सबद
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सबद विशेष : ११ : कुंवर नारायण की नोटबुक



[ हिंदी के बारे में चित्र-विचित्र बातें करते हुए आपके सामने जब कुंवर नारायण सरीखे कवि-लेखक का कुछ ( फिर वह उनकी कविता हो, आलोचना हो, कहानी हो ) पड़ जाता है तो आप अपनी धारणाएं बदलने को बाध्य होते हैं. यह एक ऐसा लेखन है जो सोच, विचार और कल्पना के उत्कृष्ट से आपका साक्षात कराते हुए आपको अपनी भाषा में ऐसा संभव होते /देखने /पढ़ने के सौभाग्य, गर्व और संतोष से भर देता है.

सबद विशेष की ११वीं कड़ी में कुंवर जी का अब तक अजाना लेखन : उनकी नोटबुक. सच तो यह है कि पचासेक वर्षों के साहित्य सृजन के सामानांतर लिखे जाने वाले इन नोट्स / जाटिंग्स को कई दफ़ा बज़िद मैंने उनसे लेकर पढ़ा है और एक अपूर्व अनुभव और विचारोत्तेजना से समृद्ध होता रहा हूँ. बहुत आग्रह करने पर उन्होंने कुछ हिस्सों पर काम करने की अनुमति दी. अब इसकी पहली कड़ी यहां है. यह चयन थीमैटिक है, इसलिए वर्ष आदि का उल्लेख नहीं है. इसकी दूसरी कड़ी भी जल्द सामने होगी.

सबद जब शुरू हुआ था तो पहले लेखक कुंवर जी थे, आज जब इसकी २०० वीं पोस्ट लग रही है तो भी कुंवर जी. कहना कम है कि इस बीच वे कितने बड़े संबल रहे. मैं उनके सहित उन तमाम लेखकों और पाठकों के आगे नतशिर हूँ जिन्होंने इसे ज़रूरी प्रकाशन बनाये रखने का हौसला दिया.


प्रसंगवश यह सूचना आपसे बांटी जा रही कि कुंवर जी को साहित्य अकादमी ने अपनी महत्तर सदस्यता से नवाजने का निर्णय लिया है. ]




आधा भी कम नहीं

आधा भी कम नहीं होता, बशर्ते हमें उसे भी पूरी तरह जीने की कला आती हो.

अधूरे तर्क भी बड़े काम के होते हैं, क्योंकि कोई भी तर्क कभी पूरा नहीं होता. अधूरे किस्से, अधूरी खोजें, अधूरी आकांक्षाएं, अधूरे समझौते, अधूरे युद्ध, अधूरे सपने, अधूरे प्रेम, अधूरी ज़िन्दगी...एक पूरा संसार है इनका --उस संसार से कहीं बड़ा और रोचक जिसे हम पूर्णताओं का संसार कहते हैं.

