Monday, November 01, 2010

निगाह से जन्म लेते हैं दृश्य



{ आगे व्योमेश शुक्ल की नई कविताएं दी जा रही हैं. इनमें से अंतिम चार को कवि के शब्दों में उनकी असमाप्य कविता 'मैं रहा तो था' के हिस्से की तरह पढ़ा जाना चाहिए. सूचनार्थ यह भी निवेदित है कि इस कविता का प्रथम प्रकाशन सबद पर हुआ था और दूसरी बार जब यह आशुतोष भारद्वाज द्वारा संपादित 'कथादेश' के 'कल्प कल्प का गल्प' शीर्षक विशेषांक में छपी तो उसमें तीन नए हिस्से जोड़े गए. आखिरी तीन हिस्से वही हैं. 'अलावा' शीर्षक से छपा हिस्सा पहली दफ़ा छप रहा है.

निजी बनाम पोलिटिकल / कला बनाम कमिटमेंट / क्राफ्ट बनाम कंटेंट का आनुपातिक अनुमान लगा कर कविता लिखने और जांचने वाली बुद्धि के लिए हिंदी के नए कवि ऐसी ही कविताओं से दिक्कत पेश कर सकते थे. व्योमेश उस बहुत छोटी सी जमात से हैं, जिन्होंने ऐसा सफलतापूर्वक किया है. व्योमेश के यहां यह करना कुछ अधिक दीप्त इसलिए है, क्योंकि उन्होंने लगभग असंभव, बेसंभाल और किसी सुविधा / शब्दाभाव / जल्दबाजी में जिसे हम 'आवां-गर्द' कहते हैं, उसे अप
नी कविता में एक सतत, सजग और संयंत जैविक और बौद्धिक अन्तर्क्रिया से पाया है. उनकी कविता इसलिए प्रथम दृष्टया अभिव्यक्ति के खतरे उठाने से ज़्यादा बड़ी आकांक्षा से लिखी हुई कविता जान पड़ती है.


चित्र-कृति मधुमिता दास के कैमरे से.}



कुछ का कुछ

ग्लेशियर बाद में गलते हैं
और हिमालय प्रेस नाम का हिंदी छापाख़ाना पहले बंद हो जाता है
पंचम राम समेत बारह कम्पोज़ीटर और प्रूफ रीडर अकालनिवृत्त हो जाते हैं
यों, बग़ैर कलफ़ के साफ़ धोती-कुरता पहनने वाली एक दर्जन साइकिल नागारिकताएं किसान बना दी जाती हैं मज़दूर बना दी जाती हैं और कुछ के बारे में पता नहीं है कि वे क्या बना दी जाती हैं

नागरिकता जैसियों को ज़रूर कुछ का कुछ बना दिया जाता है

आइन्दा वे कुछ और बना दी जायेंगी
सत्तर के शहर को तेल लेने भेज दिया जाएगा

मेले में मूँगफली बेचने लगता है लेटरप्रेस में सही वाक्य संभव करने वाला आविष्कारक वैज्ञानिक कम्प्यूटर नहीं सीख पाता
अश्लील भोजपुरी में गर्क़ होने को है भाषा की शख्सियत
यहीं टूटने थे खड़ी बोली के गुम्बद
यहीं बक सकता था गाली दारोग़ा - माँ की, बहन की, दुनिया के सभी भाइयों और बेटों और प्रेमियों को
यहीं बनना था आस्था को सबसे बड़ा तर्क
यहीं तय होने थे हिन्दू-मुसलमान, आदमी-औरत, ज़्यादा आदमी और कम औरत, काव्यात्मक-अकाव्यात्मक के फ़र्क़

और जब सब तय हो ही गया है तो दारोग़ा का नाम भी बता दिया जाना चाहिए क्योंकि इतने नुक़सान के बाद एक नाम आख़िर किसी चीज़ का और कितना नुक़सान कर सकता है

