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बही-खाता : ११ : मनीषा कुलश्रेष्ठ





एकल उड़ान

खुद को औरों से अधिक बुद्धिमान दिखाने की इच्छा, चर्चित होने और मरने के बाद याद रखे जाने की चाह जैसी बहुत - सी वजहें होती हैं लिखने के पीछे. शब्दों से ही समाज बदल डालने और लोगों की जिन्दगियों पर असर डालने जैसे कई - कई मुगालते होते हैं लिखने वालों को. मैं इन सारे मुगालतों से थोडा - थोडा ग्रस्त जरूर हूं पर मुझे पता है कि ये गंभीर वजहें नहीं हैं मेरे लिखने की.

अपनी अनवरत, अंतहीन यायावरी के दौरान, जगह – जगह से बटोरे गए सूखे तनों-जड़ों की ही तरह जो भी अनुभव भीतर- बाहर सहेजा, उसी की अस्तव्यस्त पोटली में से हर बार कुछ नया निकाल कर, उन पर ‘प्राईमर’/‘टचवुड’ लगा कर नई कलाकृति में ढालने की प्रवृत्ति ही प्रमुख रही है.

ज़्यादातर लोग अपने आप से बाहर नहीं निकल पाते, केवल अपनी कहानियां लिखना अकसर लोगों को मज़ा देता है. मुझे वह आसान लगता है. खुद को तरह - तरह के आकर्षक रंग पोत कर, निर्दोष बना कर कहानी में बिठा देना आसान कवायद है. वहाँ चुनौती नहीं, असली चुनौती है, दूसरों के भीतर बैठकर लिखना. खास तौर पर दूसरे जेण्डर या बिलकुल दूसरे तबके या दूसरे समाज के व्यक्ति के भीतर घुस कर लिखना.

गफूरिया, सुगना ढोलण, कुरजाँ डाकण, ‘खरपतवार’ की अनाथ, आवारा गोअन लड़की, ‘ऎडोनिस का रक्त और लिली के फूल’ में युवा लेफ्टीनेंट के भीतर सेंध लगाना आसान कवायद नहीं था मगर बहुत रोमांचक था. ओह! वही मुझे आनन्द देता है. इन चुनौतियों को जीने का विशुद्ध आनन्द ही मुझसे लिखवाता है. निसंदेह इस तरह काया बदल कर लिखना, किसी छोटे जहाज की एक एकल उड़ान की तरह है, उसमें आपके भीतर का सजग पाठक ही नेवीगेटर की तरह का काम करता है. मैं लेखक कैसी भी होऊं, मुझे पता है मैं एक शानदार पाठक रही हूं. इसलिए इस एकल उड़ान की चुनौती मुझे हमेशा उत्साह से भर देती है.

हर बार की एकल उड़ान के बाद भी हर नई कहानी लिखने से पहले तो आत्मविश्वास डोला ही हुआ होता है. कभी जब बहुत कुछ तय करके लिखने बैठ जाऊँ तो कोरे काग़ज़, कोरी स्क्रीन...के सामने आते ही किसी भोंदू छात्र की तरह किंकर्त्व्यविमूढ़ हो जाती हूँ...और डूडलिंग करके पन्ना बन्द. और कभी लिखास जब हावी होती है तो लिपपेन्सिल से ही पेपर नैपकिन पर लिखना पड़ जाता है. या अन्धेरे में बिना किसी को जगाए, टेलीफोन पैड पर लिख तो देती हूँ जिसे सुबह पढने में मुझे ही मुश्किल होती है, मन करता है कैमिस्ट से पढ़वा लाऊँ. यह सच है कि हर नई कहानी के साथ स्वयं को सीखने वालों की कतार में ही पाती हूँ, भाषा, शिल्प और कहन व अभिव्यक्ति की क्षमता हर बार कम पड ज़ाती है.

