Sunday, December 05, 2010

आज पहली और आखिरी बार 2010 की 6 दिसंबर है !



अयोध्या, 1992
कुंवर नारायण

हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !

तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर - लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है.

इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
'मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं
चुनाव का डंका है !

हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान - किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक ....
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !
****


{ कविता प्रकाशित करने की अनुमति देने के लिए हम कुंवरजी के अत्यंत आभारी हैं. साथ में दी गई चित्र-कृति सिंडी वॉकर की है.}

18 comments:

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

कितनी विडम्बनाओं को इकट्ठा रखती कविता है यह !
हमारे समय ने अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी नहीं छोड़ा , विज्ञान तो बृहद स्वार्थ का सहचर बना ही ( शायद पूजीवाद-साम्राज्यवाद का हथियार कहूँ तो गलत क्या , हाँ हथियार भर नहीं तथापि ..) , उसी के समानातर मिथक-पुराण-चरित्र आदि भी स्वार्थ की वेदी पर गिरवी रखे गए , राम-चरित्र-काव्य तो इसका बड़ा उदाहरण है ! सबसे बड़ी विडम्बना कि इन मिथकों पर 'सोचने' के लिए जनता के पास समय नहीं , कोई चेताने वाला नहीं जबकि आकाओं के पास 'भंजाने' के खूब समय हैं . ऐसे समय में बौद्धिक वर्ग ने भी मिथकों को लेकर कितनी जागरूकता दिखाई ? / !!

सुखद आश्चर्य है कि ऐसे समय में इस कविता की उपस्थिति कविता की ताकत का एहसास करा रही है ! इस कविता की एक खासियत यह भी है कि गूढ़ सांस्कृतिक-राजनीतिक अर्थों के मर्म को बड़ी सरलता से और सरल भाषा में हमारे सामने रख रही है !

आभार !!

Niranjan Shrotriya said...

कुंवर जी के कहने का अंदाज़ ही निराला है! इसे एक बार और पढ़ना प्रीतिकार लगा! अत्यंत प्रभावी कविता!

fisaddi said...

nice

समीर यादव said...

रचना नए प्रतीकों के साथ दिल को छूती है. हाँ "अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं योद्धाओं की लंका है" ..... में अयोध्या की वर्तमान स्थिति पर लंका प्रतीक तो सटीक है किन्तु "योद्धाओं" की लंका क्यों ? आज कोई ऐसा "योद्धा" नहीं जो किसी शुचितापूर्ण उद्येश्य को लेकर लंका रूपी अयोध्या में लड़ रहा हो, इन्हें छापामारों/अवसरवादिओं की लंका कहना उचित होगा. आभार.

सुशीला पुरी said...

savinay nivedan hai PRABHU !!!!!

Fauziya Reyaz said...

ohhhhhh

ab ye bhool bhi jaaiye...bahut huaa

Farhan Khan said...

ye mujhe ek adhbhut kavitaa ke saath aisaa lagtaa hai jaise kisee kisee pavitra dharm granth se leye shabd yaa Gita or Quran ka sabaq ek sabaq hai....

A tons of thanks for sharing this poem today....

Travel Trade Service said...

इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य
इस कविता की उपस्थिति कविता की ताकत का एहसास करा रही है ! ....बहुत सुन्दर विवेचन आप की एक सुन्दर रिदय्न्गम शब्दों की कविता आज के परिपेक्ष्य में ....धन्यवाद आप का इस सुन्दर कविता से परिचय कराने का ...सादर

Brajesh pandey said...

bahut sadgi se gudh baton ko kahti ye kavita apni prasangikta aaj bhi rakhe hue hai,rajneeti ke chehre ko samne lakar aaj ki vastusthiti pr satik tippani hai .anurag bhai bahut dhanyavad,samyanurup prastuti hetu.

डॉ .अनुराग said...

अमरेन्द्र की टिप्पणी के बाद कहने को कुछ शेष नहीं रह जाता है ........सिवाय शुक्रिया के.....

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी सुन्दर काव्यात्मक अभिव्यक्ति।

मान जाऊंगा..... ज़िद न करो said...

bahut barhiya......

'उदय' said...

हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !
... bahut khoob ... behatreen abhivyakti !!!

गीता पंडित (शमा) said...

जी हाँ....
कविता शब्दों से बाहर निकलकर बोल रही है...आभार...


बमों और बंदूक की भाषा, से कब होती खुशहाली,
कहो लेखनी जो भी कहना तुम सबके मन की माली|


-- गीता पंडित

डॉ. नूतन - नीति said...

अनुराग जी ! कुंवर नारायण जी कि यह कविता बेहद अच्छी लगी .. कल मैं इसका लिंक चर्चामंच पर रखूंगी .. आपका आभार .. http://charchamanch.blogspot.com .. on dated 17-12-2010

अनुपमा पाठक said...

aabhar is prastuti ke liye!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सारगर्भित रचना ...

Meenu Khare said...

अत्यंत सशक्त.आभार.