांघना पड़ता है उसका आकार निरंतर ही बढ़ाना होता है की हम उसे पा सके जो आज इस वर्तमान में छुटता जा रहा है या जो कभी था ही नहीं. इस लिए मै गीत जी की इस बात से वाकिफ रखता हू की आज के समाज में कवि केवल पोली जेनेसिस का कवि ही हो सकता है और जो उसे नकार देते है वो बस उसी सत्ता और वर्ग का हिस्सा हो जाते है जो उन्हें निरंतर बनता रहता है और वो कभी समाज के उन अंतरविरोधो को समझ नहीं पाते.

और अंतर्विरोध केवल समाज के भीतर ही नहीं हो रहा होता, अपितु इंसान के भीतर भी होता है जिसे समझना भी जरुरी हो जाता है और इस कारण से उसे हम आध्यात्म कहे (जो की एक controversial टर्म है) या कुछ और इस अंतर्द्वंद को देखने की कोशिस भी कवि करता है जिसकी ओर गीत जी ने इशारा किया है और जो हमें कुंवर जी में दिखती है. यह लेख खास कर मेरे जैसे व्यक्ति के लिए कुंवर जी ओर उनकी कविताये को समझने के लिए अत्यंत सहयोगी हुआ है ओर शायद इसके द्वारा मै कुंवर जी की लेखनी के अन्य कई आयाम को समझ पाऊ और इस प्रकार एक नया ही क्षितिज खुलता मेरे सामने दीखता है.....इस पोस्ट के लिए अनुराग जी को भी धन्यवाद्.

मनीषा पांडे said...

गीत, बहुत गंभीर और जरूरी लेख। हालांकि मैंने ब्‍लॉग पर आने से पहले ही पढ़ लिया था लेकिन यहां अपनी बात कहना जरूरी है। इस लेख में तुमने कुछ ऐसे सवाल उठाए हैं, जिस पर शायद हिंदी में पहली बार कोई बात हो रही है। जैसे आध्‍यात्मिकता का प्रश्‍न। इस पर तो पूरी एक किताब लिखे जाने की जरूरत है। फिलहाल इस लेख को लिखने और छापने के लिए तुम औ अनुराग दोनों बधाई के पात्र हो।