Thursday, December 09, 2010

रघुवीर सहाय पर व्योमेश शुक्ल



[ यह
आलेख रघुवीर सहाय के हिंदी में होने को सिर्फ़ दर्ज भर नहीं करता. उन्हें याद कर लेना भी इसका अभीष्ट नहीं. यह याद करने की राजनीति और उसके अभिप्राय पर कुछ सवाल ज़रूर खड़े करता है और ऐसा करते हुए पुनः हमारा ध्यान उन समस्याओं की ओर भी ले आता है जो सहाय जैसे कवियों की मूल चिंता में शामिल थे और जिसका बहुत सतही, रवायती और जगहघेरू पाठ हमारे पास उतना ही मौजूद है जितना सहाय जी का नाम-जाप. व्योमेश शुक्ल ने सबद पर इससे पहले मंगलेश डबराल और बिस्मिल्लाह खान पर अपने लेख लिखे थे. इस दफा परिप्रेक्ष्य को सही करते हुए रघुवीर सहाय पर उनका लेख.

दो निजी तथ्यों का उल्लेख गैरज़रूरी न होगा. एक तो यह कि आज सहाय जी का जन्मदिन है और दूसरा, सिर्फ़ ४८ घंटे की शॉर्ट नोटिस पर
'रघुवीर सहाय' पर इतना निरंध्र और निर्भीक गद्य उनको जीनेवाले व्योमेश ही लिख सकते थे. यह सार्वजानिक स्वीकार ही शुक्रिया है. निजी तौर पर इसे जताना मेरे लिए असंभव है. ]


लोग भूल नहीं गए हैं, लेकिन...

इस बात पर यक़ीन करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है कि हमलोग रघुवीर सहाय को नहीं भूले हैं या नहीं भूल जायेंगे; मसलन हम उन्हें बग़ैर यक़ीन के याद करते हैं। यह एक निजी दिक़्क़त है कि तमाम 'साहित्यिक' लोगों से मिलकर, उन्हें देखकर या उनकी बातें सुनकर लगता है कि उन्होंने सहाय जी को पढ़ा नहीं है; मसलन कविता से लगभग आक्रांत एक सभागार में बैठे हुए ऐसा ख़याल विपत्ति की तरह अचानक किसी के ऊपर बरस जाता है कि यहाँ ज़्यादातर लोग रघुवीर सहाय के बग़ैर मनुष्य, समाज या कविता की रचना करने की कोशिश कर रहे हैं. यों, रघुवीर सहाय की अनुपस्थिति के बादल घिरे ही रहते हैं.

ऐसी ही निरी 'साहित्येतर' वजहों से मुझको समाज में और साहित्य की छोटी सी दुनिया में कवि की व्याप्ति या दख़ल की जांच करते रहने का रोज़गार मिल जाता है. ज़ाहिर है कि इन टोटकों से रघुवीर सहाय या किसी की भी कविता के औचित्य या उत्कर्ष का सीधा संबंध बनाना दुश्वार है और समीक्षा की भाषा के स्तर पर उसे सिद्ध कर पाना तो प्रायः नामुमकिन, लेकिन अगर भूलने की राजनीति को मुद्दा बनाया जाये तो वह मुद्दा अपने आप सहाय जी की कविता की राजनीति को रेफ्लेक्ट करने लगेगा. रघुवीर सहाय नाम के नागरिक, संपादक, कवि और दार्शनिक के मुद्दे ऐसे ही जनता में झिलमिलाते हैं.

ऐसे मूल्यों की एक वृहत्तर सूची तैयार की जा सकती है जिनकी जगह भारतीय नागरिक के विवेक में कम होती गई है, लोग जिन्हें भूलते गये हैं. फ़िलहाल वे मूल्य अक्सर मुहावरे की शक्लों में पेश किये जाते हैं. धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता, शोक या करुणा जैसे किसी भी मूल्य को उदाहरण बनाया जा सकता है. वे चमकीले और चंचल बना दिए गये हैं, उनके अनिवार्य सन्दर्भ ओझल हैं और उनके मुहावरेबाज़ प्रयोक्ता ज़्यादा से ज़्यादा जगह घेरने के आकांक्षी. यह साहित्यिक सचाई है और राजनीतिक सचाई है.