संदेह करना चाहिए कि पूर्णता जैसा कुछ है भी या वह भी एक भ्रम है ? या हम कहीं भी 'समाप्त' लिख कर अपने को समझा लेते हैं कि एक किताब पूरी हुई. मैंने ऐसी कोई भी किताब नहीं पढ़ी है जिसके 'अंत' से एक नई किताब की शुरुआत ना हो सके.
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मुझे शुरुआतें पसंद हैं : उनमें एक उत्साह, उम्मीद और ताज़गी होती है. सब कुछ अंत तक जी डाला जाए यह ज़रूरी तो नहीं. काफी कुछ को अधूरा ही छोड़ कर नई-नई शुरुआतों की ओर लौटना अधिक रोमांचक और आशाप्रद लगता है.
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'उपदेश' जैसे शब्दों से भागने की ज़रूरत नहीं. ये भी 'विचार' करने, देने और पाने के जायज़ तरीके रहे हैं - संवादी तरीके.
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कविता की ताज़गी जब ख़त्म होने लगती है, तब वह सब से पहले भाषा की ओर से सड़ना शुरू करती है.
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कविता, अनुभव और भाषा के साथ एक खास तरह का सलूक करती है. कविता अनुभव की भाषा पर एक दूसरी तरह का चिंतन है.
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कविता 'यथार्थ' के बारे में 'कल्पना' की भाषा में बोलती है. इस तरह यथार्थ और कल्पना के बीच वह एक निकटता बनाती है- दूरी नहीं. हम कल्पना की भाषा में भी यथार्थ के बारे में सोच और बातें कर सकते हैं. इस विरोधाभास को दूर करने में ही कविता ना केवल दर्शन को संभव बनाती है, बल्कि इस आम धारणा को भी खंडित करती है कि कल्पनाशीलता और यथार्थ में कोई बुनियादी विरोध है ही जिसे दूर नहीं किया जा सकता.
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भाषा की बारीकियों को मोटा और भोंडा करके नहीं बल्कि उसकी धार और नोक को एक लगभग पारदर्शी शिल्प द्वारा और भी पैना करके यदि सोचा जाए तो अनुभव और विचारों की ज़मीन को एक पक्का मानवीय आधार दिया जा सकता है.
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शब्द सांकेतिक होते हैं -अमूर्त संकेत- जिनके द्वारा हम वस्तुजगत या उसके बारे में जानकारियों को अपनी कल्पना में ग्रहण करते हैं. संकेतों का तभी कोई अर्थ है जब हम उन्हें किसी सन्दर्भ में व्याख्यायित करते हैं.
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एक माने में शब्द के साथ अब हमारे संबंध बदल गए हैं : अत्यंत परोक्ष जटिल अर्थों में. हम शब्दों से भी उसी तरह के सीधे प्रभावों की उम्मीद करते हैं जैसी बिम्बों से. किसी भी प्रकार के अमूर्त / प्रतीकात्मक / पराभौतिक / चिंतन को लेकर हम धीरज खो देते हैं. तुरंत ठोस, और साकार सम्प्रेषण हम चाहते हैं. वैज्ञानिक तथ्यों के अनुरूप. वह शब्दों की बुनियादी प्रकृति के ही प्रतिकूल है. शब्द चिन्ह मात्र ही नहीं, ऐतिहासिक भी होते हैं जिनके अभिप्रायों को नियम विशेष के अनुसार 'पढ़ना' और 'रचना' होता है. उनके associations और inovations बिम्बों की अपेक्षा अधिक तरल और विस्तृत होते हैं.
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औद्योगिक, व्यावसायिक और तकनीकी दुनिया में जैसे भाषा का मतलब स्थूल हितों से जुड़ता जाता है, भाषा के अत्यंत नाज़ुक संवेदन-तंतुओं का क्षरण होना लाजिम है. कलाओं की भाषा 'व्यावहारिक' नहीं लगती- यह आक्षेप अपने आप में भाषा के अत्यंत सुसंस्कृत पक्ष के प्रति बदसलूकी है.
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पोलिश नाट्य-निर्देशक ग्रोताव्सकी ने एक बातचीत के दौरान कहा था कि कुछ शब्द मुर्दा हो गए हैं, फिर भी हम उन्हें ढो रहे हैं. उनकी जगह दूसरे शब्द रखने भर से काम नहीं चलेगा, क्योंकि उन शब्दों के अर्थ मर चुके हैं. यह बात मानीखेज है. नए शब्दों से अधिक नए अर्थों की खोज ज़रूरी है. इस खोज के लिए साहसिकता और जोखिम उठाते हुए हम अपने लिए ऐसा कुछ पा सकते हैं जिसे दूसरों तक पहुँचाना मूल्यवान हो.

'संस्कृति' शब्द मुझे एक बुरी तरह लुटा हुआ शब्द लगता है : इसे किसी भी अर्थ की दासता स्वीकार है. इसका अपना व्यक्तित्व पूर्णतः विघटित हो गया है. यह अब किसी ऐसी ऐतिहासिकता या जोखिम का परिणाम नहीं मालूम होता जिससे कभी प्राचीन भारतीय, यूनानी, मिस्री या रोमन सभ्यताओं ने गुजरते हुए इस शब्द के रोमांचकारी गौरव मूल्यों को पाया था. आज हम ''मास कल्चर'' या ''जन-संस्कृति'' शब्द को उसके उन ऐतिहासिक अर्थों से छीनते भी हैं. किसी नए अर्थ में उसे समृद्ध नहीं करते.
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12 comments:

अधूरे शब्द गणित की भाषा हुआ करती है ...इस में क्या जोड़ना क्या घटाना क्या गुना करना या क्या भाग देना ,,,ये इंसानी जीवन में बड़ी विचित्र भाषा है ....आप का कहना की आज हम ''मास कल्चर'' या ''जन-संस्कृति'' शब्द को उसके उन ऐतिहासिक अर्थों से छीनते भी हैं. किसी नए अर्थ में उसे समृद्ध नहीं करते....बिलकुल ye शब्द सत्यता की ओढ़नी ओढ़े हुए है .....आप को एक अच्छे नोट को शेयर करेने के लिए धन्यवाद और ....कुंवर नारायण जी को शुभकामनायें !!!!!!!!!!!अनुराग जी ...एक अच्छी व सार्थक व अलग सी बातें इस फेस बुक/ब्लॉग पर आतीं है हो तो मन और दिमाग व विचारों को सुकून भी दे जाती है !!!!!!!धन्यवाद जी !!!!!!!!!!!!!!!1


