Monday, November 29, 2010

अलक्षित : 1


मदन की उत्‍प्रेक्षा

आलोचना में ऐसा उद्यम विरल होता जा रहा है जब वह अपनी अंतरंगता में प्रखर और प्रखरता में ललित (निबंध नहीं !) हो जाए. जब वह कृति और कृतिवाह्य अर्थ सन्दर्भों में प्रवेश कर उसकी व्याख्या और पुनर्रचना का प्रयत्न साथ-साथ करे. जिसमें पारंपरिक प्रत्यय पुनराविष्कृत होकर नई अर्थाभा से चमक उठें और नए प्रत्ययों की प्रतिध्वनि सुनाई पड़े. जो अपने सामने महज ''एक कृति का आकलन करने से बढ़कर'' चुनौतियाँ स्वीकार करे और साहस किसी फैशन में नहीं जोखिम उठाने की गरज से करे. आलोचना का ऐसा विरल, गंभीर और दायित्वपूर्ण उद्यम मदन सोनी एक लम्बे अरसे से कर रहे हैं और इसका साक्ष्य उनकी चौथी आलोचना पुस्तक 'उत्प्रेक्षा' भी है. हालांकि इस पुस्तक की ओर भी हिंदी साहित्य के पुराने रस्मोरिवाज़ के तहत न बहुत ध्यान है न ध्यान दिलाने की चेष्टा. उसकी एक वजह संभवतः उसमें हिंदी के अन्यथा आदरणीय प्रेमचंद, अज्ञेय, विनोद कुमार शुक्ल के अलावा फ़क़त 'भोपाल स्कूल' के अशोक वाजपेयी, कृष्ण बलदेव वैद, रमेशचंद्र शाह, वागीश शुक्ल, गगन गिल की कृतियों के पाठ का शामिल होना भी हो. प्रेम कविता, स्त्री, कबीर वगैरह तो हैं ही, हिंदी बाहर रविन्द्रनाथ और हिंदी साहित्यिक हलकों के लिए अस्पृश्य 'एड्स' पर भी एक निबंध है. कहना कठिन नहीं कि मदन ने पुस्तक का नाम उत्प्रेक्षा क्यों रखा है. 'उत्प्रेक्षा' एक अलंकारिक पदावली है, जिसका अर्थ है किन्हीं दो भिन्न वस्तुओं में एकत्व की सम्भावना का निदर्शन. मदन इस परम्परित अर्थ को कुछ वसी करते हैं. वे इसमें ''उस समस्त कृतित्व को शामिल मानकर इस शब्द का उपयोग कर रहे हैं जिसे भाषा में रचा गया है और जहां से आत्यंतिक रूप से भिन्न वस्तुओं को उनकी भिन्नता के प्रति बेखबर न रहकर इस तरह बरता जाता है मानो वे एक हों''. मेरे ख़याल से यह बर्ताव अनूठा है. यह दरअसल हिंदी में मौजूद सोच की उस फांक पर एक करारी चोट भी है जिसके तहत प्रेमचंद के बारे में ही क्यों अज्ञेय/ मुक्तिबोध / शमशेर / नागार्जुन के बारे में एक खास काट (डिजाइन) में या तबका ही बात कर सकता है. मदन अपनी पहली पुस्तक 'कविता का व्योम और व्योम की कविता' में आलोचना के इस जागरूक विवेक से हमें परिचित करा चुके हैं. बाद की पुस्तकों में उसमें और प्रौढ़ता आई है. इस अवधि में उनसे असहमति भी बढ़ी है. किंतु उनकी आलोच-क्रिया में रचना (कार से भी ) एकत्व स्थापित करने का सयाना विवेक हमेशा असहमति को साथ रखकर उन्हें पढ़ने के लिए न्योतता रहा है. इसी एक बिंदु पर मुझे लगता है कि गुंजाइश, लोच, सहिष्णुता की दरकार अब दुतरफा है.जैसे यहां तक आते आते मुझे अपनी यह असहमति ज़ाहिर करनी चाहिए कि मदन के विवेचन में 'स्फीति' बहुत है. जिसे कुंवर नारायण बेहतर शब्दों में 'कवि-दृष्टि का अभाव' कहते हैं, वह है और उनको नजदीक से फ़ॉलो करने वाले शायद इस बात की भी ताईद करें कि यह अब उनका लाइलाज आलोचकीय आचरण बन चुका है.दूसरी बात यह कि बाहर के जिन विद्वानों के सन्दर्भ अब दिए जाते हैं, आलोचना में रूचि रखनेवाले विज्ञ पाठक को उनके बारे में अब इंटरनेट या पुस्तकों की आसन पावती की वजह से कुछ पहले से भी पता रहता है. इसलिए वे सन्दर्भ क्षिप्रतर हों तो क्या ही अच्छा.

(यह टिप्पणी कॉलेज के दिनों में अशोक वाजपेयी से संयोगवश हुई मुलाकात के बाद 'उत्प्रेक्षा 'की उनकी प्रति मांग लेने के अपने युवकोचित उत्साह और अशोक जी द्वारा बिना किसी संकोच के इसे मेरे हाथ में रख देने की अच्छी याद के नाम।)

चित्राक्रिती : सल्‍वादोर दाली

5 comments:

डॉ .अनुराग said...

.कहानी में अक्सर बहुत कुछ कहा नहीं होता है .....ओबवियस सा नहीं ...एक आलोचक का असल काम ...उन अनकहो...उन नॉन ओब वियस को .भी .विस्तार से बताना होता है...... कहानी के गूढ़ तत्वों की विस्तृत व्याख्या से इतर ....


ओर हाँ
चित्र बेहद खूबसूरत है .....हमेशा की तरह आपकी चोयेस बेमिसाल है !!

Geet Chaturvedi said...

सुंदर, संक्षिप्‍त टिप्‍पणी.
इतनी 'कन्‍टेन्‍ड' है कि अलग से कुछ कहते नहीं बनता. दुहराना हो जाएगा. इसमें सब कुछ है.
निहायत नियंत्रित. बहुत बढि़या.

deependra said...

The piece is interesting in the sense as it takes un-expected turn(s) . Its approach which intends to celebrate the rigor of reason and conscience, carries some promise. and in this approach , one feels assured that at least some figures of the madanjees criticism will be identified and articulated . and this review registers the exclusiveness and the uniqueness of the madanjees criticism and one feels that ground are being settled to encounter the ‘Text ‘ which is utterly speculative , multi-valent , self –conscious , and imaginative which engages in the ‘work’ but destabilizes the categories that construe and construct it and is dismissive of the categorical judgement . and this aesthetics of deferring judgment makes it uncertain , in-coherant , but fertile in mining the un-authorized meaning(s).
And we come across the ‘acts of readings’ which subverts the established co- ordinates of conventional readings .
and this apathy is quite natural in the sense as Hindi criticism is the space where you have to either confirm to mediocre parameters or have to defy them in the commonsensical economy of judgments.
But while celebrating marginal features of madanjees writings , I thought your language capital will extract files in madanjees writing which are installed in his writing and fashion his programes of writing . I thought pass – words will be broken. but instead of entering into sites of war , you have only expressed the shyness to encounter the vantage points . I am afraid this rhetoric of judgment is obsessed by too much self protection and preserves it by the shield of ‘poetic – insight’ which is absolute and therefore intolerant of any argument/ contestation/ question .

Dear , this word ‘inflation ‘ has problems, if we believe in exploring radical parameters of criticism . As this inflation alludes to economy of excessive supply of words(currency) to manage the crises of the demand of the commodity ( meanings) . I feel madanjees words elaborate the connotative economy of words therefore we see words realizing the wealth of meanings and readers becoming equipped with the purchasing power to buy ‘which is not made so far ‘ in their own enchantment . so this judgment of inflation / redundancy is reductive and oppressive and suppressive of the ‘other readings’ . and this judgment is a judgment is of an anti –reader who feels only his reading to be perfect ,ideal and representative of truth .

And you have diagnosed the mis- conduct /disease in his writing. Quite a pathological judgment. And you have designated it as ‘un- curable’ . perhaps , ‘normalcy ‘ and ‘health ‘are dominant values for you. I relish literature for it explores existential disease, deviant behaviors of the ‘authority’ and the ‘text ‘ . Can uniqueness be curable. . Answer will always be ‘no’. As uniqueness is fundamental to ones’ core as this- the ‘disease of fiction’ and ‘fiction of disease ‘- one creates for oneself to be away from the world and life to disseminate the very infection of it .
Deependra baghel ( have tried to be restrained )

madan soni said...

प्रिय अनुराग,

आपकी टिप्पणी अपने लेखन के प्रति आत्मविश्वास की मेरी कमी को शायद कुछ दूर कर सके. मेरे लेखकीय उद्यम को आपने जिस तरह सराहा है उसके हर्ष को स्वीकार न करना व्यर्थ का पाखंड होगा, लेकिन आपकी असहमतियों में, स्वाभाविक ही, मेरी दिलचस्पी ज्यादा है. इसीलिए लगता है कि काश 'स्फीति' का आपका नुक्ता कुछ विस्तार पा सकता (यद्यपि लाघव के आपके अन्तर्निहित, और, निश्चय ही, स्पृहणीय, आग्रह को देखते हुए मुझे आपसे यह अपेक्षा शायद नहीं करनी चाहिए), तब मुझे अपने इस 'आचरण' को, न सही सुधारने का (क्योंकि, जैसा की आपका कहना है, वह 'लाइलाज' हो चुका
है), कम से कम पहचान सकने का अवसर मिल सकता.
ख़ैर... अन्यथा, आलोचना के संदर्भ में (बल्कि लेखन मात्र के संदर्भ में) 'लाइलाज़' का आपका प्रयोग, जो 'बीमारी' के प्रत्यय को प्रतिध्वनित करता है, मुझे आपसे गुफ्तगू करने को उकसा रहा है, लेकिन चूँकि यह आपने मेरे लेखन पर चर्चा के संदर्भ में प्रयुक्त किया है, मुझे फ़िलहाल इस गुफ्तगू के लोभ का संवरण करना होगा.
मैं आपका लिखा ज्यादा से ज्यादा पढ़ना चाहता हूँ, कृपया मदद करें.
सस्नेह
आपका
मदन सोनी

विमलेश त्रिपाठी said...

संक्षिप्त और सुंदर टिप्पणी...बधाई....