सबद
vatsanurag.blogspot.com

कथा : २ : हिमांशु पंड्या की कहानी



Image : Rajesh R. Nair
पञ्च परमेश्वर : भाग दो

एक समय की बात है .एक गाँव था ,गाँव का नाम था खारिया खंगार .गाँव में एक मनुष्य रहता था जिसका नाम था हू. हू के पास एक बकरी थी .बकरी क्या थी ,पूरे गाँव की शान थी .सालाना बकरी मेले में उसे पुरस्कार भी मिला था .हू को वह बकरी बहुत अजीज़ थी .सुनहरा पीला रंग,पुष्ट शरीर,उसके कान के रोयें सुनहरी आभा बिखेरते थे और जब वह इठलाकर बोलती ,"म्है है है... "तो लगता मानो किसी प्रेमिका ने आवाज़ लगाई हो .

....पर एक बात थी .उस बकरी के खुर टेढ़े थे .सामान्य बकरियों से थोड़े अलग (गो कि इससे उसकी चाल बाधित नहीं हुई थी बल्कि उसमें चार चाँद लग गए थे). गाँव के कुछ लोगों को वह बकरी अपशकुन लगती थी .उन्हें लगता था कि इसका मूल कारण यह था कि उस बकरी की नस्ल में कुछ संकरता थी.वे उसे गाँव के लिए श्राप मानते थे और गाँव पर यदा कदा आयी आपदाओं के लिए उसे जिम्मेदार मानते थे .

धीरे धीरे इन लोगों का विरोध बढ़ता गया और यहाँ तक पहुचा कि उस बकरी की मौत ही गाँव की भलाई का एकमात्र हल थी .इन्हीं लोगों द्वारा दावा किया गया कि दरअसल उस बकरी पर असली हक क्वै का था क्योंकि बकरी के परदादा दरअसल क्वै के परदादा के बकरे थे .इसे जांचने का कोई ठोस आधार नहीं था क्योंकि हू की बकरी की परदादी के जमाने में गाँव में कई बकरे थे और अब पितृत्व की पहचान करना असंभव था .

क्वै और उसके साथियों ने आसपास के चालीस गावों में मुनादी करवाई कि यदि हू अपनी बकरी उसे नहीं सौपंता तो वे इकठ्ठे होकर उसकी बलि का अनुष्ठान करेंगे .गाँव नए सिरे से बसा ,उसके बाद से बलि प्रथा गैरकानूनी थी और वैसे भी बकरी हू की थी सो वो निश्चिन्त था कि गाँव मिलकर इस बलि को नहीं होने देगा .

...बलि हुई .खूब तंत्र मंत्र अनुष्ठान हुए .बड़े बड़े तांत्रिक ओझा आये जिन्होंने बकरी के वध के ऐतिहासिक महत्त्व को बताया और बताया कि आज एक ऐतिहासिक गलती सुधार ली गयी है .खुद बकरी को भी पता नहीं था कि वह पूरे गाँव की शान्ति और सद्भाव के लिए इतना बड़ा खतरा थी .जब उसे वधस्थल पर खडा कर उसके साथ जुड़े श्राप की महागाथा सुनाई गयी तो जवाब में बकरी ने एक ही बात कही -"म्है है है... "

असली लड़ाई बकरी की मौत के बाद शुरू हुई .अनुष्ठान समिति अपने यज्ञस्थल पर इस यज्ञ और पौरोहित्य की गाथा वाला एक स्मारक चाहती थी जबकि हू की चाह थी कि यहाँ उसकी प्यारी बकरी की याद में एक स्मारक बने .
इसके बाद की कहानी दंतकथाओं के इतिहास में बदल जाने की कहानी है .पंचायत ने फैसला दिया कि यह बकरी क्वै की ही थी क्योंकि गाँव के सब लोग मानते थे कि हू की बकरी के परदादा क्वै के बकरे थे .पंचायत के फैसले में बलि का कोई ज़िक्र नहीं था और पंचायत का यह दावा कि -सारा गाँव यह मानता है -भी खासा संदेहास्पद था .एक और समय पर, एक और मसले में जब यह कहा गया था कि पूरा गाँव ऐसा मानता है तो उस गाँव के एक पुराने शायर पाश ने कहा था कि मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो .

हू का बेटा ध्री इससे खासा बेचैन था .उसे बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा था कि सारे गाँव के कहने से उसकी बकरी की बलि जायज़ कैसे हो गयी जबकि गाँव में बलि गैरकानूनी थी ! गाँव खामोश था .एक आम राय थी कि जो हुआ सो हुआ ,कम से कम अब तो शान्ति है ,आखिर वधस्थल के कोने में हू को भी छोटी सी जगह दे ही दी गयी थी .सबसे बड़ी बात जो हर हलके से कही जा रही थी -आखिर वो एक बकरी ही तो थी !

ध्री के लिए वह सिर्फ बकरी नहीं थी .उस बकरी की उम्र ध्री के बराबर ही थी , वह उस बकरी के साथ खेलकर ही बड़ा हुआ था .उसे बकरी के साथ की सारी किलकारियां ,अठखेलियाँ याद थीं और उससे भी ज्यादा उसे उसका क़त्ल याद था .वह पंचायत से चीखचीख कर कहना चाहता था कि अब जब जब उसे अपनी बकरी याद आयेगी उसका क़त्ल भी याद आयेगा और आज शायद पंचायत उसके हत्यारों को सजा देकर उस क़त्ल की कड़वी यादों से उबरने का उसे मौका दे सकती थी लेकिन उसके क़त्ल पर चुप्पी साध लेने से अब वह क़त्ल उसके जेहन में अमिट रूप से अंकित हो गया था . ध्री चीख चीख कर कहना चाहता था कि बकरी का क़त्ल तब नहीं हुआ था बल्कि अब पंचायत ने उसका क़त्ल कर दिया था पर उसकी बात समझने वाला कोई नहीं था .आखिर वह एक बकरी ही तो थी ,पूरे गाँव की शान्ति और सद्भाव से बढ़कर तो न थी .

ध्री लगातार इधर उधर भटकता रहता .उसे लगता कि आज तक जिन बातों पर उसका ध्यान नहीं गया था वहां भी बहुमत सच और झूठ का फैसला कर रहा था .गाँव के बाहर ३७० गज दूर लो के ऊपर पूरे गाँव के कपडे धोने की जिम्मेदारी डाल दी गयी थी क्योंकि नदी का वो कोना सबसे साफ़ था .कुछ ताकतवर लोग नदी को रोक कर गाँव के गरीबों को पानी से महरूम कर रहे थे और गाँव की पंचायत ने उनकी गुहार अनसुनी कर दी थी . गाँव के बाएं कोने में सात बहनें जमींदार और उसके गुंडों के बलात्कार का शिकार हो रही थीं .गाँव कुछ तो जानकारी के अभाव में और कुछ सहमकर चुप था पर अब तो गाँव की पंचायत ने भी मुहर लगा दी थी कि कि लोगों के मानने से ही तय होगा कि क्या सही है और क्या गलत .कौन थे ये लोग और किसकी थी ये पंचायत ? ध्री को लगता कि गाँव की खाप पंचायत की यह बात भी अब मान लेनी होगी कि कोई अपनी मर्जी से न प्रेम कर सकता है न शादी . तांत्रिक और ओझा गाँव के भाग्य निर्धारक हो गए थे .

एक अंधेरी शाम ध्री ने गाँव को छोड़ देने का फैसला किया .हू के रोकने का उसपर कोई असर नहीं पडा .असल में हू के अलावा उसे रोकने वाला कोई था भी नहीं .जो कुछ लोग उसे रोकना चाहते थे उनके पास उसे रोकने की कोई ठोस वजह नहीं बची थी .उनके पास ध्री के सवालों के जवाब नहीं थे .

