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Showing posts from November, 2010

अलक्षित : 1

मदन की उत्‍प्रेक्षा
आलोचना में ऐसा उद्यम विरल होता जा रहा है जब वह अपनी अंतरंगता में प्रखर और प्रखरता में ललित (निबंध नहीं !) हो जाए. जब वह कृति और कृतिवाह्य अर्थ सन्दर्भों में प्रवेश कर उसकी व्याख्या और पुनर्रचना का प्रयत्न साथ-साथ करे. जिसमें पारंपरिक प्रत्यय पुनराविष्कृत होकर नई अर्थाभा से चमक उठें और नए प्रत्ययों की प्रतिध्वनि सुनाई पड़े. जो अपने सामने महज ''एक कृति का आकलन करने से बढ़कर'' चुनौतियाँ स्वीकार करे और साहस किसी फैशन में नहीं जोखिम उठाने की गरज से करे. आलोचना का ऐसा विरल, गंभीर और दायित्वपूर्ण उद्यम मदन सोनी एक लम्बे अरसे से कर रहे हैं और इसका साक्ष्य उनकी चौथी आलोचना पुस्तक 'उत्प्रेक्षा' भी है. हालांकि इस पुस्तक की ओर भी हिंदी साहित्य के पुराने रस्मोरिवाज़ के तहत न बहुत ध्यान है न ध्यान दिलाने की चेष्टा. उसकी एक वजह संभवतः उसमें हिंदी के अन्यथा आदरणीय प्रेमचंद, अज्ञेय, विनोद कुमार शुक्ल के अलावा फ़क़त 'भोपाल स्कूल' के अशोक वाजपेयी, कृष्ण बलदेव वैद, रमेशचंद्र शाह, वागीश शुक्ल, गगन गिल की कृतियों के पाठ का शामिल होना भी हो. प्रेम कविता, स्…

कथा : २ : हिमांशु पंड्या की कहानी

पञ्चपरमेश्वर : भाग दो
एक समय की बात है .एक गाँव था ,गाँव का नाम था खारिया खंगार .गाँव में एक मनुष्य रहता था जिसका नाम था हू. हू के पास एक बकरी थी .बकरी क्या थी ,पूरे गाँव की शान थी .सालाना बकरी मेले में उसे पुरस्कार भी मिला था .हू को वह बकरी बहुत अजीज़ थी .सुनहरा पीला रंग,पुष्ट शरीर,उसके कान के रोयें सुनहरी आभा बिखेरते थे और जब वह इठलाकर बोलती ,"म्है है है... "तो लगता मानो किसी प्रेमिका ने आवाज़ लगाई हो .

....पर एक बात थी .उस बकरी के खुर टेढ़े थे .सामान्य बकरियों से थोड़े अलग (गो कि इससे उसकी चाल बाधित नहीं हुई थी बल्कि उसमें चार चाँद लग गए थे). गाँव के कुछ लोगों को वह बकरी अपशकुन लगती थी .उन्हें लगता था कि इसका मूल कारण यह था कि उस बकरी की नस्ल में कुछ संकरता थी.वे उसे गाँव के लिए श्राप मानते थे और गाँव पर यदा कदा आयी आपदाओं के लिए उसे जिम्मेदार मानते थे .

धीरे धीरे इन लोगों का विरोध बढ़ता गया और यहाँ तक पहुचा कि उस बकरी की मौत ही गाँव की भलाई का एकमात्र हल थी .इन्हीं लोगों द्वारा दावा किया गया कि दरअसल उस बकरी पर असली हक क्वै का था क्योंकि बकरी के परदादा दरअसल …

निगाह से जन्म लेते हैं दृश्य

{ आगे व्योमेशशुक्लकी नई कविताएं दी जा रही हैं. इनमें से अंतिम चार को कवि के शब्दों में उनकी असमाप्य कविता 'मैं रहा तो था' के हिस्से की तरह पढ़ा जाना चाहिए. सूचनार्थ यह भी निवेदित है कि इस कविता का प्रथम प्रकाशन सबद पर हुआ था और दूसरी बार जब यह आशुतोष भारद्वाज द्वारा संपादित 'कथादेश' के 'कल्प कल्प का गल्प' शीर्षक विशेषांक में छपीतो उसमें तीन नए हिस्से जोड़े गए. आखिरी तीन हिस्से वही हैं. 'अलावा' शीर्षक से छपा हिस्सा पहली दफ़ा छप रहा है.
निजी बनाम पोलिटिकल / कला बनाम कमिटमेंट / क्राफ्ट बनाम कंटेंट का आनुपातिक अनुमान लगा कर कविता लिखने और जांचने वाली बुद्धि के लिए हिंदी के नए कवि ऐसी ही कविताओं से दिक्कत पेश कर सकते थे. व्योमेश उस बहुत छोटी सी जमात से हैं, जिन्होंने ऐसा सफलतापूर्वक किया है. व्योमेश के यहां यह करना कुछ अधिक दीप्त इसलिए है, क्योंकि उन्होंने लगभग असंभव, बेसंभाल और किसी सुविधा / शब्दाभाव / जल्दबाजी में जिसे हम 'आवां-गर्द' कहते हैं, उसे अप
नी कविता में एक सतत, सजग और संयंत जैविक और बौद्धिक अन्तर्क्रिया से पाया है. उनकी कविता इसलिए प्रथम द…