यक़ीनन उन जैसे लेखक की सूचनाओ की इस भीड़ भरी दुनिया में उपस्थिति आवश्यक है ....जहाँ विचार समाज की भीतरी ओर मनुष्य के मन के विकास के लिए है .....
one of the Gem page!!


आधा भी कम नहीं होता, बशर्ते हमें उसे भी पूरी तरह जीने की कला आती हो. बहुत सुंदर..कुंवर नारायण जी को हर तरह से पढना हमेशा अच्छा लगता रहा है,यह गद्य भी उनकी कविताओं की तरह अद्भुत है


"कविता 'यथार्थ' के बारे में 'कल्पना' की भाषा में बोलती है. इस तरह यथार्थ और कल्पना के बीच वह एक निकटता बनाती है-" इसे हम कविता की अब तक की सबसे प्रामाणिक परिभाषा करार देते हैं ,हम चाहते हैं आज से कविता को इस परिभाषा के माध्यम से जाना जाए |अनुराग आपको बधाई और धन्यवाद भी कुंवर जी को पढाने के लिए


सबद का ये पोस्ट यादगार रहेगा.कुंवर जी के ये नोट जिंदगी को एक ताज़ी हवा देते हैं .कविता को कहने -समझने की बात रेखांकित करने योग्य है .अनुराग भाई को बधाई कि इस तरह की सामग्री साझा कर रहे हैं


कुंवर जी की नोटबुक के ये अंश, किसी गाईडलाइन की माफिक़ काम करते हैं, किसी शब्द की ख़ास ज़रूरत को और किसी को एकदम ही डिसकार्ड कर पाने का बल कुंवर जी जैसे कद वालों के पास ही मिलता है. इतने दिनों से हम सभी अपने लेखन में "संस्कृति" को बड़े ही भरे मन से प्रयोग में ला रहे थे, लेकिन उस मजबूरी का अर्थ आज समझ में आया - "इसे किसी भी अर्थ की दासता स्वीकार है". शब्दों के मुर्दा हो जाने में जो संदेह है, कितना सनसनीखेज़ और ख़ूबसूरत है? इस गद्य में ऐसी बातें मिल रही है, जिन पर आश्चर्यचकित होना लाज़िम है जैसे कविता के नुकसान की शुरुआत होती है भाषा के मरने से. "उपदेश" से न भागना - ये मेरे लिए असहमत होने का एकमात्र बिंदु है. अधियाई हुई चीज़ों से रचित एक सम्पूर्ण तंत्र की आवश्यकता, उन अलग-अलग चीज़ों से ज्यादा होती है. संदेह करना और हो चुके में और होने की संभावनाएं ढूंढना ही, किसी रचना को और आगे ले जा पाने की संभावनाओं पर विचार करना है.


'संस्कृति' शब्द मुझे एक बुरी तरह लुटा हुआ शब्द लगता है : इसे किसी भी अर्थ की दासता स्वीकार है. इसका अपना व्यक्तित्व पूर्णतः विघटित हो गया है. यह अब किसी ऐसी ऐतिहासिकता या जोखिम का परिणाम नहीं मालूम होता जिससे कभी प्राचीन भारतीय, यूनानी, मिस्री या रोमन सभ्यताओं ने गुजरते हुए इस शब्द के रोमांचकारी गौरव मूल्यों को पाया था. आज हम ''मास कल्चर'' या ''जन-संस्कृति'' शब्द को उसके उन ऐतिहासिक अर्थों से छीनते भी हैं. किसी नए अर्थ में उसे समृद्ध नहीं करते.

AB SANSKRITI KI BAATEIN KAHAN... AB JEEVAN SHAILI KI BAATEIN HOTI HAIN... INHE CHAHEN TO AAJ KI SANSKRITI KAH LEIN...


पहली बार पढ़े पर चिन्तन में पगे लगे सारे विचार।


kunwar ji ki Notebook se uddhrit vichar unke kavi-manas ko samjhne ki disha prashasht karte hain.
badhai anurag!

Om Nishchal
Delhi


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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