मूल्य को मुहावरे में अपदस्थ किये जाने के इस ख़तरे से सहाय जी वाकिफ़ थे. इस विडम्बना का रचनात्मक प्रतिकार क्या हो सकता था ? रघुवीर सहाय कविता की भाषा को अनेकार्थी, तात्कालिक, अवसरानुरूप और यथास्थितिवादी होने से रोकने का संघर्ष करते हैं. वह अनेकार्थता और इस प्रकार आलंकारिकता को कविता का गुण मानने वाले कॉमन सेन्स के सामने खड़े हो जाते हैं. यों वह हिंदी साहित्य संसार के पारंपरिक कॉमन सेन्स में एक रैडिकल रप्चर घटित कर देते हैं. रास्ता कहीं और ही मुड़ और किसी दूसरी ही दिशा में खुल जाता है. वह पुरानी जनता को एक नये कलात्मक व्यवहार के ज़रिये नये समाज, नये मनुष्य और नये विचार के लिये नया कर लेते हैं.

डायलेक्टिक्स का कोलाहल और रचनात्मक व्यवहार में उसका सर्वथा अभाव हिंदी में लगभग एक ही बात है. शोषण की कविता चूँकि घोषित तौर पर लिखी नहीं जाती इसलिए हम शोषण के ख़िलाफ़ लिखी जा रही कविता में ही डायलेक्टिक्स की कमी की शिकायत करने को विवश हैं. दरअसल शोषण के अधिकतम संभव वर्तमान और आगामी रूपों की शिनाख्त के बग़ैर प्रतिकार की नई शक्लें ढूँढना संभव नहीं और शोषण के प्रकारों की खोज - ज़ोर देकर कहा जाना चाहिए - कि हमेशा एक सामाजिक काम है, एक राजनीतिक गतिविधि है. शोषण और शक्ति की अधुनातन सरंचनाओं में घुसे बग़ैर उन्हें ढहाने की आकांक्षा भी कैसे की जा सकती है?

आज की अधिकांश कविता में इन नव्यतम सरंचनाओं में जाने की नीयत, कौशल, सूझ और इच्छाशक्ति का अभाव तो है ही, उसमें इन्हीं वजहों से नारा लगाने और पत्थर चलाने तक के जुनून का अभाव भी है. यानी होश और जोश दोनों की कमी. कला का रहस्य कुछ इस व्यवहार में भी निहित है कि उसमें किसी एक बिंदु पर जोश और होश, कलात्मकता और सामाजिकता जैसे प्रत्यय एक ही हो जाते हैं, इसी बिंदु पर कविता में विचार या कला की कमी का अलग-अलग रुदन करने वाले भी एक-से मसखरे हो जाते हैं.

ख़ैर, शोषण के उपलब्ध रूपों के ख़िलाफ़ उपलब्ध में ही चीख़-पुकार मचाना, अनुभव से साबित है, यथास्थिति की निर्लज्ज अभ्यर्थना के सिवाय कुछ नहीं है. मिसाल के लिये युवा कवि राकेश रंजन की एक कविता हिंदी के आलोचकों की कथित तौर पर भर्त्सना करती है. कविता का आख्याता कहता है कि महानगर चलो, आलोचक वहीँ रहते हैं, हे कवि, उनसे दोस्ती कर लो, तुम्हारा बहुत भला होगा, आदि-आदि. कविता तुकांत है और हिंदी आलोचना के सामान्य कामकाज के बारे में जो असंतोष और निराशा-मिश्रित आम राय है, उसी को वाणी देती है. पूरी कविता समकालीन आलोचना की किसी भी बौद्धिक प्रवृत्ति, अन्याय या अत्याचार के उसके औज़ारों, उसमे शामिल व्यक्तियों या समूहों के ख़िलाफ़ विशेष रूप से कोई टिप्पणी नहीं करती, जबकि शाब्दिक रूप से वह आलोचना का निंदन ही अथ से इति तक कर रही है.