तो दोस्तो,
दारोग़ा का नाम है
विभूति नारायण राय

****
कार्य-कारण


शायद किसू के दिल को लगी उस गली में चोट
मेरी बग़ल में शीशा ए दिल चूर हो गया

पन्त जी की कविता चींटी पढ़ाने के कुछ मिनट बाद

दिखती है चीटियों की कतार एक लड़की की आँख में - पहली चमक-सी चमक पैदा करती हुई
यह कविता का समझा जाना हो सकता है
या एक अन्य कविता की शुरूआत
यह ख़ात्मा हो सकता है कविता का
या ख़ात्मे का ख़ात्मा

लोग कहते कुछ

और करते कुछ हैं
और जब यह बात कार्य-कारण-संबंध की तरह नियम बन गई है,
कुछ लोग जो कहते हैं
वही कर देते हैं

मैं उसकी ओर देखता हूँ तो वह भी देखती है मेरी ओर

मैं इस संसार की सर्वाधिक निर्जीव और जड़ चीज़ों की ओर देखता हूँ - लोहे की पाइप, कटे हुए बाल, गाड़ी की स्टीयरिंग, धम्मेख स्तूप और आनंद के तलवे की तरफ़, तो न सिर्फ़ ये चीज़ें भी मुझे देखती हैं,
वह भी घूरने लगती है मुझे

लिखता है कवि अपने छन्द में

और मुझ तक पहुँचता है वह गद्य के सबसे रुक्ष उदाहरण की तरह

जो बातचीत बहुत बहक कर की जानी थी

वह कमबख्त वस्तुनिष्ठ हो जाती है फ़ोन पर
और यह नीच ट्रैजिडी भी जुड जाती है दोस्ती के गड़बड़-सड़बड़ हिसाब-किताब में

बिल्ली रास्ता काट जाया करती है
प्यारी-प्यारी औरतें हरदम बकबक करती रहती हैं
चांदनी रात को मैदान में खुले मवेशी
आकर चरते रहते हैं

और प्रभु यह तुम्हारी दया नहीं तो और क्या है
कि इनमें आपस में कोई संबंध नहीं


( अंतिम 6 वाक्य रघुवीर सहाय की एक मशहूर कविता से ले लिये गये हैं. कवि हमेशा की तरह उनका कृतज्ञ )
****

जैसे वैसे

जैसे फ़ोन पर किसी को पता नोट करा रहे हों और अंग्रेज़ी के 'V' से कोई शब्द शुरू करना हो
जैसे 'Varanasi' से शुरू करना हो
जैसे बहुत बोल-बोल कर नोट कराना हो अपना पक्ष, कि घटना ऐसे नहीं वैसे हुई थी
और जो नहीं हुआ वह होकर रहेगा

वैसा

धूल से साँवला घुटना
हवा के निर्भार में एक अप्रतिम 'V' बनाता हुआ
किसी बेहद क़िस्म के मूल की परछाई
और मूल भी इसी परछाई से पैदा हुए होंगे

मूल परछाइयों से ही जन्म लेते हैं
निगाह से जन्म लेते हैं दृश्य
सपने में पानी बरसता है तो लगता है नींद में बरस रहा है
और सुबह कोई किसी से पूछता है...

'कल पानी बरसा था ?'
****

दृष्टान्त

1. मरने से काफ़ी पहले किसी ने देख लिया होगा वह पेड़ जिसकी लकड़ियों से बनेगी उसकी चिता 2. आगे की सड़कों पर लगने वाले ट्रैफ़िक जाम कुछ लोगों को पहले ही मालूम हो जाते हैं 3. नितांत चालू हिंदी फ़िल्मों में आए दुख में कई बार बिल्कुल अपने-अपने आँसू देखे हैं ज़िन्दगी की हेरोइनों ने.