दरअसल खारिया खंगार अब वह खारिया खंगार बचा भी नहीं था .जब पञ्च अलगू चौधरी और जुम्मन शेख होते थे तब उस गाँव की फिजा और ही थी , आज की पंचायत में वैसे पञ्च नहीं थे .वे लोग जो ध्री के सवालों के जवाब नहीं दे पाए उन्होंने जवाब अब कहीं और तलाशने शुरू कर दिए थे .गाँव में इसके निशाँ दिखने लगे थे .गाँव के बाहरी कोने पर लगा एक पोस्टर इसकी गवाही देता था .पोस्टर पर लिखा था ," pity the nation that needs to jail those who ask for justice ,while communal killers, mass murderers, corporate scamsters, looters,rapists, and those who prey on the poorest of the poor , roam free ."

****

(१२-१३ नवम्बर,२०१० को उदयपुर में मीरा कन्या महाविद्यालय और सुखाडिया विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में एक सेमीनार हुआ था -'विज्ञान,समाज और स्वतंत्रता '। इसमें पर्चे के रूप में यह कहानी पढी गई थी । पर्चा प्रज्ञा जोशी और हिमांशु द्वारा संयुक्त रूप से पढ़ा गया था । अलबत्ता , इसे हिमांशु की पहली प्रकाशित कहानी मानने में कोई हर्ज़ नहीं। इस स्तंभ में पहले आप उदयन वाजपेयी की कथा-कृति पढ़ चुके हैं। ऊपर का चित्र यहां से। )
20 comments:

भाई बधाई।
रूपक के रूप में लिखी ये कथा रोचक होने के साथ ही एक देश का दर्द बयान करती है। हां, पाश का लोकल गांव का शायर होना उदय प्रकाश की किस्‍सागोई की नकल सा लगता है।


भाई बधाई।
कहानी का रूपक रोचक होने के साथ ही देश का दर्द भी बयान करता है।
लेकिन पाश को लोकल शायर बताना उदय प्रकाश की किस्‍सागोई की नकल सा लगता है। वहां पर एक शायर का उसका नाम लिए बगैर भी विरोध दर्ज हो सकता है।


और उदय प्रकाश जी ने किस्‍सागोई की उस शैली की नकल कहां से की है, नवनीत जी यह भी बता जाएये....


भाई अशोक, इतना ज्‍यादा पढ़ाकू कभी नहीं रहा कि हर कतर ब्‍योंत को सहेजता र सकूं। निगोडी नौकरी इतना समय भी नहीं देती। हां ये तो तय है कि ये उदय जी के पास वाया हिमांशु तो हरगिज नहीं पहुंची होगी।


हिमांशु जी, कहानी के लिए बधाई ! बहुत पहले इसी आधार की एक कहानी पढी थी राजेंद्र कुमार की, नमक का दरोगा भाग-दो, उसकी याद आ गयी!
खैर, कहानी छोटी है, यथार्थ का बोझ भारी. बहुत कुछ कहने का दबाव इतना है कि कहानी बार बार अपनी विधा से निकल कर बाहर जाना चाहती है. पर यह क्या मुश्किल है? आखिर कोई करे क्या? ऐसे में कोई युक्ति (डिवाईस) ही कहानीकार की मुश्किल हल कर सकती थी. वह युक्ति इस कहानी में है परम्परा. प्रेमचंद्र और लू शुन की परम्परा. लेकिन सिर्फ परम्परा के साथ जाने से तो कोई भला न होगा तो कहानीकार परम्परा का समकालीनीकरण करता है. तब परम्परा की सहजता और वर्तमान की गुत्थी की मुटभेड होती है. कहना चाहिए कि यह कहानी इस नाजुक संतुलन को वर्तमान के पक्ष में झुका देती है. पर यही तो कहानीकार चाहता है. फिर गड़बड़ कहाँ हुई? जहां तक मैं समझ पाया, इस झुका देने में की प्रक्रिया में वे शक्ति-श्रोत कहानी से अलग हो जाते हैं, जिनकी तरफ कहानी शुरू में हमें ले जाती है. इसीलिये गाँव, जो कि गाँव ही होगा, की दीवार पर अंगरेजी का पोस्टर है, सच को पुरजोर तरीके से कहता हुआ पर एकदम अलग जगह दीखता हुआ. यही मुझे लगा. शायद.
मृत्युंजय


कहानी में दम हैं और अद्भुत व्यंजना शक्ति है…बस पोस्टर की भाषा मेरे ख़्याल से हिन्दी या राजस्थानी होनी चाहिये थी…


पहली ही कहानी और इतनी परिपक्व, इतनी सिम्बॉलिक. हमारी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता ध्री ( नाम बहुत अच्छे और मौलिक) हिमांशु बहुत बहुत बधाई, कहानी निसन्देह हम सब के गर्व की वजह है, उपलब्धि चाहे तुम्हारी हो.


himanshuji ko unki pahli kahani ki bahut badhaai.achha rupak hai. maaf kijiyega mera computer hindi men likhne se mana kar raha hai.