अब यह निंदन - जो उपलब्ध के पिष्टपेषण के सफलतावादी नुक्ते से निकला है, अपने लक्ष्य में इस हद तक सफल है कि ज़माने भर के नामवर सिंह और नन्दकिशोर नवल और परमानंद श्रीवास्तव मज़े से बैठे -बैठे उसे सुनते हैं और काव्यपाठ पूरा हो जाने पर कवि की पीठ ठोंकते हैं. यह कविता अपने विरोध की उपलब्धवादिता और एकांगिता में आलोचना नाम की अन्यायरत ताक़त को लेजीटिमाइज़ करती है. ऐसी कविता का शोषण के प्रकारों की खोज और मीमांसा से दूर का ही रिश्ता है. यह विशुद्ध साहित्यिक कर्म है.

इसके विपरीत रघुवीर सहाय के यहाँ डायलेक्टिक्स रचना के सभी स्तरों पर एक साथ सक्रिय और अंतर्भूत है. समाज और भाषा की डायलेक्टिक्स. रूप और अंतर्वस्तु की डायलेक्टिक्स... मानवीय संबंधों के निर्माण और परिष्कार की डायलेक्टिक्स. नीम के पेड़ के इर्दगिर्द बनी उनकी एक कविता में अंततः पेड़ के पास उसकी महिमा का गुणगान करने कुछ संस्कृतज्ञ जुटते हैं. पूरी कविता दृश्य में अभिव्यक्त होती है लेकिन अन्यायमूलक यथास्थिति के नये प्रकार तक अपने पाठक को पहुँचाती है.

आज रघुवीर सहाय की दुविधाएँ भी रचनात्मक तौर पर बड़ी लगती हैं. उनकी उपलब्धियों के बग़ैर तो हिंदी कविता अपने भविष्य में दाखिल ही नहीं हो सकती. अपने समय अर्थात नेहरु युग और उसके ठीक बाद के दौर की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को सहाय जी कितने विशाल फलक पर प्रोब्लेमेटाइज़ करते हैं और भाषा और शिल्प की पिछली समस्त चुनौतियों को एकबारगी पार करते हुए नये लक्ष्य सामने रखते हैं. आज जिन बातों बिलावजह मुद्दा बनाने की कोशिश हो रही है, उनके कितने सशक्त समाधान सहाय जी की कविताओं में निहित हैं ,'' अरे अब ऐसी कविता लिखो कि जिसमे छन्द घूमकर आए '' में छन्द और अछन्द, प्रगति और प्रयोग, लघु और गुरु जैसे विभाजन किस तरह ओछे और निरर्थ हो जाते हैं.

रघुवीर सहाय ने हिंदी कविता को धर्मनिरपेक्षता, नागरिक अधिकार, लोकतंत्र, बराबरी और अंततः सारे संघर्ष एक साथ करते हुए भाषा के मोर्चे पर ही खपने जैसी प्रतिश्रुतियाँ दी हैं. जब तक इन संकल्पों के सामने आने खतरों की पहचान का विवेक ओर उनके विश्लेषण का माद्दा हममें हैं तब तक कवि जीवित है और उसे भूला भी नहीं गया है.

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13 comments:

विमलेश त्रिपाठी said...

बढ़िया पीस... आभार आपका

सोनू said...

डायलेक्टिक्स को हिंदी में द्वंद्ववाद कहते हैं। मेरे अंदाज़े से, संस्कृत में द्वंद्ववाद समेत तर्कशास्त्र पर काफ़ी साहित्य है। एक उदाहरण वात्सयायन के न्यायसूत्रभाष्य को बता सकता हूँ।

http://en.wikipedia.org/wiki/Dialectic

हिंदी विकिपीडिया का आलेख।

शैलेन्द्र नेगी said...