इन लचर दृष्टान्तों के आधार पर कम से कम कविता में कहा जा सकता है कि उसने तुम्हें देख लिया होगा तुम्हें देखने से पहले,
जैसे एक बार तुम्हें देख लिया था तुम्हें देखने के बाद

दरअसल इस सारे फ़साने में पहले और बाद का कोई चक्कर ही नहीं है, कहाँ से पहले और कहाँ के बाद ?
कभी लगता है कि सारी गाड़ियां पहले ही छूट चुकी हैं
और कभी यह कि अपना वक़्त अभी आया ही नहीं

इसलिए अगर कोई ऐसी किसी भाषा में कुछ सोचने या लिखने लगे जिसमें 'अतीत' और 'आगामी' जैसे शब्द एक ही अर्थ देते हों तो ज़्यादा दिक़्क़त में पड़ने की ज़रूरत नहीं है, ज़्यादा से ज़्यादा यही न होगा कि 'आगामी' का झंझट करते हुए वह 'व्यतीत' को भी साँसत में डाल देगा, तो डाल दे, हमें इससे क्या लेना-लादना? वह अपने रास्ते हम अपने रास्ते. उसके वाक्यों में तो क़दम-क़दम पर इतने संशय कि वह अगर लिख रहा हो तो उसके ही मुहावरे में 'वह कुछ और कर रहा है.'
****

अलावा

उसमें देखने के अलावा भी था. उसमें मुस्कराहट के अलावा भी था. उसमें न देखने और न मुस्कराने के अलावा भी था. उसमें उसके अलावा भी था. उसमें है के अलावा भी था.
उसमें एक घड़ा था, साफ़ पानी से नहीं पेयजल से भरा हुआ.
तत्सम की बाधाएं थी और बाधाओं के अलावा भी था. हम तद्भव की तरह छलक जाते थे.
उसमें मरण था और मरण के अलावा. अथ और इति के अलावा. उसमें मेरी बेटी रहती थी. मैं रहता था उसमें, एक बेटी का बाप. एक बेटी का बाप होने अलावा भी मैं उसमें था. मेरा बाप था उसमें सनातन सेकुलर कांग्रेसी. उसमें एक खूंटा था नरेंद्र मोदी की गांड में डालने के लिये.


खूंटे पर, घड़े पर, किताब पर, आँखों पर मेरी, मेरे काले हाथों पर, लकड़ी पर, नींद पर, रुमाल पर, गणेश जी की तोंद पर तुम्हारा स्पर्श.

उस स्पर्श में स्पर्श के अलावा भी था.
****

कि पानी से आग ?

भींगती हुई बरसात
भींगता हुआ शिशिर
इसके पहले ग्रीष्म भी भींगा था

भींगती हुई सड़क - जो उसकी भी मातृभूमि है

रात भींगी सुबह भींगी
पप्पा की गोदी में
बच्ची कुछ कम भींगी
भींगता हुआ शव चिता भींगती हुई
इस ख़याल का भींगना कि पानी से आग बुझ जाती है
भींगने का इंतज़ार करते हुए गुप्ता जी

चराचर

ये सब तुम्हें भींगता न देख पाने के दृश्य हो सकते थे
****

होना था

गर्मी में पिता होना था कि तुम्हें लू न लग जाये. ( उफ़.... तुम्हारे बाप का पीसीओ....)
बहुत ज़्यादा गर्मी में पानी के बरसने का पर्व होना था कि तुम भींग सको देवी-देवता के विग्रहों की तरह और जब भींगते-भींगते बुखार हो जाये या नाक बहने लगे तो एक धवल रुमाल या एक झोलाछाप डॉक्टर होना था.
रक्षाबंधन के दिन भाई होना था तुम्हारा, लाख भाइयों के बराबर.
भले ही माफिया डान को देना पड़े, अट्ठारह की उम्र में बीजेपी के ख़िलाफ़ तुम्हारा पहला वोट होना था.
अपना वोट बीजेपी को नहीं देंगे की वरीयता होना था. कुछ-कुछ विनोद कुमार शुक्ल होना था. कुछ तुम्हारा कुछ अपना कुछ विनोद जी का आदिवास होना था.