हर लेखक की तरह मैं भी चाहती हूँ मेरे लेखन का सिग्नेचर स्टायल हो. मगर मैं जानती हूँ कि कहानी का और लेखक का, दोनों का ही विकास सीधी लकीर में या किन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर नहीं होता. साहित्य ही कौन सा सिद्धान्तों पर चलता है, वह चलता है, अपनी अलमस्त कलात्मक चाल. पीछे छूटे निशानों पर लोग मील - पत्थर बनाते जाते हैं, सिद्धान्तों - वादों - धाराओं के रूप में. इसलिए हर लेखक का विकास भी अलग - अलग अनुभवों और अलग - अलग किस्म की समस्याओं से जूझ कर होता है, और अन्तत: वह जिस तरह से विकसित होता है, उसे दूसरों से नितान्त भिन्न होना ही चाहिए.

मैं जब लेखन की दुनिया में आई थी तब मेरे पास अपनी सुसंस्कृत भाषा तो थी, कुछ अलग किस्म का अनुभव संसार भी था, मगर दर्शन, इतिहास और राजनीति, वैचारिकता और संस्कृति के अथाह समन्दरों में गोते मैंने नहीं लगाए थे. लेकिन मैं यह जानती थी कि अनुभव छोटा या बड़ा नहीं होता उसकी अभिव्यक्ति और कलात्मकता छोटी - बड़ी होती है. क्योंकि एक ओर 13 वर्ष की छोटी - सी जिन्दगी एक तहखाने में गुजार कर, डायरी लिख कर, एन फ्रेंक अमर हो गयी दूसरी ओर दर्शन, इतिहास और संस्कृति के अथाह समन्दरों में गोते लगा कर, लम्बी उम्र जिए कई लेखक उसके जितनी प्रसिद्धी न पा सके.

कथा लेखन की मेरी इस छोटी सी यात्रा में, मेरे स्थूल अनुभव तो वैसे ही रहे, जैसे सभी के होते हैं मसलन ढेर सारे बने - बनाए ढांचे, विमर्शों के रेडीमेड खांचे. पीछे एक लम्बा कथा - संसार और आगे भविष्य की कहानी की चुनौती. शिल्प और कथ्य को लेकर नवीन प्रयोग की चुनौती देता आज की कहानी का विस्तृत संसार और वहीं प्रयोगों की असहज कृत्रिमता के प्रति मेरा एक व्यक्तिगत आन्तरिक विरोध. कहानी लिखते हुए कथ्य और शिल्प के प्रयोग के लिए, मैंने कोई प्रयोगशाला नहीं जमाई, परखनली, बने बनाए रासायनिक मिश्रणों, स्प्रिट लेम्प का सहारा नहीं लिया. मगर फिर भी कहानी एक पूरी लम्बी प्रक्रिया के बाद मुझमें पूरी सघनता और संश्लिष्टता के साथ अवक्षेपित यानि प्रेसिपिटेट होती रही है. मेरे सूक्ष्म अनुभव बहुत गहरे और उलझाने वाले रहे हैं. 'कहानी से तटस्थ रहने की' बड़ों की नसीहत के बावजूद कहानी हमेशा मेरे वजूद पर चढ क़र बोलती है, कहानी मुझमें हदें पार कर जाती है.

वर्षों तक मैं कहानियों की एक अच्छी समझ वाली पाठक रही हूँ, तब भी अच्छी कहानी मुझ पर प्रेत की तरह डोलती थी. सोते - जागते, उठते - बैठते. अब लेखक के तौर पर भी मैं कहानी को खुद पर हावी होने से रोक नहीं पाती, जैसा कि कुरज़ां के अन्त में कहानी का नायक अपने मृत्यु के पहले लिखे नोट में कहता है _''स्मृति द्वारा वापस लाकर अतीत की चीज़ों को मोटे तौर पर देखना और बात करना तो आसान है, डॉक्टर पर बारीक कहानी बुनना, अतीत की आवारा रूह को अपनी देह पर बुलाने जैसा होता है. मैं बहुत पस्त मगर मुक्त महसूस कर रहा हूँ.''

इस अनुभव से अन्तत: मैंने यही जाना है कि कहानी चाहे दूसरों के अनुभव पर लिखी गई हो या स्वानुभूत हो, लिखते समय हर कहानी के भीतर होकर खुद गुजरने के अलावा लेखक के पास कोई चारा नहीं होता, शुरु से लेकर आखिर तक यह रास्ता तय करना ही होता है _ कदम - दर -कदम. फिर चाहे वह कहानी अच्छी साबित हो या बुरी.

