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Showing posts from October, 2010

सबद पुस्तिका : ५ : प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

{ I }

साधो, अशब्द साधना कीजै


इस अमावस्या की रात
सफर की तैयारी से पहले क्या तुमने
मानचित्रों को अच्छी तरह देख लिया है ?
मेरा कहा मानो तो उन्हे फिर देख लो .................कहाँ कहाँ जाना है
नोट कर लो

अच्छा पहले बताओ कौन हो तुम ?
दीदारगंज की यक्षी ? किसी गंधर्वलोक की उर्वशी ? कामायनी ?
या अजिंठा की गुफा में कैद
सजा के लिए नतशिर वह नर्तकी ?
जो भी हो, मेरे लिए सिर्फ एक स्त्री हो
सृष्टि की सुन्दरतम कृति ......................... रचना का सुन्दर होना
.......................................................(पुरुष के लिए) स्त्री होना है़

कूच के पहले थोड़ी देर आइने में झांक लेना
खुद को देखना
अपनी आँखों से आँखें मिलाना साहसी होना है
.............................................. कम-स-कम आज की दुनिया में
और साहसी होना ही कूच करना है

बालों को संवार लो और जूडे़ में ये फूल गूंथ लो
फिर इन्द्रधनुषी रंग में
झिलझिलाती यह साड़ी ओढ़ लेना
सृष्टि के जितने रंग हैं
उन सभी रंगों का सत्व है यह............................... रंग - ब्रह्म
सभी आँखें तृप्त होंगी तुम्हे देखकर
फिर भी तुम किसी की न होगी

मुक्त होना है सफर …

बही-खाता : १२ : वंदना राग

मेरी कोशिश अपने आप को व्यापक समाज से जोड़ने की रहती है
कहते हैं, हम जितना अपने स्मृति कोश को माँजते हैं, उतने ही साफ सुथरे और चमकदार ढंग से स्मृतियाँ हमारे भीतर उगती जाती हैं और हमारे जीवन जीने का अविभाज्य हिस्सा बनती जाती हैं। एक ऐसे चक्र के भीतर जहाँ पहल स्मृति के मार्फत होती है और सपने आगामी जीवन के दिखाई पड़ते हैं। पुनः आगामी जीवन स्मृति होता जाता है और चक्र अपनी परिधि को पूरा करने में लगा रहता है। ऐसे ही चक्र के तहत मैं अपने आप को पाती हूँ और स्मृतियों के उन महाआख्यानों को दुहराती रहती हूँ। विचलित होती रहती हूँ, कभी दुख से तो कभी खुशी से। जब अपनी स्मृतियों में मैं महाआख्यानों के स्वर परिभाषित करती हूँ तो जाहिर है वे मेरे निजी स्पेस से बाहर आकर उस सार्वजनिक स्पेस के अतिक्रमण की बात करते हैं, जिसके शोर को मैं बचपन से ही, कभी अनदेखा नहीं कर पाई।

कौन था बचपन में, जो चुपके से दबे पाँव आकर कान में उस शोर को पैदा कर देता था? एक अति भावात्मक मन, उतना ही कल्पनाशील दिमाग अथवा एक असंतुष्ट और हमेशा प्रश्न करने वाली प्रवृत्ति? शायद बहुत सारे लक्षणों ने मिलजुल कर एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण किय…