सहाय जी के लेखन के बारे में जानने के लिए व्योमेश जी का ये लेख काफी है. सुंदर लेख के लिए बधाईयाँ.

मृत्युंजय said...

व्योमेश भाई, शुक्रिया.
कुछ बेतरतीब बातें-

क. रघुवीर सहाय के संग्रह 'लोग भूल गए हैं' की भूमिका (82 ) से - "...आज अन्याय और दासता की पोषक और समर्थक शक्तियों ने मानवीय रिश्तों को बिगाड़ने की प्रक्रिया में वह स्थिति पैदा कर दी है कि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले जन मानवीय अधिकार की अपनी हर लड़ाई को एक पराजय बनता हुआ पा रहे हैं. संघर्ष की रणनीतियां उन्हीं के आदर्शों की पूर्ति करती दिखाई दे रही हैं, जिनके विरुद्ध संघर्ष है, क्योंकि संघर्ष का आधार नए मानवीय रिश्तों की खोज नहीं रह गया... जहां तक ह्रदय का सवाल है, कम से कम मुझे दृढ आस्था है कि लोग न्याय और बराबरी के जन्मजात आदर्श को नहीं भूलते : इतिहास के किसी दौर में कुछ लोग अवश्य इन्हें भूल जाते हैं पर इन्हें याद कराने के लिए उनसे कहीं बड़ी संख्या में मनुष्य जीवित रहते हैं."

ख. मुहावरे तो भाषा की जान होते हैं, ऐसा सुना था. मूल्यों को मुहावरे में बदल दिया जाना, क्या सिर्फ चंचल और चमकीला बना दिया जाना है? क्या सत्ता और जनता के मुहावरे एक जैसे हो गए हैं? मुहावरे अगर सत्ता की भाषा में गढे जाएँ तो ही उनकी शक्ति को उलटी दिशा दी जा सकती है. अभी तक तो वे मुहावरों से वे डरते ही थे. तो क्या हमारी भाषा, कमजोर भाषा, दुहाजू की बीबी हिन्दी भी अब हमारी नहीं रह गयी? इस दौर में क्या उसकी सारी शक्ति पर सत्ता का वर्चस्व हो गया है? पूरा पूरा ऐसा हो गया हो, मुझे नहीं लगता भाई, नहीं तो हम लिखेंगे क्या? खायेंगे क्या, और क्या तो लेकर परदेश जायेंगे?

ग. डायलेक्टिक्स की खूब कही! किसे पडी है इतने पुराने हथियार की? हिन्दी कविता रक्षात्मक लड़ाई के लिए जान दिए (!) जा रही है, और आप हैं कि ... 'कहते हैं कविता की है'!
और रही शोषण के नए रूपों के खिलाफ नए हथियारों की बात, तो ये है भाई कि कविता एक सकर्मक इलाका है, पहले लड़ते थे, बदलते थे, कविता पक्षधरता के साथ विरोध कर्म थी. फिर बचाने लगे, कविता राजनीति से सीधे मिलने में डरने लगी. फिर तो 'युग आया कीर्ति व्यवसायी, लाभकारी कार्य में से धन, व धन अभिभूत अंतःकरण में से सत्य की झाईं'' भी दिखानी बंद हो गयी. कविता ने याद की राह पकड़ी. ये यादें संघर्षो की न थीं, यादों की बरात दिल के द्वारे से निकल रही थी, कुछ ऐसा ही तमाशा था. 'मल्ल मल्ल की मारें' थीं, 'निशाने चूक चुके थे', जिनकी 'केवल धार' थी, उनका 'पुतली भर संसार' रह गया था. फिर तो 'यह तो हम लिखते हैं, पर उस व्यक्ति में हैं जो शब्द वे हम जानते नहीं, जो शब्द हम जानते हैं, उसकी अभिव्यक्ति नहीं विज्ञापन हमारा है.'