कहानी क्या है? महज कुछ संवाद, कुछ गुफ्तगू, कुछ आवाजें, या फिर अमल या हरकतें. लेखक की हजारों नजरों से देखी गई,यह नई - सी लगती कहानी की दुनिया , वही अपनी पुरानी दुनिया है! मेरी समझ से, जिस कहानी को महसूस करने में और लिखने में लेखक की पांच इंद्रिया कम पडती हों और उस कहानी को महसूस करने के लिए पाठक की भी पांचों अनुभूतियां काम जाएं बल्कि दो चार अनुभूतियां उसे जगानी पड ज़ाएं तो वही सच्ची कहानी है.

अनुभव जगत का अपार विस्तार हो, सटीक अभिव्यक्ति का वरदान हो और भाषा उंगलियों पर नाचती हो तो घने नम जंगलों से लेकर रेगिस्तानी धोरों में तरह-तरह के सांपों की तलाश में भटकता गुनगुनाता, मौलिक लोकगीत रचता कालबेलिया भी कथाकार हो जाता है.

यायावरी और अनुभव जगत में लगातार होते विस्तार ने, मन को एक किस्से - कहानियों से लबालब पात्र बना दिया था जिसे एक न एक दिन छलकना ही था. अब छलका है तो रीतने तक लिखना ही होगा. कथा लेखन वैसे तो सृजन की सुखद अनुभूति है. मगर कथानक के डिंबस्थ होने से लेकर कहानी के जन्म लेने तक पीडा और सुख दोनों साथ चलते हैं.

****
{चर्चित युवा कथाकार . तीन कहानी-संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित.
चित्र-कृति शिव कुमार गाँधी की. इस स्तंभ के अन्य लेखक यहाँ. }
15 comments:

नयी परिभाषात्मक यात्रा।


"यायावरी और अनुभव जगत में लगातार होते विस्तार ने, मन को एक किस्से - कहानियों से लबालब पात्र बना दिया था जिसे एक न एक दिन छलकना ही था. अब छलका है तो रीतने तक लिखना ही होगा." कहानी स्वयं में एक यायावर विधा है .. कविता आस-पास को देखती है , घूरती है , एकल उड़ान भी भरती है पर कई कोने छूटते जाते हैं ... घुमक्कड़ी नहीं हो पाती . कुछ बिम्ब .. फंतासी , गाढ़े रंग होते हैं लेकिन एक छोटे कैनवास पर सब कुछ उलीचने जैसा रहता है .


han yahi kahani hai.....jabardust....soch...aur samajh dono...hi jabrdust....


मनीषा जी की अनुभव यात्रा पठनीय है


सुंदर.आत्मीय.
जब भी शोर-गुल से अलग होकर आपके लिखे हुए को याद करता हूँ तो आश्वस्त होता हूँ कहानीकार ही होना था आपको.

यह बिल्कुल सही है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ नें विषय चुने और उनपर कहानियाँ लिखी.चाहे वह स्वांग हो या कुरजां या फिर भगोड़ा.लेखिका के रूप में उनकी यह प्रतिबद्धता आयोजित भोगे हुए सचों पर सीरीज लिखने से ज्यादा महत्वपूर्ण है.मैं तुलना नहीं कर रहा पर मुझे विषयो पर शोध करके कहानियाँ लिखनेवालों में संजीव की भी हमेशा याद आ जाती है.

यह डायरी जैसा निश्छल,विनम्र गद्य पढ़कर मुझे लगा जिसके भीतर ऐसी सिनिग्ध भाषा हो उसे लेखक के अलावा कोई दूसरी भूमिका चुननी भी नही थी

रही बात प्रसिद्धि की तो मैं इसे गैर ज़रूरी मानता हूँ.किसका लेखन हमारे भीतर लौ की तरह कौंधता है,किससे हमारी पाठकीय संगति बन जाती है यह मुख्य होते हैं.मैं हमेशा सोचता हूँ.बदनामी की तरह प्रसिद्धि भी संक्रामक होती है.फैलती है तो फैलती जाती है.

शैलेश मटियानी को उतनी प्रसिद्धि नहीं मिली,वे प्रसिद्धि का उद्योग चलानेवालों को नहीं रुचे तो क्या इबू मलंग और अर्धांगिनी तो सांस लेते हैं दिलों में

पर यह सच है कि लेखक प्रसिद्धि भी चाहता ही है.इसे लेखन के संकट की तरह देखा जाना चाहिए कि हमारे समय मे प्रसिद्धि ही विज्ञापन है,अक्सर विज्ञापन ही प्रसिद्धि

पढकर अच्छा लगा


बहस सधी हुई, शानदार सहेजने लायक पोस्ट, आजकल कहानियों से ज्यादा ऐसे लेख पढने में मज़ा आता है.


जाहिर है अब वो जमाना नहीं रहा जहाँ लेखक किसी दूसरी दुनिया का प्राणी था ....सूचनाओ की इस भीड़ के जंगल में उससे सीधे संवाद की गुंजाईश है ....ओर उसके निजी जीवन में झाँकने की भी .जहाँ से वो आम मनुष्य की तरह दिखता है ...
मानवीय गुण दोषों से भरपूर ...यश की वेटिंग लिस्ट में अपना नाम लिखवाने को आतुर ....उसकी दूसरी जगह किसी विषय पर टिप्पणिया कमोबेश उसके व्यक्तित्व के एक पहलु से फ़ौरन पर्दा उठा देती है .....बेरहमी से .कहने का आशय ये है के आज के लेखक के पास इस टेक्नोलोजी के गर फायदे है तो शायद नुक्सान भी है ..... बरहाल ..अब जब लोगो को बारीकी से प्रेम चंद का पोस्ट मार्टम करते देखता हूँ तो हैरानी होती है ...".मन्त्र" में कोई भाषा शिल्पता नहीं थी ....न ही लेखक की विद्धता किसी हिस्से पर हावी होकर आंतकित करती थी ....
वो सीधे दिल से उतरी थी ओर जेहन पर आज भी कायम है ......ऐसा ही हमीद का चिमटा......शायद ये भी लेखक के एक सिग्नेचर है ..इसका ये आशय कतई नहीं के जिनके पास इसकी योग्यता है .वे उनकी खामिया है ....कहने का मतलब है कहानी का कंटेट लेखक से महत्वपूर्ण ना हो...कहानी जटिल ना हो जाए ...........किसी ने कहा था एक अच्छा लेखक बन ने के लिए एक बड़ा पाठक बन ना जरूरी है .सच कहा था .....किताबे ओर दूसरे तमाम तजुर्बे हमें शायद कुछ द्र्श्यो ओर कुछ घटनाओं को एक ओर सिरे से देखने के हमारे नजरिये को पैना करती है .....ओर शायद हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में मदद.......किसी इंटर व्यू में कुंवर नारायण जी ने कहा था कवी अपने समय का चौकीदार होता है........उसे ये जिम्मेवारी भूलनी नहीं चाहिए ....कविता केवल स्वंय का एक्टेंशन नहीं है ....
शायद कहानी भी अपनी जिम्मेवारी निभाती है .....
आपकी स्वीकारोत्ती भली लगी ....
.


रचना कर्म से रूबरू कराती ये अंतर्यात्रा सभी के लिए उपयोगी है ..उन सब के लिए जो लिखते हैं एक अजीब सी बेचैनी के साथ और जो कभी ये निश्चित नहीं कर पाते की वो बेचैनी क्या है ...!