जो होना था वह होना था.
जो नहीं होना था वह होना था.
था होना था, है होना था.

'सब कुछ' होना था.
'होना' होना था.
'बचा रहेगा' होना था.

तुम्हारी और अपनी, यानी विनोद जी की कविता किताब होना था.
उनकी आगामी कविताओं में निहित दंडकारण्य का कोलाहल होना था. उस कोलाहल का मौन होना था. उस मौन को तुम्हारी आवाज़ होना था.
कभी-कभी मुझे बोलना था तुम्हारे मुँह से. तुम्हारा वाक्यविन्यास होना था. ऐन इसी सोहराबुद्दीनी मुहूर्त में गुजरात का कांग्रेसी राज्यपाल होना था. रोज़-रोज़ मोदी के ख़िलाफ़ कानूनी तरीक़े से लिखा गया बहुत सुंदर राजकीय निबंध होना था. एक अभिनव केंद्र-राज्य संबंध होना था.

तुम्हें नीरू होना था मुझे नीमा होना था.
एक कबीर होना था एक मीर होना था.
****

मौसम के ख़िलाफ़ अच्छी सेहत भी चाहिए

जब बिजली का खंबा या गिर रहे पेड़ों में से कोई एक गिरेगा सर पर और बेहोश होने से कुछ पहले मैं साँसों में कहूँगा की विवेकानंद या दयानंद मेडिकल स्टोर ले चलो तो वह ऐसा पहला अंतिम आदमी होगा जो यक़ीन करेगा कि ये मुहावरे नहीं दवा की दुकानों के नाम हैं.

मरने से बचने के लिये अस्पताल की बजाय दवा की दुकान जाने का क्या मतलब हो सकता है तो इसका मतलब हो सकता है की दुकान अस्पताल की बग़ल में भी तो हो सकती है. मैं दवा का दुकानदार हो सकता हूँ मेरा बेटा नाजायज़ कंपाउंडर हो सकता है.

और एक बच्ची दिखी थी मोटरसाइकिल पर बैठी माँ की गोद में. देर तक देखती थी मुड़ने के बाद भी देखती थी.

जूते की दुकान पर एक जोड़ी जूता दिखा था, अपने होने में मेरी प्रेमिका के मामा के जूते जैसा, देर तक देखता था मुड़ने के बाद भी देखता था.

और वह दिखी थी. बिल्कुल उस जैसी दिखती थी. बस थोड़ा ज़्यादा हँसती थी. वह हँसी बहुत कुछ कहती थी. देर तक देखती थी मुड़ने के बाद भी.

और देवेन्द्र द्विवेदी दिखे थे अपनी अकाल मौत के बाद. और यह ख़याल कि गुजरात का राज्यपाल बनने के बाद शपथग्रहण से पहले ही उन्हें नहीं रहना था.

और यह ख़याल कि उन्हें मरना था तो गुजरात का राज्यपाल बनते ही क्यों मरना था. और यह ख़याल कि गुजरात का राज्यपाल बनाने के लिए सबकुछ के साथ अच्छी सेहत भी चाहिए. यह ख़याल देर तक देखता था मुड़ने के बाद भी देखता था.
****

3 comments:

Bimlesh said...

विचारोत्तेजक कविताएं... बधाई

chandan pandey said...

व्योमेश जी की कविताएं पढ़ते हुए इस एक बात का सुन्दर एहसास लगातार हो रहा होता है कि हम कुछ ऐसी पंक्तियाँ पढ़ रहे है जिन्हें याद रख ले. यह प्रगीत की तरह का नहीं बल्कि किसी अमर वाक्य को याद रखने जैसा होता है. यह बहुत अच्छी कविताएं है. और पिछली कविताओं से लगातार अच्छी होती हुई भी.

अनुपमा पाठक said...

बहुत कुछ है गुनने को... याद रखने को... बार बार पढ़े जाने को!
आभार!