घ. मानवीयता तलाशते तलाशते हम कहाँ से कहाँ आ गए दोस्त !
माओ त्से तुंग के चर्चित भाषण की सीख याद आती है - आप पेड़ देखते हैं, जंगल नहीं! या जंगल देखते हैं, पेड़ नहीं! दोनों को एक साथ देखना ही पूरा देखना है. 'क्षुधार राज्ये पृथ्वी गद्योमय', 'कच्चे हरे खीरे सी रुक्मिनी' और उसके भाई की सरपतों से बिंधी देह को देखना है.

य. राकेश की वह कविता जिसका जिक्र आपने किया, वह तो मैनें पढी नहीं, पर आपने कविता की जो कसौटियां नीचे गिनाई हैं, उनपर कसने से बहुत कम ही कवितायें बचेंगी, और इसमें महान कवि भी पिस जायेंगे. रघुवीर सहाय की कविता को इनसे-उनसे लड़ाने की क्या जरूरत.

र. जहां तक रघुवीर सहाय की खुद की कविता की बात है, छंद का उन्होंने इस्तेमाल किया, न उससे बचे और न ही उसमें गिरे. ये चुनौती तो हम लोगों के भी आगे है. ओछे और निरर्थक कहने से क्या हासिल? क्या मैं यह मानूं कि आप छंदों की ताकत को नहीं मानते? ऐसा होना तो नहीं चाहिए, क्यूंकि ऐसा हुआ तो 'रामदास' की ट्रेजडी की ताकत का एक महत्वपूर्ण आधार आपसे छिन जाएगा.

गलत सही क्या क्या लिखा, पता नहीं पर कभी फुरसत से इन सब पर और बात हो तो शायद मैं और कुछ सीख सकूं. ऐसी उम्मीद है, और दुनिया, कहना ही चाहिए, इसी पर कायम है.

'उदय' said...

... prasanshaneey abhivyakti !!!

Brajesh pandey said...

व्योमेश शुक्ल ने इस लेख के माध्यम से जिस प्रकार रघुवीर सहाय के लेखन को वर्तमान लेखकीय और सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य से गुंथा है ,उसे उपलब्धि मानते हुए ये कह भर देना ही पर्याप्त नहीं होगा की ये वर्तमान की कविता के लिए एक दिशा निर्देश है ,बल्कि ये कविता को चमकीले मूल्य से इतर जीवन के धूसर मूल्यों की और भी हाथ दिखाता नजर आता है.आज की आलोचना पर राकेश रंजन को उद्धरित किया जाना महत्वपूर्ण है.अनुराग भाई अच्छी प्रस्तुति हेतु बधाई.

प्रवीण पाण्डेय said...

व्यक्तित्व व कृतित्व के पक्ष जानकर परिचय और बढ़ गया।

durgesh said...

mujhe jaise anpadh aadmi ka gyan bahut badh gaya..anurag jee ki timing bahut umdaa hai..aur relevent bhi..sahitya mein timing..nayee sankalpna hai..sabad padhkar man ullasit ho jata hai..vyomesh jee ka aabhar..jinhone sahay jee ke is pahlu ke bare mein avgat karaya..badhaaye..

sameer yadav said...

रघुवीर सहाय मेरे पसंदीदा साहित्यकार हैं. लेख ने उनके प्रति प्यार बढ़ाया ही है.

नवनीत पाण्डे said...

आज की कविताओं के संदर्भ में व्योमेश जी की राय से असहमत होते हुए उनकी रघुवीर सहाय की कविता के बारे निष्कर्ष व आलोचना की दयनीय स्थिति का आकलन गज़ब है

मान जाऊंगा..... ज़िद न करो said...

bahut badhiya... anuragji... raghuweer jee ke baare mein jaankaari aur badh gayee... aabhaar aapkaa...
aakarshan

सुनील गज्जाणी said...

सहाय जी के लेखन के बारे में जानने के लिए व्योमेश जी का ये लेख काफी है. सुंदर लेख के लिए बधाई

शरद कोकास said...

बढ़िया आलेख ।