जबरदस्त कहानी......बधाई.....


एक असरदार कहानी ... बधाईयाँ


प्रभावी कथा व लेखन शैली।


हिमांशु की यह कहानी राजस्थान में फासीवादी राजनीति के प्रोत्साहन से पुनर्नवा हुई सती-प्रथा, हाल के खाप पंचायतों के शासन समर्थित बर्बर फैसलों और हाल के अरुंधती के कश्मीर वाले बयान पर चलाए जा रहे घृणित अभियानों में अन्तर्निहित बहुमतवादी लोकतंत्र की फासिस्ट परिणतियो के विरोध में लिखी एक रूपक-कथा है. एलेगरी की ताकत ही यह है कि वह एक साथ अनेक संदर्भो में उद्घाटित हो रहे युग-सत्य को एक ऐसा आकार देती है जो उन संदर्भो के मिट जाने के बाद भी प्रासंगिक रहता है और दूसरे संदर्भो में भी जब वही सत्य एक भिन्न देश-काल में उभरता है तो भी वही एलेगरी उससे भी आगाह करने में समर्थ होती है. ऐसे में अत्यंत सुगठित रूपक-कथा वह होती है जिसमे समकालीन सन्दर्भ 'बिटवीन दी लाइंस' आए, प्रत्यक्ष नहीं. एलेगरी अगर 'डेटेड' हुई तो लम्बे देश-काल में उसकी अर्थवत्ता प्रभावित होती है. हिमांशु अगर ऐसे लिख पाए, तो यह सिर्फ प्रेमचंद और लू शुन की परम्परा नहीं , बल्कि नज़दीक देखें तो कही विजयदान देथा भी आपको दिख जाएंगे. सुन्दर है मित्र , बधाई!- प्रणय


अच्छी कहानी है ।


हिमांशु और उसके दोस्त लोग एक हस्तलिखित पत्रिका निकला करते थे" वितान ",उसमे हिमांशु की कहानी छपी थी "सूअर ".अगर हस्तलिखित पत्रिका में छपने को प्रकाशन मन जाये तो यही पहली प्रकाशित कहानी ठहरती है ,बात इस कहानी की ,हिमांशु निबंध लिखते तो शायद अपनी बात ज्यादा स्पष्ट ढंग से कह पाते.मनोज


दिलचस्प है......
याद नहीं कहाँ एक लम्बी कहानी पढ़ी थी जिसमे सरकार किसी जाति विशेष के लिए कोई स्कीम रखती है जिसमे एक परिवार है जिसका मुखिया भालू पालता है ...ओर उसकी पत्नी ओर बेटा उसे भालू को छोड़ कर आन एके लिए दबाव डालते है .भालू से उसका मोह....ओर रिश्तो में वक़्त के साथ आता स्वार्थ .ग्रामीण प्रष्टभूमि होने के बावजूद उस कहानी की निरंतरता ने मुझे न केवल चकित किया था ....बल्कि एक दूसरी दुनिया को देखने का विज़न भी......
लेखक दरअसल एक दूसरी दुनिया अपने बाइस्कोप से दिखाने वाला ही तो है


प्रिय मनोज ,
मेरी पहली कहानी 'सूअर' नहीं 'थकान' थी जो 'वितान' में तुम्हारे ही सम्पादन में निकली थी .
उम्मीद है अच्छे होगे .


बधाई! रूपक में आकर बात पूरी तरह खुल गई है। शायद इसीको रचना कहते हैं।


thanks a lot for selecting my work for this post.. m feeling very great


सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी