Wednesday, September 29, 2010

अम्न का राग


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शमशेर की यह कविता करीब साठ साल पुरानी है, लेकिन कतिपय आंकड़ों को छोड़ दें तो ह्रदय की सच्ची सुख-शांति का यह बहुत आदिम बहुत अभिनव राग है. इसे सुनना उन सब कार्रवाइयों का स्थगन है, जिससे इंसानी आत्मा लहूलुहान होती है. हम शमशेर का जन्म-शताब्दी वर्ष जीते हुए यह अनुभव कर रहे हैं कि हमारे लिए 'शांति की चाहना' पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है, क्योंकि युद्ध सरदारों ने मोर्चे खोलने में कोई कसर नहीं उठा रखी है. ऐसे मौकों पर ''अम्न का राग'' गाना चाहे जितना अनुत्तेजक जान पड़े, ज़रूरी यही लगता रहा है.}


सच्चाइयाँ
जो गंगा के गोमुख से मोती की तरह बिखरती रहती हैं
हिमालय की बर्फ़ीली चोटी पर चाँदी के उन्मुक्त नाचते
परों में झिलमिलाती रहती हैं
जो एक हज़ार रंगों के मोतियों का खिलखिलाता समंदर है
उमंगों से भरी फूलों की जवान कश्तियाँ
कि बसंत के नए प्रभात सागर में छोड़ दी गई हैं।

ये पूरब-पश्चिम मेरी आत्मा के ताने-बाने हैं
मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द
लपेट लिया
और मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आँच की धूप-छाँव पर
बहुत हौले-हौले से नाच रहा हूँ
सब संस्कृतियाँ मेरे संगम में विभोर हैं
क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख-शांति का राग हूँ
बहुत आदिम, बहुत अभिनव।

हम एक साथ उषा के मधुर अधर बन उठे
सुलग उठे हैं
सब एक साथ ढाई अरब धड़कनों में बज उठे हैं
सिम्फोनिक आनंद की तरह
यह हमारी गाती हुई एकता
संसार के पंच परमेश्वर का मुकुट पहन
अमरता के सिंहासन पर आज हमारा अखिल लोकप्रेसिडेंट
बन उठी है

देखो न हक़ीक़त हमारे समय की जिसमें
होमर एक
हिंदी कवि सरदार जाफ़री को
इशारे से अपने क़रीब बुला रहा है
कि जिसमें
फ़ैयाज़ खाँ बिटाफ़ेन के कान में कुछ कह रहा है
मैंने समझा कि संगीत की कोई अमर लता हिल उठी
मैं शेक्सपियर का ऊँचा माथा उज्जैन की घाटियों में
झलकता हुआ देख रहा हूँ
और कालिदास को वैमर कुंजों में विहार करते
और आज तो मेरा टैगोर मेरा हाफ़िज़ मेरा तुलसी मेरा
ग़ालिब
एक-एक मेरे दिल के जगमग पावर हाउस का
कुशल आपरेटर है।

आज सब तुम्हारे ही लिए शांति का युग चाहते हैं
मेरी कुटुबुटु
तुम्हारे ही लिए मेरे प्रतिभाशाली भाई तेजबहादुर
मेरे गुलाब की कलियों से हँसते-खेलते बच्चों
तुम्हारे ही लिए, तुम्हारे ही लिए
मेरे दोस्तों, जिनमें ज़िन्दगी में मानी पैदा होते हैं
और उस निश्छल प्रेम के लिए
जो माँ की मूर्ति है
और उस अमर परमशक्ति के लिए जो पिता का रूप है।

हर घर में सुख
शांति का युग
हर छोटा-बड़ा हर नया पुराना आज-कल-परसों के
आगे और पीछे का युग
शांति की स्निग्ध कला में डूबा हुआ
क्योंकि इसी कला का नाम भरी-पूरी गति है।

मुझे अमरीका का लिबर्टी स्टैचू उतना ही प्यारा है
जितना मास्को का लाल तारा
और मेरे दिल में पीकिंग का स्वर्गीय महल
मक्का-मदीना से कम पवित्र नहीं
मैं काशी में उन आर्यों का शंख-नाद सुनता हूँ
जो वोल्गा से आए
मेरी देहली में प्रह्लाद की तपस्याएँ दोनों दुनियाओं की
चौखट पर
युद्ध के हिरण्यकश्य को चीर रही हैं।

यह कौन मेरी धरती की शांति की आत्मा पर कुरबान हो
गया है
अभी सत्य की खोज तो बाकी ही थी
यह एक विशाल अनुभव की चीनी दीवार
उठती ही बढ़ती आ रही है
उसकी ईंटें धड़कते हुए सुर्ख दिल हैं
यह सच्चाइयाँ बहुत गहरी नींवों में जाग रही हैं
वह इतिहास की अनुभूतियाँ हैं
मैंने सोवियत यूसुफ़ के सीने पर कान रखकर सुना है।

आज मैंने गोर्की को होरी के आँगन में देखा
और ताज के साए में राजर्षि कुंग को पाया
लिंकन के हाथ में हाथ दिए हुए
और ताल्स्ताय मेरे देहाती यूपियन होंठों से बोल उठा
और अरागों की आँखों में नया इतिहास
मेरे दिल की कहानी की सुर्खी बन गया
मैं जोश की वह मस्ती हूँ जो नेरूदा की भवों से
जाम की तरह टकराती है
वह मेरा नेरुदा जो दुनिया के शांति पोस्ट आफ़िस का
प्यारा और सच्चा क़ासिद
वह मेरा जोश कि दुनिया का मस्त आशिक़
मैं पंत के कुमार छायावादी सावन-भादों की चोट हूँ
हिलोर लेते वर्ष पर
मैं निराला के राम का एक आँसू
जो तीसरे महायुद्ध के कठिन लौह पर्दों को
एटमी सुई-सा पार कर गया पाताल तक
और वहीं उसको रोक दिया
मैं सिर्फ एक महान विजय का इंदीवर जनता की आँख में
जो शांति की पवित्रतम आत्मा है।

पश्चिम मे काले और सफ़ेद फूल हैं और पूरब में पीले
और लाल
उत्तर में नीले कई रंग के और हमारे यहाँ चम्पई-साँवले
औऱ दुनिया में हरियाली कहाँ नहीं
जहाँ भी आसमान बादलों से ज़रा भी पोंछे जाते हों
और आज गुलदस्तों मे रंग-रंग के फूल सजे हुए हैं
और आसमान इन खुशियों का आईना है।

आज न्यूयार्क के स्काईस्क्रेपरों पर
शांति से 'डवों' और उसके राजहंसों ने
एक मीठे उजले सुख का हल्का-सा अंधेरा
और शोर पैदा कर दिया है।
और अब वो अर्जेन्टीना की सिम्त अतलांतिक को पार कर
रहे हैं
पाल राब्सन ने नई दिल्ली से नए अमरीका की
एक विशाल सिम्फ़नी ब्राडकास्ट की है
औऱ उदयशंकर ने दक्षिणी अफ़्रीका में नई अजंता को
स्टेज पर उतारा है
यह महान नृत्य वह महान स्वर कला और संगीत
मेरा है यानी हर अदना से अदना इंसान का
बिल्कुल अपना निजी।

युद्ध के नक़्शों की कैंची से काटकर कोरियाई बच्चों ने
झिलमिली फूलपत्तों की रौशन फ़ानूसें बना ली हैं
और हथियारों का स्टील और लोहा हज़ारों
देशों को एक-दूसरे से मिलानेवाली रेलों के जाल में बिछ
गया है
और ये बच्चे उन पर दौड़ती हुई रेलों के डिब्बों की
खिड़कियों से
हमारी ओर झाँक रहे हैं
वह फ़ौलाद और लोहा खिलौनों मिठाइयों और किताबों
से लदे स्टीमरों के रूप में
नदियों की सार्थक सजावट बन गया है
या विशाल ट्रैक्टर-कंबाइन और फ़ैक्टरी-मशीनों के हृदय में
नवीन छंद और लय का प्रयोग कह रहा है।

