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Showing posts from December, 2010

कोई खिड़की नहीं

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(उर्फ़ कैब में प्‍यार)
उसके आने से वह जगह घर बन जाती

घर बनना शिकायत से शुरू होता और हंसी पर ख़त्म
शिकायत यह कि 'बाहर की तेज़ हवाओं से मेरे बाल बिखर जाते हैं'
और हंसी इस बात पर कि 'इतना भी नहीं समझते'

हंसी की ओट में लड़के को शिकायत समझ में आती
और यह भी कि लड़की की तरफ़ से यह दुनिया से की गई
सबसे जेनुइन शिकायत क्यों है

फिर शिकायत के दो तरफ़ शीशे की दीवार उठ जाती
और हालांकि दीवार में तो एक खिड़की का रहना बताया जाता है,
१२ किलोमीटर के असंभव फैलाव और अकल्पनीय विन्यास में
उसके आ जाने भर से रोज़- रोज़ आबाद
घर की दीवार में कोई खिड़की नहीं रहती

बाहर रात, सड़क, आसमाँ और चाँद-तारे रहे होंगे,
भीड़, जाम, लाल या हरी बत्तियां भी,
इस घर में तो लड़के का अजब ढंग होना और
लड़की की आंखों में शरीफ काजल ही रहा.

बाहर का होना
घर टूटने के बाद याद आया :
दोनों को
अलबत्ता बहुत अलग-अलग.
****

(इसके पहले की कविता देखें यहां
तस्‍वीर : मधुमिता दास)

स्‍वगत : ६ : गीत चतुर्वेदी

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[ यह, यानी आप जो आगे पढ़ने जा रहे हैं, कुंवर नारायण सरीखे कवि की उपस्थिति का महज खाका नहीं है, इसलिए यह सहज ही उस रीडिंग से भिन्न है जो कुंवर जी पर और उनसे परे आपके ज़ेहन में आलोचना के नाम पर पुख्ता है. यह आलोचना की 'हिंदी-हदबंदी' से बाहर शुरू हुआ है. इस तरह इसे पढ़ने का 'हिंदी-बाहर' ढंग करार दिया जाये तो अचरज नहीं. लेकिन अगर यह वह है भी तो आसानपसंद लोगों के उन अर्थों में नहीं, जो विदेशी साहित्य-सन्दर्भ या लेखक का नाम आदि देख कर ही  कुपित हो जाते हैं. यह अपनी भाषा के जेठे कवि की कविता को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का जतन है : अतः  ध्यान और धीरज का गद्य है. इसमें अगर न के बराबर सुना-सुनायापन है तो इस वजह से क्योंकि इसके लेखक ने अपने काव्य-पुरुष की प्रदत्त समझ को नेपथ्‍य में छोड दिया है. आलोचना में सुमिरन को कितना महत्व दिया जाता रहा है, काश कि ऐसा दुर्लभ 'छोड़ना' भी उसमें कभी-कभार घटित होता ! ]     

एक कवि की जेनेसिस और रिवर्स जेनेसिस
रूसी भाषा के कवि जोसेफ ब्रॉडस्की ने थॉमस हार्डी पर एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया था कि इतने बरसों बा…

स्वगत : ५ : कुंवर नारायण

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साहित्य एक समानांतर इच्छालोक रचता है

साहित्य अकादमी द्वारा दी जानेवाली ''महत्तर सदस्यता'' उत्कृष्ट साहित्य-लेखन को सम्मानित करती है. मेरे लिए इस मान्यता का सबसे मूल्यवान अंश ''उत्कृष्टता'' में विश्वास है, जिससे मुझे अपने लेखन और जीवन में भी, बराबर प्रेरणा मिलती रही है. अकादमी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए मैं इस सम्मान को सादर स्वीकार करता हूँ.
वह बीसवीं सदी का चौथा दशक था जब मैंने साहित्यिक होश संभाला. वही दूसरे महायुद्ध के शुरुआत और अंत का दशक था. ''भारत छोडो'' आन्दोलन और भारत की आज़ादी का दशक था. और आज़ादी के साथ ही भारत-विभाजन की भयानक सांप्रदायिक हिंसा और गाँधी की हत्या का दशक था...इन घटनाओं का मैं मूक साक्षी मात्र नहीं था : एक ऐसे संयुक्त परिवार का सदस्य था जो आज़ादी की लड़ाई से परोक्ष किंतु घनिष्ठ रूप से जुड़ा था. यही मेरे हिंदी साहित्य में प्रवेश का भी समय था -- लगभग १९५० के आसपास. उस समय को सोचते हुए कुछ शब्द स्मृति में तेज़ी से गूंजने लगते हैं --''आधुनिक'', ''प्रगतिशील'', ''प्रयोगवाद&#…

सबद विशेष : ११ : कुंवर नारायण की नोटबुक

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[ हिंदी के बारे में चित्र-विचित्र बातें करते हुए आपके सामने जब कुंवर नारायण सरीखे कवि-लेखक का कुछ ( फिर वह उनकी कविता हो, आलोचना हो, कहानी हो ) पड़ जाता है तो आप अपनी धारणाएं बदलने को बाध्य होते हैं. यह एक ऐसा लेखन है जो सोच, विचार और कल्पना के उत्कृष्ट से आपका साक्षात कराते हुए आपको अपनी भाषा में ऐसा संभव होते /देखने /पढ़ने के सौभाग्य, गर्व और संतोष से भर देता है.

सबद विशेष की ११वीं कड़ी में कुंवर जी का अब तक अजाना लेखन : उनकी नोटबुक. सच तो यह है कि पचासेक वर्षों के साहित्य सृजन के सामानांतर लिखे जाने वाले इन नोट्स / जाटिंग्स को कई दफ़ा बज़िद मैंने उनसे लेकर पढ़ा है और एक अपूर्व अनुभव और विचारोत्तेजना से समृद्ध होता रहा हूँ. बहुत आग्रह करने पर उन्होंने कुछ हिस्सों पर काम करने की अनुमति दी. अब इसकी पहली कड़ी यहां है. यह चयन थीमैटिक है, इसलिए वर्ष आदि का उल्लेख नहीं है. इसकी दूसरी कड़ी भी जल्द सामने होगी.

सबद जब शुरू हुआ था तो पहले लेखक कुंवर जी थे, आज जब इसकी २०० वीं पोस्ट लग रही है तो भी कुंवर जी. कहना कम है कि इस बीच वे कितने बड़े संबल रहे. मैं उनके सहित उन तमाम लेखकों और पाठकों के आगे…

रघुवीर सहाय पर व्योमेश शुक्ल

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[ यह आलेखरघुवीरसहाय के हिंदी में होने को सिर्फ़ दर्ज भर नहीं करता. उन्हें याद कर लेना भी इसका अभीष्ट नहीं. यह याद करने की राजनीति और उसके अभिप्राय पर कुछ सवाल ज़रूर खड़े करता है और ऐसा करते हुए पुनः हमारा ध्यान उन समस्याओं की ओर भी ले आता है जो सहाय जैसे कवियों की मूल चिंता में शामिल थे और जिसका बहुत सतही, रवायती और जगहघेरू पाठ हमारे पास उतना ही मौजूद है जितना सहाय जी का नाम-जाप. व्योमेश शुक्ल ने सबद पर इससे पहले मंगलेश डबराल और बिस्मिल्लाह खान पर अपने लेख लिखे थे. इस दफा परिप्रेक्ष्य को सही करते हुए रघुवीर सहाय पर उनका लेख.

दो निजी तथ्यों का उल्लेख गैरज़रूरी न होगा. एक तो यह कि आज सहाय जी का जन्मदिन है और दूसरा, सिर्फ़ ४८ घंटे की शॉर्ट नोटिस पर 'रघुवीर सहाय' पर इतना निरंध्र और निर्भीक गद्य उनको जीनेवाले व्योमेश ही लिख सकते थे. यह सार्वजानिक स्वीकार ही शुक्रिया है. निजी तौर पर इसे जताना मेरे लिए असंभव है. ]


लोग भूल नहीं गए हैं, लेकिन...

इस बात पर यक़ीन करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है कि हमलोग रघुवीर सहाय को नहीं भूले हैं या नहीं भूल जायेंगे; मसलन हम उन्हें बग़ैर यक़ीन के याद क…

आज पहली और आखिरी बार 2010 की 6 दिसंबर है !

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अयोध्या, 1992 कुंवर नारायण
हे राम, जीवन एक कटु यथार्थ है और तुम एक महाकाव्य !
तुम्हारे बस की नहीं उस अविवेक पर विजय जिसके दस बीस नहीं अब लाखों सर - लाखों हाथ हैं, और विभीषण भी अब न जाने किसके साथ है.
इससे बड़ा क्या हो सकता है हमारा दुर्भाग्य एक विवादित स्थल में सिमट कर रह गया तुम्हारा साम्राज्य
अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं योद्धाओं की लंका है, 'मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं चुनाव का डंका है !
हे राम, कहां यह समय कहां तुम्हारा त्रेता युग, कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम कहां यह नेता-युग !
सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ किसी पुरान - किसी धर्मग्रन्थ में सकुशल सपत्नीक .... अबके जंगल वो जंगल नहीं जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक ! ****


{ कविता प्रकाशित करने की अनुमति देने के लिए हम कुंवरजी के अत्यंत आभारी हैं. साथ में दी गई चित्र-कृति सिंडी वॉकर की है.}

पुस्तकों से बनता जीवन

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{ वे दिल्ली के आरंभिक दिन थे .सीखने, पढ़ने, प्रेम और काम करने के भी. फिर पता नहीं कब ये सब एक हो गए. जैसे कई लड़कियों के लिए उमड़नेवाला कैशोर्य प्रेम किसी एक पर टिक जाता है, कुछ उसी तरह. ऐसे यहां जीना शुरू हुआ और इसे बेहतर संभव करने में पीसीओ में खड़े होकर कई हफ़्तों तक की गई लेखकों/ कलाकारों/ विचारकों से बातचीत भी शामिल थी. आगे पसंदीदा किताबों पर एकाग्र उनकी बहुवर्णी टिप्पणियां दी जा रही हैं. फिल्मों, जगहों आदि के बारे में फिर कभी. इन्हें पुराने कागजों से छांटते वक़्त जिनके हाथ का मैं बना हुआ हूँ, उन्हीं राजेंद्र धोड़पकर की याद आती रही और इसीलिए यह पोस्ट उनको समर्पित है. इसके अलावा मसीहगढ़ और जामिया कॉलेज के उन टेलीफ़ोन बूथ वाले सदय भाइयों को भी जिनके सामने न जाने कितनी दफ़ा ऐसी बातचीत के दरम्यान जेब के पैसों से ज़्यादा वक़्त निकल जाता था और वे उधार भले बढ़ाते रहे थे, पर न तो कभी टोका न ही याद दिलाई.
स्पष्ट करना ज़रूरी है कि राजेन्द्र जी के यहां लिखे जाने वाले कॉलम का तक़ाज़ा था कि किसी एक किताब/फिल्म/जगह आदि पर ही बातचीत हो. लेकिन इसमें न तो मैं सफल होना चाहता था न जिनसे बातें होती थी वे…