कहानी में पाठक को अनुभूतियों का जगाने की ज़रुरत नहीं पड़ती .. वह कथाकार की एकल उड़ान में कब में शामिल हो जाता है पता नहीं चलता .. कविता में या निबंधों में आप चाह कर भी ये अनुभूतियाँ इस तीव्रता के साथ जगा नहीं पाते . कुछ अनुभूतियाँ अपरिचित-सी रह जाती हैं .. कहानी में हर पात्र आपसे बतियाता है और ये बातें उतनी ही आत्मीय होती हैं जितनी लेखक को उस सुख -दुःख से गुज़रते हुए लगी होंगी .
कहानी को किसी प्रयोगशाला की कहाँ ज़रुरत है .. वह कोई कोहलर थ्योरी की तरह बखान करने नहीं बैठेगी कि बादलों में बूंदों का बनना थर्मोडायनामिक्स से जुड़ा है ... एक बादल है जो घनीभूत हुआ और बरस गया . जिसने खिड़की से झाँका उसने सिर्फ बरसने का आह्लाद लिया और जो बाहर निकल कर भीग गया उसका आनंद गूंगे का गुड़ मानिए .
लेखन में सिगनेचर .. शायद इसकी ज़रुरत कथाकार को नहीं पड़ती. किसी स्टाइल के खांचे में जानबूझ कर गिरने और ढलने की उसे आवश्यकता ही कहाँ होती है .. वह तो अपने सांचे खुद गढ़ता है और उसमें पाठक को उतार देता है ... ये पाठक का विसर्जन होने जैसी अनुभूति है .. विसर्जन के सुख की अनुभूति.
मनीषा जी , आपकी ये अनवरत यायावरी यात्रा सुख दे गयी . आपने अपने जगत में उतार ही लिया . आभार


किसी भी लेखक के लिए अपने लिखने का मुकम्मल कारण खोज बता पाना बहुत सरल नहीं होता, और यह काम कठिनतर हो जाता है जब बताए गए उब कारणों को अपने लिखे हुए के बर-अक्स हँसते मुस्काते हुए रखना हो. मनीषा ने यह कठिनतर काम भी किया है. इसके लिए उन्हें साधुवाद. किसी लेखक को किस विषय पे क्या लिखना है वह अक्सर क्या कभी भी उसके हाथ में नहीं होता और कई कई बार जो लिखना होता है, वह इतना जटिल होता है कि किन्ही कसौटियों का मान रखते हुए विषय की सच्ची से न्याय नहीं किया जा सकता और लेखक की पहली पक्षधरता अपने लिखे हुए के प्रति होतो है, भले ही उस से लिखने के पूर्व घोषित कारण झूठे पड़ जाते हों. इसलिए, सच तो यह है कि लेखक के लिए लिखने का कोई भी कारन अंतिम नहीं होता. वह बार बार नए चेहरे के साथ लेखक के सामने आता है और अचंभित करता है.. सच कहूँ तो यह अचम्भा भी लिखने के एक सुख की ही तरह है...
अशोक गुप्ता
मोबाईल 9871187875


एक कहानीकार की कथा यात्रा का यह बहुत साफ सुथरा बयान दिखता है. कहानी पहले कही जाती थी, अब लिखी जाने लगी है. उसका असली रूप उसके कहे जाने में ही होता है पर मंजी हुई भाषा उसे और सुन्दर बना देती है. मनीषा जी की कहानियां मैने पढ़ीं हैं, उनके पास अनुभवों का अथाह संसार है तो बान्धकर अपने साथ बहा ले जाने वाली भाषा भी. और मैं कहता हूं घट रीतेगा नहीं क्योंकि कहने के साथ देखने और सुनने का सिलसिला भी तो चल रहा है. कुछ बूंदें बाहर झील रच रही होती हैं तो कुछ दर्द के बादल बरस कर घट को भरते भी तो रहते हैं.


मनीषा तुम्‍हारा ब्‍लाग आज पहली बार दिखायी दिया वो भी चिठटा चर्चा के माध्‍यम से। बड़ा अच्‍छा लिखा है बस अभिभूत सी पढ़ती ही चले गयी। बधाई।


प्रभावित करने वाली सहज अभिव्यक्ति।


मनीषा दीदी, आपने अपनी रचनात्मकता के सूत्रों पर बेबाक लिखा है. अच्छा लगा आपको इस तरह जानना.


आप को पढा....अच्छा लगा....हमेशा ही जानने की उत्सुकता कुलबुलाती रह्ती है...इसी तरह पाठ्कों से संवाद बनाये रखिये...करीब लगेंगी....


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संपादन : अनुराग वत्स.

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