यह सुख का भविष्य शांति की आँखों में ही वर्तमान है
इन आँखों से हम सब अपनी उम्मीदों की आँखें सेंक
रहे हैं
ये आँखें हमारे दिल में रौशन और हमारी पूजा का
फूल हैं
ये आँखें हमारे कानून का सही चमकता हुआ मतलब
और हमारे अधिकारों की ज्योति से भरी शक्ति हैं
ये आँखें हमारे माता-पिता की आत्मा और हमारे बच्चों
का दिल है
ये आँखें हमारे इतिहास की वाणी
और हमारी कला का सच्चा सपना हैं
ये आँखें हमारा अपना नूर और पवित्रता हैं
ये आँखें ही अमर सपनों की हक़ीक़त और
हक़ीक़त का अमर सपना हैं
इनको देख पाना ही अपने आपको देख पाना है, समझ
पाना है।

हम मनाते हैं कि हमारे नेता इनको देख रहे हों।
****

(शमशेर की इस कविता का रचना काल नामवर सिंह द्वारा सम्पादित उनकी प्रतिनिधि कविताओं के संकलन में १९४५ बताया गया है, जो कविता में ''यह कौन मेरी धरती की शांति की आत्मा पर कुरबान हो गया है/ अभी सत्य की खोज तो बाकी ही थी'' जैसी पंक्तियों के आने से ग़लत जान पड़ता है. ''कुछ और कविताएं'' शीर्षक संकलन में, जहां से यह कविता ली गई है, वहां इसका रचना-काल १९५२ दिया गया है, यही सही रचना काल है. कविता के साथ दी गई चित्र-कृति मधुमिता दस के कैमरे से. )

9 comments:

अरुण देव said...

महाकाव्यत्मक विस्तार और उदात्तता के शिखर से गूंजता शमशेर का यह राग; एक सामूहिक गान की तरह है-मानवता का सामूहिक गान. अपूर्व

PUKHRAJ JANGID पुखराज जाँगिड said...

अनुराग जी, कविता प्रकाशनकाल पर की गई आपकी टिप्पणी उचित लगती है. यह मनुष्य होने की वजह सीखलाती कविता है. इसे साझा करने के लिए शुक्रिया बंधुवर. पुखराज जाँगिड़

Farhan Khan said...

mere paas iss mahaan kavitaa ke baare main kuch kehne ko shabd nahin hain...kaash ham sab iss kavitaa ko apne jeevan main aml main laa paate aur "मुझे अमरीका का लिबर्टी स्टैचू उतना ही प्यारा है
जितना मास्को का लाल तारा
और मेरे दिल में पीकिंग का स्वर्गीय महल
मक्का-मदीना से कम पवित्र नहीं
मैं काशी में उन आर्यों का शंख-नाद सुनता हूँ" shukrea bhayea ke aapne ye adbhut kavitaa share kee ...

विमलेश त्रिपाठी said...

सचमुच कविता यह जाहिर करती है कि कवि का कोई एक देश नहीं होता, कोई एक समुदाय, धर्म या जाति नहीं होती. वह अपने रचना और जीवन दोनों में ही सार्वभौम होता है, या उसे होना चाहिए. क्या इसे हम अपना दुर्भाग्य कहें कि इतनी सी बात और इतनी बड़ी बात आज तक हम लोगों ने नहीं समझी...
शमरशेर जैसे रचनाकार और "अम्न का राग" जैसी कविताएं इस तथ्य की ओर इशारा करतीं हैं...

इतनी अच्छी कविता के लिए, खासकर तब जब एक बार फिर एक बहुत बड़ा हुजूम गुमराही की ओर अग्रसर हो रहा है, आपका बहुत आभार....

Prasanna said...

अद्‌भुत! इतनी अच्छी-अच्छी रचनाएँ साझा करने के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

प्रवीण पाण्डेय said...

हमारे इतिहास की वाणी उतनी ही मधुर है जितनी हमारी अभिव्यक्ति।

Parul said...

speechless!

शरद कोकास said...

ये आँखें हमारे इतिहास की वाणी
और हमारी कला का सच्चा सपना हैं
ये आँखें हमारा अपना नूर और पवित्रता हैं
ये आँखें ही अमर सपनों की हक़ीक़त और
हक़ीक़त का अमर सपना हैं

हक़ीकत का यह अमर सपना कितना पूरा हुआ है शमशेर जी होते तो देखते ।
यहाँ नवागढ में रहने वाले अपने भाई तेजबहादुर को भी उन्होने इस तरह इस कविता में स्थान दिया अच्छा लगा ।

डॉ .अनुराग said...

अद्भुत !!!